दो शब्द
किसी देश पर यदि दुश्मन देश अचानक आक्रमण कर देता है तो उस समय तो उस देश का सबसे पहला कर्तव्य उस आक्रांता को पराजित करके उससे अपने देश को सुरक्षित बचाना होता है | आक्रांता को खदेड़ दिए जाने के बाद वह राजा अपनी सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करता है और पता लगाने का प्रयत्न करता है कि हमारे गुप्तचर लोग शत्रु के द्वारा किए गए आक्रमण की जानकारी समय से पता लगाने असफल क्यों रहे | ये उनकी लापरवाही थी गद्दारी थी या उनमें ऐसी गुप्त सूचनाएँ पता लगाने की योग्यता ही नहीं है |इस प्रकार से आत्म मंथन करता हुआ राजा उन विकल्पों पर बिचार करता है जिससे दोबारा ऐसी परिस्थिति पैदा न हो |
महामारी का आक्रमण भी एक प्रकार का युद्ध ही है | महामारी आने का पूर्वानुमान न लगा पाना उन गुप्तचरों की असफलता है | जो महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की जिम्मेदारी सँभाल रहे थे | वे अपनी जिम्मेदारी का सफल निर्वहन क्यों नहीं कर पाए | ये उनकी लापरवाही थी या उनमें ऐसा करने की योग्यता नहीं थी | यदि ऐसा है तो सरकार को उन विकल्पों पर बिचार करना चाहिए | जिनसे भविष्य में आने वाले महामारी जैसे संकटों से समाज की सुरक्षा की जा सके |
आक्रमण दुश्मन देश के द्वारा किया गया हो या महामारी के द्वारा तुरंत की तैयारियों के बल पर इनसे अपनी सुरक्षा नहीं की जा सकती है | इन पर विजय प्राप्त करने के लिए मजबूत तैयारियाँ पहले से करके रखनी पड़ती हैं | ऐसा किया जाना तभी संभव है जब इनके बिषय में पूर्वानुमान पहले से पता हों | सही पूर्वानुमान लगाने के लिए किसी ऐसे विज्ञान की आवश्यकता होती है | जिसके द्वारा भविष्य में झाँका जा सके | ऐसा कोई न तो विज्ञान है और न ही वैज्ञानिक तो ऐसी घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसके बिना सुरक्षा की तैयारियाँ
पहले से करके कैसे रखी जा सकती हैं | तुरंत की तैयारियों के बल पर ऐसा किया जाना कैसे संभव है |
इस प्रकार से महामारी से सुरक्षा के लिए यदि मजबूत तैयारियाँ ही नहीं थीं तो ये कैसे कहा जा सकता है कि महामारी बहुत भयानक थी | कोरोना महामारी में जितना जनधन का नुक्सान हुआ है संभव है कि वह महामारी से सुरक्षा की तैयारियों के अभाव में हुआ हो | महामारी से सुरक्षा के लिए यदि कोई व्यवस्था ही नहीं थी तो महामारी कितनी भी बढ़ती जा सकती थी | उसमें महामारी का क्या दोष !
भूमिका
विगत दशकों में भारत को पड़ोसी शत्रु देशों के साथ तीन युद्ध लड़ने पड़े हैं | उन तीनों युद्धों में मिलाकर जितने लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे | उससे कई गुणा अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | ये बहुत बड़ी चोट है |जो भारत ने तो सही ही है इसके साथ ही साथ संपूर्ण विश्व ने सही है | ये भूलने और भुलाने लायक नहीं है |कोरोना महामारी से सुरक्षा के लिए भले कुछ न किया जा सका हो किंतु भविष्य के लिए तो मजबूत तयारी करके रखी जानी चाहिए ताकि भविष्य में महामारी के आगे मनुष्य इतना बेवश न हो |
बताया जाता है कि विगत कुछ सौ वर्षों में कई बार महामारियाँ आती जाती रही हैं | उनसे जनधन का जो नुक्सान होना था वो होता रहा है | उस समय यदि उससे समाज की सुरक्षा नहीं की जा सकी तो वर्तमान समय कोरोना महामारी आई जब इतना उन्नतविज्ञान है विद्वान वैज्ञानिक हैं निरंतर अनुसंधान होते रहते हैं | इसके बाद भी महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाए जा सके | जो लगाए जाते रहे वे गलत निकल जाते ते रहे |
इतना उन्नत विज्ञान होने के बाद भी ये नहीं पता लगाया जा सका कि महामारी पैदा कैसे हुई ! ये प्राकृतिक है या मनुष्यकृत ! इसका प्रसार माध्यम क्या है ! विस्तार कितना है! इस पर मौसम का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान का प्रभाव पड़ता है या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! संक्रमण बढ़ने घटने का कारण क्या है !आदि !! महामारीके बिषय में ये आवश्यक जानकारियाँ नहीं जुटाई जा सकीं | ऐसे प्रश्नों के निश्चित उत्तर नहीं खोजे जा सके |
किसी रोग या महारोग को समझे बिना उससे सुरक्षा के लिए औषधि कैसे बनाई जा सकती है तथा किसी संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण से मुक्ति कैसे दिलाई जा सकती है | चिकित्सा के लिए रोग को पहचाना जाना आवश्यक है |
अनुसंधान मनुष्यों की सुरक्षा के लिए किए जाते हैं |अनुसंधानों पर व्यय होने वाली भारी भरकम धनराशि जनता के द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए खर्च की जाती है | अनुसंधानों का प्रथम लक्ष्य भी जनसुरक्षा ही है | इसके बाद भी उन अनुसंधानों के द्वारा महामारी में होने वाली जनसुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकी है |
ऐसे अनुसंधानों के द्वारा सुख सुविधाओं के संसाधन यदि खोज भी लिए जाएँ तो उनका क्या होगा !यदि मनुष्य ही सुरक्षित नहीं रहेंगे | इनका आनंद भी मनुष्य तभी ले पाएँगे, जब वे स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे | इसलिए महामारी समेत सभीप्रकार की प्राकृतिक आपदाओं अनुसंधानों का लक्ष्य मनुष्यों को सुरक्षित करना है |
विश्ववैज्ञानिकों ने महामारी के बिषय में जो अंदाजा लगाया है या जो कल्पना की है या संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए जो प्रयत्न किए हैं |उनसे प्राप्त अनुभवों के आधार पर बिचार किया जाना चाहिए कि कोरोना महामारी से मनुष्यों की सुरक्षा करने में महामारीपीड़ितों को किस प्रकार की कितनी मदद पहुँचाई जा सकी है | ये मूल प्रश्न है |
महामारी संबंधी किसी औषधि या टीके के बिषय में विश्वासपूर्वक ये नहीं कहा जा सका कि इसका उपयोग कर लेने के बाद कोरोना संक्रमण से मुक्ति मिल ही जाएगी या इसके बाद संक्रमित नहीं होंगे |ऐसा भी नहीं कहा जा सका कि इस समय के बाद महामारी समाप्त हो जाएगी या महामारी की ये लहर समाप्त हो जाएगी |
महामारी आने वाली है | ऐसा कोई पूर्वानुमान भी नहीं लगाया जा सका !महामारी की कब कौन लहर आने वाली है | इसका भी कोई सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका | महामारी जैसी इतनी बड़ी आपदा आ जाने के बाद जहाँ एक ओर बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते जा रहे हों | वहाँ दूसरी ओर महामारी से मुक्ति दिलाने की तैयारी की जा रही हों | ऐसी आधी अधूरी तैयारियों के बलपर महामारियों से मनुष्यों को सुरक्षित कैसे बचाया जा सकता है | महामारी से सुरक्षा की या मुक्ति दिलाने की तैयारियाँ भी तभी की जा सकती हैं जब महामारी को सही ढंग से समझ लिया गया हो |
विनम्र निवेदन
प्रत्येकदुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के बीत जाने के बाद उससे सुरक्षा के लिए किए गए उपायों के बिषय में समीक्षा की जाती है| उसी प्रकार से कोरोना महामारी से सुरक्षा के लिए किए गए उपायों की भी समीक्षा की जानी चाहिए | उन उपायों को विशेषज्ञों की कसौटी पर कसने के बजाए समाज की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | अनुसंधान समाज के लिए किए जाते हैं | इसलिए उनसे समाज को कितनी मदद मिली ये समाज से पूछा जाना चाहिए |
दूसरा अनुसंधानों को साक्ष्यों की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | ये पता किया जाना चाहिए कि जिन उपायों अनुभवों के द्वारा महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने का या संक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाने का श्रेय दिया जाता है | उसमें सच्चाई कितनी है ये परीक्षण किया जाना चाहिए | काल्पनिक रूप से आत्मपरीक्षण किया जाना चाहिए कि महामारी यदि अभी फिर से घटित होने लगे तो पहले किए गए उपायों अनुभवों से समाज को सुरक्षित बचाने में कितनी मदद मिल सकती है | प्लाज्मा थैरेपी की तरह का भ्रम पाल लेना भविष्य के लिए हितकर नहीं होगा |
तीसरा परिस्थितियों के आधार पर बिचार किया जाना चाहिए कि महामारी की कोई बड़ी लहर यदि अभी कभी अचानक आ जाए तो बड़ी मात्रा में जनधन का नुक्सान होना तो तुरंत प्रारंभ हो जाएगा |उस समय अनुसंधान आदि करने के लिए समय ही नहीं होगा | ऐसी स्थिति में उतने कम समय में लोगों को महामारी से सुरक्षित कैसे बचाया जा सकेगा |उतने बड़े संकट से समाज की सुरक्षा के लिए कौन कौन उपाय किए जा सकते हैं |
चौथी बात महामारी आने के बाद तो उपाय के लिए समय मिलता नहीं है | महामारी का वेग ही इतना अधिक होता है | इसलिए महामारी से सुरक्षा के लिए या फिर संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए जो आवश्यक तैयारियाँ करनी होंगी | वो तो महामारी प्रारंभ होने से पहले ही करके रखनी होंगी | ऐसा तभी हो सकता है जब महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही सही पूर्वानुमान लगा लिया जाए | उसी के आधार पर महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ करके रख ली जाएँ |इसलिए अभी तक किए गए महामारी बिषयक अनुसंधानों के द्वारा क्या यह पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा कि निकट भविष्य में महामारी की कोई लहर आने वाली है या नहीं और है तो कब ! उसके अनुसार महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ पहले से करके रखी जा सकें |
वस्तुतः समाज की सुरक्षा का लक्ष्य लेकर मैं चिंतित हूँ | इसलिए विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूँ कि यदि आधुनिक अनुसंधानों के द्वारा ऐसा किया जाना संभव हो सके तब तो कोई बात नहीं अन्यथा ऐसा करने में यदि किसी भी प्रकार का संशय लगे तो प्राचीनविज्ञान के आधार पर मेरे द्वारा किए गए अनुसंधानों के बिषय में परीक्षण पूर्वक बिचार कर लिया जाना चाहिए |
आधुनिक विज्ञान अभी सौ दो सौ वर्ष पुराना है उसके पास लाखों वर्ष के अनुभवों का संग्रह नहीं है |इस लज्जा से इतिहास को छोटा करने के बजाए भारत के प्राचीन अनुसंधानों को आधार बनाकर अपनी प्राचीनता का परिचय दिया सकता है | भारत का प्राचीन विज्ञान लाखों वर्ष पुराना है | महामारियाँ तो हमेंशा से आती रही हैं | कोरोना महामारी की तरह यदि उन युगों में जनसंहार होता रहा होता तो सृष्टि का क्रम आगे कैसे बढ़ पाता | उस आरंभिक काल में तो जनसंख्या भी बहुत कम रही होगी | बिना विज्ञान के महामारियों से समाज को सुरक्षित बचाया जाना कठिन होता | जिस प्राचीन विज्ञान की मदद से प्राचीन काल में समाज की सुरक्षा की जाती रही है | उसी के आधार पर कोरोना महामारी के बिषय में मैंनेअनुसंधान प्रारंभ किए उसके आधार पर महामारी के बिषय में अनुमान लगा लगाकर पहले से पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | वे सही निकलते रहे हैं | महामारी की सभी लहरों के बिषय मेंपूर्वानुमान लगा लगाकर पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | वे भी सही निकलते रहे हैं | जो पीएमओ की मेल पर अभी भी विद्यमान हैं |
इतना ही नहीं दूसरी लहर जब दिनों दिन भयंकर रूप लेती जा रही थी | तरह तरह की तनावबर्धक डरावनी कल्पनाएँ की जा रही थीं | उस समय 20 अप्रैल 2021 को महामारी शांत करने के लिए मैंने जो उपाय किए | उनके प्रभाव से मेरे दिए हुए समय पर महामारी शांत होनी प्रारंभ हो गई थी | इस बिषय का पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो बाद में पूरी तरह सही सिद्ध हुआ |
ऐसी अनेकों मेलें मैं पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो बाद में सही निकलती रही हैं | उन मेलों के चित्र एवं उन घटनाओं के साक्ष्य मैं इस पुस्तक में प्रकाशित कर रहा हूँ | जिनका प्रमाणपूर्वक परीक्षण किया जा सकता है | उसके आधार पर मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि भविष्य में महामारियों से समाज की सुरक्षा करने में मेरे अनुसंधान बहुत उपयोगी हो सकते हैं
हमारे अनुसंधानों का परिचय (पुस्तक की दूसरी हेडिंग )
प्राकृतिक आपदाएँ एवं महामारियाँ घटित होती हैं | ये तो चिंता का बिषय है किंतु ऐसी प्राकृतिक घटनाओं को घटित होने से रोका नहीं जा सकता है | ऋतुएँ अपने निश्चित समय पर आती जाती हैं | सूर्य अपने निश्चित समय पर उगता अस्त होता है | जिस प्रकार से सूर्यचंद्र ग्रहण अपने निश्चित समय पर घटित होते हैं |उसी प्रकार से आँधीतूफान वर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ अपने अपने निर्धारित समय पर घटित होती रहती हैं |ऐसे ही महामारियों के पैदा और समाप्त होने का समय निश्चित होता है | महामारी की लहरों के आने और जाने का समय निश्चित होता है |
ऋतुओं के आने जाने का एवं सूर्योदय सूर्यास्त आदि का निश्चित समय पता लगाने की गणितीय प्रक्रिया खोज ली गई है | सूर्य चंद्र ग्रहण अपने निश्चित समय पर घटित होते हैं | प्रत्यक्ष देखने पर भले लगे कि इनके घटित होने का समय निश्चित नहीं होता है किंतु इनके घटित होने का समय भी प्राकृतिक रूप से निश्चित होता है | उसे पता लगाने की गणितीय प्रक्रिया अनुसंधानपूर्वक पता कर ली गई है | जिसके आधार पर सूर्यचंद्र ग्रहणों के बिषय में सैकड़ों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | जो बिल्कुल सही निकलता है |
