किसी घटना के बिषय में केवल रिसर्च रिसर्च करना ही रिसर्च का उद्देश्य नहीं होता है और न ही रिसर्च के नाम पर कुछ भी करने लगना और बाद में उस घटना के बिषय में कुछ भी बताने लगना भी रिसर्च नहीं है | रिसर्च का मतलब जिस घटना के बिषय में जो कुछ भी किया जाए उसके आधार पर जो कुछ भी पता लगाया जाए उसमें से इतना तो सच निकले | जिससे उसे तीर तुक्कों से अलग वैज्ञानिक अनुसंधानों जैसा कुछ तो लगे |
रिसर्च किया जाना इतना ही आसान होता तो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना हुए डेढ़ सौ वर्ष बीत गए | रिसर्च के नाम पर कुछ न कुछ किया तो जाता है किंतु इसके बाद भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं खोजा जा सका है | जिसके आधार पर वर्षा आँधी तूफानों या भूकंपों की प्रकृति को सही सही समझा जा सके और उसके आधार पर सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सके |
उपग्रहों से देखकर बादलों चक्रवातों की दिशा और गति का अंदाजा लगाया जाता है कि ये कब कहाँ पहुँच सकते हैं | यह विज्ञान नहीं है | यह तो एक ऐसा जुगाड़ है | जिसके आधार पर प्रकृति और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंदाजे लगाए जाते हैं | कई बार अंदाजों से भी मदद मिल जाती है किंतु अंदाजे वैज्ञानिक अनुसंधानों की तरह विश्वसनीय नहीं होते हैं | इसीलिए किसी घटना के बिषय में अंदाजों के आधार पर विश्वासपूर्वक कुछ कहा नहीं जा सकता है | इससे कभी कभी लोगों को मदद तो मिल जाती है किंतु यह एक जुगाड़ है विज्ञान नहीं है | इसलिए इन पर विश्वास नहीं हो पाता है |
मौसमअनुसंधान के नाम पर यंत्रों के द्वारा बादल चक्रवात आदि देखे जा रहे हैं | सुपर कंप्यूटरों से बहुत सारे डेटा की बहुत तेज गणना कर ली जाती है किंतु इन दोनों प्रक्रियाओं में प्रकृति के स्वभाव को समझने लायक ऐसा क्या है | जिसके आधार प्राकृतिक घटनाओं के निर्माण होने की परिस्थितियों के बिषय में कुछ पता लगाया जा सके | भूकंपों के अनुसंधानों के नाम पर जमीन में गहरे गड्ढे खोदे जा रहे हैं | महामारी के बिषय में रिसर्च करने के नाम पर जाँच करके संक्रमितों को पहचाना जा रहा है कि तुम संक्रमित हो और वे संक्रमित नहीं हैं | ऐसी बातों से समाज को किस प्रकार से कितनी मदद पहुँचाई जा सकती है |
कुलमिलाकर कोई प्राकृतिक घटना घटित होगी तो उन वैज्ञानिकों को कुछ न कुछ तो करते तो दिखना ही पड़ता है | इसके बाद भी प्राकृतिक आपदाओं महामारियों से जनधन की हानि होती ही रहती है | जनता सबकुछ यह सोचकर सहती है कि हम जनधन हानि सहते रहेंगे तो अनुसंधान भी चलते रहेंगे अन्यथा बंद हो जाएँगे |
प्राकृतिक विषयों होने वाले रिसर्चों की संपूर्णविश्व में यही स्थिति है | इसीलिए तो प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में यह समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है कि अनुसंधानों के द्वारा प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में खोजा क्या जा सका है | प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से समाज की सुरक्षा में वैज्ञानिक अनुसंधानों की क्या भूमिका है | वैसे भी ऐसी प्राकृतिक घटनाओं को समझने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो अनुसंधान कैसे किए जा सकते हैं |
विगत कुछ दशकों में भारत को पड़ोसी शत्रु देशों से तीन युद्ध लड़ने पड़े हैं | उन तीनों में मिलाकर जितने लोगों की मृत्यु हुई होगी | उससे कई गुना अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में वैज्ञानिक अनुसंधानों की प्रत्यक्ष भूमिका यही है |
इसलिए प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुसंधान करने वाले लोगों से ये पता किया जाना चाहिए कि जिन बिषयों को वे विज्ञान समझ रहे हैं या जिन कार्यों को वे अनुसंधान समझ रहे हैं | उसके आधार पर बीते दो सौ वर्षों में वे ऐसा कितना क्या समझ पाए हैं | जिसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाया जाना संभव हो पाया हो | दीर्घावधि पूर्वानुमानों के बिना प्राकृतिकघटनाओं महामारियों आदि से सुरक्षा संबंधी तैयारियाँ करने के लिए आवश्यक समय कैसे मिल सकता है | इसके बिना जनधन की सुरक्षा कैसे की जा सकती है | अनुसंधानों के नाम पर केवल समय बीतता जा रहा है |
महामारी के लिए जिम्मेदार हैं प्राकृतिक कारण !
महामारी पैदा होने के लिए यदि प्राकृतिक कारणों को जिम्मेदार माना जाए तो उसके संभावित कारण क्या क्या हो सकते हैं और प्रमाणों के बिना उन्हें कारण के स्वरूप में प्रमाणित कैसे माना जा सकता है| उसे खोजा जाना चाहिए |
प्राकृतिकरूप से किसी गैस का स्राव नहीं हुआ | प्रकृति में ऐसा कोई परिवर्तन दिखा नहीं | जो नया हो अर्थात हमेंशा न होता रहा हो | प्रकृति यदि कुछ नया घटित हुआ हो तो उसे अलग से चिन्हित करके उसका महामारी से संबंध सिद्ध किया जाना चाहिए | यदि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं | हमेंशा की तरह सबकुछ सामान्य चल रहा था | इसके बाद भी महामारी कैसे पैदा हुई | इसका कारण खोजा जाना चाहिए |
विभिन्न वैज्ञानिकों ने बताया कि कोरोना संबंधीसंक्रमण बढ़ने का कारण मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाएँ होती हैं |यह उनका अंदाजा है या इसके पीछे उनकी अनुसंधानजनित कोई सच्चाई है | ये उन्हें आधार सहित बताना चाहिए | महामारी संबंधीसंक्रमण बढ़ने का कारण यदि मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं को मान भी लिया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना आवश्यक हो जाएगा | महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए मौसम के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना सीखना होगा |
हमारे मौसमसंबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने को कहने का मतलब यह नहीं है कि सुदूर आकाश में उड़ते हुए बादलों आँधी तूफानों चक्रवातों को उपग्रहों से देखकर उनकी गति और दिशा के अनुसार उनके किसी दूसरे स्थान पर पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाए | यह तो बादलों आँधीतूफानों को दूर से देख लेने का जुगाड़ मात्र है | इस प्रक्रिया से चक्रवातों को कुछ पहले देखकर उनसे समाज को सुरक्षित बचाने में मदद भले मिल जाती हो किंतु इस प्रक्रिया में विज्ञान जैसा ऐसा क्या है | जिसके द्वारा महामारी को समझा जा सके और महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सके |
महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि महामारी पैदा होने के लिए मौसमसंबंधी किसप्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ जिम्मेदार होती हैं | उसप्रकार की घटनाओं को खोजना होगा | ऐसी घटनाऍं कब घटित होती हैं |इसका सिद्धांत पता लगाना होगा | भविष्य में उनके घटित होने की संभावना कब है| उस समय को खोजना होगा | महामारी आने से कितने वर्ष पहले से किस किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाऍं घटित होनी प्रारंभ हो जाती हैं | उनका पता लगाना होगा | जिन्हें देखकर ये अंदाजा लगाया जा सके कि लगभग इतने वर्षों में महामारी आ सकती है |उसी के अनुसार महामारी से सुरक्षा के लिए उपाय प्रारंभ का दिए जाने चाहिए |
महामारी पैदा होने के लिए जिम्मेदार हैं मनुष्यकृत !
