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आधुनिक अनुसंधान

                                                      विज्ञान के बिना पूर्वानुमान कैसे संभव है !                        

      पानी से  भरे गहरे गड्ढे में कोई चीज गिर गई हो वो कहाँ है | इसे खोजने के दो प्रकार हैं | कोई ऐसा यंत्र खोजा जाए जिसके सहयोग से पानी के अंदर देखा जा सकता हो | ये वैज्ञानिक प्रकार है और दूसरा अंदाजे से उस  वस्तु  को खोजा जाए | मिले तो मिल जाए न मिले तो न मिले |  
   इसीप्रकार से मौसम संबंधी  कोई प्राकृतिक घटना या महामारी जैसी कोई घटना भविष्य में कब घटित होगी | यह पता लगाने के लिए दो प्रकार हैं | एक तो अनुसंधानपूर्वक कोई ऐसा यंत्र खोजा जाए | जिसके सहयोग से भविष्य में झाँका जा सकता हो | उसकी मदद से भविष्य में घटित होने वाली संभावित घटनाओं को पहले से देख लिया जाए  और दूसरा बिना किसी वैज्ञानिक आधार के ऐसी घटनाओं  के बिषय में अंदाजा लगाया जाए | जो सही गलत कुछ भी निकल जाए | 
      ऐसी किसी अनुसंधान के प्रारंभिक दौर में जब पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान विकसित नहीं हुआ होता है,  तब तो प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों के बिषय में अंदाजा लगाकर तीर तुक्के बैठाना अनुसंधान कर्ताओं की मजबूरी थी | इससे जितनी मदद मिल जाए उतनी बहुत थी और न मिल जाए तो न मिले | मजबूरी में किया भी क्या जा सकता था | जो होना था वो तो होना ही था |
    कोई बच्चा जब छोटा होता है उस समय तुतला कर बोले तो सुनकर प्रसन्नता होती है किंतु वही बच्चा जब बड़ा हो जाए | उस समय भी वैसे ही तुतलाता रहे तो उसे सुनकर प्रसन्नता की जगह चिढ़ लगने  लगती है लोग कहने लगते हैं कि आखिर कब तक तुतलाते रहोगे !
    इसी प्रकार से वैज्ञानिक अनुसंधान जब प्रारंभिक काल में थे तब तो इनका तुतलाना ठीक लगता रहा किंतु भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की स्थापना 15 जनवरी 1875 को हुई थी | लगभग डेढ़ सौ वर्ष बीत चुके हैं | अब तो विज्ञान को सफलता के शीर्ष पर बताकर इस पर गर्व किया जाने लगा है | विज्ञान जब इतना बड़ा हो गया है तब तो तुतलाना बंद होना चाहिए | ये विभाग आखिर कब तक तुतलाता रहेगा | ऐसे मंत्रालयों के संचालन पर एवं इनसे संबंधित मंत्रियों अधिकारियों कर्मचारियों के पारिश्रमिक या सुख सुविधाओं पर भारी भरकम धनराशि व्यय की जाती है |अनुसंधानों के नाम पर जो तामझाम खड़े किए जाते हैं | उन पर देशवासियों के धन का बहुव्यय किया जाता है | बदले में वही तीर तुक्के  जो आज के डेढ़ सौ वर्ष पहले लगाए जा रहे थे | यह पता लगाने के लिए अभी तक कोई  वैज्ञानिक अनुसंधान प्रक्रिया नहीं खोजी जा सकी है कि आगामी वर्षा ऋतु में वर्षा कब और कैसी होगी | इस वर्ष कैसी कैसी प्राकृतिक घटनाएँ  आपदाएँ आदि घटित हो सकती हैं | इसका पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं खोजी जा सकी है | 
     ऐसी ही स्थिति कोरोना जैसी महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की है | किस वर्ष के किस महीने में कोई महामारी आ सकती है | इस बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान होता तो कोरोना महामारी या उसकी लहरों के बिषय  में सही पूर्वानुमान लगा लिया गया होता | इसके लिए जो प्रयास किए भी जाते रहे वे गलत निकल जाते रहे |  
     किसी भी प्राकृतिक आपदा या महामारी से  सुरक्षा के लिए  बचाव की बड़े स्तर पर तैयारियाँ  करनी होती हैं | उन तैयारियों में जो समय लगता है | उस घटना के बिषय में उतने पहले यदि पूर्वानुमान पता लग जाए तब तो उससे सुरक्षा के लिए कुछ  प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते हैं | इसके अतिरिक्त कुछ भी कर लिया जाए किंतु उससे प्राकृतिक आपदा या महामारी पीड़ितों को चाहकर भी मदद नहीं पहुँचाई जा सकती है | प्राकृतिक आपदाओं एवं कोरोना महामारी के समय यह उन्नत विज्ञान जितना सहायक हुआ है | भविष्य के लिए भी उससे अधिक आशा नहीं की जानी चाहिए | ऐसे पूर्वानुमान लगाने की दिशा में यदि कोई विज्ञान नहीं है तो संकोच किस बात का | भारत के प्राचीन विज्ञान का लाभ ले लेना चाहिए |  
     
     दो शब्द 
       किसी देश पर यदि दुश्मन देश अचानक आक्रमण कर देता है तो उस समय तो उस देश का सबसे पहला कर्तव्य  उस आक्रांता को पराजित करके उससे अपने देश को सुरक्षित बचाना होता है | आक्रांता को खदेड़  दिए जाने के बाद वह राजा अपनी  सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करता है और पता लगाने का प्रयत्न करता है कि हमारे गुप्तचर लोग शत्रु के द्वारा किए गए आक्रमण की जानकारी समय से पता लगाने असफल क्यों रहे | ये उनकी  लापरवाही थी गद्दारी थी या उनमें  ऐसी गुप्त सूचनाएँ पता लगाने की योग्यता ही नहीं है |इस प्रकार से आत्म मंथन करता हुआ राजा उन विकल्पों पर बिचार करता है  जिससे दोबारा ऐसी  परिस्थिति पैदा न हो | 
       महामारी का आक्रमण भी एक प्रकार का युद्ध ही है | महामारी आने का पूर्वानुमान न लगा पाना  उन गुप्तचरों की असफलता है | जो महामारी से समाज की सुरक्षा करने के लिए अनुसंधान करने की जिम्मेदारी सँभाल रहे थे | महामारी से उन्हें समाज की सुरक्षा करनी थी |वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन क्यों नहीं कर पाए | ये उनकी लापरवाही थी या उनमें ऐसा करने की योग्यता नहीं थी | यदि ऐसा है तो सरकार को उन  विकल्पों पर बिचार करना चाहिए | जिनसे भविष्य में आने वाले महामारी जैसे संकटों से  समाज की सुरक्षा की  जा  सके | 
     आक्रमण दुश्मन देश के द्वारा किया गया हो या महामारी के द्वारा तुरंत की तैयारियों के बल पर इनसे अपनी सुरक्षा नहीं की जा सकती है | इन पर विजय प्राप्त करने के लिए मजबूत तैयारियाँ  पहले से  करके रखनी पड़ती हैं | ऐसा किया जाना तभी संभव है जब इनके बिषय में पूर्वानुमान पहले से पता हों | सही पूर्वानुमान लगाने के लिए किसी ऐसे विज्ञान की आवश्यकता होती है | जिसके द्वारा  भविष्य में झाँका  जा सके |  ऐसा कोई न तो विज्ञान है और न ही वैज्ञानिक  तो ऐसी घटनाओं के बिषय में  सही पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसके बिना सुरक्षा की तैयारियाँ 
पहले से  करके कैसे रखी जा सकती हैं | तुरंत की तैयारियों के बल पर ऐसा किया जाना कैसे संभव है | 
    इस प्रकार से महामारी से सुरक्षा के लिए यदि मजबूत तैयारियाँ ही नहीं थीं तो ये कैसे कहा जा सकता है कि महामारी बहुत भयानक थी | कोरोना महामारी के समय  जितना भी जनधन का नुक्सान हुआ है संभव है कि वह महामारी से सुरक्षा की तैयारियों के अभाव में हुआ हो | महामारियाँ  जनधन का नुक्सान करने के लिए ही जानी जाती हैं | इसलिए उनकी भयंकरता तो उनका स्वभाव ही है |अनुसंधान महामारी से समाज की सुरक्षा के लिए जाने जाते हैं | ऐसा नहीं किया जा सका ये अनुसंधानों की बड़ी असफलता है | महामारी से सुरक्षा के लिए यदि कोई व्यवस्था ही नहीं थी तो महामारी कितनी भी बढ़ती जा सकती थी |  उसमें महामारी का क्या दोष !महामारी को जब अभी ही नहीं समझा जा सका तो  ऐसे अनुसंधानों से भविष्य में संभावित महामारियों से समाज की सुरक्षा में क्या मदद मिल सकती है |     
                                       