भूकंप वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात भी तो प्राकृतिक घटनाएँ है | सूर्यचंद्र ग्रहणों की तरह ही गणितीय प्रक्रिया से सभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | ऐसे ही महामारी भी तो प्राकृतिक घटना ही है | सभी प्राकृतिक घटनाओं की तरह ही महामारी भी तो प्राकृतिक घटना ही है | इसके घटित होने का समय भी निश्चित होता है | जिसे गणित के आधार पर खोजा जा सकता है |
इस क्षेत्र में भी प्राचीनवैज्ञानिकों ने प्रयास प्रारंभ कर रखे थे |बहुत सारी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के कारण लक्षण समय आदि खोज भी लिए थे | जिनका वर्णन प्राचीन संहिता ग्रंथों में मिलता है | जिनके आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाए जाने लगे थे | उन्हें ग्रहणों की तरह ही गणितीय सूत्रों में बाँधना था | यदि वैसा किया जाना संभव हो पाता तो सूर्यचंद्र ग्रहणों की तरह ही गणितीय प्रक्रिया के द्वारा भूकंप वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात आदि प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना संभव हो जाता | उन अनुसंधानों को उसी गति से आगे बढ़ाए जाने की आवश्यकता थी किंतु दुर्भाग्य से उन्हें न केवल वहीं रोक दिया गया | इसके बाद वो प्रक्रिया वहीं छूट गई जिसे आगे बढ़ाया जाना था किंतु ऐसा नहीं किया जा सका | उसके जो भी कारण रहे हों |
हमारी विनम्र वेदना
परतंत्रता के समय आक्रांताओं के द्वारा उस ज्ञान विज्ञान से संबंधित वैज्ञानिक विधाओं और अनुसंधानों को नष्ट किया गया | प्राचीन वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए अनुसंधानों को या तो उठा ले जाया गया या फिर नष्ट कर दिया गया | जो नष्ट कर दिया गया वो किसी के काम का नहीं रहा और जो उठा ले गए वो इसलिए किसी के काम का न रहा क्योंकि वहाँ उस रिसर्च को आगे बढ़ाने में समर्थ लोग नहीं थे | इसलिए वो नष्ट हो गया | इस प्रकार से मानवता का बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है |
विशेष बात ये है कि उस ज्ञान विज्ञान का जो अंश जिस किसी भी प्रकार से उन वैज्ञानिकों के द्वारा सुरक्षित रखा जा सका | उसे आगे बढ़ाने के लिए जो रिसर्च किए जाने आवश्यक थे वो नहीं किए जा सके | उसका कारण ऐसे बिषयों के विद्वानों के सामने आजीविका की समस्या रही इसलिए उनमें से बहुत लोग चाहते हुए भी ऐसे अनुसंधानों
में रुचि नहीं ले सके | ऐसे बिषयों के जानकार बहुत लोग सरकारी सेवाओं में आ गए इसलिए कुछ ने ऐसे अनुसंधानों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं समझी और कुछ लोग ऐसे अनुसंधानों को करने में समर्थ नहीं हैं |
सरकारें इसके लिए प्रयत्न कर रही हैं किंतु वे उन विद्वानों तक पहुँच नहीं पा रहीं हैं | जो ऐसा करने में समर्थ हो सकते हैं |
ऐसे विद्वानों को खोजने के लिए मैंने बहुत प्रयत्न किए किंतु मैं ऐसा करने में असफल रहा | अंत में मैंने अपना संपूर्ण जीवन लगाकर इस अनुसंधान में पिछले 35 वर्षों से लगा हूँ | उससे मौसम संबंधी दीर्घावधि एवं मध्यावधि पूर्वानुमानों को लगाने में बड़ी सफलता मिली है |कोरोना महामारी की प्रत्येक लहर के बिषय में बिल्कुल सही अनुमान लगाने में सफल हुआ हूँ | जिसके साक्ष्य सुरक्षित हैं | सरकारों से अपेक्षा थी कि वे हमारे अनुसंधानों को आगे बढ़ने में मदद करेंगी किंतु बार बार प्रयास करने के बाद भी मेरी सुनवाई नहीं हुई | मौसम एवं महामारी जैसे
इससे अधिक प्रयास करना मेरे लिए भी संभव नहीं हैं | इसलिए ऐसे अनुसंधानों को मुझे यहीं विश्राम देना होगा | मेरे बच्चों की इधर बहुत रुचि होने के बाद भी मैं उनसे यह कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ कि वे मेरे इन अनुसंधानों को आगे बढ़ाने में अपना जीवन लगाएँ | मैं चाहता तो प्रोफ़ेसर बनकर सुख सुविधापूर्ण जीवन जी सकता था किंतु ऐसा करने में मैं अनुसंधानों के साथ न्याय नहीं कर पाता | इसलिए मैंने अपना जीवन इस संघर्ष में झोंका है किसी दूसरे के जीवन के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहता | ऐसा हो सकता है कि वर्तमान समय में इस अनुसंधान मेंइस उँचाई तक पहुँचने वाला मैं अकेला व्यक्ति निकलूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | मैं भावी पीढ़ी से क्षमा याचना के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं वो सफलता तुम तक नहींपहुँचा सका जिसके तुम अधिकारी थे |
वैज्ञानिकों सरकारों एवं समाज से विनम्र निवेदन है कि एकबार आप अपने पूर्वजों के विज्ञान को पहचानिए और महामारी के बिषय में मेरे द्वारा पीएमओ की मेल पर भेजे गए पूर्वानुमानों का कोरोना ग्राफ से मिलान करके परीक्षण कीजिए कि अपने प्राचीनविज्ञान के आधार पर लगाए गए महामारी बिषयक अनुमान पूर्वानुमान आदि कितने सही निकलते हैं | इसके साथ ही यह भी देखिए कि महामारी की दूसरी लहर को घोषणा पूर्वक रोकने में प्राचीन विज्ञान कितना प्रभावी रहा है | यह भी समझिए कि महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने की जिम्मेदारी सँभाल रहे विश्व वैज्ञानिक महामारी को समझने एवं इसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने चिकित्सा करने में कितने सफल रहे |
पुस्तक के बाद
महामारी बिषयक अनुसंधानों से अपेक्षा !
प्रकृति में बहुत सारी घटनाएँ समय समय पर घटित होती रहती हैं |जिनसे मनुष्यों का नुक्सान न होने के कारण उनका पता ही नहीं लग पाता है कि वे कब घटित हो रही हैं | उनसे कोई भय भी नहीं होता है | सघन जंगलों में मरुस्थलों में या समुद्रों में अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं |वहाँ मनुष्यों की बस्तियाँ नहीं होती हैं तो उनसे किसी का नुक्सान नहीं होता है | इसलिए उनसे किसी को चिंता भी नहीं होती है |मनुष्यों की बस्तियाँ जहाँ होती हैं | प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से वहीं नुक्सान होता है |उनसे सुरक्षा कैसे की जाए |इसके लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है |
महामारी आना और महामारी से संक्रमित होना ये दोनों अलग अलग प्रकार की घटनाएँ हैं | मनुष्यों का नुक्सान महामारी आने से नहीं,प्रत्युत महामारी में संक्रमित होने से होता है | इसलिए महामारी को समझने की अपेक्षा उस समय महामारी से सुरक्षा के उपाय खोजे जाने चाहिए |
महामारी काल में लोगों के संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने के लिए महामारी को जिम्मेदार बताया जाता है किंतु जिस प्रकार से वर्षा होने पर सभी लोग भीगते हैं | भूकंप आने पर सभी लोग हिलते हैं | आँधी तूफ़ान से सभी प्रभावित होते हैं | ऐसे ही लोग महामारी से लोग संक्रमित होते तो सभी होते | एक ही स्थान पर रहते हुए कुछ लोगों के संक्रमित होने एवं बहुत लोगों के संक्रमित न होने से महामारी के प्राकृतिक होने पर संशय होना स्वाभाविक है | महामारी यदि मनुष्यकृत होती तो भी उससे कौन संक्रमित हो सकता है और कौन नहीं | इसका कोई तो निर्धारित मानक होता ! बूढ़े बच्चे स्वस्थ दुर्बल स्त्री पुरुष आदि किस श्रेणी के लोगों को इससे संक्रमित होने की अधिक संभावना है | इसलिए इसे मनुष्यकृत कहने का आधार भी खोजना होगा और अनुसंधान पूर्वक बताया जाना चाहिए कि जो संक्रमित हुए और जो संक्रमित नहीं हुए उनमें क्या अंतर था | बहुत लोग पूरी तरह स्वस्थ बलिष्ठ थे उन्हें भी संक्रमित होते देखा गया था | बहुत लोग दुर्बल थे उम्र भी अधिक थी वे संक्रमितों के साथ रहकर भी संक्रमित नहीं हुए | इसलिए संक्रमित होने या न होने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण खोजा जाना चाहिए |
संपूर्ण जनसंख्या का यदि आधा चौथाई भाग संक्रमित हुआ तो वे संक्रमित क्यों हुए और बाक़ी जो लोग संक्रमित नहीं हुए तो वे संक्रमित क्यों नहीं हुए | उनके संक्रमित न होने का कारण पता लगाया जाना चाहिए | जिस प्रकार या कारण से कुछ लोग संक्रमित होने से बचे रहे |रिसर्च पूर्वक वो कारण खोजकर उसीप्रकार से बाक़ी लोगों की भी सुरक्षा का प्रयत्न किया जाना चाहिए | ऐसा यदि किया जा सका होता तो उन लोगों को भी संक्रमित होने से सुरक्षित बचाया जा सकता था | जो संक्रमित हुए हैं | ऐसा किया जाना यदि संभव हो पाता तो महामारी आई थी ये पता ही नहीं लग पाता !
प्रतिरोधक क्षमता और महामारी
प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर बार-बार सर्दी-जुकाम, फ्लू, पाचन संबंधी समस्याएँ (दस्त, संक्रमण), निमोनिया, ब्रोंकाइटिस जैसे गंभीर श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है | महामारी संक्रमितों को भी प्रारंभ में इसी से मिलते जुलते रोग होते देखे जा रहे थे |
इस प्रकार से प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी से लोग रोगी होते हैं और महामारी से भी लोग रोगी होते हैं | ये कैसे पता लगाया जाए कि कोरोनाकाल में लोगों को होने वाले रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण हो रहे थे या कि महामारी संबंधी संक्रमण के कारण लोग रोगी हो रहे थे | कहीं ऐसा तो नहीं है कि बहुसंख्य लोगों की प्रतिरोधक क्षमता घट गई हो इसलिए लोग रोगी हुए हों | प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण उन पर चिकित्सा का प्रभाव न पड़ा हो | इसलिए उसे महामारी समझ लिया गया हो |
दूसरी बात महामारी आने से यदि उन्हें ही संक्रमित होने का ख़तरा होता है | जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है | इसका मतलब दोनों घटनाओं के एक साथ घटित होने से लोग रोगी होते हैं |प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो तो महामारी आने पर भी लोगों को खतरा नहीं होता है |इसका मतलब महामारी से संक्रमित न होने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करना आवश्यक होता है | यदि ये सच है तब तो प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनाकर महामारी मुक्त समाज की संरचना के लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं | कितना अच्छा हो जब महामारी आने पर भी कोई व्यक्ति संक्रमित ही न हो!
इसके लिए जो संक्रमित हों उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर मान ली जाए और जो संक्रमित नहीं हों ,उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत मान लिया जाना तर्कसंगत नहीं है | प्रतिरोधक क्षमता को पहचानने के लिए कोई अनुसंधानजनित वैज्ञानिक आधार होना चाहिए | जिससे स्वास्थ्य परीक्षण पूर्वक किसी की प्रतिरोधक क्षमता के बिषय में सही सही पता लगाया जा सके |
बताया जाता है कि सीरोलॉजी जैसे स्वास्थ्य परीक्षणों से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने का पता लगा लिया जाता है | यदि ऐसा किया जाना संभव है तो करोड़ों लोग विभिन्न कारणों से अक्सर स्वास्थ्य परीक्षण कराते रहते हैं |उन परीक्षणों में सीरोलॉजी जैसे स्वास्थ्य परीक्षणों को अनिवार्य किया जाना चाहिए | जिससे यह पता लगते रहेगा कि किसकी प्रतिरोधक क्षमता कब कैसी रह रही है |
इससे प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण जो लोग उस समय रोगी हैं ,उन्हें तो चिकित्सा पूर्वक तुरंत स्वस्थ कर ही लिया जाएगा | इसके अतिरिक्त भावी अनुसंधानों में भी मदद मिलेगी | ऐसे स्वास्थ्य परीक्षण पहले से कराए जाने चाहिए थे |कोरोनाकाल से पूर्व यदि ऐसा किया गया होता तो करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य परीक्षणों से महामारी आने के संकेत महामारी प्रारंभ होने से पूर्व प्राप्त किए जा सकते थे | यदि ये पूर्वानुमान सही निकलते तो महामारी से सुरक्षा के लिए तैयारियाँ करने का समय मिल सकता था |इसकी रोकथाम के लिए उसी समय से प्रयत्न प्रारंभ किए जा सकते थे | जिससे संभव है कि महामारी से जनधन का उतना अधिक नुक्सान न हो पाता |जितना हुआ है |
प्रतिरोधक क्षमता के आधार पर लगाया गया अंदाजा यदि गलत निकल जाता तो यह पता लग जाता कि महामारी से संक्रमित होने का कारण प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना नहीं है |
प्रतिरोधक क्षमता मतलब क्या ?
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से संक्रमित होने की संभावना कम रहती है | ऐसा कहा जाता रहा है | रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए पौष्टिक आहार फल मेवा नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद (7-8 घंटे), और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है। इनका पालन साधनसंपन्न लोग ही कर सकते हैं | इसलिए साधन संपन्न लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़नी निश्चित ही है | इसलिए उन्हें संक्रमित नहीं होना चाहिए |
गरीबों का तनाव मुक्त स्वच्छतायुक्त रहन सहन एवं पर्याप्त नींद लेने लायक सुख सुविधाएँ नहीं मिल सकती हैं |इसलिए गरीबों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है | इसलिए गरीबों को अधिक संक्रमित होना चाहिए था और साधन संपन्न लोगों को कम संक्रमित होना चाहिए था जबकि साधन संपन्न लोग गरीबों की अपेक्षा अधिक संक्रमित हुए हैं |इसका कारण क्या है ?इसे भी खोज का बिषय बनाया जाना चाहिए !