महामारी मनुष्यकृत थी या प्राकृतिक रूप से निर्मित हुई थी | कोरोना महामारी पैदा होने के लिए यदि मनुष्यों के व्यवहार को जिम्मेदार माना जाए तो सोचना पड़ेगा कि मनुष्य विगत कुछ वर्षों से मनुष्यों ने ऐसा नया क्या करना प्रारंभ कर दिया है | जिसके परिणाम स्वरूप महामारी पैदा हुई है | प्रत्यक्ष रूप से ऐसा कुछ होना तो दिखाई नहीं दिया |
ऐसी स्थिति में किसी देश की लैब से वायरस लीक हुआ या किया भी गया होता तो केवल वायरस ही लीक हो सकता था | लोगों के शरीरों में प्रतिरोधक कम करना लैब से वायरस लीक करने वाले के बश की बात नहीं थी | दोनों घटनाएँ एक साथ तभी घट सकती हैं | जब दोनों घटनाओं के घटित होने का कारण कोई एक हो अथवा ऐसी दोनों घटनाओं के घटित होने का सूत्रधार कोई एक ही व्यक्ति हो | इस रहस्य को सुलझाया जाना चाहिए |
औषधियों का प्रभाव क्यों घटा !
चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी मान्यता है कि जिस किसी रोग का सही सही निदान (रोगपहचान) न हो पावे | ऐसे रोगी की चिकित्सा लक्षणों के आधार पर की जानी चाहिए | ऐसी परिस्थिति में कोरोना महामारी के समय लोगों को जिस प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो रही थीं | ऐसे रोग वैसे भी होते रहते हैं | उन रोगियों को चिकित्सा करके स्वस्थ कर लिया जाता है |
हमने देखा कि कोरोना महामारी आने से पूर्व ऐसी कोई प्राकृतिक घटना नहीं घटित हुई | जिसे महामारी पैदा होने के लिए जिम्मेदार मान लिया जाए | मनुष्यों का ऐसा कोई व्यवहार चिन्हित नहीं किया जा सका जिसे महामारी पैदा होने के लिए जिम्मेदार माना जा सके | लोगों ने सामूहिक रूप से ऐसे किसी खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं किया | इसके बाद भी महामारी आई इसका जो भी कारण हो उसे खोजा जाना चाहिए |
कोई व्यक्ति यदि बकड़ी को पकड़ कर पेड़ के पास ले जाए और उस पेड़ की डाली हाथ से पकड़ कर नीचे झुका दे तो पहुँच में आए पत्तों को बकड़ी खा ले तो पत्ते खाने के लिए बकड़ी को दोषी मान भले लिया जाए किंतु कोई बकड़ी अपने बल पर पेड़ की शाखा नीचे झुकाकर उसके पत्ते नहीं खा सकती है | इसलिए उस पेड़ के पत्ते खाने की प्रक्रिया उसके अपने बल पर संभव न थी | जो मनुष्य उस बकड़ी को लेकर पेड़ के नीचे पहुँचा और डाल नीचे झुकाई | इस घटना का सूत्रधार वही है | यह योजना उसी की है |
इसीप्रकार से महामारी किसकी योजना है | उस सूत्रधार को खोजे बिना न तो महामारी को समझा जा सकता है और न ही उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सकता है |
जिस प्रकार से किसी स्थान पर आग जलाने के लिए जितना आवश्यक माचिस की तीली जलाना है उतना ही आवश्यक उसे जलने के लिए ज्वलनशील ईंधन उपलब्ध करना है | दोनों के संयोग के बिना आग जलने की घटना घटित होना संभव ही नहीं है | जहाँ ईंधन नहीं होता है | वहाँ माचिस की तीली जलाकर डाल देने पर भी आग नहीं जलती है | इसलिए कहीं आग जलाने के लिए माचिस की तीली जलाने से पहले वहाँ ज्वलनशील ईंधन इकठ्ठा कर लेना पड़ता है | ये दोनों कार्य एक साथ तभी हो सकते हैं जब इसका सूत्रधार कोई एक ही हो | वो प्रत्यक्ष या परोक्ष कैसा भी हो सकता है |
ऐसा भी संभव था कि जो प्राकृतिक परिस्थिति निर्मित हुई थी | उसका प्रभाव सुदूर आकाश में ही बना रहता, जंगलों या समुद्रों में बना रहता | प्राकृतिक वातावरण में बना रहने दिया जाता | इस प्रक्रिया को अपनाकर मनुष्य इससे बचाए भी जा सकते थे | ऐसा कोई सूत्रधार तो रहा ही होगा |जिसने इस महामारी के बिषाणुओं को पकड़कर मनुष्यों से जोड़ा | उसी ने खाने पीने की वस्तुओं को बिकारित किया | उसी ने मनुष्यों के शरीरों में प्रतिरोधक क्षमता कम की थी | उसी ने ऐसे रोगों में लाभ करने वाली बनस्पतियों औषधियों की गुणवत्ता को कम किया | इन घटनाओं के पीछे एक ही ऊर्जा(शक्ति) कार्य कर रही थी | महामारी को समझने के लिए उस ऊर्जा के स्रोत को खोजना होगा |
इसीप्रकार से समझना होगा कि जिस शक्ति के द्वारा कोरोना महामारी आने की रचना रची गई थी | उसी के द्वारा से पहले बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता घटाई जा चुकी थी | उसी के द्वारा भोजपदार्थों को बिषैला बनाया गया था | जिससे महामारी के आने पर लोग संक्रमित भी हों |उसी ने बनस्पतियों औषधियों की गुणवत्ता को कम किया था ताकि संक्रमितों पर औषधियों चिकित्सा आदि का प्रभाव ही न पड़े |इसी सभी प्रकार की घटनाओं का एक साथ घटित होना | बिना किसी एक सूत्रधार के संभव न था | ऐसी परिस्थिति किसी एक ही शक्ति के द्वारा निर्मित की गई थीं |
मृत्यु होने का कारण !