                                                                         भूमिका 

     विगत दशकों में भारत को पड़ोसी शत्रु देशों के साथ तीन युद्ध लड़ने पड़े हैं | उन तीनों युद्धों में मिलाकर जितने लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे | उससे कई गुणा अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | ये   बहुत बड़ी चोट है |जो  भारत ने तो सही ही है इसके साथ ही साथ संपूर्ण विश्व ने सही है | ये भूलने और भुलाने लायक नहीं है |कोरोना महामारी से सुरक्षा के लिए भले कुछ न किया जा सका हो किंतु भविष्य के लिए तो मजबूत तयारी करके रखी जानी चाहिए ताकि भविष्य में महामारी के आगे मनुष्य इतना बेवश न हो | 
    बताया जाता है कि विगत  कुछ सौ वर्षों में कई बार महामारियाँ आती जाती रही हैं | उनसे जनधन का जो नुक्सान होना था वो होता रहा है | उस समय यदि उससे समाज की सुरक्षा नहीं की जा सकी तो वर्तमान समय कोरोना महामारी आई जब इतना उन्नतविज्ञान है विद्वान वैज्ञानिक हैं निरंतर अनुसंधान होते रहते हैं | इसके बाद भी महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाए जा सके | जो लगाए जाते रहे वे गलत निकल  जाते ते रहे | 
    इतना उन्नत विज्ञान होने के बाद भी ये नहीं पता लगाया जा सका कि महामारी पैदा कैसे हुई ! ये प्राकृतिक है या मनुष्यकृत ! इसका प्रसार माध्यम क्या है  ! विस्तार कितना है! इस पर मौसम का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान का प्रभाव पड़ता है या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! संक्रमण बढ़ने घटने का कारण क्या है !आदि !! महामारीके बिषय में ये  आवश्यक जानकारियाँ  नहीं  जुटाई जा सकीं | ऐसे प्रश्नों के निश्चित उत्तर नहीं खोजे जा सके |
     किसी रोग या महारोग को समझे बिना उससे सुरक्षा के लिए औषधि कैसे बनाई जा सकती है तथा किसी संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण से मुक्ति कैसे दिलाई जा सकती है | चिकित्सा के लिए रोग को पहचाना जाना आवश्यक है | 
    अनुसंधान मनुष्यों की सुरक्षा के लिए किए जाते  हैं |अनुसंधानों पर व्यय होने वाली भारी भरकम धनराशि जनता के द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए खर्च की जाती है | अनुसंधानों का प्रथम लक्ष्य भी जनसुरक्षा ही है | इसके बाद भी  उन अनुसंधानों के द्वारा महामारी में होने वाली जनसुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकी है  | 
    ऐसे  अनुसंधानों के द्वारा सुख सुविधाओं के संसाधन यदि खोज भी लिए जाएँ तो उनका क्या होगा !यदि मनुष्य ही सुरक्षित नहीं रहेंगे | इनका आनंद भी मनुष्य तभी ले पाएँगे, जब वे स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे | इसलिए महामारी समेत सभीप्रकार की प्राकृतिक आपदाओं अनुसंधानों का लक्ष्य मनुष्यों को  सुरक्षित  करना है | 
    विश्ववैज्ञानिकों ने महामारी के बिषय में जो अंदाजा लगाया है या जो कल्पना की है या संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए जो प्रयत्न किए हैं |उनसे  प्राप्त अनुभवों के आधार  पर  बिचार किया जाना चाहिए कि कोरोना महामारी से मनुष्यों की सुरक्षा करने में महामारीपीड़ितों को किस प्रकार की कितनी मदद पहुँचाई जा  सकी है |  ये मूल प्रश्न है | 
    महामारी संबंधी किसी औषधि या टीके के बिषय में विश्वासपूर्वक ये नहीं कहा जा सका कि इसका उपयोग कर लेने के बाद कोरोना संक्रमण से मुक्ति मिल ही जाएगी या इसके बाद संक्रमित नहीं होंगे |ऐसा भी नहीं कहा जा सका कि इस समय के बाद महामारी समाप्त हो जाएगी या महामारी की ये लहर समाप्त हो जाएगी | 
     महामारी आने वाली है | ऐसा कोई पूर्वानुमान भी नहीं लगाया जा सका !महामारी की कब कौन लहर आने वाली है |  इसका भी कोई सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका | महामारी जैसी इतनी बड़ी आपदा आ जाने के बाद जहाँ एक ओर बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते जा रहे हों | वहाँ दूसरी ओर  महामारी से मुक्ति दिलाने की तैयारी की जा रही हों | ऐसी आधी अधूरी  तैयारियों के बलपर महामारियों से मनुष्यों को सुरक्षित कैसे बचाया जा सकता है | महामारी से सुरक्षा की या मुक्ति दिलाने की तैयारियाँ भी तभी की जा सकती हैं जब महामारी को सही ढंग से समझ लिया गया हो | 

                                                                   विनम्र निवेदन
 
     प्रत्येकदुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के बीत जाने के बाद उससे सुरक्षा के लिए किए गए उपायों के बिषय में समीक्षा की जाती है| उसी प्रकार से कोरोना महामारी से सुरक्षा के लिए किए गए उपायों की भी समीक्षा की जानी चाहिए | उन उपायों को विशेषज्ञों की कसौटी पर कसने के बजाए समाज की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | अनुसंधान समाज के लिए किए जाते हैं | इसलिए उनसे समाज को कितनी मदद मिली ये समाज से पूछा जाना चाहिए | 
    दूसरा अनुसंधानों को साक्ष्यों  की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | ये पता किया जाना चाहिए कि जिन उपायों अनुभवों के द्वारा  महामारी से  समाज को सुरक्षित बचाने का  या संक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाने का श्रेय दिया जाता है | उसमें सच्चाई कितनी है ये परीक्षण किया जाना चाहिए | काल्पनिक रूप से आत्मपरीक्षण  किया जाना चाहिए कि महामारी  यदि अभी  फिर  से  घटित होने लगे तो पहले किए गए  उपायों अनुभवों से  समाज को सुरक्षित बचाने में कितनी मदद मिल सकती है | प्लाज्मा थैरेपी की तरह का भ्रम पाल लेना भविष्य के लिए हितकर  नहीं होगा   | 
   तीसरा परिस्थितियों के आधार पर बिचार किया जाना चाहिए कि महामारी की  कोई  बड़ी लहर यदि अभी कभी अचानक आ जाए तो बड़ी मात्रा में जनधन का नुक्सान  होना तो तुरंत प्रारंभ हो जाएगा |उस समय अनुसंधान आदि करने के लिए समय ही नहीं होगा | ऐसी स्थिति में  उतने कम समय में लोगों को महामारी से सुरक्षित  कैसे बचाया जा सकेगा |उतने बड़े  संकट से समाज की सुरक्षा के लिए कौन कौन उपाय किए जा सकते हैं | 
   चौथी बात महामारी आने के बाद तो उपाय के लिए समय मिलता नहीं है | महामारी का वेग ही इतना अधिक होता है | इसलिए महामारी से सुरक्षा के लिए या फिर संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए जो आवश्यक तैयारियाँ करनी होंगी | वो तो महामारी प्रारंभ होने से पहले ही करके रखनी होंगी | ऐसा तभी हो सकता है जब महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही सही पूर्वानुमान लगा लिया जाए | उसी के आधार पर महामारी से सुरक्षा की  तैयारियाँ करके रख ली जाएँ |इसलिए अभी तक किए गए महामारी बिषयक अनुसंधानों के द्वारा क्या यह पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा कि निकट भविष्य में महामारी की  कोई लहर आने वाली है या नहीं और है तो कब ! उसके अनुसार महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ पहले से करके रखी जा सकें |
    वस्तुतः समाज की सुरक्षा का लक्ष्य लेकर मैं चिंतित हूँ | इसलिए विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूँ कि यदि आधुनिक अनुसंधानों के द्वारा ऐसा किया जाना संभव हो सके तब तो कोई बात नहीं अन्यथा ऐसा करने में यदि किसी भी प्रकार का संशय लगे तो प्राचीनविज्ञान के आधार पर मेरे द्वारा किए गए अनुसंधानों के बिषय में परीक्षण पूर्वक बिचार कर लिया जाना चाहिए | 
    आधुनिक विज्ञान अभी सौ दो सौ वर्ष पुराना है उसके पास लाखों वर्ष के अनुभवों का संग्रह नहीं है |इस लज्जा से  इतिहास को छोटा करने के बजाए भारत के प्राचीन अनुसंधानों को आधार बनाकर अपनी प्राचीनता का परिचय दिया सकता है | भारत का प्राचीन विज्ञान लाखों वर्ष पुराना है | महामारियाँ तो हमेंशा से आती रही हैं | कोरोना महामारी की तरह यदि उन युगों में जनसंहार होता रहा होता तो सृष्टि का क्रम  आगे कैसे बढ़ पाता | उस आरंभिक काल में तो जनसंख्या भी बहुत कम रही होगी | बिना विज्ञान के महामारियों से समाज को सुरक्षित बचाया जाना कठिन होता | जिस प्राचीन विज्ञान की मदद से प्राचीन काल में समाज की सुरक्षा की जाती रही है | उसी के आधार पर कोरोना महामारी के बिषय में मैंनेअनुसंधान प्रारंभ किए उसके आधार पर  महामारी के बिषय में अनुमान लगा लगाकर पहले से पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | वे सही निकलते रहे हैं | महामारी की सभी लहरों के बिषय मेंपूर्वानुमान लगा लगाकर पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | वे भी सही निकलते रहे हैं | जो पीएमओ की मेल पर अभी भी विद्यमान हैं | 
     इतना ही नहीं दूसरी लहर जब दिनों दिन भयंकर रूप लेती जा रही थी | तरह तरह की तनावबर्धक डरावनी कल्पनाएँ  की जा रही थीं | उस समय 20 अप्रैल 2021 को महामारी शांत करने  के लिए मैंने जो उपाय किए | उनके प्रभाव से मेरे दिए हुए समय पर महामारी शांत होनी प्रारंभ हो गई थी | इस बिषय का पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को    ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो बाद में पूरी तरह सही सिद्ध हुआ | 
      ऐसी अनेकों मेलें  मैं पीएमओ  की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो बाद में सही निकलती रही हैं | उन मेलों के चित्र एवं उन घटनाओं के साक्ष्य  मैं इस पुस्तक  में प्रकाशित कर रहा हूँ | जिनका प्रमाणपूर्वक परीक्षण किया जा सकता है | उसके आधार पर मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि भविष्य में महामारियों से समाज की सुरक्षा  करने में मेरे अनुसंधान बहुत  उपयोगी हो सकते हैं |                                                               
                                                   