दूसरी बात कोरोनाकाल में कई हृष्ट पुष्ट बलवान युवा लोगों को भी महामारी में संक्रमित होते देखा गया था जबकि लक्षणों के आधार पर उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती थी |फिर भी उन्हें संक्रमित होते देखा जा रहा तो कई दुर्बल वृद्ध लोगों को भी महामारी से संक्रमित होते नहीं देखा गया था जबकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर लगती थी |इसका कारण खोजा जाना चाहिए
महामारी आने पर भी बहुत लोग रोगी नहीं होते हैं और बहुत लोग महामारी न आने पर भी रोगी रहते हैं | ऐसे में किसी के रोगी होने का संबंध महामारी से होता है या प्रतिरोधक क्षमता की कमी से ये कैसे पता लगाया जाए |
प्राचीन विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो प्रतिरोधक क्षमता दो प्रकार की होती है | एक तो वो जो प्रत्यक्ष कारणों से होने वाले रोगों से हमारी रक्षा करती है | सर्दी गरमी लगने से,असंतुलित या अस्वास्थ्यकर भोजन करने से या असमय में सोने जागने से या अपनी लापरवाही से कोई चोट चभेट लगने से जो रोग पैदा होते हैं | उनसे सुरक्षित होने में या रोग मुक्ति पाने में शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता मदद करती है |
दूसरी प्रतिरोधक क्षमता परोक्ष कारणों से होने वाले रोगों से हमारी सुरक्षा करती है | ऐसे रोग जिसके न तो हम स्वयं कारण होते हैं और न ही कोई दूसरा होता है अकारण ही स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है | कोई ऐसा रोग पैदा होने लगता है | जिसका कोई कारण नहीं होता है | उस पर किसी औषधि या चिकित्सा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है | वो दिनों दिन बढ़ता जाता है | उसे यदि समाप्त होना होता है तो अपने आप से ही समाप्त होता है | अन्यथा जीवन भर चलता है या उस मनुष्य की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता है | प्राकृतिक रोग हों या कोरोनामहामारी में हुए रोग भी इसी श्रेणी के थे | इसीलिए न तो इनके पैदा होने का कारण पता लगा और न ही इनसे स्वस्थ होने का कारण पता लगाया जा सका |
प्रतिरोधक क्षमता केवल शरीरों में ही नहीं घटती बढ़ती है ऐसा प्राकृतिक वातावरण में भी होता है | ये भी दो प्रकार का होता है | ये कई बार मनुष्यकृत तो कई बार प्राकृतिक होता है | मनुष्यों के द्वारा कई बार कुछ ऐसे कार्य किए जाते हैं जिससे प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | युद्ध आदि में उपयोग किए जाने वाले विस्फोटकों ,गैसों ,किसी लैब से लीक बिषाणुओं से वातावरण बिषैला हो जाता है | इससे प्राकृतिक रोग या महामारी पैदा हो जाती है | इसे वातावरण में साँस लेने से मनुष्य रोगी होने लगते हैं | ये रोग तभी तक होते हैं जब तक उक्त घटनाएँ घटित होती हैं | उन घटनाओं के रुकते ही वातावरण की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है और लोग स्वस्थ होने लगते हैं | दूसरी लहर तब आएगी जब मनुष्यों के द्वारा प्राकृतिक वातावरण प्रदूषित करने के लिए फिर से कोई वैसा कार्य किया जाएगा | जिससे प्राकृतिक वातावरण फिर से प्रदूषित होने लगे | इसमें ऐसा नहीं होता है कि कोरोना महामारी की तरह ही मनुष्यों के द्वारा दोबारा कुछ किए बिना ही संक्रमण बार बार बढ़ता घटता रहे | मनुष्यकृत रोग या महारोग तो उस गाड़ी की तरह होते हैं | जिन्हें धक्का देकर एक बार आगे बढ़ा दिया जाता है |इसके बाद वो जहाँ तक जाती है चली जाती है इसके बाद जब रुक जाती है तो रुक जाती है | दोबारा धक्का दिए बिना दोबारा नहीं चलने लगती है |
जिस प्रकार से मोटर वाली गाड़ी अपने आप चलने लगती है, रुक रुककर चलने लगती है | इस दृष्टि से देखा जाए तो कोरोना महामारी में लहरों का आना जाना बार बार देखा जा रहा था | जो प्राकृतिक महामारियों में ही संभव हो सकता है | ऐसी महामारियाँ प्राकृतिक बिकारों से पैदा होती है जो दिखाई नहीं पड़ते हैं | ऐसे बिकारों का प्राकृतिक रूप से बढ़ना घटना भी दिखाई नहीं पड़ता है | उनसे संक्रमण बढ़ते घटते ही दिखाई पड़ता है |
इसी परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता का अनुभव मनुष्यों को तब होता है,जब किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा में बहुत लोग किसी एक प्रकार की हिंसक परिस्थिति का सामना कर रहे होते हैं | उसमें कुछ लोगों की मृत्यु हो जाती है | कुछ लोग घायल हो जाते हैं तो कुछ लोग परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने के कारण पूरी तरह सुरक्षित होते हैं | कोरोना महामारी के समय भी बहुत लोग संक्रमितों के साथ रह कर भी संक्रमित होने से बचे रहे |
किसी कार में 4 लोग बैठे हुए होते हैं | कार खाई में गिर जाती है | उनमें से तीन की मृत्यु हो जाती है और एक बिल्कुल स्वस्थ सुरक्षित होता है | ऐसा उस एक व्यक्ति की परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने के कारण हो पाता है |
ऐसी बहुत सारी दुर्घटनाओं रोगों महामारियों प्राकृतिक आपदाओं से परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता संपन्न लोग सुरक्षित बने रहते हैं |कोरोना महामारी के समय जो लोग संक्रमित नहीं हुए पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित बने रहे | इसका कारण परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता प्रभाव रहा है |
मृत्यु का रहस्य और महामारी
किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय घटित हो रही दुर्घटनाएँ उसकी मृत्यु का केवल बहाना बनती हैं | इसका पता तब लगता है जब उस दुर्घटना से एक जैसे प्रभावित बहुत लोगों में से कुछ की मृत्यु हुई होती है ,कुछ घायल हुए होते हैं तो कुछ को खरोंच भी नहीं लगी होती है जबकि प्रभावित वे भी उसीप्रकार से हुए होते हैं | दुर्घटना से पीड़ितों में से जिनकी मृत्यु हो गई उसके लिए यदि दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाएगा तो उन्हीं के साथ उसी दुर्घटना में शिकार हुए उन लोगों के सुरक्षित बचे रहने के लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा| जिन्हें एक खरोंच भी नहीं आई | मृत्यु होने के समय जिस प्रकार की दुर्घटना घटित हो रही होती है |उसी दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है | मृतकों के लिए यदि दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाएगा तो सुरक्षित बचे लोगों पर दुर्घटना का प्रभाव न पड़ने का तर्कसंगत कारण खोजना होगा | उसे खोजे बिना मृतकों की मृत्यु के लिए दुर्घटना को जिम्मेदार मानना तर्क संगत नहीं है |
कई बार बिना किसी कारण के सहज सामान्य स्वस्थ जीवन जी रहे लोगों की मृत्यु अचानक होते देखी जाती है |कुछ लोगों की हँसते खेलते नाचते कूदते चलते फिरते खाते पीते मृत्यु हो जाती है | वहाँ तो कोई दुर्घटना नहीं घटी | उन मौतों के लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा |
प्राचीन मान्यताओं के अनुशार किसी व्यक्ति की मृत्यु उसकी आयु पूरी होने पर होती है |जिनकी आयु पूरी नहीं हुई होती है | किसी दुर्घटना में वे घायल तो हो जाते हैं किंतु बच जाते हैं | कुछ की न मृत्यु होने का समय होता है और न ही घायल होने का ऐसे लोग उतनी बड़ी दुर्घटना से भी घायल हुए बिना ही निकल आते हैं |
कुल मिलाकर प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु का समय निश्चित होता है | इसीलिए उस समय के आने पर मृत्यु तो होती ही है |यदि ऐसा न होता तो किसी बड़ी दुर्घटना में बहुत लोग एक साथ एक जैसे प्रभावित होते हैं | चोट सभी को लगती है किंतु मृत्यु उन्हीं की होती है जिनकी आयु पूरी हो चुकी होती है |
मृत्यु एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है | जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी | सूर्योदय होने के साथ ही सूर्यास्त होने का समय भी निश्चित हो जाता है | इसी प्रकार से जन्म होने के साथ ही मृत्यु होने का समय भी निश्चित हो जाता है | उसी निश्चित समय पर मृत्यु होती है |
स्वाँसें जब तक जीवन तब तक
प्रत्येक व्यक्ति के जीवनरूपी दीपक में घी का कार्य स्वाँसें करती हैं | दीपक में जब तक घी रहता है तब तक दीपक की लव जलती रहती है | घी समाप्त होते ही दीपक की ज्योति शांत हो जाती है |
इसीप्रकार से हृदय की धड़कन ही दीपक की ज्योति है | श्वासें जब तक रहती हैं ,हृदय तभी तक धड़कता है | जैसे घी समाप्त होते ही दीपक शांत हो जाता है | वैसे ही पूर्व निर्धारित स्वाँसें समाप्त होते ही धड़कन शांत हो जाती है |
जिसप्रकार से किसी गाड़ी का पेट्रोल ख़त्म हो जाए तो गाड़ी रुक जाती है | ऐसे ही जीवन में श्वासों का कोश समाप्त होते ही हृदय की गति रुकनी ही होती है | उसके रुकते ही मृत्यु हो जाती है |
प्रत्येक व्यक्ति सारे जीवन कुछ न कुछ करता रहता है | ऐसे ही प्रकृति और समाज में हमेंशा कुछ न कुछ घटित होता रहता है | श्वासें पूरी होते समय प्रकृति और समाज में कुछ न कुछ घटित हो ही रहा होता है | वो स्वयं भी कुछ न कुछ कर ही रहा होता है | श्वासें पूरी होते समय उस व्यक्ति के साथ जो दुर्घटना घटित हो रही होती है | उसकी मृत्यु के लिए उसी दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है कि उसकी मृत्यु उसी के कारण मृत्यु हुई है |
ये भ्रम तब टूटताहै जब वही दुर्घटना उसी समय कुछ दूसरे लोगों के साथ भी घटित हुई होती है | वे पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित होते हैं |कुछ लोग जिन्हें चोट भी लगी होती है और श्वासें भी बची होती हैं | ऐसे लोग घायल होते हैं बाद में स्वस्थ हो जाते हैं | इसका मतलब उस एक या अनेक लोगों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार वो दुर्घटना नहीं प्रत्युत मृतक की अपनी श्वासों का समाप्त होना था | मृत्यु होते समय जो घटना घटित हो रही होती है | मृत्यु होने का बहाना उसे ही मान लिया जाता है | मृत्यु अपने समय पर ही होती है |
महाभारत युद्ध में अर्जुन को भ्रम था कि वो जिसे बाण मरेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी | इसीलिए वो कह रहा था कि गुरुद्रोण पितामह आदि स्वजनों पर हम बाण चला सकते | अर्जुन का यही भ्रम तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित कर रहे थे कि तुम युद्ध करो | श्रीकृष्ण को पता था कि गुरुद्रोण पितामह आदि अजेय महाबीरों की श्वासें समाप्त होने पर हैं इसलिए इनकी अब मृत्यु होनी ही है |इस समय यदि अर्जुन इनसे युद्ध लड़ेगा तो उनकी मृत्यु तो श्वासें समाप्त होने के कारण होगी | लोगों को लगेगा कि अर्जुन ने युद्ध में उप्राप्त कर ली है | इसका मतलब अर्जुन उनसे भी बड़ा बीर है | श्रीकृष्ण ने अर्जुन की यही तो मदद की थी | जब जिस योद्धा की स्वाँसें पूरी होने वाली होती थीं | अर्जुन का रख लेकर श्रीकृष्ण उसी के सामने पहुँच कर अर्जुन से उस पर बाण चलाने को बोल देते थे | वो मरता अपनी मृत्यु से था श्रेय अर्जुन को मिल जाता था | श्रीकृष्ण उन्हें समझा रहे थे कि उनकी स्वाँसें पूरी हो चुकी हैं इसलिए उनकी मृत्यु होनी ही है | तुम्हें किसी को मारना नहीं है केवल निमित्त बनना है |
प्राचीनकाल के आख्यानों में अक्सर सुना जाता है कि किसी को मरने का शाप दिया जाता था तो वो तुरंत मर जाता था | इसका भी रहस्य यही है कि शाप दिया ही उसे जाता था | जिसकी स्वाँसें पूरी हो चुकी होती थीं | यदि ऐसा न होता तो राक्षसों का संहार करने के लिए ऋषि मुनियों को भगवान से प्रार्थना क्यों करनी पड़ती | शाप देकर ही उन्हें समाप्त कर दिया गया होता | इसलिए श्वाँसों के समाप्त होने पर ही जीवन पूरा होता है |
महामारी में हुई मौतों से श्वासों का संबंध !
महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से हत्याओं आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है |प्राकृतिक आपदाएँ एवं आतंकी घटनाएँ बढ़ी हैं | इनमें एवं इसी बीच कई देशों में हुए आपसी युद्धों में बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं |ऐसी सभी अलग अलग घटनाओं को देखा जाए तो मृत्यु होने के बहाने भले अलग अलग भले बनते रहे हों किंतु इनमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं |
इन घटनाओं में जो लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | उनकी मृत्यु के लिए तो वे घटनाएँ ही कारण रूप में मान ली जाती है | इससे ऐसा लगना स्वाभाविक ही है कि यदि ऐसी घटनाएँ घटित न हुई होतीं तो उन घटनाओं में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की मृत्यु भी नहीं हुई होती किंतु यदि ऐसा होता तो विगत कुछ वर्षों में अच्छे खासे स्वस्थ लोगों को अचानक चलते फिरते उठते बैठते हँसते खेलते सोते जागते बिना किसी कारण के मृत्यु को प्राप्त होते देखा जाता है | इससे ऐसा विश्वास होने लगना स्वाभाविक ही है कि लोगों की मृत्यु होने के लिए जिन घटनाओं को जिम्मेदार माना जाता रहा है | कहीं वो भ्रम ही तो नहीं है | कहीं ऐसा तो नहीं है कि लोगों की मृत्यु अपने समय पर ही होती हो | घटनाएँ केवल बहाना बन जाती रही हों | लोगों की मृत्यु होते समय घटित हो रही घटनाओं को अज्ञानवश मृत्यु का कारण मान लिया जाता रहा हो |
किसी की मृत्यु होने का कारण श्वासकोश का समाप्त होना होता है | महामारी का मतलब बहुत लोगों का अप्रत्याशित रूप से श्वासकोश समाप्त हो जाना | कोरोना महामारी में भी बहुत लोगों की मृत्यु होने का कारण बहुत लोगों का श्वासकोश अचानक समाप्त हो जाना ही था |
इसीलिए कोरोना महामारी में जिनकी मृत्यु होनी थी उनकी तो हुई ही उसके अलावा भी बहुत सारी दुर्घटनाओं में भी इसी समय बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे | आतंकी घटनाओं में आपसी युद्धों में बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | इसके अतिरिक्त भी चलते फिरते उठते बैठते हँसते खेलते सोते जागते बिना किसी कारण के बहुत लोगों की मृत्यु होते देखा जाता रहा है |
ऐसी स्थिति में यदि केवल महामारी में ही लोगों की मृत्यु हुई होती तो उसके लिए महामारी को जिम्मेदार माना जा सकता था किंतु कोरोनाकाल में विभिन्नप्रकार की घटनाओं में लोगों की मृत्यु हुई है | इसलिए महामारी केवल उतनी ही मौतों के लिए जिम्मेदार है | जो संक्रमित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | उसके अतिरिक्त जितनी भी मौतें हुई हैं |उनका कारण श्वासकोश का समाप्त हो जाना ही है |