कुछ लोगों की मृत्यु विभिन्नप्रकार के रोगों या दुर्घटनाओं में होती है | ऐसे लोगों की मृत्यु होने के लिए उन रोगों या दुर्घटनाओं को जिम्मेदार मान लिया जाता है | किसी की मृत्यु यदि रोगों या दुर्घटनाओं में ही होती तो जिन स्वस्थ लोगों की मृत्यु हँसते खेलते उठते बैठते सोते जागते हो जाती है | वहाँ मृत्यु होने का ऐसा कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता है |
इसी प्रकार से कुछ लोग उँचाई से गिर कर ,गहरे पानी में डूबकर ,किसी भयंकर आग में फँसकर, किसी बड़ी बिल्डिंग के मलबे में सप्ताहों तक दबे रहकर,अचानक दुर्घटना घटित होने पर भी जीवित बच जाते हैं | किसी कार के खाई में गिरने पर उसमें बैठे तीन लोग मृत्यु को प्राप्त हुए एक जीवित बच जाता है | ऐसी घटनाओं को यदि प्रत्यक्ष विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसे लोगों के बचने की संभावना नहीं थी फिर भी ये सुरक्षित बच जाते हैं |
कोरोना महामारी के समय जो लोग मृत्यु को प्राप्त हुए उसके लिए तो कोरोना महामारी को जिम्मेदार मान लिया गया किंतु कोरोना महामारी जब नहीं रही तब भी तो लोग मृत्यु को प्राप्त होते देखे जाते रहे हैं |
ऐसे उदाहरणों से इस बात को बल मिलता है कि किसी की मृत्यु होने के लिए किसी रोग या दुर्घटना का होना आवश्यक नहीं है | जिस प्रकार से सूर्यास्त होने का कारण किसी दुर्घटना का घटित होना नहीं है | यह तो प्राकृतिक प्रक्रिया है | प्रत्येक ग्रह अपने अपने समय से उगता और अस्त होता है | संभवतः इसी प्रकार से प्रत्येक प्राणी की मृत्यु अपने अपने समय से होती है |
इसी प्रकार से चिकित्सा के बिषय में सोचा जा सकता है कि चिकित्सा बहुत रोगों से मुक्ति दिलाने में सक्षम मानी जाती है किंतु औषधियों के द्वारा सभी रोगों से मुक्ति मिलनी संभव नहीं होती है |कोरोना महामारी के समय एक बात और देखी गई कि जो औषधियाँ जिन रोगों से मुक्ति दिलाने में सक्षम मानी जाती रही हैं | उन्हीं औषधियों का प्रयोग उसीप्रकार के रोगों से पीड़ित रोगियों पर किया जाता था तो उनसे रोग मुक्ति नहीं मिल पा रही थी |
इसके अलावा भी कई बार किसी रोगी को जो रोग होता है | उस रोग से मुक्ति दिलाने के लिए एक से एक प्रभावी औषधियाँ होती हैं | उनसे मुक्ति दिलाने में सक्षम एक से एक सुयोग्य चिकित्सक होते हैं | जिनके प्रयासों से बहुत रोगियों को ऐसे रोगों से मुक्ति मिल भी चुकी होती है | उसी प्रकार के कुछ ऐसे रोगी भी होते हैं | जिनकी चिकित्सा वही सुयोग्य चिकित्सक उन्हीं औषधियों से करते हैं,किंतु उन्हें स्वस्थ किया जाना संभव नहीं हो पाता है |
इसी प्रकार से रोग मुक्ति पाने के लिए चिकित्सा ही आवश्यक हो ऐसा भी नहीं है | जंगलों में पशु आपस में झगड़ कर एक दूसरे को घायल कर देते हैं किंतु किसी प्रकार की औषधि चिकित्सा आदि न मिलने पर भी उनके घाव धीरे धीरे भर जाते हैं और वे स्वस्थ हो जाते हैं |
ऐसे सभी उदाहरणों को देखकर यह आशंका होनी स्वाभाविक ही है कि किसी के स्वस्थ होने न होने के लिए औषधि चिकित्सा आदि ही कारण नहीं हैं | ऐसे ही किसी की मृत्यु होने या न होने के लिए केवल रोग और दुर्घटना ही कारण नहीं हैं | इसके लिए सूत्रधार के रूप में कोई न कोई परोक्ष शक्ति ऐसी हो सकती है | जो ऐसी सभी घटनाओं के बिषय में निर्णय लेती रही हो |
घटनाओं के घटित होने का कारण !
संसार में जितनी भी घटनाएँ घटित होती हैं वे यदि एक पक्षीय हैं तो मनुष्यकृत हैं यदि उसके दो या अधिक पक्ष हैं तो वे प्राकृतिक होती हैं | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सामान्य नियम यही है | यही कारण है कि संसार के कुछ बड़े कार्य कुछ लोगों ने अभी किए इसके बाद वे रुक गए उसके काफी समय बाद कुछ दूसरे लोग आए उन्होंने उस कार्य को करना प्रारंभ किया | उनका भी जीवन पूरा गया फिर पीढ़ियाँ बदलीं इसके बाद फिर वह कार्य प्रारंभ गया तब पूरा हुआ |
ऐसे कार्यों के प्रारंभ और पूर्ण होने में बहुत अंतराल(गैप) होता है | उस कार्य को प्रारंभ करने वाले ने जो सोचा होगा आवश्यक नहीं है कि वही सोच उस कार्य को पूर्ण करने वाले की भी रही हो | टुकड़ों में किए जाने के बाद भी वह कार्य पूर्ण तभी हुआ जब कार्य करने वाले बदलते रहे किंतु वह कार्य जिसकी योजना थी वह एक ही बना रहा |
इसीलिए गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि आपका अधिकार कर्म पर है फल पर नहीं है | संकेत यही है कि जो कार्य आपसे प्रारंभ करवाया जा रहा है वो पता नहीं कितना बड़ा है कितने समय में होना है कितने लोगों को मिलकर पूरा करना है | उस कार्य के लिए योजना जिसने बनाई है ये उसी पर आश्रित है |
किसी माला में मनके अलग अलग हो सकते हैं किंतु सूत्र एक ही होता है जिसमें वे पिरोए गए होते हैं | माला का एक मनका घुमाए जाने पर वे सारे मनके घूमते हैं | ऐसे ही प्रकृति की अनेकों घटनाएँ अलग अलग सूत्रों में पिरोई हुई हैं | एक घटना महामारी है तो दूसरी भूकंप है तीसरी बादल फटना है चौथी तूफान आना है | ऐसी बहुत सारी घटनाओं में से किसी एक के घटित होने के आगे पीछे बाक़ी घटनाएँ भी घटित हो रही होती हैं | उन्हें पहचानना आवश्यक है | वे सभी किसी एक सूत्र में गुँथी हुई हैं | उन्हें गूँथने वाला ही सूत्रधार है | उस घटना को समझने एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए सूत्रधार की उस योजना को समझना होता है | इसके बिना प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में जितने भी अंदाजे लगाए जाते हैं | उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है | इसीलिए प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में विश्व में जितने भी अनुमान पूर्वानुमान लगाए जाते हैं वे सही नहीं निकलते हैं | कोरोना महामारी इसके लिए सबसे सटीक उदाहरण है |
सूत्रधार की योजना होती हैं प्राकृतिक घटनाएँ !