                                         हमारे  अनुसंधानों का परिचय  (पुस्तक की दूसरी हेडिंग 
   
     प्राकृतिक आपदाएँ एवं महामारियाँ घटित होती हैं | ये तो चिंता का बिषय है किंतु ऐसी प्राकृतिक घटनाओं को घटित होने से रोका नहीं जा सकता है | ऋतुएँ अपने निश्चित समय पर आती जाती हैं | सूर्य अपने निश्चित समय पर उगता  अस्त होता है | जिस प्रकार से सूर्यचंद्र ग्रहण अपने निश्चित समय पर घटित होते हैं |उसी प्रकार से  आँधीतूफान  वर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ अपने अपने निर्धारित समय पर घटित होती रहती हैं |ऐसे ही महामारियों के पैदा और समाप्त होने का समय निश्चित होता है | महामारी की लहरों के आने और जाने का समय निश्चित होता है | 
     ऋतुओं के आने जाने का एवं सूर्योदय सूर्यास्त आदि का निश्चित समय पता लगाने की गणितीय प्रक्रिया खोज ली गई है | सूर्य चंद्र ग्रहण  अपने निश्चित समय पर घटित होते हैं | प्रत्यक्ष देखने पर भले लगे कि इनके घटित होने का समय निश्चित नहीं होता है किंतु  इनके घटित होने का समय भी प्राकृतिक रूप से निश्चित होता है | उसे पता लगाने की  गणितीय प्रक्रिया अनुसंधानपूर्वक  पता कर ली गई है | जिसके आधार पर सूर्यचंद्र ग्रहणों के बिषय में सैकड़ों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | जो बिल्कुल सही निकलता है | 
    भूकंप वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात भी तो प्राकृतिक घटनाएँ है | सूर्यचंद्र ग्रहणों की तरह ही गणितीय प्रक्रिया से सभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | ऐसे ही  महामारी भी तो प्राकृतिक घटना ही है | सभी प्राकृतिक घटनाओं की तरह ही महामारी भी तो प्राकृतिक घटना ही है | इसके घटित होने का समय भी निश्चित होता है | जिसे गणित के आधार पर खोजा जा सकता है |  
     इस क्षेत्र में भी प्राचीनवैज्ञानिकों ने प्रयास प्रारंभ कर रखे थे |बहुत सारी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के कारण  लक्षण समय आदि खोज भी लिए थे | जिनका वर्णन प्राचीन  संहिता ग्रंथों में मिलता है | जिनके आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान  लगाए जाने लगे थे | उन्हें ग्रहणों की  तरह ही गणितीय सूत्रों में  बाँधना था | यदि वैसा किया जाना संभव हो पाता तो सूर्यचंद्र ग्रहणों की तरह ही गणितीय प्रक्रिया के द्वारा  भूकंप वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात आदि प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना संभव हो जाता | उन अनुसंधानों को उसी गति से आगे बढ़ाए जाने की आवश्यकता थी किंतु दुर्भाग्य से उन्हें न केवल वहीं रोक दिया गया | इसके बाद वो प्रक्रिया वहीं  छूट गई जिसे आगे बढ़ाया जाना था किंतु ऐसा नहीं किया जा सका | उसके जो भी कारण रहे हों |
                                                                      हमारी विनम्र वेदना
 
    परतंत्रता के समय आक्रांताओं के द्वारा उस ज्ञान विज्ञान से संबंधित वैज्ञानिक विधाओं और अनुसंधानों को नष्ट किया गया | प्राचीन वैज्ञानिकों  के द्वारा किए गए अनुसंधानों को या तो उठा ले जाया गया या फिर नष्ट कर दिया गया | जो नष्ट कर दिया गया वो किसी के काम का नहीं रहा और जो उठा ले गए वो इसलिए किसी के काम का न रहा क्योंकि वहाँ उस रिसर्च को आगे बढ़ाने में समर्थ लोग नहीं थे | इसलिए वो नष्ट हो गया | इस प्रकार से मानवता का बहुत बड़ा नुक्सान  हुआ है | 
     विशेष बात ये है कि उस ज्ञान विज्ञान का जो अंश जिस किसी भी प्रकार से उन वैज्ञानिकों के द्वारा सुरक्षित रखा जा सका | उसे आगे बढ़ाने के लिए जो रिसर्च किए जाने आवश्यक थे वो नहीं किए जा सके | उसका कारण ऐसे बिषयों  के विद्वानों के सामने आजीविका की समस्या रही इसलिए उनमें से बहुत लोग चाहते हुए भी ऐसे अनुसंधानों 
में रुचि नहीं ले सके | ऐसे बिषयों के जानकार बहुत लोग  सरकारी सेवाओं में आ गए  इसलिए कुछ ने ऐसे अनुसंधानों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं समझी और कुछ लोग ऐसे अनुसंधानों को करने में समर्थ नहीं हैं | 
सरकारें इसके लिए प्रयत्न कर रही हैं किंतु वे उन विद्वानों तक पहुँच नहीं पा रहीं हैं | जो ऐसा करने में समर्थ हो सकते हैं |            
    ऐसे विद्वानों को खोजने के लिए मैंने बहुत प्रयत्न किए किंतु मैं ऐसा करने में असफल रहा | अंत में मैंने अपना संपूर्ण जीवन लगाकर इस अनुसंधान में पिछले 35 वर्षों से लगा हूँ | उससे मौसम संबंधी दीर्घावधि एवं मध्यावधि पूर्वानुमानों को लगाने में  बड़ी सफलता मिली है |कोरोना महामारी की प्रत्येक लहर के बिषय में  बिल्कुल सही अनुमान  लगाने में सफल हुआ हूँ | जिसके साक्ष्य सुरक्षित हैं | सरकारों से अपेक्षा थी कि वे हमारे अनुसंधानों को आगे बढ़ने में मदद करेंगी किंतु  बार बार प्रयास करने के बाद भी मेरी सुनवाई नहीं हुई | मौसम एवं महामारी जैसे 
इससे अधिक प्रयास करना मेरे लिए भी संभव नहीं हैं | इसलिए ऐसे अनुसंधानों को  मुझे यहीं विश्राम देना होगा | मेरे बच्चों की इधर बहुत रुचि होने के बाद भी मैं उनसे यह कहने का साहस नहीं जुटा  पा  रहा हूँ कि वे मेरे इन अनुसंधानों को  आगे बढ़ाने में अपना जीवन लगाएँ | मैं चाहता तो प्रोफ़ेसर बनकर सुख सुविधापूर्ण जीवन जी सकता था किंतु ऐसा करने में मैं अनुसंधानों के साथ न्याय नहीं कर पाता | इसलिए मैंने अपना जीवन इस संघर्ष में झोंका है किसी दूसरे के जीवन के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहता | ऐसा हो सकता है कि वर्तमान समय में इस अनुसंधान मेंइस उँचाई  तक पहुँचने वाला   मैं अकेला व्यक्ति निकलूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | मैं भावी पीढ़ी से क्षमा  याचना के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं वो सफलता तुम तक नहींपहुँचा  सका जिसके तुम अधिकारी थे | 
     वैज्ञानिकों सरकारों एवं समाज से विनम्र निवेदन है कि एकबार आप अपने पूर्वजों के विज्ञान को पहचानिए और महामारी  के बिषय में मेरे द्वारा पीएमओ की मेल पर भेजे गए पूर्वानुमानों का कोरोना ग्राफ से मिलान करके परीक्षण कीजिए कि अपने प्राचीनविज्ञान के आधार पर लगाए गए महामारी बिषयक अनुमान पूर्वानुमान आदि कितने सही निकलते हैं | इसके साथ ही यह भी देखिए कि महामारी की दूसरी लहर को घोषणा पूर्वक रोकने में  प्राचीन विज्ञान कितना प्रभावी रहा है | यह भी समझिए कि महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने की जिम्मेदारी सँभाल रहे विश्व वैज्ञानिक महामारी को समझने एवं इसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने चिकित्सा करने में कितने सफल रहे | 

  पुस्तक के बाद  
                                                   
                                                                 
                                                       महामारी  बिषयक  अनुसंधानों से अपेक्षा  !

    प्रकृति में बहुत सारी घटनाएँ समय समय पर घटित होती रहती हैं |जिनसे मनुष्यों का नुक्सान न होने के कारण उनका पता ही नहीं लग पाता   है कि वे कब घटित हो रही हैं | उनसे कोई भय भी नहीं होता है | सघन जंगलों में मरुस्थलों में या समुद्रों में अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं |वहाँ  मनुष्यों की बस्तियाँ नहीं होती हैं तो उनसे किसी का  नुक्सान नहीं होता है | इसलिए उनसे  किसी को चिंता भी नहीं होती है |मनुष्यों की बस्तियाँ जहाँ होती हैं | प्राकृतिक आपदाओं  एवं महामारियों  से वहीं  नुक्सान होता है |उनसे सुरक्षा कैसे की जाए |इसके लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है | 
   महामारी आना और महामारी से संक्रमित होना ये दोनों अलग अलग प्रकार की घटनाएँ हैं | मनुष्यों का नुक्सान महामारी आने से नहीं,प्रत्युत महामारी में संक्रमित होने से होता है | इसलिए महामारी को समझने की अपेक्षा उस समय महामारी से सुरक्षा के उपाय खोजे जाने चाहिए | 
   महामारी काल में लोगों के संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने के लिए महामारी को जिम्मेदार बताया जाता है किंतु जिस प्रकार से वर्षा होने पर सभी लोग भीगते हैं | भूकंप आने पर सभी लोग  हिलते हैं | आँधी तूफ़ान से सभी प्रभावित होते हैं | ऐसे ही लोग  महामारी से लोग संक्रमित होते तो सभी होते | एक ही स्थान पर रहते हुए कुछ लोगों के संक्रमित होने एवं  बहुत लोगों के  संक्रमित न होने से महामारी के प्राकृतिक होने पर संशय होना स्वाभाविक है |       महामारी यदि मनुष्यकृत होती तो भी उससे कौन संक्रमित हो सकता है और कौन नहीं | इसका कोई तो निर्धारित मानक होता ! बूढ़े बच्चे स्वस्थ दुर्बल स्त्री पुरुष  आदि किस श्रेणी के लोगों  को इससे संक्रमित होने की अधिक संभावना है | इसलिए इसे मनुष्यकृत कहने का आधार भी खोजना होगा और अनुसंधान पूर्वक बताया जाना चाहिए कि  जो  संक्रमित हुए और जो  संक्रमित नहीं हुए उनमें क्या अंतर था | बहुत लोग पूरी तरह स्वस्थ बलिष्ठ थे उन्हें भी संक्रमित होते देखा गया था | बहुत लोग दुर्बल थे  उम्र भी अधिक थी वे संक्रमितों के साथ रहकर भी संक्रमित नहीं हुए | इसलिए संक्रमित होने या न होने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण खोजा जाना चाहिए |  
    संपूर्ण जनसंख्या का यदि आधा चौथाई भाग संक्रमित हुआ तो वे संक्रमित क्यों हुए और बाक़ी जो लोग संक्रमित नहीं हुए तो वे संक्रमित क्यों नहीं  हुए | उनके संक्रमित न होने का कारण पता लगाया जाना चाहिए | जिस  प्रकार या कारण से कुछ  लोग  संक्रमित होने से बचे रहे |रिसर्च पूर्वक वो कारण खोजकर उसीप्रकार से बाक़ी लोगों की भी सुरक्षा का प्रयत्न किया जाना चाहिए | ऐसा यदि किया जा  सका होता तो उन लोगों  को भी संक्रमित होने से सुरक्षित बचाया जा  सकता  था | जो संक्रमित हुए हैं |  ऐसा किया जाना यदि संभव हो पाता तो महामारी आई थी ये पता ही नहीं लग पाता !
                                                        
      
                                      
                                              प्रयत्न और परिणामों  में अंतर के कारण की खोज !
 