इस दृष्टि से बिचार करने पर महामारी में हुई मौतों का कारण यदि महामारी के प्रभाव को माना जाए तो वो सभी पर समान रूप से पड़ रहा था | इसलिए महामारी के प्रभाव से जो घटना घटती वो सभी के साथ एक समान रूप से घटित होती|किसी किसी की मृत्यु होने का मतलब उन लोगों का श्वासकोश का समाप्त होना ही था | जब जिसका श्वासकोश समाप्त हुआ तब उसकी मृत्यु हुई |
श्वास और आयु के नियम
श्वासकोश की बचत और व्यय व्यवस्था इस प्रकार से बनाई गई हैकि किसी व्यक्ति को इस धरती पर कितने वर्षों का जीवन जीना है | ये वर्षों में निर्द्धारित न होकर श्वासों के आधार पर निर्धारित होता है | एक व्यक्ति 1 मिनट में 15 श्वासें और एक दिन में 21,600 श्वासें लेगा | ऐसा मानकर प्रत्येक व्यक्ति की आयु उसके जन्म के समय ही निश्चित कर दी जाती है कि वह कितने वर्षों तक जीवन जिएगा |
इसीलिए जैमिनिसूत्र आदि प्राचीनग्रंथों में आयुर्दाय निर्धारित करनेके लिए गणना करते समय कलात्मक ग्रहों में जो 21,600 का भाग दिया जाता है | वे एक दिन के लिए निर्धारित की गईं 21,600 श्वासें ही होती हैं |इसके आधार पर 21,600 श्वासों का एक दिन मान लिया गया है | इसी के आधार पर महीनों वर्षों आदि को मान लिया गया है | इसी के आधार पर अनुमान लगा लिया जाता है कि किस व्यक्ति का जीवन कितने वर्षों का हो सकता है |
कोई व्यक्ति यदि शांत सदाचारी संयमित जीवन जीते हुए प्राणायाम आदि का अभ्यास करता है तो उसकी श्वासों की बचत होने लगेगी | जिससे उसकी आयु बढ़ने लगेगी | ऐसे ही कोई व्यक्ति अधिक सोता है | अधिक स्त्री पुरुषों के साथ बासनात्मक संबंधों का सेवन करता है तो उसकी आयु उसी हिसाब से कम होती चली जाएगी | व्यवहार में अक्सर देखा जाता है कि स्त्री पुरुष संसर्ग के समय चोरी बलात्कार हत्या आदि पापपूर्ण आचरण करते समय जल्दी जल्दी श्वास चल रही होती है | इसलिए उस समय अधिक श्वासें खर्च होने कारण तेजी से आयु घटती चली जा रही होती है |
श्वासकोश बढ़ने और घटने की प्रक्रिया यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जब शांत बैठा होता है तब 1 मिनट में 12 श्वास लेता है | रास्ते में चलता है तो एक मिनट में 18 श्वास लेता है | जब सोता है तब एक मिनट में 32 श्वास लेता है | स्त्री पुरुष शारीरिक संबंधों में एक मिनट में 64 श्वास लेता है | ऐसे और भी जो जितने पाप पूर्ण आचार व्यवहार हैं | उनमें श्वासें उसी हिसाब से बढ़ती जाती हैं |
कोई व्यक्ति एक दिन में 21,600 अर्थात 1 मिनट में 15 श्वास लेता है तो उसे अपने लिए निर्धारित पूर्ण आयु भोगने का समय मिलता है | इसी हिसाब से उसकी आयु निश्चित होती है |कोई व्यक्ति यदि शांत सदाचारी संयमित जीवन जीने का अभ्यास करता है तो वह एक मिनट में 12 श्वास लेगा | इससे 1 मिनट में 3 श्वासें बचाने से 1 घंटे में 180 श्वासें बच सकती हैं |ऐसा करके एक दिन में 4320 श्वासें बचाई जा सकती हैं | इन श्वासों के भोगने की गणना यदि 1 मिनट में 12 के हिसाब से की जाए तो इन बची हुई श्वासों से एक दिन में 6 घंटे अधिक जीवन जीने को मिल सकता है| इस प्रकार से एक दिन की श्वासों में सवा दिन जीवन जिया जा सकता है |
इसका अभ्यास यदि निरंतर किया जाए तो जिसकी आयु 80 वर्ष निर्धारित है | वो इस प्रक्रिया से अपनी एक चौथाईआयु बढ़ाकर 80 +20 = 100 वर्ष जीवन जीने का आनंद ले सकता है |
प्राचीनकाल में तपस्वी ऋषि मुनि प्राणायाम पूर्वक अपनी बहुसंख्य श्वासें बचाते हुए हजारों वर्षों का जीवन जीते देखे जाते थे |
इसीप्रकार से कोई व्यक्ति ब्यभिचार आदि बुरे ब्यवहारों में जो जितना अधिक समय व्यतीत करेगा | उसकी आयु उतनी अधिक घटती चली जाएगी | ब्यभिचार के समय में 1मिनट में 64 श्वासें चलती हैं |ऐसी स्थिति में जिन 64 श्वासों में 4 मिनट से अधिक समय तक जीवित रहा जा सकता है | उतनी श्वासें 1 मिनट में खर्च हो गईं |
इस हिसाब से देखा जाए तो जन्म के समय जिनकी आयु 100 वर्ष निर्द्धारित की गई थी वे निरंतर बिषय बासनाओं में लगे रहने के कारण निरर्थक श्वासें खर्च करते करते 30-40 वर्षों में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं |
इस प्रकार का असंयमित जीवन जीने वाले पापप्रवृत्त लोगों की संख्या जैसे जैसे बढ़ती जाती है| वैसे वैसे कम उम्र में ही उनका श्वासकोश समाप्त होने लग जाता है | ऐसा होते ही अधिक संख्या में लोग मृत्यु को प्राप्त होने लग जाते हैं |
महामारी और अन्य मौतों में अंतर
वर्तमान समय में भी ऐसी सभी प्रकार की पाप प्रवृत्तियाँ बढ़ने से लोगों का श्वासकोश असमय में ही समाप्त होता जा रहा है | लोग तेजी से आयु खोते चले जा रहे हैं | अधिक संख्या में लोग इस प्रवृत्ति का शिकार हो रहे हैं | श्वासक्षय होने से लोग मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं |इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होना ही महामारी है |
इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि जिन लोगों की मृत्यु किसी दुर्घटना के घटित होते समय होती है | उस मृत्यु के लिए उस दुर्घटना को जिम्मेदार मान लिया जाता है | रोगी अवस्था में मृत्यु हुई तो रोग के कारण मृत्यु ,किसी दुर्घटना में मृत्यु हुई तो दुर्घटना के स्थान और समय पर मृत्यु हुई तो दुर्घटना के कारण मृत्यु और यदि कोई प्रत्यक्ष कारण न हो और मृत्यु हो जाए तो हृदय की गति रुक जाने से मृत्यु मान ली जाती है किंतु हृदय की गति रुकने का कारण क्या था तो श्वासकोश समाप्त होना ही कारण होता है | किसी गाड़ी में ईंधन समाप्त हो जाने से जैसे गाडी रुक जाती है | वैसे ही श्वासें समाप्त होने से हृदय गति रुकजाती है |बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होना ही महामारी है | महाभारत
इस हिसाब से एक मिनट में 15 श्वासे लेना वाला व्यक्ति दिन रात्रि में 21,600 श्वास लेगा
इतनी बड़ी संख्या में लोगों के स्वाँसकोश अचानक घटने का कारण खोजना होगा |
वस्तुतः जब बहुत लोगों की मृत्यु होने लगे तो उस समय को महामारी मान लिया जाता है |
जिस प्रकार से सूर्योदय होने पर कमल खिलता है | जिस घटना को ऐसा माना जाता रहा है | संभव है कि इन दोनोंप्रकार की घटनाओं का आपस में कोई संबंध ही न हो | ये दोनों प्रकार की घटनाऍं समय से संबंधित हों |सूर्योदय होने और कमल के खिलने का समय एक ही हो इसलिए ये दोनों घटनाएँ साथ साथ घटित हो रही हों |ऐसे भरम बहुत घटनाओं के बिषय में बने हुए हैं जिनका एक दूसरे से कोई संबंध ही नहीं होता है फिर भी एक समय में घटित होने के कारण उन दोनों का संबंध एक दूसरे के साथ जोड़ दिया जाता है |
अनुसंधानों के नाम पर महामारी के साथ मौसम को चिपकाने का प्रयास किया गया | तापमान बढ़ने घटने को चिपकाने का प्रयास हुआ | वायु प्रदूषण बढ़ने को चिपकाकर देखा गया इनमें से किसी की संगति महामारी के साथ जुड़ जाती तो जोड़ दी जाती और कह दिया जाता कि महामारी पर इस घटना का प्रभाव पड़ता है | ये तो घटनाओं को आपस में जोड़ने की प्रक्रिया है | जो शिक्षित अशिक्षित सभी लोग कर सकते हैं |इसके लिए विज्ञान वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानों की क्या आवश्यकता है |
अनुसंधानों का लाभ तभी है जब अनुसंधानों के द्वारा ये पता लगा लिया जाए कि महामारी आ रही है \ जिसका स्वभाव ऐसा है | इसलिए उस महामारी पर मौसम का क्या प्रभाव पड़ेगा ! वायुप्रदूषण का कैसा प्रभाव पड़ेगा और तापमान का कैसा प्रभाव पड़ेगा | महामारी आने के बाद ये सब पता लगाने का समय ही कहाँ होता है
इसी प्रकार से जिससमय बहुत लोग रोगी होने लगे या मृत्यु को प्राप्त होने लगे तो महामारी नाम रख दिया या वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा ऐसा कुछ पता लगाया जा सका कि आगे आने वाले समय में बहुत लोगों की मृत्यु होगी उसका कारण यह होगा | उससे सुरक्षा के लिए क्या करना होगा | वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा जो जानकारी पहले से जुटा ली जाती है और बाद में वैसा ही घटित होता जाता है वो जानकारी विश्वास योग्य है | उसी जानकारी से महामारी समय में मदद मिल सकती है |
इसके अतिरिक्त लोगों को संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते देखकर ये मान लिया गया है कि महामारी आ गई है तो ये विश्वसनीय नहीं है क्योंकि इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं, किंतु यही बात यदि पहले पता लगा ली जाए और उसी के अनुसार घटनाएँ घटित होती जा रही हों तो ये विश्वास करने योग्य विज्ञान है |
लोगों को संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते देखकर ही यदि महामारी का पता लगाया जाना है तो महामारी को समझने में विज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों की भूमिका क्या है ?ये कैसे पता लगे कि लोगों की मृत्यु महामारी से हो रही है या बिना महामारी के हो रही है |
इसलिए किसी का किसी रोग से संक्रमित होते एवं मृत्यु होते देखकर महामारी मान लेने का आधार वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं है |
लक्ष्य : महामारी खोजना है या महामारी से सुरक्षा !
हमारे अनुसंधानों का लक्ष्य महामारियों से मनुष्यों की सुरक्षा के उपाय खोजना है न कि महामारी खोजना है |इसलिए अनुसंधानों का लक्ष्य मनुष्यों को महामारियों से संक्रमित होने से बचाना है | अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ उन सघन जंगलों मरुस्थलों में या समुद्रों में में घटित होती रहती हैं | जहाँ मनुष्यों की बस्तियाँ नहीं होती हैं तो किसी का उनसे नुक्सान नहीं होता है | इसलिए उनके बिषय में किसी को पता नहीं लग पाता है |
बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित होते हुए देखकर उसी के अनुसार महामारी आने के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है |इसके अलावा विज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों के आधार ये पता लगाया जाना कैसे संभव है कि महामारी आ रही है या आ गई है |
ऐसी परिस्थिति में महामारी कैसे पैदा हुई थी |ये मनुष्यों के द्वारा निर्मित थी या प्राकृतिक थी |इस पर मौसम संबंधी घटनाओं का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान बढ़ने घटने का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! वायु प्रदूषण बढ़ने का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! ऐसी परिस्थिति में अनुसंधानों के लिए मानव सुरक्षा गौण होती चली जाती है और महामारी के बिषय में जिज्ञासा बढ़ती चली जाती है |
महामारी जैसे इतने कठिन समय में जब लाखों लोग जीवन मृत्यु से जूझ रहे होते हैं|उस समय पहला लक्ष्य मनुष्यों की सुरक्षा का होना चाहिए |
मान्यवर ,इस मीटर घर में
___________________________________________________________________________________
प्राचीन विज्ञान (BOOK)
___________________________________________________________________________________
महामारी संबंधी अनसुलझे सवाल !
भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात वज्रपात जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में चर्चा के लिए तो विज्ञान है किंतु अनुसंधानों के लिए ऐसा कोई विज्ञान नहीं है | जिस पर भरोसा किया जा सके | इसीलिए ऐसी घटनाओं के बिषय में वैज्ञानिक लोग अनुसंधान करते हैं किंतु उनसे ऐसा कुछ नहीं निकलता है | जिनका घटनाओं के साथ संबंध सिद्ध हो सके | कई बार कुछ घटनाओं के बिषय में गलत निष्कर्ष पकड़कर उन्हें ही सही की तरह प्रस्तुत का दिया जाता है | प्लाज्मा थैरेपी की तरह वो सच्चाई समय के साथ कभी सामने आ जाती है और कभी नहीं भी आ पाती है | महामारी की दूसरी होती तो ये कैसे पता लगता कि कोरोना संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्लाज्मा थैरेपी उतनी सक्षम नहीं है जबकि उसे पहले सक्षम बताया गया था | ऐसी ही दुविधा भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात वज्रपात जैसी प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों अनुमानों पूर्वानुमानों के बिषय में देखा जाता है| कोरोनामहामारी के बिषय में भी ऐसा ही होते देखा गया है |
प्रायः प्राकृतिकदुर्घटनाओं के घटित होने के बाद उस समय जो नुक्सान होता है वो तो हो ही जाता है |उसके बाद थोड़े बहुत समय तक तो चर्चा होती रहती है | इसके बाद लोग घटनाओं को भूलने लग जाते हैं | उसके बाद उन अनुसंधानों का क्या होता है | वो पता नहीं लग पाता है | दोबारा फिर जब घटनाएँ घटित होती हैं जनधन का नुक्सान होता है तब फिर अनुसंधान करने की चर्चाएँ शुरू होतीं हैं |उसके बाद फिर वही होता है | घटनाएँ शांत होती हैं | चर्चाएँ शांत होती हैं | अनुसंधान भी शांत हो जाते हैं | बीते कुछ सौ वर्षों से महामारियाँ इसीप्रकार से आती जाती रही हैं | उनके बिषय में विशेष कुछ हो नहीं पाया है |
पिछले कुछ सौ वर्षों से महामारी जैसी घटनाएँ घटित होते देखी जाती रही हैं ,उनसे जुड़े कुछ न कुछ अनुसंधान भी होते रहे होंगे| जिनसे महामारी के बिषय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी मिलती रही होंगी |उन अनुसंधानजनित अनुभवों से कोरोना महामारी के समय समाज को ऐसी क्या मदद पहुँचाई जा सकी | जिससे मनुष्यों को सुरक्षित बचाने में या संक्रमण से मुक्ति दिलाने में मदद मिल सकी हो | महामारी से निपटने के ढंग से तो ऐसा ही लग रहा था जैसे विज्ञान के विकास से पहले आदि काल में कोई महामारी पहली बार अचानक आ गई हो | इस प्रकार की हड़बड़ाहट थी |
महामारी में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु सामान्य घटना नहीं है |ये गंभीर चिंता का बिषय है कि पड़ोसी शत्रु देशों के साथ भारत को तीन युद्ध लड़ने पड़े | उन तीनों युद्धों में मिलाकर भारत के जितने लोगों की मृत्यु हुई थी |उससे कई गुना अधिक लोग केवल कोरोनामहामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | महामारी संबंधी अनुसंधानों के द्वारा उन्हें सुरक्षित नहीं बचाया जा सका |
वर्तमानसमय में अत्यंत उन्नत विज्ञान है| विद्वान वैज्ञानिक हैं| अनुसंधान निरंतर होते ही रहते हैं |वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा जल थल नभ के बिषय में बहुत खोजें की जा चुकी हैं | तरह तरह के यंत्रों का आविष्कार कर लिया गया है | इसके बाद भी संक्रमितों को स्वस्थ करने में या मृतकों की संख्या कम करने में सफलता नहीं मिल सकी | कोरोनासंक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाने में वैज्ञानिक अनुसंधान कितने सहायक सिद्ध हुए हैं | भविष्य संबंधी सुरक्षा के लिए यह पता लगाया जाना आवश्यक है |
महामारी छोड़ गई कुछ अनसुलझे सवाल !