कोई कार्य एक ओर से किया जा रहा हो और दूसरी ओर से उसके अनुकूल परिस्थितियाँ भी बनती जा रही हों | इसका मतलब इस क्रिया के पीछे ऐसी प्राकृतिक ऊर्जा लगी है | जिसकी योजना के अनुसार वह कार्य संपन्न हो रहा है | कार्य को करने वाले से वो कार्य करवाया जा रहा है | वही ऊर्जा उस कार्य को करने के लिए प्रयत्न और परिस्थितियों को संयोजित कर रही है |
किसी घटना का सूत्रधार यदि प्रत्यक्ष दिखाई न दे तो उसके लिए परोक्ष सूत्रधार को जिम्मेदार मान लिया जाता है | जिसे लोग समय भाग्य होनी कुदरत डेस्टिनी प्रकृति आदि नामों से पहचानते हैं | सभीप्रकार की प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के घटित होने के लिए परोक्ष सूत्रधार सबसे बड़ा जिम्मेदार कारण होता है |
जिस प्रकार से कोई बढ़ई(कारपेंटर ) किसी लकड़ी में कील गाड़ने के लिए एक हाथ से कील को पकड़ता और दूसरे हाथ से उस कील पर हथौड़ा मारता है | कील गाड़ने की प्रक्रिया तब पूरी होती है जब उस प्रक्रिया में दोनों हाथ एक दूसरे का सहयोग कर रहे होते हैं | जब दोनों हाथों को इस क्रिया में लगाने वाला सूत्रधार मन एक ही ही होता है | दो लोग मिलकर यदि इस कार्य को कर रहे हों | एक कील पकड़े और दूसरा हथौड़ा चलावे तो ऐसा नहीं हो पाता है | दोनों क्रियाएँ संपन्न होने के लिए सूत्रधार एक ही होना आवश्यक होता है, तभी ऐसी घटना घटित हो पाती है |
कोरोना महामारी भी प्राकृतिक घटना है तो इसके घटित होने के पीछे भी कोई न कोई सूत्रधार तो होगा | जिसकी योजना के अनुसार महामारी जैसी इतनी बड़ी घटना घटित हुई है | जिस सूत्रधार की योजना से महामारी आई होती है | वो एक ओर से तो बिषाणुओं की संख्या बढ़ाता जा रहा था | दूसरी ओर से लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम करता जा रहा था | तीसरी ओर से भोज्य पदार्थ बिषैले करते जा रहा था और चौथी ओर से औषधियों के गुणधर्म में परिवर्तन करके उनकी गुणवत्ता को कम करता जा रहा था | वो सूत्रधार ही ऐसी सभी प्रकार की घटनाओं के घटित होने के लिए समानरूप से जिम्मेदार रहा होगा |
इसके लिए परोक्ष ऊर्जा को देखना, समझना , अनुभव करने वाला विज्ञान खोजना होगा | परोक्षऊर्जा से प्रेरित घटनाओं को न समझ पाने के कारण उन्हें महामारी का स्वरूप परिवर्तन या जलवायु परिवर्तन आदि काल्पनिक मान्यता दे दी जाती है | जो ठीक नहीं है | उस परोक्षऊर्जा को न पहचानने के कारण ही भूकंप,चक्रवात बज्रपात वर्षा आदि घटनाओं के स्वभाव को समझा जाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है |
महामारी आने से पहले होता है प्रकृतिपरिवर्तन !
महामारी आने के 12 वर्ष पहले से प्रकृति के विभिन्न अंगों में छोटे छोटे परिवर्तन होने शुरू हो जाते हैं | 9 वर्ष पहले से प्रकृति में हो रहे वे सूक्ष्म परिवर्तन अनुभव किए जाने लगते हैं | महामारी आने से 6 वर्ष पहले से प्राकृतिक परिवर्तन घटनाओं के रूप में दिखाई देने लगते हैं | महामारी आने के 3 वर्ष पहले से ऋतुओं का प्रभाव असंतुलित होने लगता है |ऋतुमर्यादाएँ टूटने लगती हैं | सर्दी गर्मी वर्षा आदि अपनी अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण करने लगती हैं | प्रकृति प्रकुपित होकर प्रतिरोधक क्षमता कमजोर करने लगती है |
इस प्रकृति विप्लव से वातपित्त कफ आदि असंतुलित होने लगते हैं | शरीरों में दिनोंदिन प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है |जिससे शरीर रोगी होने लगते हैं | श्वसन प्रणाली शिथिल पड़ने लगती है | सोचने और सहने की शक्ति कमजोर पड़ने लगती है | इससे प्रभावित पशु पक्षी समेत समस्त जीव जंतुओं में बेचैनी बढ़ने लगती है | समाज हिंसक होने लगता है | राजा लोग एक दूसरे पर हमला करने लगते हैं | ऐसे दुर्बल शरीरों को महामारी आसानी से संक्रमित करने लगती है |
इसका प्रभाव केवल शरीरों पर ही नहीं प्रत्युत समस्त प्राकृतिक वातावरण पर पड़ता है | जिससे फसलों अनाजों दालों फूलों फलों शाक सब्जियों वृक्षों बनस्पतियों पर भी पड़ता है | जिससे उसी अनुपात में उनमें भी प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है | वे अतिशीघ्र खराब होने लगती हैं |फसलों में बिकार होने लगते हैं | कीड़े लगने लगते हैं | ऐसे खाद्य पदार्थों को खाने पीने से लोगों का पाचन तंत्र बिगड़ने लगता है |
इसीलिए ऐसे समय जो लोग रोगी हो रहे होते हैं |बनस्पतियों एवं अन्य औषधीय द्रव्यों में भी उसी अनुपात में प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है | उनसे निर्मित औषधियों का उनपर उतना प्रभाव नहीं पड़ता है | प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण अनाज दालें फूल फल शाक सब्जियाँ उन शरीरों को उतना मजबूत नहीं बना पाती हैं | वृक्ष बनस्पतियाँ एवं तैयार औषधियाँ भी अपने गुण धर्म के कमजोर होने से रोगमुक्ति दिलाने में उतनी समर्थ नहीं रह जाती हैं |
ऐसा होने का कारण समझने में जितना समय लगता है तबतक महामारी बिकराल रूप धारण करती चली जाती है | जबतक यह पता लग पाता है कि यह सामान्य रोग न होकर प्रत्युत महामारी है तब तक देर हो चुकी होती है | उस समय साक्षात् धनवंतरि भी आ जाएँ तो महामारी से समाज की सुरक्षा कैसे कर सकते हैं | शरीर यदि इस स्तर तक दुर्बल हो चुके होते हैं तो उन्हें उस समय स्वस्थ करने में कठिनाई होती है |
ऐसी परिस्थिति में इतनी बड़ी महामारी जो 12 वर्षों से तैयार हो रही थी तब उसे पहचाना नहीं जा सका | उसके बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका | उससे मुक्ति दिलाने की औषधियाँ नहीं खोजी जा सकीं | औषधीय निर्माण के लिए बनस्पतियों का संग्रह नहीं किया जा सका | उसे तुरंत के प्रयासों से कैसे ठीक कर लिया जाएगा | महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने के लिए जब पहले से कोई तैयारी करके रखी गई होती है |उस समय वही काम आ पाती है |
अनुसंधानों के लिए अध्ययन की प्रक्रिया
मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ | उसके आधार पर जो अनुभव प्राप्त हुए हैं | उससे लगता है कि इसके द्वारा मौसम एवं महामारी जैसी घटनाओं को समझा जाना संभव है |इस विधा से किए गए अनुसंधानों से महामारी आने के संकेत मिल रहे थे | इसका आधार उस समय घटित हो रही विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ थीं |