    किस प्रकार के रोगियों के स्वस्थ होने में चिकित्सकीय प्रयासों की क्या भूमिका होती है इस बिषय में यदि बिचार किया जाए तो चिकित्सालयों में चिकित्सक लोग बहुत रोगियों को स्वस्थ करने के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न करते हैं उस हिसाब से यदि प्रयत्नों के परिणाम मिलते तो उन सभी रोगियों को स्वस्थ हो जाना चाहिए था | यदि प्रयत्नों में भेद भाव नहीं हुआ तो परिणामों में भेद भाव होने का कारण क्या है | 
    इस बात का पता लगाया जाना कैसे संभव है  कि जो स्वस्थ होते हैं वे चिकित्सा के प्रभाव से स्वस्थ होते हैं और उसी चिकित्सा व्यवस्था के आधीन रहकर भी जो रोगी  अस्वस्थ बने रहे  या जिनकी मृत्यु हो गई |उस अस्वास्थ्य और मृत्यु होने के कारण को खोजे बिना रोगों या महारोगों से पीड़ितों पर चिकित्सा के प्रभाव का आकलन कैसे किया जा सकता है | 
   चिकित्सा का लाभ ले रहे रोगियों में से जो लोग स्वस्थ हुए | उसका श्रेय यदि चिकित्सकों के चिकित्सकीय प्रयत्नों को दिया जाए तो उन्हीं चिकित्सकों ने उसीप्रकार के चिकित्सकीय प्रयत्न तो उन रोगियों को भी स्वस्थ करने के लिए किए थे जो प्रयत्नों के बाद भी अस्वस्थ बने रहे या उसीप्रकार की चिकित्सा का लाभ लेने के बाद जिनकी मृत्यु हुई है | उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा  | चिकित्सक एक चिकित्सा एक तो परिणाम अनेक होने का कारण क्या है | उनमें से मृत हुए लोगों की मृत्यु होने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण किसे माना जाएगा | |
   चिकित्सकों के प्रयत्नों के बाद तो तीन प्रकार की घटनाएँ  घटित हुई हैं | कुछ रोगी स्वस्थ हुए हैं कुछ अस्वस्थ रहे हैं और कुछ मृत्यु को प्राप्त हुए हैं |इन तीनों प्रकार की घटनाओं में से चिकित्सकों के प्रयत्नों का परिणाम किस प्रकार की घटनाओं को किस आधार पर मान लिया जाए | 
       जिस प्रकार से कोई गाड़ी यदि बिगड़ जाए तो उसे ठीक करवाने के लिए किसी वर्कशॉप  में ले जाया  जाता है | जहाँ  से वो ठीक होकर ही निकलेगी | ऐसा भरोसा होता है | इसीलिए गाड़ी को ठीक करने का श्रेय उन्हें दिया जा सकता है | 
   ऐसे ही चिकित्सालयों में स्वस्थ होने के लिए ही रोगी लाए जाते हैं | उन्हें स्वस्थ करने के लिए  चिकित्सकों के द्वारा संपूर्ण प्रयास किए जाते हैं | इसके बाद भी उस रोगी पर यदि चिकित्सा का प्रभाव नहीं पड़ता है | रोगी रोग मुक्त नहीं हो पाता है और यदि रोगी की मृत्यु हो ही जाती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं माना जाता है ,क्योंकिऐसा हो सकता है | इसके लिए अस्पताल प्रबंधन पहले से तैयार होता है तभी तो  चिकित्सालयों में शव रखने के लिए शवगृह पहले से ही बनाकर रख लिए जाते हैं | 
     ऐसी ही स्वास्थ्य समस्याओं का सामना महानगरों में साधनसंपन्न लोगों को करना पड़ता है | इन्हें तो सभी संसाधनों से युक्त महँगी से महँगी चिकित्सा सेवाएँ सुलभ हो जाती हैं | इसके बाद भी महानगरों में बड़े बड़े चिकित्सालयों में भी शवगृह  बनाने पड़े हैं | कोरोना काल में अत्यंत विकसित देशों में भी सुयोग्य डाक्टरों की देखरेख में वेंटीलेटरों पर पड़े लोगों की भी मृत्यु होते देखा जाता रहा है |परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता विहीन लोगों की सुरक्षा कैसे की जा सकती है |  
    तार्किक दृष्टि से तो ऐसा सोचा जा सकता है | इन वैद्यों डाक्टरों तांत्रिकों  के बहुत प्रयत्न करने के बाद भी बहुत लोगों को स्वस्थ नहीं किया जा सका औरबहुत  लोग मृत्यु को प्राप्त हुए | उनके स्वस्थ न होने या रोग बढ़ते जाने या मृत्यु हो जाने के बाद  यह खोजना आवश्यक  हो जाता है कि किसी रोगी के  स्वस्थ होने में चिकित्सा की भूमिका क्या और कितनी है |
  महामारी और प्राचीनविज्ञान  

      कोरोना महामारी को यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ माना जाए तो इसके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने योग्य साक्ष्य कुछ ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ हो सकती हैं | जो सामान्य रूप से पहले न दिखाई पड़ती रही हों | इस आधार पर प्राकृतिक महामारी आने के कुछ पूर्व से प्रकृति में ऐसे कौन कौन से प्राकृतिकपरिवर्तन होने लगे थे | जो पहले होते नहीं देखे गए थे या कभी कभी देखे गए थे | ऐसे परिवर्तनों घटनाओं संकेतों आदि को सम्मुख रख कर ये अनुसंधान करना पड़ेगा कि ऐसा होने पर क्या रोगों या महारोगों के पैदा होने की परिस्थिति  बनती है |

   प्राचीनविज्ञान की दृष्टि से अनुसंधान किया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसमसंबंधी उन सभी प्राकृतिक परिवर्तनों को समझना पड़ेगा | जो महामारी प्रारंभ होने के 12 वर्ष पहले से घटित होने प्रारंभ हुए हों | महामारी को समझने के लिए पता लगाना होगा कि कोरोनामहामारी पैदा होने का निश्चित कारण क्या था| इसके साथ ही कोरोना  संबंधी संक्रमण बढ़ने या घटने का कारण क्या रहा है |उसे भी खोजना पड़ेगा | ऐसे कारणों के आधार पर महामारी संबंधी अनुसंधानों को आगे बढ़ाना पड़ेगा | 

      वर्तमान वैज्ञानिक अनुसंधानपद्धति के द्वारा भी प्राकृतिक घटनाओं  एवं महामारियों को समझने के लिए ऐसे ही प्रयत्न किए जाने चाहिए | उसी के आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है | इसके लिए प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता है | उसी वैज्ञानिक दृष्टि   इन्हें समझना संभव  हो  पाएगा | इसके अभाव में लोग मनमाने ढंग से घटनाओं के घटित होने के कारण अनुमान पूर्वानुमान आदि बताते देखे जाते हैं |जो गलत निकलते जाते हैं  | 

     ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों  का वैज्ञानिक आधार न होने के कारण कोरोना काल में जितने वैज्ञानिक उतने प्रकार की बातें सुनी जाती रही हैं |एक वैज्ञानिक के द्वारा बताए गए ऐसे काल्पनिक कारण कई बार दूसरे वैज्ञानिक से अलग होते हैं | कई बार तो एक  वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारण दूसरे वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारणों से पूरी तरह से बिपरीत  निकलते देखे जाते रहे हैं | कई बार विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा बताए हुए कारण एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न होते रहे हैं | इनमें न कोई तर्क होते हैं न विज्ञान !वैज्ञानिकों के द्वारा कहे जा रहे हैं इसलिए उन पर विश्वास  करना पड़ता रहा है | अनुसंधानों के नाम पर कही जाने वाली ऐसी आधार बिहीन बातों से महामारी पीड़ित समाज को कैसे कोई मदद पहुँचाई जा सकती है | कोरोना महामारी के समय ऐसा  होते कई  बार  देखा जाता  रहा है   | 

    मनुष्यों के प्रकृति विरुद्ध रहन सहन खान पान आचार व्यवहार आदि बिगड़ने से क्षुब्ध प्रकृति की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर  होने लगती है | इसलिए प्रकृति अपने स्वभाव से बिपरीत व्यवहार करने लगती है|
    ऐसा प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुसार भी होता है | समय संचार के बिगड़ने से भी कई बार प्राकृतिक वातावरण में परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता कमजोर  होने  लगती है | जिससे तरह तरह की प्राकृतिक दुर्घटनाएँ घटित होने लगती हैं |    

   प्राकृतिक रोग हों या महामारी में हुए रोग इनके पैदा होने का वास्तविक कारण पता  नहीं लग पाता है और न ही इनसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए कोई चिकित्सा औषधि आदि का ही पता लग पाता है | 
                                