महामारी को समझने के लिए यह पता लगाया जाना आवश्यक है कि महामारी कैसे पैदा हुई | महामारी पैदा होने का कारण यदि किसी देश विशेष की लैब से लीक हुआ वायरस था तब तो संक्रमण उसी स्थान पर फ़ैल जाता उसी के आस पास बना रहता | बिना किसी प्रसार माध्यम के वो संपूर्ण विश्व में कैसे फ़ैल जाता | दूसरी बात किसी लैब से एक बार लीक हुआ था या बार बार लीक होता रहा था | यदि एक बार लीक हुआ था तो जितना बढ़ना होता उतना एक बार ही बढ़ता बार बार बढ़ने घटने के कारण यह संशय होना स्वाभाविक ही है कि लैब से बार बार लीक हुआ कैसे हो सकता है | वैसे भी सौ दो सौ वर्षों के अंतराल में महामारी पहले भी आती रही है | हो सकता है उसी प्रक्रार प्राकृतिक रूप से ही आई हो |
प्रकृति स्वयं में तो जड़ है इसमें प्रतिपल हो रहे परिवर्तनों की योजना समय की होती है | समयसंचार का अनुगमन करने वाली हवाएँ ही उन परिवर्तनों को मूर्तरूप दे रही होती हैं |इस प्रकार से समय के अनुसार ही प्राकृतिक वातावरण में प्रत्येक घटना घटित हो रही होती है |उन सब के घटित होने का समय निश्चित होता है | प्रकृति भी उसी समय का अनुगमन करती है | वर्षाऋतु का समय आने पर वर्षा होने लगती है | शिशिरऋतु आने पर सर्दी पाला कोहरा आदि देखा जाता है | ग्रीष्मऋतु आने पर तापमान बढ़ जाता है | लू आदि गर्म हवाएँ चलने लगती हैं |
पूर्णिमा का समय आने पर पूर्ण चन्द्रमा दिखाई देने लगता है | अमावस्या का समय आने पर चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता है | सूर्य उदय एवं अस्त होने की घटनाएँ उनके अपने अपने निर्धारित समय पर घटित होती हैं | यहाँ तक कि कभी कभी घटित होने वाली सूर्य चंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ भी उस प्रकार का समय आने पर घटित होती हैं | समुद्र में ज्वारभाटा अपने निर्द्धारित समय पर घटित होता है | इस प्रकार से संपूर्ण प्रकृति अपने अपने समय के अनुसार व्यवहार करते देखी जाती है |
बसंतऋतु आने पर पेड़ों में पतझड़ होकर नई पत्तियाँ निकलने लगती हैं | आम के वृक्षों में मंजरियाँ लगने लगती हैं | सूर्योदय होने पर कमल खिल जाते हैं | ऐसे ही बसंतऋतु के आने पर कोयलें कूकने लगती हैं | प्रातः काल होने पर मुर्गा बोलने लगता है |
इस प्रकार से बहुत सारी प्राकृतिक घटनाएँ पेड़ पौधे बनस्पतियाँ आदि सपने अपने समय से संबंध रखती हैं | उसी के अनुसार व्यवहार करती हैं |पशु पक्षी भी अपने अपने समय के अनुशार व्यवहार करते हैं | इसलिए प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के आधार पर, पेड़ों पौधों में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर जीव जंतुओं के व्यवहारों के आधार पर समय की पहचान की जाती है |
कई बार अंतर ऋतुएँ आती हैं | इसमें किसी एक ऋतु का प्रभाव कुछ दूसरी ऋतुओं में देखा जाता है |ऐसी स्थिति में वर्षाऋतु के अलावा कुछ दूसरी ऋतुओं में भी वर्षा होते देखी जाती है | ऐसे समय वहाँ खोजने पर कुछ ऐसे चिन्ह भी मिल जाते हैं | जो वर्षाऋतु से संबंधित होते हैं | उस समय वहाँ वर्षाऋतु के समय का प्रभाव होता है | इसलिए वहाँ वर्षा हो रही होती है | इसलिए जो रोग वर्षाऋतु में होते हैं | वही रोग उस समय भी हो सकते हैं |
इसी प्रकार से कोयलें बसंत के अलावा किसी अन्य ऋतु में बोलने लगें तो इसका मतलब बसंतऋतु न आने पर भी बसंतऋतु कुछ समय के लिए आ गई है | कई बार ऐसी घटना किसी छोटे से क्षेत्र में घटित होती है | उससे ये सिद्ध होता है कि बसंतऋतु का समय न होने पर भी इस स्थान पर इस समय बसंतऋतु का प्रभाव है | यह निश्चय हो जाने पर उस समय प्रकृति के कुछ दूसरे लक्षणों का भी मिलान करना चाहिए | जिस स्थान पर ऐसा हो उस स्थान पर उस समय पतझड़ होने या आम्र मंजरी लगने जैसे अन्य चिन्ह भी खोजे जाने चाहिए | ऐसी सभी घटनाओं का आपस में मिलान करना चाहिए | यदि ऐसा होता है तो उस स्थान पर बसंत की उपस्थिति समझी जानी चाहिए |
इसप्रकार से सभी पेड़ पौधे जीव जंतु आदि समय संबंधी परिवर्तनों के अनुसार परिवर्तित होने लगते हैं | जीव जंतुओं के स्वभाव में उस प्रकार के बदलाव होने लगते हैं | इसीलिए भूकंप आदि बड़ी घटनाओं के समय कुछ जीव जंतुओं के व्यवहार को बदलते देखा जाता है | जिससे ऐसी घटनाओं के घटित होने का अनुमान लगाया जाता है |
मनुष्य जीवन और प्रकृति !
मनुष्यों का जीवन जब केवल प्रकृति के आधीन होता था तो उन्हें भी ऐसे प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव हुआ करता था किंतु सुख सुविधाओं के साधन बढ़ने से मनुष्य प्राकृतिक वातावरण से दूर होता जा रहा है| मनुष्य को जो प्राकृतिक अनुभव प्रकृति के साथ रह कर करना था | उन्हें वो नहीं कर पा रहा है |
बढ़े हुए तापमान एवं उसके परिणामों का अध्ययन करना है तो पंखा कूलर एसी आदि व्यवस्थाओं में रहने आने जाने काम करने वाले लोग इसका अनुभव कैसे कर सकते हैं | ठंढा पानी पीने वाले लोग इसका अनुभव नहीं कर सकते हैं |
इसके अलावा गरमी भी कई प्रकार की होती है कुछ हुमश वाली गरमी होती है | कुछ वर्षा के बीचकी गर्मी होती है | कुछ क्रमिक गर्मी होती है कुछ अचानक गर्मी होती है | सितंबर के महीने में हुई गर्मी बिल्कुल अलग प्रकार की होती है | इस समय जितनी गर्मी बढ़ती है उतने रोग बढ़ते हैं | सबका गुण धर्म स्वाद आदि अलग अलग होता है | सबमें अलग अलग प्रकार के रोग होते हैं |
जिस प्रकार से सीढ़ी पर चढ़ते हुए लोग पाँच मंजिल पर चढ़ जाते हैं किंतु बिना सीधी के एक मंजिल से भी कूद जाएँ तो चोट लग जाती है |इसी प्रकार से क्रमिक रूप से गर्मी बढ़ती जा रही हो और लोग सहते जा रहे हों तो ज्यादा कठिनाई नहीं होगी किंतु पानी बरसते बरसते अचानक तेज गर्मी होने लगे या अधिकांश समय वातानुकूलित वातावरण में रहने वाले लोगों को उस समय अचानक तेज धूप में निकलना पड़े जब गर्मी बहुत अधिक पड़ रही हो तो वो रोगी हो जाएँगे | इसका कारण तेज गरमी का होना कम अपनी जीवन शैली बिगड़ना अधिक होता है |
ऐसे ही गरमी होने और लू चलने में अंतर है | गर्मी का स्वाद कडुआ एवं लू का स्वाद मीठा होता है | लू के प्रभाव से आम इमली खरबूजा तरबूज लीची आदि मीठी हो जाते हैं | कहा जाता है कि जितनी अधिक लू चलती है उतनी मिठास बढ़ती है | हेमंत ऋतु का समय मीठा होता है जिसके प्रभाव से गन्ने में मिठास बढ़ जाती है | मिठास बहुत अधिक बढ़ जाए तो फलों गन्ने आदि में कीड़े लगने लगते हैं | जिस वर्ष ऐसा होने लगे तो फलों गन्ने आदि के गुणधर्म में तो परिवर्तन आ ही जाते हैं ऐसा प्रभाव सभी जीवजंतुओं पर पड़ता है मनुष्यों पर भी पड़ता है | जो पचाने के अभ्यासी मनुष्य नहीं होते हैं | जिसके कारण उन में उसप्रकार के रोगों के होने की संभावना बन जाती है |
इसी प्रक्रिया से रोग महारोग आदि शरीरों में चुपके चुपके प्रवेश करते रहते हैं | कुछ महीनों वर्षों तक इस प्रकार का असंतुलन सहते सहते महामारी जैसे बड़े रोग फैलने लगते हैं |
महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए दो ही मार्ग हैं | एक तो ऐसे प्राकृतिक लक्षणों को देखकर कुछ महामारियों को आने के कुछ पहले पहचान लिया जाए और दूसरा प्रकृति में ऐसे लक्षण प्रकट होने का कारण समय होता है |इसलिए ऐसा समय कब आएगा | इसका पूर्वानुमान लगाकर उसके आधार पर पूर्वानुमान लगा लिया जाए | समयसंबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए गणितविज्ञान ही एक मात्र मार्ग है | जिसके द्वारा अनुसंधानपूर्वक महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
___________________________________________________________________________________
अनुसंधानों में चूक कहाँ हुई !
कोरोना महामारी के बिषय में वैज्ञानिकों ने जितने भी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए हैं | उनमें से एक आध ही भले सही निकला हो बाक़ी गलत निकलते चले गए |ये गंभीर चिंता की बात इसलिए है क्योंकि ये आम आदमी के द्वारा लगाए गए सामान्य अंदाजे नहीं थे| जिनके गलत निकल जाने पर सहकर चुप बैठ जाया जाए | इनमें वैज्ञानिकों का परिश्रम लगता है | सरकारों के प्रयत्न लगते हैं | जनता के खून पसीने की कमाई लगती है | इन सबसे आशा तो इतनी ही रहती है कि महामारी जैसी घटनाओं के घटित होने पर वैज्ञानिक अपने अनुसंधानों के द्वारा महामारियों से देश वासियों की सुरक्षा कर लेंगे | महामारियों के आने पर उसका सामना सीधे जनता को ही करना पड़े | प्रभावी प्रयत्नों के अभाव में जनता को संक्रमित होना ही पड़े !कुछ लोगों की मृत्यु भी हो ही जाए तो इससे ऐसे अनुसंधानों की कमजोरी सिद्ध होती है | जिसके कारणों की खोज इसलिए की जानी चाहिए | ये महामारी तो जैसे तैसे निकल गई किंतु भविष्य में आने वाली महामारियों के समय विज्ञान जगत इतना बेवश न रहे |
अनुसंधानों का ये ढंग बिल्कुल विश्वास करने योग्य नहीं है कि भूकंप आने पर जितनी जनधन हानि होनी है वो होती ही रहे और भूकंप संबंधी अनुसंधान भी होते रहें | यही बाढ़ तूफान बज्रपात आदि प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने पर होता है |अनुसंधान भी होते रहते हैं | घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं और जनधन का नुक्सान भी होता रहता है |यही कोरोना महामारी के समय होते देखा गया | अनुसंधानों से इतनी मदद तो मिलनी ही चाहिए कि प्राकृतिक आपदाएँ आने पर जनधन की हानि उतनी न हो जितनी होती है |
भूकंपविज्ञान की वैज्ञानिकता तब तक संदिग्ध है जब तक उस विज्ञान के द्वारा भूकंप के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि सही निकलने लगें !भूकंपों के नाम पर कुछ काल्पनिक किस्से कहानियाँ गढ़ लेना अनुसंधान नहीं है | यही स्थिति महामारी संबंधी अनुसंधानों की है | महामारी संबंधी अनुसंधान होते हुए भी जनधन का इतना बड़ा नुक्सान होने से यह सिद्ध होता है कि इससे संबंधित अनुसंधानों से सुरक्षात्मक सहयोग नहीं मिल पाया है |
इसलिए ऐसे अनुसंधानों के लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए |अनुसंधानकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए | अनुसंधान बिषयक बिकल्पों पर बिचार करते हुए उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए | महामारी के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान जो गलत हुए हैं | वे उनके द्वारा लगाए गए थे | जिन्हें ऐसे बिषयों का विशेषज्ञ माना जाता है | उन्हें उनकी इसी योग्यता के कारण इतनी बड़ी जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं | इसीलिए उन्हें ऐसे विशिष्ठ वैज्ञानिक पद प्रतिष्ठा सुख सुविधाएँ आदि प्रदान की जाती हैं | उनके द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि यदि इतनी आसानी से गलत निकल सकते हैं तो वह समाज ऐसे अनुसंधानों का क्या करे | जिसे इन पर व्यय होने वाला आर्थिक बोझ वहन करना पड़ता है |
अनुसंधान और भविष्यसंबंधी चिंताएँ !
विकास का मतलब अनुसंधानों के द्वारा सुख सुविधा के साधन खोज लिया जाना मात्र नहीं है | उन मनुष्यों की को सुरक्षित रखना भी है | जिन्हें सुखी करने के लिए सुख सुविधाओं के साधन खोजे जाते हैं | कोरोना महामारी जैसी आपदाएँ यदि उन मनुष्यों को यूँ ही निगलती चली जाएँगी तो उन सुख सुविधाओं का क्या होगा | उन्हें कौन भोगेगा | वे किसका जीवन सरल बनाएँगी | जो मनुष्यों के लिए खोजी गई हैं | इसलिए महामारी जैसी आपदाओं से मनुष्यों को सुरक्षित बचाया जाना पहले आवश्यक है | सुख सुविधाएँ कुछ कम रहेंगी तो भी स्वस्थ रहकर सुखी हुआ जा सकता है |
महामारी जैसे संकटों से मनुष्यों को सुरक्षित बचाने में वैज्ञानिकअनुसंधान यदि सक्षम थे तो महामारी पीड़ितों की मदद क्यों नहीं की जा सकी | विज्ञान इतना सक्षम नहीं था या वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसे प्रभावी अनुसंधान किए नहीं जा सके | जो महामारी पीड़ितों का बचाव करने में समर्थ होते |
ऐसे में उन अनुसंधानों अनुसंधानों के योगदान का आकलन कैसे किया जाए | महामारी से जो जनधन का नुक्सान हुआ है वो तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है किंतु अनुसंधानों से क्या मदद मिली !ये पता नहीं है | ये आत्ममंथन इस कसौटी के आधार पर किया जाना चाहिए कि महामारी संबंधी जो अनुसंधान अभी तक किए जाते रहे | यदि ऐसे अनुसंधान पहले से न किए जा रहे होते तो क्या महामारी इससे भी अधिक लोगों को संक्रमित कर सकती थी या और अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त हो सकते थे |
प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधानों के नाम पर जो कुछ किया जाता है | उस किए जाने का उस प्राकृतिक घटना से कोई तो संबंध सिद्ध होना चाहिए | ये आवश्यक है | अक्सर देखा जाता है कि भूकंप संबंधी अनुसंधानों से भूकंपों के बिषय में कुछ पता नहीं लग पाता है और महामारी संबंधी अनुसंधानों से महामारी के बिषय में कुछ पता नहीं लग पाता है | ऐसी तैयारियों के बल पर भविष्यसंबंधी महामारियों से सुरक्षा की दृष्टि से कितनी मदद मिल पाएगी |
महामारी पैदा कैसे हुई !
कुछ वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी पैदा होने के लिए किसी देश विशेष की प्रयोगशाला से निकले वायरस (बिषाणुओं) को जिम्मेदार बताया जाता है |
वैसे भी प्राकृतिक वातावरण में समय के साथ अनेकों प्रकार के बिषाणु प्राकृतिक रूप से पैदा और समाप्त होते रहते हैं | इस प्राकृतिक प्रक्रिया को रोका जाना संभव नहीं है और न ही ऐसी आवश्यकता है | कोरोना वायरस किसी प्रयोगशाला से निकला हो या प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ हो | किस वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा यह पता लगाया जा सकता है | यदि ये पता लगा भी लिया जाता कि महामारी प्राकृतिक है या मनुष्यकृत तो इससे महामारी पीड़ितों का क्या भला हो जाता |
महामारी या प्रतिरोध क्षमता की कमजोरी !