भारत की दृष्टि से देखा जाए तो 16 जून 2013 को केदारनाथ जी में भीषण सैलाव आया था | 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में भीषण भूकंप आया था | सन 2016 के अप्रैल महीने में वातावरण में नमी दिनों दिन कम होती जा रही थी | जिससे आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक घटित होते देखी जा रही थीं | बिहार में आग लगने की बढ़ती घटनाओं केकारण राज्य सरकार ने एक एडवाइजरी जारी कर सुबह 9 से शाम 6 बजे के बीच चूल्हा जलाने और हवन-पूजा करने पर अस्थाई रोक लगा दी थी, ताकि आग लगने के खतरों को कम किया जा सके | 3 मई 2018 से शुरू होकर कई बार पूर्वी उत्तर प्रदेश में तूफ़ान आते रहे | चक्रवात आने की घटनाएँ बार बार घटित होती रही हैं | वर्षा बाढ़ बादलों के फटने की घटनाएँ बार बार घटित होती रही हैं | संपूर्ण विश्व में भूकंपों की आवृत्तियाँ बहुत अधिक बढ़ गई थीं | ऐसा प्राकृतिक अतिवाद महामारी जैसी किसी घटना के घटित होने के संकेत दे रहा था |
सन 2015 के बाद भूकंपों की आवृत्तियाँ जब दिनोंदिन बढ़ती जा रही थीं |जिस किसी भी ऊर्जा के प्रभाव से भूकंप आते होंगे | उसका भी स्वास्थ्य और प्राकृतिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता होगा | कोरोनाकाल में उस प्रकार की ऊर्जा की मात्रा काफी अधिक बढ़ चुकी होगी |सितंबर के महीने में जून जैसी अत्यंत अधिक गरमी पड़ने ,बार बार बादलों के फटने ,मार्च अप्रैल तक वर्षा होने बार बार चक्रवात आने जैसी घटनाएँ घटित होती रही हैं |
इस प्रकार से ऋतुसंधियों में या ऋतु संधियों के अलावा भी अचानक मौसम बदलने पर वात पित्त आदि असंतुलित हो जाते हैं | जिससे तापमान अचानक बहुत बढ़ घट जाता है | तेज हवाएँ चलने लगती हैं | ठंडी या गरम हवाएँ चलने लगती हैं | सर्दी गर्मी वर्षा आदि बहुत अधिक या कम होती है | प्राकृतिक वातावरण में जब वात पित्त कफ आदि का इस प्रकार का असंतुलन होता है, तो उसका प्रभाव पड़ने से वृक्षों बनस्पतियों फसलों अनाजों दालों फूलों फलों एवं शाक सब्जियों आदि के गुण धर्म बदल जाते हैं | इससे स्वास्थ्य का प्रभावित होना स्वाभाविक ही है |
सर्दी गर्मी वर्षा आदि बहुत अधिक या कम होने की दृष्टि से सैकड़ों वर्षों के रिकार्ड टूट रहे हैं | ऐसा बता तो दिया जाता है किंतु उसका प्रभाव प्रकृति और स्वास्थ्य पर कैसा पड़ता है | उससे शरीरों में किस प्रकार के रोग पैदा होने की संभावना बनती है | इसप्रकार की प्राकृतिक परिस्थिति स्वास्थ्य संबंधी कुछ बड़ी समस्याओं को जन्म दे रही होती है |
प्राकृतिक वातावरण में होने वाले तरह तरह के उथल पुथल का कारण वात पित्त कफ आदि का असंतुलित होना होता है | ऐसी सभी प्राकृतिक घटनाओं को पैदा करने वाली ऊर्जा की अधिकता स्वास्थ्य एवं प्रकृति दोनों को ही प्रभावित करती है |ऐसी प्राकृतिक उग्रता को केवल प्राकृतिकघटनाओं तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता है | इनका प्रभाव प्रकृति और जीवन दोनों पर भी पड़ता है | शरीरों के साथ साथ मन पर भी पड़ता है |
प्राकृतिकअसंतुलन महामारी एवं उससे सुरक्षा
किसी पकवान को बनाने में जो सामान जितना डाला जाना उचित होता है | उससे कम या अधिक डाला जाएगा तो उस पकवान का स्वाद और गुण दोनों में ही अंतर आ जाएगा | ऐसे ही किसी औषधि के निर्माण में जो द्रव्य जितनी मात्रा में डाले जाने हों वो यदि उनसे कम या अधिक डाल दिए जाएँ तो उस औषधि का गुण धर्म बदल जाता है | ऐसी औषधियाँ कई बार स्वास्थ्य के लिए अहितकर हो जाती हैं |
कोरोना महामारी के समय इसीप्रकार के असंतुलन से मनुष्यों समेत समस्त जीव जंतुओं में बेचैनी साफ देखी जा रही थी |पशु पक्षियों के व्यवहारों में तरह तरह के परिवर्तन आते दिखाई दे रहे थे | बेचैन पशु किसानों की फसलें बरबाद करते जा रहे थे | विश्व के अनेकों देशों में बड़े बड़े चूहों की संख्या बहुत अधिक बढ़ती देखी जा रही थी | उनके द्वारा काफी नुक्सान किया जा रहा था | जंगलों में कौओं चमगादड़ों की बड़ी संख्या में मृत्यु होते देखी जा रही थी | टिड्डियों ने कई देशों का आसमान ढक लिया था | ऐसे बहुत सारे अन्य जीव जंतुओं के व्यवहारों में भी बदलाव देखे जारहे थे |मनुष्यों का चिंतन हिंसक होता जा रहा था | शासकों प्रशासकों में आक्रमता बढ़ती जा रही थी | अकारण आंदोलन होते दिखाई दे रहे थे | सामान्य कारणों से दंगे होते देखे जा रहे थे | सामाजिक उन्माद दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था |
ऐसा कठिन समय आता देखकर सबसे पहले मनुष्यों की प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण प्रारंभ कर दिया जाना चाहिए | जिससे यह पता लग सके कि समाज के कितने प्रतिशत लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कितनी मजबूत है | जितने प्रतिशत लोगों की प्रतिरोधकक्षमता कमजोर हो उन्हें सुरक्षित करने के लिए पहले से ऐसे प्रयत्न प्रारंभ कर दिए जाएँ | जिससे उनकी भी प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो जाए कि वे भी संक्रमित न हों | इस प्रक्रिया से महामारी मुक्त समाज की संरचना की जा सकती है |
चिकित्सा में किस रोग से मुक्ति दिलाने के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए | औषधिनिर्माण के लिए किसप्रकार के औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होगा |इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है |इसके लिए तरह तरह से रोग महारोग औषधि एवं शरीरों की तत्कालीन परिस्थिति समझना आवश्यक होता है | उसी के आधार पर महामारी पीड़ितों की सुरक्षा की जा सकती है | इस सारी प्रक्रिया में बहुत समय लगता है |
ऐसे में लोगों के तेजी से संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने लगने के बाद यदि पता लगता है कि महामारी आ गई है | उस परिस्थिति में लोगों को सुरक्षित बचाने के लिए तुरंत क्या कर लिया जाएगा | कुछ करने के लिए भी तो समय चाहिए | वैसे भी महामारी से सुरक्षा के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ करना पड़ता है |
महामारी जैसी घटनाओं से सुरक्षा की व्यवस्था जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | यही व्यवस्था राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है |ऐसी स्थिति में संक्रमितों पर मनुष्यकृत प्रयत्नों का प्रभाव पड़ने के लिए जो समय चाहिए वो महामारी आने के बाद तुरंत कैसे मिल पाएगा | इतने कम समय में संक्रमितों की चिकित्सा हेतु औषधि कैसे तैयार कर ली जाएगी | इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण के लिए अधिक द्रव्यों संसाधनों को जुटाने में भी तो समय लगेगा |समय तभी मिल सकता है जब महामारी या उसकी लहरों के आने से पहले उनके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाए जा सकें !