                                                                                                                                                
                                                         स्वाँसें जब तक जीवन तब तक 

    किसी दीपक में जब तक घी रहता है तब तक दीपक जलता रहता है | घी समाप्त होते ही दीपक शांत हो जाता है | ऐसे ही प्रत्येक व्यक्ति  के जीवन में श्वासकोश जब तक रहता है, तब तक वह व्यक्ति जीवित रहता है | श्वासें समाप्त होते ही उस व्यक्ति के हृदय की धड़कन शांत होकर मृत्यु हो जाती है | 
     जिसप्रकार से किसी गाड़ी का पेट्रोल ख़त्म हो जाए तो गाड़ी रुक जाती है | जिस समय पेट्रोल समाप्त हुआ हो उसी समय गाड़ी के पास कोई दुर्घटना घटित हो जाए तो गाड़ी के रुकने का कारण पेट्रोल समाप्त होने को न मानकर उस दुर्घटना को मान लिया जाता है |  
    ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दुर्घटना दिखाई पड़ रही होती है जबकि गाड़ी की टंकी में पेट्रोल का समाप्त होना किसी को दिखाई नहीं पड़ता है | दुर्घटना नहीं भी घटित होती तो भी पेट्रोल समाप्त हो जाने के कारण गाड़ी को तो वहाँ रुकना ही था |
      ऐसे ही किसी मनुष्य के जीवन में श्वासों का कोश समाप्त होते ही हृदय की गति रुककर मृत्यु हो जाती है | श्वासें समाप्त होते समय यदि कोई दुर्घटना भी घटित हुई हो तो उसकी मृत्यु होने का कारण उस दुर्घटना को मान लिया जाता है | श्वासों का समाप्त होना दिखाई न पड़ने के कारण ऐसा किया जाता है |
    जिस प्रकार से किसी गाड़ी में जब पेट्रोल समाप्त होने लगता है तो गाड़ी चलने में झटके लेने लगती है | मानलिया जाता है कि पेट्रोल समाप्त  होने  के कारण अब गाड़ी रुकने वाली है | इसी प्रकार से  जिस व्यक्ति का श्वासकोश  वाला होता है तो उन्हें श्वाँस लेने में कठिनाई होने लगती है |  
    जिसप्रकार से सूर्योदय होने पर कमल खिलता है | जिस घटना को ऐसा माना जाता रहा है | संभव है कि सूर्योदय होने और कमल के खिलने का आपस में कोई संबंध ही न हो प्रत्युत ये दोनों प्रकार की घटनाऍं समय से संबंधित हों |सूर्योदय होने और कमल के खिलने का समय एक ही हो इसलिए ये दोनों घटनाएँ एक समय पर घटित हो रही हों |ऐसे भ्रम बहुत घटनाओं के बिषय में बने हुए हैं | जिनका  एक दूसरे से कोई संबंध ही नहीं होता है फिर भी एक समय में घटित होने के कारण उन दोनों का संबंध एक दूसरे के साथ जोड़ दिया जाता है |
     वस्तुतः प्रातः काल का समय आने पर समय प्रभाव से सूर्य को उगना पड़ता है और कमलों को खिलना पड़ता  है | इन दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध न होने पर भी दोनों घटनाओं के एक ही समय पर घटित होने के कारण इनका संबंध एक दूसरे के साथ जोड़ दिया जाता है | 
     ऐसे ही  किसी व्यक्ति की मृत्यु के होते  समय  घटित हो रही दुर्घटनाओं का उस मृत्यु से कोई संबंध न होने  पर भी उन दुर्घटनाओं महामारियों का संबंध उस मृत्यु के साथ  जोड़ दिया जाता है | ये मान लिया जाता है कि उस मृत्यु के लिए उस समय घटित हो रही  दुर्घटनाएँ ही जिम्मेदार हैं | दोनों दुर्घटनाओं के  एक साथ घटित होने के कारण उनका संबंध एक दूसरे के साथ जोड़ दिया जाता है | 
     कहा जाता है कि सूर्योदय होने पर कमल खिलता है | ये बात सच है किंतु इसका मतलब ये तो नहीं है कि सूर्य के प्रभाव से कमल खिलता है | कमल के खिलने का कारण सूर्योदय  होना नहीं है | कमल समय के प्रभाव से खिलता है किंतु कमल के खिलने के समय को पहचानने के लिए सूर्योदय का सहारा लेना पड़ता है | 
       ऐसे ही मृत्यु एक स्वतंत्र घटना होती है | उसका सीधा संबंध उस व्यक्ति की श्वासों से होता है |स्वासें समाप्त होने पर उसकी मृत्यु होती है | उस मृत्यु का उन दुर्घटनाओं से कोई संबंध नहीं होता है | 

        
                                                    दुर्घटनाओं  से मृत्यु संभव  है क्या !
 
     प्रकृति और समाज में हमेंशा कुछ न कुछ घटित होता रहता है | ऐसे ही प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में  हमेंशा कुछ न कुछ करता रहता है | ऐसे ही  किसी मनुष्य की श्वासें पूरी होते समय वो जो कुछ कर रहा होता है या तो उसे जिम्मेदार मान लिया जाता है या फिर उस प्राकृतिक दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है | जो उस समय घटित हो रही होती है | 
    श्वासें  पूरी होते समय उस व्यक्ति के आस पास जो दुर्घटना घटित हो रही होती है | उसकी मृत्यु के लिए उसी दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है कि उसकी मृत्यु उसी के कारण मृत्यु हुई है |  ये भ्रम तब टूटताहै जब वही  दुर्घटना उसी समय कुछ दूसरे लोगों के साथ भी घटित हुई होती है | वे पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित होते हैं | 
    किसी ट्रेन में बहुत लोग बैठे होते हैं | ट्रेन के साथ अगर  कोई दुर्घटना हो जाती है तो उसमें कुछ लोगों की मृत्यु हो जाती है | कुछ लोग घायल होते हैं | कुछ लोग पूरी तरह सुरक्षित होते हैं | ऐसी  एक दुर्घटना  से ग्रस्त बहुत लोगों पर अलग अलग प्रभाव पड़ने का कारण उन सबका अपना अपना श्वासकोश  होता है | जिनकी श्वासें  बची होती हैं | ऐसे लोग  घायल होते हैं बाद में या तो स्वस्थ हो जाते हैं या फिर श्वासें पूरी होने पर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं | 
     इसका मतलब उस एक या अनेक लोगों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार वो दुर्घटना नहीं प्रत्युत  मृतक की अपनी श्वासों का समाप्त होना होता है | मृत्यु होते समय जो घटना घटित हो रही होती है | मृत्यु  होने का बहाना उसे ही मान लिया जाता है | मृत्यु अपने समय पर ही होती है | 
    प्राचीनकाल के आख्यानों में अक्सर सुना जाता है कि किसी को मरने का शाप दिया जाता था तो वो तुरंत मर जाता था | इसका भी रहस्य यही है कि शाप दिया ही उसे जाता था | जिसकी स्वाँसें पूरी हो चुकी होती थीं | यदि ऐसा न होता तो राक्षसों  का संहार करने के लिए ऋषि मुनियों को भगवान से प्रार्थना क्यों करनी पड़ती | शाप देकर ही उन्हें समाप्त कर दिया गया होता | इसलिए श्वासों के समाप्त होने पर ही जीवन पूरा होता है | 
    ऋषि मुनियों को तो किसी की श्वासें समाप्त होने की जानकारी पहले से होती थी | इसलिए वे जिसे मरने का शाप देते थे वो मर जाता था | जिन्हें किसी की श्वासें समाप्त होने की जानकारी नहीं होती है | वे भी अपने शत्रुओं पर  तलवार ,बम या बंदूक आदि से हमला करते हैं किंतु इससे वे सभी लोग मर ही नहीं जाते हैं |जिन पर हमला किया जाता है |  हमला होने के बाद भी बहुत लोग सुरक्षित इसलिए बच जाते हैं क्योंकि उनकी श्वासें अभी सुरक्षित बची होती हैं |  किसी के मारने से लोगों की मृत्यु हो ही जाती है | यही भ्रम तो उन लोगों को भी होता है | 
     महाभारत युद्ध में अर्जुन को यही भ्रम था कि युद्ध में उनके बाण मारने से बड़े बड़े योद्धाओं की मृत्यु हो जाएगी | इसीलिए वो कह रहे थे कि गुरुद्रोण पितामह आदि स्वजनों पर हम बाण नहीं  चला सकते | अर्जुन का यही भ्रम तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण जी  अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित कर रहे थे कि तुम युद्ध करो |श्रीकृष्ण उन्हें समझा रहे थे कि उनकी स्वाँसें पूरी हो चुकी हैं इसलिए उनकी मृत्यु होनी ही है | तुम्हें किसी को मारना नहीं है केवल निमित्त बनना है | 
     श्रीकृष्ण को पता था कि अर्जुन के बाण  मारने से गुरुद्रोण पितामह आदि अजेय महाबीरों की मृत्यु नहीं हो जाएगी |मृत्यु तो उनका अपना श्वासकोश समाप्त  होने से होगी किंतु उस समय उनसे युद्ध करने पर गुरुद्रोण पितामह आदि अजेय महाबीरों पर विजय प्राप्त करने का श्रेय अर्जुन पा जाएगा | ऐसे समय लोगों को लगेगा कि अर्जुन ने युद्ध में इतने बड़े बड़े बीरों पर विजय प्राप्त कर ली है | इससे समाज में ये संदेशा जाएगा कि अर्जुन उनसे भी बड़ा बीर है | 
      श्रीकृष्ण ने सारथी  बनकर अर्जुन की यही तो मदद की थी | जब  जिस योद्धा की स्वाँसें पूरी होकर मृत्यु होने वाली होती थी | श्रीकृष्ण जी अर्जुन का रख लेकर उसी के सामने पहुँच कर अर्जुन से उस पर बाण चलाने को कह  देते थे | वो मरता अपनी श्वासें समाप्त होने से था किंतु उसे मारने का श्रेय अर्जुन को मिल जाता था | 

                                            मृत्यु का बहाना  बनती हैं  दुर्घटनाएँ !
            
      किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय घटित हो रही दुर्घटनाएँ उसकी मृत्यु का केवल बहाना बनती हैं | इसका पता तब लगता है जब उस दुर्घटना से एक जैसे प्रभावित बहुत लोगों में से कुछ की मृत्यु हुई होती है ,कुछ घायल हुए होते हैं तो कुछ को खरोंच भी नहीं लगी होती है जबकि प्रभावित वे भी उसीप्रकार से हुए होते हैं | दुर्घटना से पीड़ितों में से जिनकी मृत्यु हो  गई उसके लिए यदि दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाएगा तो उन्हीं के साथ उसी दुर्घटना में शिकार हुए उन लोगों के सुरक्षित बचे रहने के लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा|  जिन्हें एक खरोंच भी नहीं आई |        मृत्यु होने के समय जिस प्रकार की दुर्घटना घटित हो रही होती है |उसी दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है | मृतकों के लिए यदि दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाएगा तो सुरक्षित बचे लोगों पर दुर्घटना का प्रभाव न पड़ने का तर्कसंगत कारण खोजना होगा | उसे खोजे बिना मृतकों की मृत्यु के लिए दुर्घटना को जिम्मेदार मानना तर्क संगत नहीं है |
    कई बार बिना किसी कारण के सहज सामान्य स्वस्थ जीवन जी रहे लोगों की मृत्यु अचानक  होते देखी जाती है |कुछ लोगों की हँसते खेलते नाचते कूदते चलते फिरते खाते पीते मृत्यु हो जाती है | वहाँ तो कोई दुर्घटना नहीं घटी | उन मौतों के लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा | 
    प्राचीन मान्यताओं के अनुशार किसी व्यक्ति की मृत्यु उसकी आयु पूरी होने पर होती है |जिनकी आयु पूरी नहीं हुई होती है | किसी दुर्घटना में वे घायल तो हो जाते हैं किंतु बच जाते हैं | कुछ की न मृत्यु होने का समय होता है और न ही घायल होने का  ऐसे लोग उतनी बड़ी दुर्घटना से भी घायल हुए बिना ही निकल आते हैं |
  कुल मिलाकर प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु का  समय  निश्चित होता है | इसीलिए उस समय के आने पर मृत्यु तो होती ही है |यदि ऐसा न होता तो किसी बड़ी दुर्घटना में  बहुत लोग एक साथ एक जैसे प्रभावित होते हैं | चोट सभी को लगती है किंतु  मृत्यु उन्हीं की होती है जिनकी आयु पूरी हो चुकी होती है | 
      मृत्यु एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है | जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी | सूर्योदय  होने के साथ ही सूर्यास्त होने का समय भी निश्चित  हो जाता है | इसी प्रकार से जन्म होने के साथ ही मृत्यु होने का समय भी निश्चित हो जाता है | उसी निश्चित  समय पर मृत्यु होती है | 