महामारी को यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ माना जाए तो अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाओं की तरह महामारियाँ भी आती जाती रहती होंगी | अंतर इतना ही है कि अन्य प्राकृतिक घटनाएँ दिखाई पड़ा करती हैं महामारियों का प्रकोप तभी दिखाई पड़ता है जब बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने लगते हैं और लोगों की मृत्यु होने लगती है | महामारी की पहचान यदि इतनी ही है तो ऐसा कभी भी किसी भी कारण से होने लगेगा तो उसे भी महामारीमान लिया जाएगा | इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा महामारी की कोई ऐसी पहचान विकसित नहीं की जा सकी है | जिसके आधार पर लोगों के संक्रमित होने से पहले महामारी को वैज्ञानिक आधार पर पहचाना जा सके |
याँ देखी नहीं जा सकतीं मनुष्यों की समस्या महामारी आना है या महामारी से संक्रमित होना है | बताया जाता है कि महामारी से लोगों के संक्रमित होने का कारण उनकी कमजोर प्रतिरोधक क्षमता थी |ऐसी स्थिति में लोगों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने का क्या कारण था और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के लिए पौष्टिक आहार उचित मात्रा में नींद एवं तनाव मुक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है | ऐसी सभी सुविधाएँ गरीबों की अपेक्षा साधन संपन्न लोगों के पास अधिक हो सकती हैं | इसलिए साधनसंपन्न एवं सुखसुविधा भोगी लोगों की अपेक्षा गरीबों को न तो उतना पौष्टिक भोजन मिलेगाऔर न ही उतनी अच्छी सुख सुविधाएँ मिलेंगी |न तनाव रहित मन होगा और न ही उतनी अच्छी नींद कैसे आएगी |इसलिए गरीबों की अपेक्षा संपन्न लोगों में प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होनी चाहिए | इसलिए कोरोना महामारी से साधन संपन्न लोगों को गरीबों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होना चाहिए था जबकि व्यवहार में ऐसा देखा गया था कि गरीबों की अपेक्षा संपन्न लोग कोरोना महामारीसे अधिक पीड़ित हुए हैं |
इसका मतलब प्रतिरोधक क्षमता या तो पौष्टिक आहार उचित मात्रा में नींद एवं तनाव मुक्त जीवन जी ने से मजबूत नहीं होती है या फिर कोरोनामहामारी से सुरक्षा में उसकी कोई भूमिका नहीं थी | क्योंकि गरीबों के बच्चे भोजन के लिए दिन दिन भर लाइनों में लगे रहे | मजदूरों का पलायन हुआ | दिल्ली में किसान आंदोलन में लोग बैठे रहे | ऐसी स्थिति में लोग बड़ी संख्या में संक्रमित हो सकते थे किंतु नहीं हुए सब के सब सुरक्षित बने रहे | इसका कारण यदि प्रतिरोधक क्षमता की मजबूती माना जाए तो उन गरीबों में मजबूती का कारण क्या था | उसे खोजा जाना चाहिए | लोग संक्रमित हुए आखिर कैसे !
कहीं आग लग गई हो जो बड़े बड़े मकानों को चपेट में लेती चली जा रही हो | ऐसे समय उस आग को शांत करना कर्तव्य होता है | उस समय आग को शांत करने के बजाय यदि यह पता लगाने का प्रयत्न किया जाए कि आग कैसे लगी है | आग आकाशीय बिजली गिरने से लगी है या मनुष्यों द्वारा बनाई गई बिजली संबंधी शार्टशर्किट से लगी है या माचिस की तीली जला कर डाल देने से लगी है | उस समय केवल आग को शांत करने के बिषय में सोचना होता है |
इसी प्रकार से कोरोना महामारी के आने पर लोग तेजी से संक्रमित होते जा रहे थे | उस समय पहला कर्तव्य महामारी से समाज को सुरक्षित बचाया जाना था | संक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाया जाना था | ऐसा करने के बजाय उस समय यह पता लगाने में समय बर्बाद करना कितना उचित था कि महामारी प्राकृतिक है या मनुष्यकृत ! ऐसी चर्चा महामारी से सुरक्षा संबंधी गंभीरता को कम करती है | लक्ष्य यदि महामारी से मनुष्यों की सुरक्षा करना है तो जब ये पता लग गया कि महामारी आ गई है तो पूरा ध्यान उससे सुरक्षा पर ही दिया जाना चाहिए था |
जिस प्रकार से किसी ने माचिस की तीली जलाकर फेंकी गई हो या आकाशीय बिजली गिरी हो आग जलती तो दोनों ही प्रकार से है किंतु ज्वलनशील ईंधन के संपर्क में आए बिना आग जहाँ जलेगी वहीं बुझ जाएगी | इधर उधर फैलेगी ही नहीं | ज्वलनशील ईंधन के संपर्क में आते ही उस आग का स्वरूप बढ़ना प्रारंभ हो जाता है |
इसी प्रकार से महामारी मनुष्यकृत हो या प्राकृतिक पैदा तो दोनों ही प्रकार से हो सकती है | मनुष्यों को समस्या उसके पैदा होने से न होकर प्रत्युत उससे संक्रमित होने से है | संभव है ऐसी घटनाएँ अक्सर घटित होती रहती हों किंतु कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग महामारी के संपर्क में न आ पाते हों| इसलिए महामारी पता नहीं लग पाती है |कोरोना काल में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता तेजी से कमजोर होती जा रही थी | इसलिए भारी संख्या में लोग महामारी से संक्रमित होते जा रहे थे |
जिस प्रकार से आग लगने का कारण प्राकृतिक हो या मनुष्यकृत किंतु आग लग चुकने के बाद केवल इतना ध्यान दिया जाना चाहिए कि आग से ज्वलनशील ईंधन को अलग किया जाना चाहिए |,क्योंकि जितना ईंधन मिलेगा आग उतनी भड़केगी | ईंधन का ढेर जितना बड़ा होगा आग का स्वरूप उतना बड़ा और बिकराल होगा |ईंधन थोड़ा होगा तो आग थोड़ी लगेगी ! ईंधन नहीं होगा तो आग नहीं लगेगी |
इसी प्रकार से महामारी प्राकृतिकरूप से आवे या किसी लैब से वायरस लीक होने से पैदा हो | ये बढ़ती तब है जब कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग इसके संपर्क में आते हैं | महामारी रूपी चिनगारी जब कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मनुष्यों पर पड़ती है तो बिकराल रूप धारण कर लेती है |
कुलमिलाकर महामारी से लोगों के संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने के लिए महामारी की अपेक्षा लोगों में प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी अधिक जिम्मेदार रही है | महामारी रूपी चिनगारी के लिए मनुष्यों में प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी ईंधन का काम करती रही है |
महामारी काल के बिना भी दुर्बल प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग रोगी होते देखे जाते हैं | प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने पर महामारी काल में भी बहुत लोग रोगी नहीं होते हैं |इस प्रकार से महामारी से संक्रमित होने में प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने की सबसे बड़ी भूमिका होती है |
प्रतिरोधक क्षमता की कमी के कारणों की खोज !
महामारीकाल में लोगों के संक्रमित होने का कारण यदि केवल महामारी को माना जाए तो महामारी का प्रभाव तो सभी लोगों पर एक समान रूप से पड़ता !महामारी से कुछ लोग संक्रमित होते और उसीसमय उसी स्थान पर रह रहे कुछ लोग संक्रमित नहीं होते | सभी लोग संक्रमित होने चाहिए थे | इसका मतलब लोगों के संक्रमित होने के लिए महामारी या केवल महामारी जिम्मेदार नहीं है |
इसके बाद लोगों के संक्रमित होने के लिए प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी को जिम्मेदार बताया गया था | कहा जाता है कि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना भी संक्रमण बढ़ने के लिए ईंधन का काम करता है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि लोग महामारी के प्रभाव से संक्रमितहो रहे थे या प्रतिरोधक क्षमता की कमी से !लोगों के संक्रमित होने का कारण यदि प्रतिरोधक क्षमता की कमी को माना जाए तो महामारी के बिना भी प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी से लोग अस्वस्थ होते देखे जाते हैं और रोग भी महामारी से मिलते जुलते होते देखे जाते हैं | ऐसे में लोगों के संक्रमित होने में महामारी की क्या भूमिका रही है |
ऐसे में महामारी कैसे पैदा हुई यह खोजने के बजाए ध्यान प्रतिरोधक क्षमता के कम होने पर देना होगा | इतनी बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता इसी समय अचानक कम होने का कारण क्या रहा है | दूसरी बात लोगों में प्रतिरोधक क्षमता की कमी प्राकृतिक कारणों से हुई थी या उन लोगों के अपने अनियमित रहन सहन खान पान आदि की कमजोरी से हुई थी |
केवल गरीब लोग यदि अधिक संक्रमित हुए होते तो इसके लिए उन अभावों को जिम्मेदार मान लिया जाता जो गरीबत के कारण सहना लोगों की मजबूरी होती है किंतु ऐसा नहीं हुआ | इसमें अनुभव कुछ ऐसा किया गया कि साधनविहीन लोगों की अपेक्षा साधन संपन्न लोग अधिक संक्रमित हुए हैं | ऐसी स्थिति में साधन संपन्न लोगों के अधिक संक्रमित होने के लिए यदि प्रतिरोधक क्षमता की कमी को कारण माना भी जाए तो इसके लिए संसाधनों के अभाव या खान पान की कमजोरी को प्रतिरोधक क्षमता की कमी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है | मनुष्यों के स्वेच्छाचार को यदि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के लिए जिम्मेदार माना जाए तो कोरोना महामारी आने से पूर्व इतनी बड़ीसंख्या में मनुष्यों ने अपने आहार बिहार रहन सहन आदि में अचानक ऐसा क्या परिवर्तन करना शुरू कर दिया था | जिसके कारण उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगी थी | उन कारणों को खोज की जानी चाहिए | उसी के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकेगा |
महामारी पैदा होने का कारण हो सकता है 'समय'
समय से संपूर्ण संसार प्रभावित होता है | समय अच्छा बुरा दो प्रकार का होता है | अच्छे समय में सब कुछ अच्छा अच्छा होता है बुरे समय में सबकुछ बुरा बुरा होता है | बुरे समय में प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | हवाओं की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है | बुरे समय से प्रभावित हवाओं का जितना प्रभाव पेड़ों पौधों समेत समस्त जीव जंतुओं पर पड़ता है | उतना ही प्रभाव मनुष्यों पर भी पड़ता है | उसमें साँस लेने से मनुष्य रोगी होते हैं | पशु पक्षी आदि समस्त जीव जंतु भी उसी में साँस लेने के कारण के कारण उतने ही रोगी होते हैं |
ऐसी हवाओं में पले बढ़े अनाज दाल फूल फल शाक सब्जियों पर भी उन हवाओं का उतना ही प्रभाव पड़ता है |इसलिए उनकी गुणवत्ता में भी कमी आती है | बृक्षों बनस्पतियों आदि से प्राप्त होने वाले औषधीयद्रव्यों पर भी उतना ही प्रभाव पड़ता है | इसलिए वे भी वे अपने अपने गुणधर्म से विहीन होने लग जाते हैं |
इसी प्रकार से डबलरोटी बिस्कुट मीठा दालमोठ आदि ऐसे भोज्य पदार्थ जो निर्मित होने के बाद कई कई दिन रखे रहते हैं | ऐसी औषधियाँ जो निर्मित होने पर काफी समय तक रखी रहती हैं | उन पर भी उसी बुरे समय का प्रभाव पड़ता है |जिससे उनकी भी गुणवत्ता में कमी आ जाती है | इसीकारण ऐसी औषधियाँ क्वालिटी टेस्ट में फेल निकलती हैं |
इसका मतलब ये नहीं कि केवल निर्मित औषधियाँ ही ही क्वालिटी टेस्ट फेल होती हैं | औषधियों के अलावा भी कच्चे तथा पक्के जितने भी प्रकार के खाद्यपदार्थ होते हैं | वे भी क्वालिटी टेस्ट में फेल निकलते हैं | महामारी के आगे पीछे के कुछ वर्षों तक ऐसी ही प्राकृतिक स्थिति रहती है |
बुरे समय से प्रभावित रोग कारक हवाओं का प्रभाव पड़ने से रोगी तो सभी होते हैं,लेकिन ऐसे बिकार दिखाई केवल मनुष्यों में ही होते हैं | महामारियों में मनुष्य ही रोगी होते देखे जाते हैं |इसका कारण यह है कि मनुष्य अपने ऊपर पड़े ऐसे प्रभावों से स्वयं तो रोगी होते ही हैं | इसके साथ ही वे जो कुछ खाते पीते हैं | वो सभी कुछ बिकारित होता है| इसलिए मनुष्यों में ऐसे संक्रमण अधिक दिखाई पड़ते हैं |इसके बाद रोग मुक्ति के लिए मनुष्य जो औषधियाँ खाते हैं | उन रोगकारक बुरे प्रभावों से वे औषधियाँ भी प्रभावित होती हैं | इसलिए ऐसे रोगियों पर उन औषधियों का प्रभाव नहीं पड़ता है |
इसीलिए कोरोना जैसी महामारियों के समय में बिकारित सभी होते हैं | मनुष्य भी होते हैं | बिकारित खान पान से मनुष्यों के रोग बढ़ जाते हैं | इसलिए मनुष्य रोगी हो जाते हैं | इसके बाद रोग मुक्ति के लिए ली जाने वाली औषधियाँ भी बिकारित होती हैं |इसलिए उनकी गुणवत्ता में कमी आ चुकी होती है | इसलिए उनका महामारी संबंधी रोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता है और रोग बढ़ते चले जाते हैं | जो कोरोना जैसी महामारियों के रूप में परिवर्तित होते चले जाते हैं |
समय संचारके बिगड़ने से बनती है महामारी !