इसका कारण महामारी के अचानक आ जाने पर न तो महामारी का अध्ययन करना संभव होता है और न ही संक्रमितों के शरीरों एवं औषधियों का अध्ययन करना भी संभव हो पाता है | इतना समय ही नहीं मिल पाता है | महामारी संबंधी पूर्वानुमानों के अभाव में महामारी के आने की सूचना ही तभी मिल पाती है, जब बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने लगते हैं |उस समय महामारी आने के बिषय में पता लग भी जाए तो भी तुरंत क्या कर लिया जाएगा जब तैयारी करने के लिए पहले से समय ही नहीं मिला है तो मजबूत तैयारी के बिना महामारी के प्रकोप से किसी को सुरक्षित बचाया जाना तुरंत के प्रयासों से कैसे संभव हो पाएगा |
इसलिए महामारी आने से उतने पहले तो महामारी आने के बिषय में पूर्वानुमान पता लगा ही लिया जाना चाहिए | जितना समय महामारी से सुरक्षा करने की तैयारी प्रक्रिया में लगता है | जो महामारी से सुरक्षा के लिए की जाती है | महामारी की किसी भी लहर के आने से पहले उसके बिषय में यदि पूर्वानुमान पता लगाए जा पाते तो कोविड नियमों का पालन करके या अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरतकर लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते थे |पूर्वानुमान पता न होने से जो आवश्यक सावधानियाँ बरती जा सकती थीं | वैसा भी नहीं किया जा सका |
इसीलिए महामारी आ रही है या महामारी कब आ रही है | इसका पहले से पता लगाया जाना ही एक मात्र विकल्प है | जिससे महामारी आने से पूर्व वह सब तैयारी करके रखी जा सके जो महामारी से सुरक्षा के लिए आवश्यक होती है | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमानु लगाने के लिए कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रक्रिया हो | ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में इसके शुरू होने का पता ही तभी लग पाता है ,जब लोग पीड़ित होने शुरू हो जाते हैं तब तो सभी को अपनी अपनी जान बचाने की पड़ी होती है | उस समय इतनी बड़ी अनुसंधान प्रक्रिया का पालन कैसे कर लिया जाएगा | इसके लिए समय ही नहीं होता है |
महामारी के अचानक आ जाने पर लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं | उस समय लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी परीक्षण प्रक्रिया का पालन कैसे किया जा सकता है |ऐसे समय कुछ औषधियों टीकों आदि का प्रयोग अनुमान के आधार पर सभी लोगों पर एक जैसा कर दिया जाता है ,किंतु सभी लोग न तो एक जैसे रोगी होते हैं और न ही उन्हें एक जैसी औषधि की आवश्यकता होती है | उन सभी के शरीर भी एक जैसी प्रतिरोधक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं | थोड़ा बहुत अंतर तो सभी में होता है फिर एक जैसी औषधि एक जैसी मात्रा में सभी को देकर उन्हें स्वस्थ कैसे किया जा सकता है |
औषधि निर्माण करने में , निर्मित औषधियों का परीक्षण करने में ,परीक्षित औषधियों को जन जन तक पहुँचाने में बहुत समय लग जाता है | इसलिए अंदाजे से दी जाने वाली ऐसी औषधियों टीकों आदि से वे तो स्वस्थ हो जाते हैं | जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है|जिन शरीरों को ऐसी औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है | उनमें इनके सेवन से छोटे बड़े तमाम प्रकार के दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं | कोरोना महामारी के बाद भी बहुत स्वस्थ लोगों की मृत्यु होते देखी जाती रही है |ऐसे दुष्प्रभावों से बचने के लिए चिकित्सा से पूर्व रोग औषधि एवं शरीरों की प्रकृति का अध्ययन करना आवश्यक होता है |महामारी के अचानक आ जाने पर इतने कम समय में न तो इस प्रकार के अध्ययन किए जा सकते हैं और न ही औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जा सकता है |
कहाँ है पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान !
नियमतः किसी रोग के प्रारंभ होने से पहले उस प्रकार की सावधानी बरतनी प्रारंभ कर देनी चाहिए | जिससे महामारी से शरीर को रोगी होने से बचाया जा सके ! यदि रोग प्रारंभ हो भी जाए तो रोग का सही निदान तुरंत किया जा सके | उसी के आधार पर रोग मुक्ति दिलाने के लिए प्रभावी चिकित्सा तुरंत प्रारंभ की जा सके | इससे शरीर रोगी भले जाए किंतु चिकित्सा के प्रभाव से उसे धीरे धीरे रोग मुक्ति मिल जाती है |
महामारी जैसे बड़े रोगों में बहुत अधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है | महामारियों का वेग बहुत अधिक होता है | इसमें बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते चले जा रहे होते हैं| ऐसे में रोग की प्रकृति खोजना बड़ा काम होता है | इसके बाद चिकित्सा का निर्णय तुरंत लिया जाना कठिन होता है |औषधि खोजने ,औषधीय द्रव्यों का संग्रह करने एवं औषधि निर्माण करने में काफी समय लग जाता है | इसके बाद कहीं चिकित्सा की प्रक्रिया प्रारंभ हो पाती है तब तक रोग बहुत अधिक बढ़ चुका होता है | इतने समय तक महामारियाँ न तो प्रतीक्षा करती रहेंगी और न ही शरीर महामारी की पीड़ा सहने लायक रह जाते हैं |शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुके होते हैं |
ऐसी परिस्थिति में महामारी से लोगों की सुरक्षा तभी की जा सकती है | जब महामारी आने से पहले उतनी तैयारियाँ पूरी करके रख ली जाएँ | जिनसे मनुष्यों की सुरक्षा की जा सके | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी आने से पहले उसके बिषय में पूर्वानुमान पता हों | पूर्वानुमान लगाना अत्यंत कठिन कार्य होता है | इसलिए गलत निकल जाते हैं | कई बार लगता है कि पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने में कोई गलती छूट गई होगी ,किंतु ऐसा नहीं था |पूर्वानुमान लगाने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो पूर्वानुमान लगाने के लिए अंदाजे के आधार पर ही निर्णय लेना होगा |
महामारी या वर्षा आदि के बिषय में जितना जो कुछ पता हो उसके आधार पर जो न पता हो उस प्रकार के कुछ अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाएँ | यदि वे गलत निकल जाते हैं | इसका मतलब उस घटना के बिषय में जो जो कुछ समझा गया है वो सही नहीं है |यदि वे सही निकल जाते हैं तो उस घटना को ठीक ठीक से समझ लिया गया है | ऐसा मान लिया जाना चाहिए | उस घटना का यही विज्ञान है |ऐसा मानकर उसी के आधार पर भविष्य बिषयक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
रोग और औषधियों को पैदा करता है समय !