                                          श्वास और आयु के नियम  
       
     श्वासकोश की बचत और व्यय व्यवस्था इस प्रकार से बनाई गई हैकि  किसी व्यक्ति को इस धरती पर कितने वर्षों का जीवन जीना है | ये वर्षों में निर्द्धारित न होकर श्वासों के आधार पर निर्धारित  होता है | एक व्यक्ति 1 मिनट में 15 श्वासें  और एक दिन में 21,600 श्वासें लेगा | ऐसा मानकर  प्रत्येक व्यक्ति की आयु उसके जन्म के समय ही निश्चित कर  दी जाती है कि वह कितने वर्षों तक  जीवन जिएगा | 
      इसीलिए जैमिनिसूत्र आदि प्राचीनग्रंथों में आयुर्दाय निर्धारित करनेके लिए  गणना करते समय कलात्मक ग्रहों में जो 21,600 का भाग दिया जाता है | वे एक दिन के लिए निर्धारित की गईं 21,600 श्वासें  ही होती  हैं |इसके आधार पर 21,600 श्वासों का एक दिन मान लिया गया है | इसी के आधार पर महीनों वर्षों आदि को मान लिया गया है | इसी के आधार पर अनुमान लगा लिया जाता है कि किस व्यक्ति का जीवन कितने वर्षों का हो सकता है | 
    कोई व्यक्ति यदि शांत सदाचारी संयमित जीवन जीते हुए प्राणायाम आदि का अभ्यास करता है तो उसकी श्वासों की बचत होने लगेगी | जिससे उसकी आयु बढ़ने लगेगी | ऐसे ही कोई व्यक्ति अधिक सोता है | अधिक स्त्री पुरुषों के साथ बासनात्मक संबंधों का सेवन करता है तो उसकी आयु उसी हिसाब से कम होती चली जाएगी | व्यवहार में अक्सर देखा जाता है कि स्त्री पुरुष संसर्ग के समय चोरी बलात्कार हत्या आदि पापपूर्ण आचरण करते समय जल्दी जल्दी श्वास चल रही होती है | इसलिए उस समय अधिक श्वासें खर्च होने कारण तेजी से आयु घटती चली जा रही होती है |   
    श्वासकोश बढ़ने और घटने की प्रक्रिया यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जब शांत बैठा होता है तब 1 मिनट में 12 श्वास लेता है | रास्ते में चलता है तो एक मिनट में 18 श्वास लेता है | जब सोता है तब एक मिनट में 3श्वास लेता है | स्त्री पुरुष शारीरिक संबंधों में एक मिनट में 64 श्वास लेता है | ऐसे और भी जो जितने पाप पूर्ण आचार व्यवहार हैं | उनमें श्वासें उसी हिसाब से बढ़ती जाती हैं |  
   कोई व्यक्ति एक दिन में 21,600 अर्थात 1 मिनट में 15 श्वास लेता है तो उसे अपने लिए निर्धारित पूर्ण आयु भोगने का समय मिलता है | इसी हिसाब से उसकी आयु निश्चित होती है |कोई व्यक्ति यदि शांत सदाचारी संयमित जीवन जीने का अभ्यास करता है तो वह एक मिनट में 12 श्वास लेगा | इससे 1 मिनट में 3 श्वासें बचाने से 1 घंटे में 180 श्वासें बच सकती हैं |ऐसा करके  एक दिन  में 4320 श्वासें बचाई जा सकती हैं | इन श्वासों के भोगने की गणना यदि 1 मिनट में 12 के हिसाब से की जाए तो इन बची हुई श्वासों से एक दिन में 6 घंटे अधिक जीवन जीने को मिल सकता है| इस प्रकार से एक दिन की श्वासों में सवा दिन जीवन जिया जा सकता है | 
    इसका अभ्यास यदि निरंतर किया जाए तो जिसकी आयु 80  वर्ष निर्धारित है | वो इस प्रक्रिया से अपनी एक चौथाईआयु  बढ़ाकर 80 +20 = 100 वर्ष जीवन जीने  का आनंद ले सकता है | 
    प्राचीनकाल में तपस्वी ऋषि मुनि प्राणायाम पूर्वक अपनी बहुसंख्य श्वासें बचाते हुए हजारों वर्षों का जीवन जीते देखे जाते थे |   
    इसीप्रकार से कोई व्यक्ति  ब्यभिचार आदि बुरे ब्यवहारों में जो जितना अधिक समय व्यतीत करेगा | उसकी आयु उतनी अधिक घटती चली जाएगी | ब्यभिचार के समय में 1मिनट में 64 श्वासें चलती  हैं |ऐसी स्थिति में जिन 64 श्वासों में 4 मिनट  से अधिक समय तक जीवित रहा जा सकता है | उतनी श्वासें 1 मिनट  में खर्च हो गईं |
    इस हिसाब से देखा जाए तो जन्म के समय जिनकी आयु 100 वर्ष निर्द्धारित की गई थी वे निरंतर बिषय बासनाओं में लगे रहने के कारण निरर्थक श्वासें खर्च करते करते 30-40 वर्षों में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं | 
    इस प्रकार का असंयमित जीवन जीने वाले पापप्रवृत्त लोगों की संख्या जैसे जैसे बढ़ती जाती है| वैसे वैसे कम उम्र में ही उनका  श्वासकोश  समाप्त होने लग जाता है | ऐसा होते ही अधिक संख्या में लोग मृत्यु को प्राप्त होने लग जाते हैं |

                महामारी में हुई मौतों से श्वासों   का संबंध !

     महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से  हत्याओं आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है |प्राकृतिक आपदाएँ एवं आतंकी घटनाएँ बढ़ी हैं | इनमें एवं इसी बीच कई देशों में हुए आपसी युद्धों में बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं |ऐसी सभी अलग अलग घटनाओं को देखा जाए  तो मृत्यु होने के बहाने भले अलग अलग भले बनते रहे हों किंतु इनमें बड़ी संख्या में लोगों की  मृत्यु होने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं |  
    इन घटनाओं में जो लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | उनकी मृत्यु के लिए तो वे घटनाएँ ही कारण रूप में मान ली जाती है | इससे ऐसा  लगना स्वाभाविक ही है कि यदि ऐसी घटनाएँ घटित न हुई होतीं  तो उन घटनाओं में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की मृत्यु भी नहीं हुई होती किंतु यदि ऐसा होता तो विगत कुछ वर्षों में अच्छे खासे स्वस्थ लोगों को अचानक चलते फिरते उठते बैठते हँसते खेलते सोते जागते बिना किसी कारण के मृत्यु को प्राप्त होते देखा जाता है | इससे ऐसा विश्वास होने लगना  स्वाभाविक ही है कि लोगों की मृत्यु  होने के लिए  जिन  घटनाओं को जिम्मेदार माना जाता  रहा है | कहीं वो भ्रम  ही तो नहीं  है | कहीं ऐसा तो नहीं  है कि लोगों की मृत्यु अपने समय  पर ही होती हो | घटनाएँ केवल बहाना बन जाती रही हों | लोगों की मृत्यु  होते समय घटित हो रही घटनाओं को अज्ञानवश  मृत्यु का कारण मान लिया जाता रहा हो | 
    किसी की मृत्यु  होने का कारण श्वासकोश  का समाप्त होना होता है | महामारी का मतलब बहुत लोगों का अप्रत्याशित रूप से श्वासकोश समाप्त हो जाना | कोरोना महामारी में भी बहुत लोगों की मृत्यु होने का कारण  बहुत लोगों का श्वासकोश अचानक समाप्त हो जाना ही था | 
       इसीलिए  कोरोना महामारी में जिनकी मृत्यु होनी थी उनकी तो हुई ही उसके अलावा भी बहुत सारी दुर्घटनाओं में भी इसी समय बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे | आतंकी घटनाओं में आपसी युद्धों में बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | इसके अतिरिक्त भी चलते फिरते उठते बैठते हँसते खेलते सोते जागते बिना किसी कारण के बहुत लोगों की मृत्यु होते देखा जाता रहा है |
      ऐसी स्थिति में यदि केवल महामारी में ही लोगों की मृत्यु हुई होती तो उसके लिए महामारी को जिम्मेदार माना जा सकता था किंतु कोरोनाकाल में विभिन्नप्रकार की घटनाओं में  लोगों की मृत्यु हुई है | इसलिए महामारी केवल उतनी ही मौतों के लिए जिम्मेदार है | जो संक्रमित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | उसके अतिरिक्त जितनी भी मौतें हुई हैं |उनका कारण श्वासकोश का समाप्त हो जाना ही है |
     इस दृष्टि से बिचार करने पर महामारी में हुई मौतों का कारण यदि महामारी के प्रभाव को माना जाए तो वो सभी पर समान रूप से पड़  रहा था | इसलिए महामारी के प्रभाव से  जो घटना घटती वो सभी के साथ एक समान रूप से घटित होती|किसी किसी की मृत्यु होने का मतलब उन लोगों का श्वासकोश का समाप्त होना ही था | जब जिसका श्वासकोश समाप्त हुआ तब उसकी मृत्यु हुई | 


                                              महामारी और अन्य मौतों में अंतर ! 
                             