बड़ी संख्या में मनुष्य जब रोगी होने लगें | खाने पीने की चीजों में विद्यमान पोषकतत्व स्वयमेव घटने लगें और रोग पैदा करने वाले बिकार बढ़ने लग जाएँ | बनस्पतियों समेत समस्त औषधीय द्रव्यों एवं निर्मित औषधियों में ऐसे बिकार आने लगें कि वे अपने अपने गुणधर्म से विहीन होने लग जाएँ तो महामारी जैसे महारोगों के निर्माण का समय आ चुका होता है |
समय अच्छा बुरा दो प्रकार का होता है | बुरे समय में ही महामारी जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं | उसी बुरे समय के प्रभाव से उस प्रकार की प्राकृतिक परिस्थिति निर्मित होती है |प्राकृतिक रूप से जब बुरा समय चल रहा होता है तभी प्राकृतिक वातावरण में महामारी संबंधी वायरस पैदा होने लगते हैं | दूसरी ओर उसी बुरे समय के प्रभाव के कारण ही लोगों के शरीरों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लग जाती है |इससे लोग रोगी होने लगते हैं | तीसरी बात इसी बुरे समय का प्रभाव बृक्षों बनस्पतियों या अन्य औषधीय द्रव्यों एवं औषधियों पर पड़ने लगता है | जिससे उनके गुण धर्म में बिकार आने लग जाते हैं | उनसे निर्मित औषधियाँ संक्रमितों को रोगमुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं रह जाती हैं |इस प्रकार बुरे समय के प्रभाव से महामारी का विस्तार होना शुरू हो जाता है |
कुल मिलाकर जब प्राकृतिक वातावरण में महामारी संबंधी बिषाणुओं की वृद्धि हो जाए | मनुष्यों के शरीर इतने दुर्बल हो जाएँ कि वे उन बिषाणुओं को पराजित करने में समर्थ न रह जाएँ | औषधियाँ ऐसे रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता से विहीन होने लग जाएँ |निर्मित औषधियों की गुणवत्ता घटती चली जाए कि औषधियों में रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता कमजोर हो जाए |ये तीनों घटनाएँ एक साथ घटित हों तब महामारी निर्मित होती है |
बिषाणु बढ़ने से प्राकृतिक वातावरण सहने लायक नहीं रह जाता है उसमें साँस लेकर स्वस्थ रहना कठिन हो जाता है | ऐसे वातावरण में पैदा हुई खाने पीने की अन्न फल फूल शाक सब्जी आदि उसी रुग्ण वातावरण में पैदा हुई होंगी | उनमें उन पोषक गुणों की कमी आएगी जिसके लिए वे जानी जाती हैं | इन्हें खाने पीने से मनुष्यों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होगी तो शरीर रोगी होने लगेंगे | यही विकारयुक्त प्राकृतिक प्रभाव औषधीय द्रव्यों एवं बनस्पतियों आदि पर पड़ने लगेगा |निर्मित औषधियों पर पड़ेगा |
इन सभी के संयुक्त प्रभाव से महामारी जहाँ एक ओर पैदा होती है ,वहीं दूसरी ओर मनुष्यों के शरीर दुर्बल होने के कारण वे सहज संक्रमित होने लगते हैं | गुणधर्म से विहीन औषधीय द्रव्य एवं निर्मित औषधियाँ रोगों से मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं रह जाते हैं तब महामारी पैदा होती है |
कोरोना महामारी के प्रारंभ होने के कई वर्ष पहले से यही प्रक्रिया प्रारंभ हो गई थी |कोरोना के कई वर्ष बाद तक ऐसा ही प्राकृतिक वातावरण बना रहा है | निर्मित औषधियों की गुणवत्ता कमजोर होती जा रही थी |औषधियों के क्वालिटीटेस्ट में फेल होने का एक कारण समय का प्रभाव भी हो सकता है | संभव है उनमें ऐसे बिकार उसी प्राकृतिक प्रक्रिया के अंश रहे हों |
इस प्रकार से सभी प्राकृतिक परिस्थितियाँ जब किसी एक ही प्रकार की घटना के घटित होने में सहायक बनती जा रही हों | महामारी भी आवे और शरीर भी दुर्बल होकर रोगी होने लायक हो जाएँ और औषधियाँ भी रोगमुक्ति दिलाने में समर्थ न रह जाएँ | इस प्रकार से आपसी सहयोग तभी संभव है ,| जब उन्हें बुरे समय का साथ मिल रहा हो | |
प्राचीन काल की अनुसंधान पद्धति के आधार पर कोरोना महामारी के बिषय में यदि बिचार किया जाए तो महामारी पैदा होने तथा उसी समय प्रतिरोधक क्षमता के कम होने एवं उसी समय औषधियों की गुणवत्ता घटने के लिए बुरे समय संचार को जिम्मेदार मान लिया जाता है |
ऋतुविज्ञान और महामारी !
महामारी के लिए अनेकों वैज्ञानिकों ने मौसम को जिम्मेदार माना है | मौसमसंबंधी जानकारी जुटाने में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं | एक तो प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते प्रत्यक्ष देखकर उनके बिषय में कुछ सही गलत अंदाजा लगा लिया जाए और दूसरा प्रकृति के स्वभाव को समझा जाए उसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाने का प्रयास किया जाए और तीसरा उस नियमावली को खोजा जाए जिसमें अनुसार प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं |
इसे यदि ट्रेन के परिचालन से समझा जाए तो एक तो किसी ट्रेन को किसी मार्ग पर जाते देखकर ये अंदाजा लगा लिया जाए कि ये कहाँ जा रही होगी | दूसरा उस जाती हुई ट्रेन का नाम मार्ग गंतव्य आदि पता करके ये अंदाजा लगाया जाए कि ये किस मार्ग पर किन किन स्टेशनों से होकर जाएगी | तीसरा ट्रेन को देखे बिना ही ट्रेन के आवागमन के बिषय में महीनों पहले पता करनी ो तो ट्रेन की नियमावली अर्थात समयसारिणी खोजनी पड़ेगी जिसके आधार पर ट्रेनों का परिचालन होता है | उसके आधार पर महीनों पहले ये पता लगाया जा सकता है | कौन ट्रेन किस तारीख को कितने बजे किस मार्ग से किस स्टेशन तक जाएगी | बीच में किन किन स्टेशनों पर रुकेगी | समयसारिणी के आधार पर ट्रेन के बिषय में ऐसी पूरी जानकारी महीनों पहले पता लगाई जा सकती है |
इसी प्रक्रिया से मौसम को समझना हो तो एक तो तत्कालीन प्राकृतिक वातावरण को देखकर बादल वर्षा आँधी तूफान के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है और दूसरा उपग्रहों से सुदूर आकाश में बादलों आँधी तूफानों को देखकर उनकी गति और दिशा के आधार पर ये अंदाजा लगा लिया जाना कि ये कब कहाँ पहुँच समते हैं | बीच में हवाओं की गति और दिशा बदलने पर ये अंदाजे गलत निकल जाते हैं |
जिन प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में महीनों वर्षों पहले सही अनुमान पूर्वानुमान पता लगाया जाना हो |उसके लिए ऐसी प्राकृतिक घटनाओं की समयसारिणी खोजनी पड़ेगी | गणितविज्ञान के आधार पर ही खोजी जा सकती है |गणित के द्वारा जिस प्रकार से सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया जाता है | उसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान वर्षा बाढ़ चक्रवात बज्रपात आदि घटनाओं के बिषय में गणित संबंधी अनुसंधानों के द्वारा सैकड़ों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं |
इसप्रकार से घटनाओं के समय का अंदाजा गणितागत अनुसंधानों से लगाकर उसप्रकार की घटनाओं के चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में देखे जाने चाहिए | इसमें समस्त प्राकृतिक परिवर्तनों को निरंतर देखते रहना होता है | किस प्रकार की प्राकृतिक घटना का निर्माण किस प्रकार की प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनने पर होता है |ये पता होना चाहिए | प्राकृतिक वातावरण में किस प्रकार के प्राकृतिक लक्षण कितने समय तक दिखाई पड़ते रहने के बाद किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं का निर्माण होता है | इसका ज्ञान होना चाहिए | उसी के अनुशार प्रकृति की पहचान की जानी चाहिए |
ऐसे ही पशु पक्षियों समेत विभिन्न जीव जंतुओं में दिखाई देने वाली किस प्रकार की चेष्टाएँ किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं के निर्मित होने के संकेत दे रही होती हैं | भूकंप आँधी तूफ़ान बादल वर्षा अतिवर्षा की प्रक्रिया प्रारंभ होने से पहले प्रकृति में किस किस प्रकार के परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं | ये पता होना चाहिए |
महामारी पैदा होने के कितने पहले से किस किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगती हैं | किस किस प्रकार के चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में उभरने लगते हैं | जीव जंतुओं के स्वभाव में किस किस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं |
प्राचीन काल में इसीप्रकार से प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में गणित के द्वारा प्राप्त हुए अनुमानों पूर्वानुमानों का प्राकृतिक संकेतों से मिलान करके जीव जंतुओं की चेष्टाओं का संयुक्त अध्ययन अनुसंधान आदि करके भूकंप आदि प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाता रहा है|
इस प्रकार से महामारी संबंधी अनुसंधानों में प्राचीन ऋतुविज्ञान संबंधी अनुसंधान काफी सहायक हो सकते हैं | जिस प्रकार से कौन ट्रेन किस तारीख़ को कितने बजे चलेगी | किस दिन किस मार्ग से जाएगी | किस स्टेशन पर कब पहुँचेगी | किस स्टेशन पर रुकेगी किस पर नहीं रुकेगी | ये सब महीनों पहले पता करना है तो ट्रेनों के आवागमन की समय सारिणी खोजने पड़ती है | उसके आधार पर ये सब कुछ बहुत पहले पता लगाया जा सकता है , जबकि उस समय वह ट्रेन दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रही होती है |
इसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं की भी समयसारिणी होती है| जिसे खोजकर उसके आधार पर सूर्य चंद्र ग्रहणों की तरह ही प्राकृतिक घटनाओं एवं महामामारियों के बिषय में महीनों वर्षों पहले अनुसंधान पूर्वक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों में उसी से मदद मिल सकती है |
अनुसंधानों की प्राचीन प्रक्रिया !
जिसप्रकार से वर्तमान समय में अलनीनो लानिना जैसे समुद्री संकेतों का संबंध मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं से जोड़ा जाता है | उसी प्रकार से प्राचीन काल में बादल वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात भूकंप आदि घटनाओं का संबंध भविष्य में घटित होने वाली कुछ दूसरी प्राकृतिक घटनाओं से माना जाता है | ऐसी घटनाएँ स्वयं तो घटित हो ही रही होती हैं | इसके साथ ही भावी प्राकृतिक परिवर्तनों की सूचनाएँ भी दे रही होती हैं |
वर्षा बाढ़ बादल फटने चक्रवात बज्रपात भूकंप महामारी आदि घटनाएँ जब प्रारंभ होने वाली होती हैं |उसके काफी पहले से उनके निर्मित होने या घटित होने की प्रक्रिया प्रकृति में प्रारंभ हो जाती है | जिससे संबंधित चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में उभरने लगते हैं | महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से खेतों खलिहानों फसलों वृक्षों बनस्पतियों बनों बागों नदियों तालाबों समुद्रों में उस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं | जीव जंतुओं के व्यवहारों में वैसे बदलाव आने लगते हैं | महामारी को समझने के लिए ऐसे समस्त परिवर्तनों का अध्ययन लगातार करते रहना होता है |
ऐसे परिवर्तनों का प्रभाव प्राकृतिक वातावरण और जीवन दोनों पर पड़ता है | इनमें से कुछ तुरंत तो कुछ वर्षों बाद अनुभव किए जाते हैं | मौसम एवं महामारी को समझने के लिए ऐसी घटनाओं के भविष्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन अनुसंधान आदि करना होता है |
प्राचीनकाल में ऋषि मुनि जंगलों में रहा करते थे ताकि प्रकृति में रहकर प्राकृतिक घटनाओं के संकेतों परिवर्तनों एवं जीव जंतुओं की चेष्टाओं आदि का अनुभव कर सकें |प्रकृति से दूर रहकर प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों का अनुभव किया जाना संभव नहीं होता है |
ऋषिमुनि अक्सर गृहस्थ होते थे | पत्नी बच्चों के साथ जंगलों में रहना कठिन होता है | वे चाहते तो ऋषिमुनियों को महानगरों के सुख सुविधा संपन्न भवनों में पत्नी बच्चों के साथ रखा जा सकता था |समाज उनके रहने खाने पीने आदि की की व्यवस्था कर सकते थे| राजालोग उन्हें सुख सुविधाएँ प्रदान कर सकते थे |ऋषियों का उद्देश्य यदि केवल तपस्या करना ही होता तो तपस्या वे वहाँ भी कर सकते थे ,किंतु पानी से दूर रहकर जैसे तैरना नहीं सीखा जा सकता है | वैसे ही प्रकृति से दूर रहकर प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुभव किया जाना संभव नहीं है |
ऋषिमुनि चाहते तो जंगलों में स्वयं तपस्या करते प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन अनुसंधान आदि करते रहते अपने पत्नी बच्चों को महानगरों के सुख सुविधा संपन्न भवनों में रख सकते थे किंतु इससे उनके बच्चे उन शिक्षा संस्कारों से बंचित रह जाते | जो भविष्य के प्रकृति वैज्ञानिक बनने के लिए आवश्यक थे | इसलिए उन्हें भी साथ रखा जाना आवश्यक था |
ऋषि मुनि चाहते तो दूर दूर आश्रम बनाने के बजाए एक दूसरे के पास बना सकते थे |आपस में एक दूसरे के सहयोग से ऋषि परिवारों का जीवन आसान हो सकता था | इससे एक ही प्रकार का प्राकृतिक वातावरण उन सभी ऋषियों को अनुभव करने के मिलता |इसीलिए बाणों में दूर दूर आश्रम बनाए जाते थे ताकि सभी स्थानों के प्राकृतिक वातावरण का अनुभव किया जा सके |
प्राचीनसमय में राजा लोग अक्सर शिकारके लिए जंगलों में जाया करते थे |कभी कभी उन्हें कई कई दिनों तक जंगलों में ही रहना पड़ता था | सुख सुविधाओं में पले बढ़े राजाओं के लिए जंगलों का रहन सहन कितना कठिन होता होगा | इसलिए वे चाहते तो ऐसे कार्यों के लिए अपने सेवक सैनिक आदि नियुक्त कर सकते थे | स्वयं राजभवनों में ही बने रहते |
राजाओं को पता था कि महानगरों का रहन सहन तभी तक सुख सुविधा पूर्ण है | जब तक प्रकृति स्वस्थ है |शासकों का लक्ष्य प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से प्रजा की सुरक्षा करना होता है | इसलिए राजा लोग सदैव प्रयत्नशील रहते थे कि कोई प्राकृतिक आपदा या महामारी मनुष्यों तक न पहुँच पाए |इसके लिए प्राकृतिक परिवर्तनों के बिषय में अनुभव किया जाना अत्यंत आवश्यक होता है |
इसीलिए प्राचीनकाल में राजा लोग प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों घटनाओं पर सदैव सूक्ष्म दृष्टि रखा करते थे | गाँवों खेतों खलिहानों बागों बनों नदियों तालाबों को देखने स्वयं जाया करते थे| ग्रामीणों किसानों पशुपालकों बनबासियों चरवाहों नाविकों बहेलियों आदि से मिलकर प्राकृतिक परिवर्तनों के बिषय में अनुभव लिया करते थे |
इसके अतिरिक्त सुख सुविधा संपन्न वातानुकूलित भवनों में रहते हुए यदि ऐसे प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव किया जाना संभव होता तो बादल वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात भूकंप महामारी आदि घटनाओं के बिषय में वर्तमान वैज्ञानिकों के द्वारा सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिए जाने लगे होते | अब ताओ तमाम प्रकार के यंत्रों का भी आविष्कार कर लिया गया है फिर भी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है |
प्राकृतिक वातावरण में रहे बिना न तो प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव किया जा सकता है और न ही प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि ही लगाया जा सकता है |इसीलिए तो महामारी को समझा जाना या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाना नहीं संभव हो पाया है |