समय एवं हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं | हेमंतऋतु में समय मीठा होता है | उसके प्रभाव से गन्ना मीठा हो जाता है | ग्रीष्मऋतु में हवाएँ मीठी होती हैं हवाओं के प्रभाव से अत्यंत खट्टी इमली एवं आम जैसे खट्टे फल पक कर मधुर हो जाते हैं | लू जितनी अधिक चलती है तरबूज खरबूजे आदि उतने ही अधिक मधुर होते हैं |
इस प्रकार से समय और हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं |उनसे मनुष्य आदि जीव जंतुओं के शरीर तो प्रभावित होते ही हैं | इसके साथ ही साथ पेड़ पौधे फलफूल शाक सब्जियाँ अनाज दालें आदि प्रभावित होने लगती हैं | अर्थात वे भी उन्हीं ऋतुओं के स्वाद और गुणों से प्रभावित होती हैं | यही कारण है कि स्वस्थ रहने के लिए ऋतुफल एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाक सब्जियाँ स्वास्थ्य के लिए हितकारी माने जाते हैं |
शरीर के लिए आवश्यक जिन तत्वों की जिन मनुष्यों में कमी रह जाती है | उन्हें पेड़ पौधों शाक सब्जियों आदि से पूरा किया जाता है | उसके बाद भी यदि कमी रह जाए तो उन गुणों से युक्त बनस्पतियों या उनसे निर्मित औषधियों का उपयोग करके शरीरों को स्वस्थ किया जाता है | इसीलिए ऋतुफलों एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाकसब्जियों को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना जाता है |उन्हीं फलों शाकसब्जियों आदि को यदि दूसरी ऋतुओं में खाया जाए तो वे उतने गुणकारी नहीं रह जाते हैं | ऐसे फल फूल कभी कभी तो रोगकारक भी होते देखे जाते हैं |
इसी प्रकार से समय और ऋतुओं का भी गुण और स्वभाव होता है | उससे शरीर प्रभावित होता है | प्रत्येक ऋतु यदि अपने अपने गुण और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार करती रहे तब तो वात पित्त आदि संतुलित बने रहते हैं | ऋतुएँ जब दूसरी ऋतुओं के गुण ग्रहण करने लगती हैं | ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने लगे सर्दी के समय तापमान बढ़ने लगे वर्षा के समय सूखा पड़ने लगे या फिर ग्रीष्म ऋतु में अधिकवर्षा होने लगे ,अधिकसर्दी के समय अधिक सर्दी बढ़ने लगे बढ़ने लगे ,वर्षाऋतु में अधिक वर्षा होने लगे | ऐसे समय रोग पैदा होने की संभावना अधिक हो जाती है | यह असंतुलन कम होता है तो छोटे रोग पैदा होते हैं और यदि यह असंतुलन अधिक हो जाता है तो बड़े रोग पैदा होने लगते हैं |
यदि मीठा भोजन करने से शुगर बढ़ती है तो मीठे समय एवं मीठी हवाओं का सेवन करने से भी तो शुगर बढ़ सकती है |ऋतुओं में जब असंतुलन होता है तो केवल उतना ही नहीं होता है उस असंतुलन का भी प्रभाव समाज के स्वास्थ्य पर पड़ता है |अचानक जो भूकंप या आँधीतूफ़ान आदि आ जाते हैं |वो घटना केवल इतनी ही नहीं होती है कि कितने घर गिर गए या क्या क्या उड़ा ले गए प्रत्युत ऐसी घटनाओं से संपूर्ण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है | इससे उस स्थान की प्रकृति के सभी अंग प्रभावित होते हैं | इसका प्रभाव जीवों के स्वास्थ्य पर पड़ता है | फूलों फलों तथा उस समय की फसलों के गुण और स्वाद पर भी पड़ता है |
कोरोना महामारी आई भले 2019 में थी किंतु ऋतुएँ 2009 से ही असंतुलित होने लगीं थीं |यह असंतुलन दिनों दिन बढ़ता जा रहा था जो महामारी के आगमन की सूचना दे रहा था | उसी के आधार पर मुझे किसी बड़े रोग के पैदा होने का अनुमान होने लगा था |
कुल मिलाकर समय संचार के आधार पर समय एवं हवाओं के स्वाद और गुणों का पता लगाया जा सकता है | रोगों या महारोगों (महामारी) को समझने या उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए भी उसी प्रक्रिया से समय को समझना होता हैं |
कोरोनामहामारी पर प्रभावी है प्राचीनविज्ञान
प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि तो प्राचीनकाल से ही घटित होती रही होंगी | सृष्टि के आरंभिक काल में तो जनसंख्या बहुत कम रही होगी | प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि को उस युग में यदि जनधन का इतना नुक्सान करने दिया गया होता,तब तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ पाना संभव ही न था | उस युग के सक्षम वैज्ञानिकों ने उसी समय बिना किसी आधुनिक उपकरण के जब सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही सटीक पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोज लिया था तो वे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के बिषय में क्या पूर्वानुमान नहीं लगा पाए होंगे | जिनसे मनुष्य जीवन को सीधे जूझना पड़ता था |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदिके बिषय में वे न केवल पूर्वानुमान लगा लेते रहे होंगे,प्रत्युत ऐसी प्राकृतिक घटनाओं से जनजीवन की सुरक्षा करने के उपाय भी खोज लिए होंगे | इसीलिए तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ना संभव हो पाया है |
ऐसे सक्षम प्राचीन ज्ञानविज्ञान की उन उपलब्धियों पर विश्वास करके मैंने भी उसी प्राचीन विज्ञान के आधार पर उसी प्रकार के अनुसंधान करने का निश्चय किया था | जिससे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के साथ साथ ऐसी आपदाओं से जनधन की सुरक्षा करने का न केवल लक्ष्य निश्चित किया ,प्रत्युत कोरोना महामारी की सभी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने के लिए जो प्रयत्न किए वे सफल हुए |इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर विद्यमान हैं |
मेरे प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों का दूसरा लक्ष्य महामारी से समाज को सुरक्षित बचाना था | इसलिए कोरोना महामारी की दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ने लगा तो उसे घोषणापूर्वक मैंने तुरंत नियंत्रित करने का प्रयत्न जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही महामारी की दूसरी लहर तुरंत नियंत्रत होने लगी थी | इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर अभी भी सुरक्षित हैं |