    वर्तमान समय में भी  ऐसी सभी प्रकार की पाप प्रवृत्तियाँ बढ़ने से लोगों का श्वासकोश असमय में ही समाप्त होता जा रहा है | लोग तेजी से आयु खोते चले जा रहे हैं | अधिक संख्या  में लोग इस प्रवृत्ति का शिकार हो रहे हैं | श्वासक्षय होने से लोग मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं |इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होना  ही  महामारी है | 
      इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि जिन लोगों की मृत्यु किसी दुर्घटना के घटित होते समय होती है | उस मृत्यु के लिए उस दुर्घटना  को जिम्मेदार मान लिया जाता है | रोगी अवस्था में मृत्यु हुई तो रोग के कारण मृत्यु ,किसी दुर्घटना में मृत्यु हुई तो दुर्घटना के स्थान और समय पर मृत्यु हुई तो दुर्घटना के कारण मृत्यु और यदि कोई प्रत्यक्ष कारण न हो और मृत्यु हो जाए तो हृदय की गति रुक जाने से मृत्यु मान ली जाती है किंतु   हृदय की गति रुकने का कारण क्या था तो श्वासकोश समाप्त होना ही कारण होता है | किसी गाड़ी में ईंधन समाप्त हो जाने से जैसे गाडी रुक जाती है | वैसे ही श्वासें समाप्त होने से  हृदय गति रुकजाती है |बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होना  ही  महामारी है |    

   जिनकी मृत्यु  के समय कोई दुर्घटना घटी ही नहीं होती है | कोई  रोग भी नहीं हुआ होता है |श्वासें समाप्त होने से हृदय की गति रुकी और मृत्यु हो गई | इसमें  प्रत्यक्ष कारण दिखाई नहीं पड़ने के कारण इसे हार्टअटैक मानलिया जाता है | बहुत लोगों की जब मृत्यु होने लगे तो महामारी मान ली जाती है | अनुसंधानों का उद्देश्य हार्टअटैक या महामारी  बता देना भर नहीं  होता है, प्रत्युत इसके कारण खोजने होते हैं कि हार्टअटैक किन कारणों से होता है और महामारी पैदा  होने के कारण क्या हैं ?  
     कई बार किसी की मृत्यु सर्प से होनी होती है किंतु मृत्यु के समय वो किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर बैठा होता है |जहाँ या तो सर्प का पहुँचना संभव नहीं है या फिर सर्प वहाँ उपलब्ध नहीं होता है | ऐसे समय उस व्यक्ति को अचानक किसी सर्प छाया का आभास होता है और उसे लगता है कि उसे किसी सर्प ने काटा है जबकि वहाँ खोजने पर कहीं सर्प मिलता नहीं है ,किंतु उसे बिष भी चढ़ता है और उसकी मृत्यु भी होती है |पुराने लोग इसे कालमृत्यु कहा करते थे | काल मतलब समय होता है | अर्थात सर्प से मृत्यु होनी थी किंतु समय पर सर्प उपलब्ध नहीं हो सका | इसलिए समय को ही सर्प की भूमिका निभानी पड़ी | 
   अनुसंधानों के नाम पर महामारी के साथ मौसम को चिपकाने का प्रयास किया गया | तापमान बढ़ने घटने को चिपकाने का प्रयास हुआ | वायु प्रदूषण बढ़ने को चिपकाकर देखा गया इनमें से किसी की संगति महामारी के साथ जुड़ जाती तो जोड़ दी जाती और कह दिया जाता कि महामारी पर इस घटना का प्रभाव पड़ता है | ये तो घटनाओं को आपस में जोड़ने की प्रक्रिया है | जो शिक्षित अशिक्षित सभी लोग कर सकते हैं |इसके लिए विज्ञान वैज्ञानिकों  एवं अनुसंधानों की क्या आवश्यकता है | 
    अनुसंधानों का लाभ तभी है जब अनुसंधानों के द्वारा ये पता लगा लिया जाए कि महामारी आ रही है \ जिसका स्वभाव ऐसा है | इसलिए उस महामारी पर मौसम का क्या प्रभाव पड़ेगा ! वायुप्रदूषण का कैसा प्रभाव पड़ेगा और तापमान का कैसा प्रभाव पड़ेगा | महामारी आने के बाद ये सब पता लगाने का समय ही कहाँ होता है 
    इसी प्रकार से जिससमय  बहुत लोग रोगी होने लगे या मृत्यु को प्राप्त होने लगे तो महामारी नाम रख दिया या वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा ऐसा कुछ पता लगाया जा सका कि आगे आने वाले समय में बहुत लोगों की मृत्यु होगी उसका कारण यह होगा | उससे सुरक्षा के लिए क्या करना होगा | वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा जो जानकारी पहले से जुटा ली जाती है और बाद में वैसा ही घटित होता जाता है वो जानकारी विश्वास योग्य है | उसी जानकारी से महामारी समय में मदद मिल सकती है |
    इसके अतिरिक्त लोगों को संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते देखकर ये मान लिया गया है कि महामारी आ गई है तो ये विश्वसनीय नहीं है क्योंकि इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं, किंतु यही बात यदि पहले पता लगा ली जाए और उसी के अनुसार घटनाएँ घटित होती जा रही हों तो ये विश्वास करने योग्य विज्ञान है | 
    लोगों को संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते देखकर ही यदि महामारी का पता लगाया जाना है तो महामारी को समझने में विज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों की भूमिका क्या है ?ये कैसे पता लगे कि लोगों की मृत्यु महामारी से हो रही है या बिना महामारी के हो रही है |
    इसलिए किसी को  किसी रोग से संक्रमित होते एवं मृत्यु होते देखकर महामारी मान लेने का आधार वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं है |  
लक्ष्य : महामारी  खोजना है या महामारी  से सुरक्षा !
    हमारे अनुसंधानों का  लक्ष्य महामारियों से मनुष्यों की  सुरक्षा के उपाय खोजना है न कि  महामारी खोजना है |इसलिए अनुसंधानों का लक्ष्य मनुष्यों को महामारियों से संक्रमित होने से बचाना है | अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ उन सघन जंगलों मरुस्थलों में या समुद्रों में में घटित होती रहती हैं | जहाँ मनुष्यों की बस्तियाँ नहीं होती हैं तो किसी का उनसे नुक्सान नहीं होता है | इसलिए उनके बिषय में किसी को पता  नहीं लग पाता है |
     बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित होते हुए देखकर उसी के अनुसार महामारी आने के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है |इसके अलावा विज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों के आधार ये पता लगाया जाना कैसे संभव है कि  महामारी आ रही है या आ गई है | 


    ऐसी परिस्थिति में महामारी कैसे पैदा हुई थी |ये मनुष्यों के द्वारा निर्मित थी या प्राकृतिक थी |इस पर मौसम संबंधी घटनाओं का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान बढ़ने घटने का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! वायु प्रदूषण बढ़ने का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! ऐसी परिस्थिति में अनुसंधानों के लिए  मानव सुरक्षा गौण होती चली जाती है और महामारी के बिषय में  जिज्ञासा  बढ़ती चली जाती है |   
    महामारी जैसे इतने कठिन समय में जब लाखों लोग जीवन मृत्यु से जूझ रहे होते हैं|उस समय पहला लक्ष्य मनुष्यों की सुरक्षा का  होना चाहिए |                                                                             


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                                                                       प्राचीन विज्ञान (BOOK) 

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                                                  वैक्सीन के प्रभाव पर संशय का कारण      

    वैज्ञानिक लोग महामारी के बिषय में जो जो कुछ आगे बताते जा रहे थे वो पीछे पीछे गलत निकलता जा रहा था | ऐसे में महामारी भयानक थी ये कैसे कहा जाए जब उसे समझने के लिए न विज्ञान है न वैज्ञानिक | इसीलिए विश्व के  किसी वैज्ञानिक ने  महामारी  के बिषय में जो जो कुछ बताया हो और वो सही निकला हो ऐसा कोई उदाहरण मुझे देखने सुनने को नहीं मिला है | 
     महामारी के प्राकृतिक रूप से पैदा होने के लिए  मौसम तापमान वायुप्रदूषण आदि में से जिसे भी जिम्मेदार कारण माना जाएगा | उसी के बिषय में अनुसंधानपूर्वक सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा | इनमें से जिसका संबंध  महामारी संबंधी संक्रमण  बढ़ने घटने के साथ सिद्ध होगा | उसी के आधार पर महामारी को समझना एवं उसके उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा |  

    कई वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी के लिए वायु प्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार बता दिया जाता  रहा है किंतु जब वायु प्रदूषण के बढ़ने और कोरोना संक्रमण बढ़ने का मिलान किया गया तो ये बात सही सिद्ध नहीं हुई | भारत में सबसे भयंकर दूसरी लहार जब आई थी उस समय वायु प्रदूषण इतना कम था कि पंजाब के अमृतशर एवं बिहार के कुछ जिलों से हिमालय के दर्शन होने लगे थे | ऐसे ही अक्टूबर नवंबर 2020 में जब वायुप्रदूषण बहुत अधिक था |उस समय कोरोना संक्रमण दिनों दिन कम होता जा रहा था |  

   ऐसे ही कुछ वैज्ञानिकों ने कोरोना संबंधी संक्रमण बढ़ने के लिए  तापमान कम होने को जिम्मेदार बताया था किंतु महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने के साथ जब इसका मिलान करके देखा गया तो ये अंदाजा गलत निकला | महामारी की केवल तीसरी लहर ही जनवरी 2022 में आई थी | इसके अलावा पहली दूसरी और चौथी लहर तो तब आई थी जब तापमान बढ़ा हुआ था |वैज्ञानिकों के द्वारा लगाया गया यह अनुमान भी गलत निकल गया | 

    महामारी के बिषय में जब  कुछ पता  ही नहीं लगाया जा सका तो फिर ये किस आधार पर कह दिया जाए कि महामारी बहुत भयानक थी |संभव है कि महामारी को समझने का विज्ञान नहीं था | इसलिए उसे समझा नहीं जा सका | उससे सुरक्षा के उपाय नहीं किया जा सके | महामारी को जितना समझा जा सका | उसके आधार पर जो अनुमान लगाए जाते रहे | वे गलत निकल जाते रहे | उनके गलत निकलने का मतलब महामारी के बिषय में जो समझा गया वो सही नहीं है | महामारी को न समझ पाने के कारण उससे  मुक्ति दिलाने के लिए औषधि नहीं तैयार की जा सकी | ऐसी प्रभावी औषधि के बिना चिकित्सा कैसे की जा सकती थी | 

     इतनी भयानक महामारी जो आते ही लाखों लोगों को संक्रमित करना एवं हजारों लोगों को मारना प्रारंभ कर सकती हैं उस समय तुरंत कितने भी बड़े प्रयास करके न तो लोगों को सुरक्षित किया जा सकता है और न ही संक्रमितों  को  स्वस्थ किया जा सकता है | महामारी की अत्युग्र संक्रामकता एवं प्रचंडवेग के सामने चिकित्सा कहाँ और कैसे ठहर पाएगी |  