वर्तमान समय में ऐसे प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों के अभाव में भूकंप बाढ़ बज्रपात चक्रवात भूकंप महामारी आदि घटनाएँ मनुष्यों पर जब आक्रमण कर देती हैं, तभी उनके आने के बिषय में पता लग पाता है | उतने कम समय में उनसे सुरक्षा के लिए कुछ किया जाना संभव नहीं होता है | ऐसी घटनाओं से होने वाली जनधन हानि को सहने के अलावा विज्ञान कोई विकल्प उपलब्ध नहीं करा सका है | ऐसी स्थिति में अनुसंधानों पर धन भी खर्च होता है और उनसे समाज को कोई मदद भी नहीं मिल पाती है |
महामारी और प्राचीनविज्ञान
प्राचीनविज्ञान की दृष्टि से अनुसंधान किया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसमसंबंधी उन सभी प्राकृतिक परिवर्तनों को समझना पड़ेगा | जो महामारी प्रारंभ होने के 12 वर्ष पहले से घटित होने प्रारंभ हुए हों |
महामारी को समझने के लिए पता लगाना होगा कि कोरोनामहामारी पैदा होने का निश्चित कारण क्या था | इसके साथ ही कोरोना संबंधी संक्रमण बढ़ने या घटने का कारण क्या रहा है |उसे भी खोजना पड़ेगा | ऐसे कारणों के आधार पर महामारी संबंधी अनुसंधानों को आगे बढ़ाना पड़ेगा |
कोरोना महामारी को यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ माना जाए तो इसके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने योग्य साक्ष्य कुछ ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ हो सकती हैं | जो सामान्य रूप से पहले न दिखाई पड़ती रही हों | इस आधार पर प्राकृतिक महामारी आने के कुछ पूर्व से प्रकृति में ऐसे कौन कौन से प्राकृतिकपरिवर्तन होने लगे थे | जो पहले होते नहीं देखे गए थे या कभी कभी देखे गए थे | ऐसे परिवर्तनों घटनाओं संकेतों आदि को सम्मुख रख कर ये अनुसंधान करना पड़ेगा कि ऐसा होने पर क्या रोगों या महारोगों के पैदा होने की परिस्थिति बनती है |
वर्तमान वैज्ञानिक अनुसंधानपद्धति के द्वारा भी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों को समझने के लिए ऐसे ही प्रयत्न किए जाने चाहिए | उसी के आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है | इसके लिए प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता है | उसी वैज्ञानिक दृष्टि इन्हें समझना संभव हो पाएगा | इसके अभाव में लोग मनमाने ढंग से घटनाओं के घटित होने के कारण अनुमान पूर्वानुमान आदि बताते देखे जाते हैं |जो गलत निकलते जाते हैं |
ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों का वैज्ञानिक आधार न होने के कारण कोरोना काल में जितने वैज्ञानिक उतने प्रकार की बातें सुनी जाती रही हैं |एक वैज्ञानिक के द्वारा बताए गए ऐसे काल्पनिक कारण कई बार दूसरे वैज्ञानिक से अलग होते हैं | कई बार तो एक वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारण दूसरे वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारणों से पूरी तरह से बिपरीत निकलते देखे जाते रहे हैं | कई बार विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा बताए हुए कारण भिन्न भिन्न होते हैं | इसमें न कोई तर्क होते हैं न विज्ञान !वैज्ञानिकों के द्वारा कहे जा रहे हैं इसलिए उन पर विश्वास करना पड़ता रहा है | अनुसंधानों के नाम पर कही जाने वाली ऐसी आधार बिहीन बातों से महामारी पीड़ित समाज को कैसे कोई मदद पहुँचाई जा सकती है | कोरोना महामारी के समय ऐसा होते कई बार देखा जाता रहा है |
वैक्सीन के प्रभाव पर संशय का कारण
वैज्ञानिक लोग महामारी के बिषय में जो जो कुछ आगे बताते जा रहे थे वो पीछे पीछे गलत निकलता जा रहा था | ऐसे में महामारी भयानक थी ये कैसे कहा जाए जब उसे समझने के लिए न विज्ञान है न वैज्ञानिक | इसीलिए विश्व के किसी वैज्ञानिक ने महामारी के बिषय में जो जो कुछ बताया हो और वो सही निकला हो ऐसा कोई उदाहरण मुझे देखने सुनने को नहीं मिला है |
महामारी के प्राकृतिक रूप से पैदा होने के लिए मौसम तापमान वायुप्रदूषण आदि में से जिसे भी जिम्मेदार कारण माना जाएगा | उसी के बिषय में अनुसंधानपूर्वक सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा | इनमें से जिसका संबंध महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने के साथ सिद्ध होगा | उसी के आधार पर महामारी को समझना एवं उसके उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा |
कई वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी के लिए वायु प्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार बता दिया जाता रहा है किंतु जब वायु प्रदूषण के बढ़ने और कोरोना संक्रमण बढ़ने का मिलान किया गया तो ये बात सही सिद्ध नहीं हुई | भारत में सबसे भयंकर दूसरी लहार जब आई थी उस समय वायु प्रदूषण इतना कम था कि पंजाब के अमृतशर एवं बिहार के कुछ जिलों से हिमालय के दर्शन होने लगे थे | ऐसे ही अक्टूबर नवंबर 2020 में जब वायुप्रदूषण बहुत अधिक था |उस समय कोरोना संक्रमण दिनों दिन कम होता जा रहा था |
ऐसे ही कुछ वैज्ञानिकों ने कोरोना संबंधी संक्रमण बढ़ने के लिए तापमान कम होने को जिम्मेदार बताया था किंतु महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने के साथ जब इसका मिलान करके देखा गया तो ये अंदाजा गलत निकला | महामारी की केवल तीसरी लहर ही जनवरी 2022 में आई थी | इसके अलावा पहली दूसरी और चौथी लहर तो तब आई थी जब तापमान बढ़ा हुआ था |वैज्ञानिकों के द्वारा लगाया गया यह अनुमान भी गलत निकल गया |
महामारी के बिषय में जब कुछ पता ही नहीं लगाया जा सका तो फिर ये किस आधार पर कह दिया जाए कि महामारी बहुत भयानक थी |संभव है कि महामारी को समझने का विज्ञान नहीं था | इसलिए उसे समझा नहीं जा सका | उससे सुरक्षा के उपाय नहीं किया जा सके | महामारी को जितना समझा जा सका | उसके आधार पर जो अनुमान लगाए जाते रहे | वे गलत निकल जाते रहे | उनके गलत निकलने का मतलब महामारी के बिषय में जो समझा गया वो सही नहीं है | महामारी को न समझ पाने के कारण उससे मुक्ति दिलाने के लिए औषधि नहीं तैयार की जा सकी | ऐसी प्रभावी औषधि के बिना चिकित्सा कैसे की जा सकती थी |
इतनी भयानक महामारी जो आते ही लाखों लोगों को संक्रमित करना एवं हजारों लोगों को मारना प्रारंभ कर सकती हैं उस समय तुरंत कितने भी बड़े प्रयास करके न तो लोगों को सुरक्षित किया जा सकता है और न ही संक्रमितों को स्वस्थ किया जा सकता है | महामारी की अत्युग्र संक्रामकता एवं प्रचंडवेग के सामने चिकित्सा कहाँ और कैसे ठहर पाएगी |
कोरोना महामारी के अलावा भी अभी तक जितनी महामारियाँ आती जाती रही हैं | वो भी अपने समय से आई एवं अपने समय से ही गई हैं | महामारियाँ जब आती हैं तो उनसे सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ किया जाने लगता है | महामारी जब समाप्त होने लगती है | उस समय जो किया जा रहा होता है | उसी से महामारी समाप्त हुई है ऐसा मान लिया जाता है | ये उसी प्रकार का भ्रम होता है जैसे प्लाज्मा थैरेपी को महामारी से मुक्ति दिलाने में समर्थ मान लिया गया था | दूसरी लहर न आती तो इसी भ्रम को सच मान लिया जाता | दूसरी लहर आने से सच्चाई सामने आ गई और चिकित्सा प्रक्रिया से उसे अलग कर दिया गया | लहर में तो एक के बाद दूसरी आ गई गई किंतु महामारी में तो ऐसा नहीं होता है वो गई तो गई | इसलिए उस समय जो भ्रम एक बार बना वो बना ही रहता है | दोबारा परीक्षण न होने के कारण उसकी सच्चाई सामने नहीं आ पाती है |
विशेष बात ये है कि महामारी के बिषय में जो समझा जा सका उसके अनुसार जो भी अनुमान पूर्वानुमान लगाए गए वे गलत निकल जाते रहे | इसका मतलब जो समझा गया वो सही नहीं था | जो सही था ही नहीं उसे आधार बनाकर जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते रहे वे सही निकलेंगे | इसकी आशा कैसे की जा सकती है | ऐसे तथ्यों के आधार पर जो औषधि वैक्सीन आदि तैयार की जाएगी उसकी विश्वसनीयता कितनी रह पाएगी |
ऐसी स्थिति में महामारी भयानक थी या नहीं थी | ये कैसे कहा जा सकता है |यदि महामारियों के स्वभाव को समझने में उस अत्यंत उन्नत विज्ञान के बल पर सफलता नहीं मिल सकी तो ये किस वैज्ञानिक आधार पर कहा जा सकता है कि महामारी भयंकर थी | ऐसे तो औषधि चिकित्सा आदि के अभाव में बहुत सारे रोग भयंकर हो सकते हैं | महामारी भी चिकित्सा के अभाव में भयंकर हुई है या वास्तव में भयंकर थी |
जिन वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा मौसम संबंधी घटनाओं के बनने की प्राकृतिकप्रक्रिया नहीं समझी जा सकी | वायु प्रदूषण बढ़ने का वास्तविक कारण नहीं खोजा जा सका उसके द्वारा न तो महामारी को समझा जा सका और न ही उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सका |
महामारी का विस्तार कितना है ! प्रसार माध्यम क्या है !अंतर्गम्यता कितनी है !इस पर मौसम का प्रभाव पड़ता है या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है या नहीं ! तापमान का प्रभाव पड़ता है या नहीं !इनमें से कुछ भी यदि पता नहीं किया जा सका है तो महामारी भयंकर रही हो या न रही हो किंतु अनुसंधानों के नाम पर क्या किया जाता रहा !ये प्रश्न अवश्य उठता है |
प्रश्न तो इस पर भी खड़े होते हैं कि महामारी को समझने के लिए अनुसंधानों के नाम पर जो जो कुछ किया जा रहा था | वो केवल करने के लिए किया जा रहा था या उसका महामारी से कोई संबंध भी था | ये कैसे कहा जाए जब ऐसे अनुसंधानों के लिए कोई विज्ञान ही नहीं था | ऐसे ही संक्रमितों को स्वस्थ करने के लिए चिकित्सा के नाम पर जो जो कुछ किया जा रहा था | उसका महामारी से कोई संबंध था या नहीं ये कैसे कहा जाए | प्लाज्मा थैरेपी जैसी जिन प्रक्रियाओं को जिनके द्वारा कोरोना संक्रमण से मुक्ति दिलाने में सक्षम बताया गया था |उन्हीं के द्वारा उसी प्लाज्मा थैरेपी को अक्षम मानकर चिकित्सा प्रक्रिया से अलग कर दिया गया |
ऐसे ही रेमडिसिविर इंजेक्शन को संक्रमण से मुक्ति दिलाने में पहले प्रभावी बताकर बाद में बाद में उससे भी किनारा कर लिया गया |
ऐसी परिस्थिति में समाज का जो वर्ग वैक्सीन पर संशय कर रहा है उसे गलत ही किस वैज्ञानिक आधार पर कह दिया जाए !क्योंकि किसी भी रोग की औषधि बनाने के लिए रोग को समझना आवश्यक होता है उसी के आधार पर उससे मुक्ति दिलाने के लिए औषधि का निर्माण किया जाता है | ऐसे में जिस कोरोना महामारी के लिए वैक्सीन बनाई गई उस महामारी को समझकर जो जो बताया जाता रहा वो गलत निकलता रहा | वही समझकर उसी के आधार पर वैक्सीन बनाई गई वो कितनी प्रभावी रही होगी | ऐसा संशय होना स्वाभाविक ही है |
मौसम और ऋतुचर्या में अंतर
मौसम का मतलब केवल बादल वर्षा आँधी तूफ़ान आदि ही नहीं है |महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए संपूर्ण प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों घटनाओं के बिषय में अध्ययन अनुसंधान आदि करना होता है |
सुदूर आकाश में उड़ रहे बादलों आँधी तूफानों को उपग्रहों की मदद से देखकर वर्षा या आँधी तूफ़ानों के बिषय में जो अंदाजा लगाया जाता है | उसमें प्रकृति का स्वभाव सम्मिलित नहीं होता है | इसलिए इसके आधार पर महामारी के बिषय में कुछ भी पता लगाया जाना संभव नहीं है |
जिस प्रकार से किसी दिशा में जाती हुई ट्रेन को देखकर इतना ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह ट्रेन इतनी गति से इस दिशा में इस रास्ते पर जा रही है | इस रास्ते में इतने स्टेशन पड़ते हैं जिनके ये ये नाम हैं | ये ट्रेन यदि इसी रास्ते पर इसी गति से चलती रही तो किस स्टेशन पर किस समय पहुँचेगी ये अंदाजा तो लगाया जा सकता है किंतु ये नहीं लगाया जा सकता है कि बीच में इसकी गति या मार्ग बदलेगा तो नहीं|
इसी प्रकार से सुदूर आकाश में में उड़ रहे बादल आँधी तूफान किस दिशा में किस गति से जा रहे हैं | यह देखने के लिए उपग्रहों आदि का सहारा लेना होता है |उसी के आधार पर यह अंदाजा लगाना होता है कि ये बादल यदि इसी दिशा में इसी गति से चलते रहे तो कितने घंटों में कहाँ पहुँच सकते हैं | जहाँ वे जब जहाँ पहुँच सकते होंगे ,तब वहाँ वर्षा होने या आँधी तूफ़ान आने की संभावना व्यक्त कर दी जातीहै | उनकी दिशा और गति बदलते ही वे अंदाजे गलत निकल जाते हैं |इस बिषय में निश्चित रूप से कुछ कहा जाना संभव नहीं होता है |
ऐसी स्थिति में उपग्रहों आदि से बादलों आँधी तूफानों को हमेंशा देखते रहना होता है | यही इसका मौसम विज्ञान है | वस्तुतः दूरस्थ बादल आँधी तूफान आदि देखने का यह एक जुगाड़ मात्र है | इसमें प्रकृति का वैज्ञानिक अध्ययन कहीं सम्मिलित नहीं होता है |इसे मौसमविज्ञान के रूप में प्रचारित तो किया जाता है किंतु इस मौसमविज्ञान में विज्ञान क्या है | मौसम को समझने में उस विज्ञान का उपयोग कहाँ किसलिए और क्या होता है | ये पता नहीं है |इसीलिए इसके द्वारा भविष्य संबंधी मध्यावधि या दीर्घावधि पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सकते हैं |
इस जुगाड़ से पता लगाए गए अल्पावधि पूर्वानुमानों में कई बार एक कठिनाई आती है | कभी कभी कई कई दिनों सप्ताहों तक लगातार वर्षा होती रहती है | ऐसी स्थिति में उपग्रहों से जैसे जैसे बादल आते दिखाई पड़ते जाते हैं | वैसे वैसे ही आँखों देखा हाल देख देख कर बताते रहा जाता है कि अभी और बादल आ रहे हैं | अभी तीन दिन वर्षा होगी,फिर भी बादल आते दिखाई पड़ते रहे तो 48 घंटे और वर्षा होगी | ऐसे जबतक बादल आते दिखाई पड़ते रहेंगे तब तक आँखों देखा हाल बताते रहा जाएगा |
इस प्रक्रिया पर भरोसा करके जो लोग पहली भविष्यवाणी पर भरोसा कर लेते हैं | वे आवश्यक वस्तुओं का संग्रह भी नहीं कर पाते हैं | उन्हें लगता है कि 3 दिन ही तो वर्षा होनी है | इसके बाद वहाँ बाढ़ आ जाती है | जिसका पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं हो पाता है | ऐसे ही जिस वर्ष वर्षा नहीं होती है | उसका सही उत्तर तो यही होता है कि इस वर्ष बादल अभी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं | क्यों नहीं दिखाई पड़ रहे हैं या कब दिखाई पड़ेंगे | इस बिषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है |
महामारी वाला मौसम विज्ञान
वैसे भी महामारी पर तो सभीप्रकार के प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता होगा जबकि उपग्रहों की मदद से तो केवल बादल आँधी तूफ़ान आदि ही देखे जा सकते हैं| भूकंप महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाएँ न तो उपग्रहों से दिखाई पड़ती हैं और न ही इन्हें समझने के लिए कोई अन्य वैज्ञानिक प्रक्रिया है |
महामारियों को समझने के लिए छोटी बड़ी सभी प्राकृतिक घटनाएँ परिवर्तन संकेत आदि समझने आवश्यक होते हैं |इसलिए उन्हें देखा जाना अनुभव किया जाना आदि महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए आवश्यक होता है |जिसके लिए प्राचीन विज्ञान के अलावा कोई दूसरा विज्ञान नहीं है |
प्रकृति के बनते बिगड़ते स्वभाव का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है | मौसमसंबंधी जो अनुसंधान प्राकृतिक स्वभाव के आधार पर किए जाते हैं |उनके आधार पर महामारी के आने जाने एवं महामारी की लहरों के आने जाने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है किंतु
Comments
Post a Comment