विश्व में मुझे छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति या वैज्ञानिक को इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है | मुझे भी यह सफलता केवल इसलिए मिली है ,क्योंकि मैंने भारत के प्राचीन विज्ञान के आधार पर अनुसंधान पूर्वक महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाए हैं | इसलिए वे सही निकले हैं |
प्राचीन विज्ञान के आधार पर मेरे अनुसंधान
प्राचीनविज्ञान के आधार पर मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ | जिससे मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में तो पूर्वानुमान लगाता ही रहा हूँ | उसी के आधार पर मैं महामारी पैदा और समाप्त होने के सही कारणों की पहचान कर पाया हूँ |
कोरोनामहामारी के बिषय में विश्ववैज्ञानिकों ने जिन बातों को बहुत बाद में कहा या स्वीकार किया है | कुछ बिंदुओं पर तो वे अभी तक दुविधा में हैं | ऐसी सभी बातें मैंने 19 मार्च 2020 को ही लिखकर पीएमओ की मेल पर भेज दी थीं | मैंने उसमें लिखा था -
"ऐसी महामारियों को सदाचरण स्वच्छता उचित आहार विहार आदि धर्म कर्म ,ईश्वर आराधन एवं ब्रह्मचर्य आदि के अनुपालन से जीता जा सकता है |"(बाद में कोविड नियमों में स्वच्छता को सम्मिलित किया गया था "
"इसमें चिकित्सकीय प्रयासों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा | क्योंकि महामारियों में होने वाले रोगों का न कोई लक्षण होता है न निदान और न ही कोई औषधि होती है |"
"किसी भी महामारी की शुरुआत समय के बिगड़ने से होती है और समय के सुधरने पर ही महामारी की समाप्ति होती है | "
"बुरे समय का प्रभाव सबसे पहले ऋतुओं पर पड़ता है | ऋतुओं का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है उसका प्रभाव वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि समस्त खाने पीने की वस्तुओं पर पड़ता है वायु और जल पर भी पड़ता है इससे वहाँ के कुओं नदियों तालाबों आदि का जल प्रदूषित हो जाता है | इन परिस्थितियों का प्रभाव जीवन पर पड़ता है इसलिए शरीर ऐसे रोगों से पीड़ित होने लगते हैं |" इसलिए महामारी प्राकृतिक है|
कुलमिलाकर मैंने ये सब कुछ उस मेल में लिखकर भेजा था | इसके साथ ही साथ महामारी की सभी लहरों के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो सही निकलते रहे हैं | साक्ष्यरूप में वे अभी तक सुरक्षित रखे गए हैं |
महामारी से सुरक्षा करने में सक्षम है प्राचीनविज्ञान
दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ चुका था | संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी | उस समय वैज्ञानिकों के बयानों में एक रूपता नहीं थी | कोई कह रहा था कि महामारी संबंधी संक्रमण जून तक बढ़ता चला जाएगा तो कुछ वैज्ञानिक मई के चौथे सप्ताह तक महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने की बात कह रहे थे | इसका पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो सही निकला है | यह प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान के द्वारा ही संभव हो पाया है | दूसरी लहर के बिषय में मैंने उस मेल में यह लिखा था -
" यज्ञ प्रभाव के विषय में मेरा अनुमान है कि ईश्वरीय कृपा से 20 अप्रैल 2021 से ही महामारी पर अंकुश लगना प्रारंभ हो जाएगा ! 23 अप्रैल के बाद महामारी जनित संक्रमण कम होता दिखाई भी पड़ेगा !और 2 मई के बाद से पूरी तरह से संक्रमण समाप्त होना प्रारंभ हो जाएगा |"
ऐसा ही हुआ था | 20 अप्रैल 2021 को यज्ञ प्रारंभ होते ही महामारी का वेग रुकने लगा था | 23 अप्रैल से संक्रमण बढ़ना रुक गया था | मेरे द्वारा किया जा रहा वह यज्ञ 11 दिवसीय था |इसलिए 11 हवें दिन अर्थात 1 मई को यज्ञ की पूर्णाहुति होते ही उसी दिन से दिल्ली में संक्रमितों की संख्या कम होने लगी थी | राष्ट्रीय कोरोना ग्राफ में भी 6 मई से राष्ट्रीय स्तर पर संक्रमण कम होते देखा जा रहा था |
कुल मिलाकर प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में प्राचीनकाल की तरह ही अभी भी प्रासंगिक हैं | सनातन धर्म की इस वैज्ञानिक सामर्थ्य का उपयोग करके प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है |
वैदिकविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महामारी का मैंने जो निदान निकाला था | वो बिल्कुल सही घटित हुआ है | इसीप्रकार से महामारी के बिषय में जितने भी प्रकार के पूर्वानुमान लगाकर मैंने पीएमओ की मेल पर भेजे थे वे सभी सही निकले हैं |
इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ऐसा विज्ञान था | जिसके द्वारा उस युग से अभीतक प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से जनता की सुरक्षा की जाती रही है | इसीलिए सृष्टिक्रम आगे बढ़ पाया है | प्रकृति के स्वभाव को समझकर प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है |जितना प्राचीनकाल में था | बीते कुछ सौ वर्ष पूर्व हुए महाकवि घाघ जिन्होंने उसी प्राचीन ऋतुविज्ञान के आधार पर मौसम के स्वभाव को समझा तथा समाज को समझाया था | उन्होंने उसी विज्ञान से संबंधित अपने अनुसंधानों अनुभवों के आधार पर वर्षा बिषयक पूर्वानुमान लगाने के लिए जिन सूत्रों का निर्माण किया था | उनके आधार पर लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान अभी भी सही निकलते देखे जाते हैं |इसीलिए तो किसानों एवं ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता अभी भी बनी हुई है |
प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में भारतीय प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान से संबंधित अनुसंधान न किए जाने के कारण समाज को इससे होने वाला लाभ नहीं मिल पा रहा है | कोरोना महामारी के बिषय में यदि प्राचीनविज्ञान के आधार पर अनुसंधान किए गए होते तो समाज को महामारी से इतना पीड़ित नहीं होना पड़ता |
इसप्रकार से महामारी को समझना जब संभव हो पायगा तभी महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाने में कुछ मदद मिल सकती है | भावी महामारियों से लोगों की सुरक्षा के लिए उपाय भी तभी किए जा सकते हैं |
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