  कोरोना महामारी के अलावा भी अभी तक जितनी महामारियाँ आती जाती रही हैं | वो भी अपने समय से आई एवं अपने समय से ही गई हैं | महामारियाँ जब आती हैं तो उनसे सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ किया जाने लगता है | महामारी जब समाप्त होने लगती है | उस समय जो किया जा रहा होता है | उसी से महामारी समाप्त हुई है ऐसा मान लिया जाता है | ये उसी प्रकार का भ्रम  होता है जैसे प्लाज्मा थैरेपी को महामारी से मुक्ति दिलाने में समर्थ मान लिया गया था | दूसरी लहर  न आती तो इसी भ्रम को सच मान लिया जाता | दूसरी लहर आने से सच्चाई सामने आ गई और चिकित्सा प्रक्रिया से उसे अलग कर दिया गया | लहर में तो एक के बाद दूसरी आ गई गई किंतु महामारी में तो ऐसा नहीं होता है वो गई तो गई | इसलिए उस समय जो भ्रम एक बार बना वो बना ही रहता है | दोबारा परीक्षण न होने के कारण उसकी सच्चाई सामने नहीं आ पाती है | 

    विशेष बात ये है कि महामारी के बिषय में जो समझा जा सका उसके अनुसार जो भी अनुमान पूर्वानुमान लगाए गए वे गलत निकल जाते रहे | इसका मतलब जो समझा गया वो सही नहीं था | जो सही  था  ही नहीं उसे  आधार  बनाकर जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते रहे वे सही निकलेंगे | इसकी आशा कैसे की जा सकती है | ऐसे तथ्यों के आधार पर जो औषधि वैक्सीन आदि तैयार की  जाएगी उसकी विश्वसनीयता कितनी रह पाएगी | 

    ऐसी स्थिति में महामारी भयानक थी या नहीं थी | ये कैसे कहा जा सकता है |यदि  महामारियों के स्वभाव को समझने में उस अत्यंत उन्नत विज्ञान के बल पर सफलता नहीं मिल सकी तो ये किस वैज्ञानिक आधार पर कहा जा सकता है कि महामारी भयंकर थी | ऐसे तो औषधि चिकित्सा आदि के अभाव में बहुत सारे रोग भयंकर हो सकते हैं | महामारी भी चिकित्सा के अभाव में भयंकर हुई है या वास्तव में भयंकर थी | 

   जिन वैज्ञानिक अनुसंधानों  के द्वारा मौसम संबंधी घटनाओं के बनने की प्राकृतिकप्रक्रिया नहीं समझी जा सकी | वायु प्रदूषण बढ़ने का वास्तविक कारण नहीं खोजा जा सका उसके द्वारा न तो महामारी को समझा जा सका और न ही उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सका | 

     महामारी का विस्तार कितना है ! प्रसार माध्यम क्या है !अंतर्गम्यता  कितनी है !इस पर मौसम का प्रभाव पड़ता है या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान का प्रभाव पड़ता है या नहीं !इनमें से कुछ भी यदि पता नहीं किया जा सका है तो महामारी भयंकर रही हो या न रही हो किंतु अनुसंधानों के नाम पर क्या किया जाता रहा  !ये प्रश्न अवश्य उठता है |  

     प्रश्न तो इस पर भी खड़े होते हैं कि महामारी को समझने के लिए अनुसंधानों के नाम पर जो जो कुछ किया जा रहा था | वो केवल करने के लिए किया जा रहा था या उसका महामारी से कोई संबंध भी था | ये कैसे कहा जाए जब ऐसे अनुसंधानों के लिए कोई विज्ञान ही नहीं था | ऐसे ही संक्रमितों  को स्वस्थ करने के लिए चिकित्सा के नाम पर जो जो कुछ किया जा रहा था | उसका महामारी से कोई संबंध था या नहीं ये कैसे कहा जाए | प्लाज्मा थैरेपी जैसी जिन प्रक्रियाओं को जिनके द्वारा कोरोना संक्रमण से मुक्ति दिलाने में सक्षम बताया गया था |उन्हीं के द्वारा उसी प्लाज्मा थैरेपी को अक्षम मानकर चिकित्सा प्रक्रिया से अलग कर दिया गया | 
     ऐसे ही रेमडिसिविर  इंजेक्शन को  संक्रमण से मुक्ति दिलाने में पहले प्रभावी बताकर बाद में बाद में उससे भी किनारा कर  लिया गया |  
     ऐसी परिस्थिति में समाज का जो वर्ग वैक्सीन पर संशय कर रहा है उसे गलत ही किस वैज्ञानिक आधार पर कह दिया जाए !क्योंकि किसी भी रोग की औषधि बनाने के लिए रोग को समझना आवश्यक होता है उसी के आधार पर उससे मुक्ति दिलाने के लिए औषधि का निर्माण किया जाता है | ऐसे में जिस कोरोना महामारी के लिए वैक्सीन बनाई गई उस महामारी को समझकर जो जो बताया जाता रहा वो गलत निकलता रहा | वही समझकर उसी के आधार पर वैक्सीन बनाई गई वो कितनी प्रभावी  रही होगी | ऐसा संशय होना स्वाभाविक ही है | 
                                                   मौसम और ऋतुचर्या में अंतर
      
     मौसम का मतलब केवल बादल वर्षा आँधी तूफ़ान आदि ही नहीं है |महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए संपूर्ण प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों घटनाओं  के बिषय में अध्ययन अनुसंधान आदि करना होता है | 
    सुदूर आकाश में उड़ रहे बादलों आँधी  तूफानों को उपग्रहों की मदद से देखकर  वर्षा या आँधी तूफ़ानों के बिषय में जो अंदाजा लगाया जाता है | उसमें प्रकृति का स्वभाव सम्मिलित नहीं होता है | इसलिए इसके आधार पर महामारी के बिषय में कुछ भी पता लगाया जाना संभव नहीं है |
   जिस प्रकार से किसी दिशा में जाती हुई ट्रेन  को देखकर इतना  ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह ट्रेन इतनी गति से इस दिशा में  इस रास्ते पर जा रही है | इस रास्ते में इतने स्टेशन पड़ते हैं जिनके ये ये नाम हैं |  ये ट्रेन यदि इसी रास्ते पर इसी गति से चलती  रही तो किस  स्टेशन  पर किस समय पहुँचेगी  ये अंदाजा तो लगाया जा सकता है किंतु  ये नहीं लगाया जा सकता है कि बीच में इसकी गति या मार्ग बदलेगा तो नहीं| 
      इसी प्रकार से सुदूर आकाश में में उड़ रहे बादल आँधी तूफान किस दिशा में किस गति से जा रहे हैं | यह देखने के लिए उपग्रहों आदि का सहारा लेना होता है |उसी के आधार पर यह अंदाजा लगाना होता है कि ये बादल यदि इसी दिशा में इसी गति से चलते रहे तो कितने  घंटों में कहाँ पहुँच सकते हैं | जहाँ वे जब जहाँ पहुँच  सकते होंगे ,तब वहाँ वर्षा होने या आँधी तूफ़ान आने की संभावना व्यक्त कर दी जातीहै | उनकी दिशा और गति बदलते ही वे अंदाजे गलत निकल जाते हैं |इस बिषय में निश्चित रूप से कुछ कहा जाना संभव नहीं होता है |
     ऐसी स्थिति में उपग्रहों आदि से  बादलों आँधी तूफानों को हमेंशा देखते रहना होता है | यही इसका मौसम विज्ञान है | वस्तुतः दूरस्थ बादल आँधी तूफान आदि देखने का  यह एक जुगाड़ मात्र है | इसमें  प्रकृति का वैज्ञानिक अध्ययन कहीं सम्मिलित नहीं होता है |इसे मौसमविज्ञान के रूप में प्रचारित तो किया जाता है किंतु  इस मौसमविज्ञान में विज्ञान क्या है | मौसम को समझने में उस विज्ञान का उपयोग कहाँ किसलिए  और क्या होता है | ये पता नहीं है |इसीलिए इसके द्वारा भविष्य संबंधी मध्यावधि या दीर्घावधि पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सकते हैं  |   
   इस जुगाड़ से पता लगाए गए अल्पावधि पूर्वानुमानों में कई बार एक कठिनाई आती है | कभी कभी कई कई दिनों सप्ताहों तक लगातार वर्षा होती रहती है | ऐसी स्थिति में उपग्रहों से जैसे जैसे बादल आते दिखाई पड़ते जाते हैं | वैसे वैसे ही आँखों देखा हाल देख देख कर बताते रहा जाता है कि अभी और बादल आ रहे हैं | अभी तीन दिन वर्षा होगी,फिर भी बादल आते दिखाई पड़ते रहे तो 48 घंटे और वर्षा होगी | ऐसे जबतक बादल आते दिखाई पड़ते रहेंगे तब तक आँखों देखा हाल बताते रहा जाएगा | 
    इस प्रक्रिया पर भरोसा करके जो लोग पहली भविष्यवाणी पर भरोसा कर लेते हैं | वे आवश्यक वस्तुओं का संग्रह भी नहीं कर पाते हैं | उन्हें लगता है कि  3 दिन ही तो वर्षा होनी है | इसके बाद वहाँ बाढ़ आ जाती है | जिसका पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं हो पाता है | ऐसे ही जिस वर्ष वर्षा नहीं होती है |  उसका सही उत्तर तो यही होता है कि इस वर्ष बादल अभी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं | क्यों नहीं दिखाई पड़ रहे हैं या कब दिखाई पड़ेंगे | इस बिषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है | 

                                                                महामारी वाला मौसम विज्ञान 
     वैसे भी  महामारी पर तो सभीप्रकार के प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता होगा जबकि उपग्रहों की मदद से तो  केवल बादल  आँधी तूफ़ान आदि ही  देखे जा सकते हैं|  भूकंप महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाएँ न तो उपग्रहों से दिखाई पड़ती हैं और न ही इन्हें समझने के लिए कोई अन्य वैज्ञानिक प्रक्रिया है | 
   महामारियों को समझने के  लिए छोटी बड़ी सभी प्राकृतिक घटनाएँ परिवर्तन संकेत आदि समझने आवश्यक होते हैं |इसलिए उन्हें देखा जाना  अनुभव किया जाना आदि महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए आवश्यक होता है |जिसके लिए प्राचीन विज्ञान के अलावा कोई दूसरा विज्ञान नहीं है |

प्रकृति के बनते बिगड़ते स्वभाव का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है | मौसमसंबंधी  जो अनुसंधान प्राकृतिक स्वभाव के आधार पर किए जाते हैं |उनके आधार पर महामारी के आने जाने एवं महामारी की लहरों के आने जाने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है किंतु  
          
                                                              
                                                    
                                               

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