Skip to main content

kitaab17-2-2026

 महामारीवैज्ञानिकों  का कर्तव्य !

     कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना संबंधीसंक्रमण बढ़ने का कारण मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाएँ होती हैं | वैज्ञानिकों की इस बात को यदि सच मान लिया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना पड़ेगा | महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए मौसम के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना सीखना होगा | 

     हमारे मौसमसंबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने को कहने का मतलब यह नहीं है  कि सुदूर आकाश में उड़ते हुए बादलों आँधी तूफानों चक्रवातों को उपग्रहों से देख लिया जाए फिर उनकी गति और दिशा के अनुसार उनके किसी दूसरे स्थान पर पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाए |यह तो दूर आकाश में उड़ते हुए बादलों आँधी तूफानों को कुछ पहले देख लेने का जुगाड़ मात्र है |इस जुगाड़ से चक्रवातों को कुछ पहले देख लेने से लोगों को सुरक्षित बचाने में मदद भी मिल जाती है किंतु ये विज्ञान नहीं है | 

     प्राकृतिक घटनाओं की जासूसी कर लेने में विज्ञान जैसा क्या है | जिसके द्वारा महामारी को समझा जा सके और महामारी  के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सके | महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि महामारी पैदा होने के लिए मौसमसंबंधी किसप्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ जिम्मेदार होती हैं | उसप्रकार की घटनाओं को खोजना होगा | ऐसी घटनाऍं कब घटित होती हैं |इसका सिद्धांत पता लगाना होगा |  भविष्य में उनके घटित होने की संभावना कब है| उस समय को  खोजना होगा | महामारी आने से कितने वर्ष पहले से किस किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाऍं घटित होनी प्रारंभ हो जाती हैं | जिन्हें देखकर ये अंदाजा लगा लिया जाए कि लगभग इतने वर्षों में महामारी आ सकती है | 

      ऐसा कठिन समय आता देखकर सबसे पहले मनुष्यों की प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण प्रारंभ कर दिया जाना चाहिए | जिससे यह पता लग सके कि समाज के कितने प्रतिशत लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कितनी मजबूत है | जितने प्रतिशत लोगों की प्रतिरोधकक्षमता कमजोर हो उन्हें सुरक्षित करने के लिए पहले से ऐसे प्रयत्न प्रारंभ कर दिए जाएँ | जिससे उनकी भी प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो जाए कि वे भी संक्रमित न हों | इस प्रक्रिया से महामारी मुक्त समाज की संरचना की जा सकती है | 


पूर्वानुमानों के बिना महामारी से सुरक्षा असंभव !

    चिकित्सा में किस रोग से मुक्ति दिलाने के लिए  किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए | औषधिनिर्माण के लिए किसप्रकार के औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होगा |इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है |इसके लिए तरह तरह से रोग महारोग औषधि एवं शरीरों की तत्कालीन परिस्थिति समझना  आवश्यक होता है | उसी के आधार पर महामारी पीड़ितों की सुरक्षा की जा सकती है | इस सारी प्रक्रिया में बहुत समय लगता है |

    ऐसे में   लोगों के तेजी से संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने लगने के बाद यदि पता लगता है कि महामारी आ गई है |  उस परिस्थिति में लोगों को सुरक्षित बचाने के लिए तुरंत क्या कर लिया जाएगा | कुछ करने के लिए भी तो समय चाहिए | वैसे भी महामारी से सुरक्षा के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ करना पड़ता है | 

       महामारी जैसी घटनाओं के समय व्यवस्था बहुत बड़े स्तर पर करनी होती है | जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | यही व्यवस्था राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है |ऐसी स्थिति में संक्रमितों पर मनुष्यकृत प्रयत्नों का प्रभाव पड़ने के लिए जो समय चाहिए वो महामारी आने के बाद तुरंत कैसे मिल पाएगा | इतने कम समय में संक्रमितों की चिकित्सा हेतु  औषधि कैसे तैयार कर ली जाएगी | इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण के लिए अधिक द्रव्यों संसाधनों को जुटाने में भी तो समय लगेगा |    

       


इसके लिए समय चाहिए |समय तभी मिल सकता है जब महामारी या उसकी लहरों के आने से पहले उनके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाए जा सकें !  

 इसका कारण  महामारी के अचानक आ जाने पर न तो महामारी का अध्ययन करना संभव होता है और न ही संक्रमितों के शरीरों एवं औषधियों का अध्ययन करना भी संभव हो पाता है | इतना समय ही नहीं मिल पाता है  |    महामारी संबंधी पूर्वानुमानों के अभाव में महामारी के आने की सूचना ही तभी मिल पाती है, जब बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने लगते हैं |उस समय महामारी आने के बिषय में पता लग भी जाए तो भी तुरंत क्या कर लिया जाएगा जब तैयारी करने के लिए पहले से समय ही नहीं मिला है तो मजबूत तैयारी के बिना महामारी के प्रकोप से किसी को सुरक्षित बचाया जाना तुरंत के प्रयासों से कैसे संभव हो पाएगा |

     इसलिए महामारी आने से उतने पहले तो  महामारी आने के बिषय में पूर्वानुमान पता लगा ही लिया जाना चाहिए | जितना समय महामारी से सुरक्षा करने की तैयारी प्रक्रिया में लगता है | जो महामारी से सुरक्षा के लिए की जाती है | महामारी की किसी भी लहर के आने से पहले  उसके बिषय में यदि पूर्वानुमान पता लगाए जा पाते तो कोविड  नियमों का पालन करके या अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरतकर लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते थे |पूर्वानुमान पता न होने से जो आवश्यक सावधानियाँ बरती जा सकती थीं | वैसा भी नहीं  किया जा सका |                                  



 

   इसीलिए महामारी आ रही है या महामारी कब आ रही है | इसका पहले से पता लगाया जाना ही एक मात्र विकल्प है | जिससे महामारी आने से पूर्व वह सब तैयारी करके रखी जा सके जो महामारी से सुरक्षा के लिए आवश्यक होती है | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमानु लगाने के लिए कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रक्रिया हो | ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में इसके शुरू होने का पता ही तभी लग पाता है ,जब लोग पीड़ित होने शुरू हो जाते हैं तब तो सभी को अपनी अपनी जान बचाने की पड़ी होती है | उस समय इतनी बड़ी अनुसंधान प्रक्रिया का पालन कैसे कर लिया जाएगा | इसके लिए समय ही नहीं होता है |  

    महामारी के अचानक आ जाने पर लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं | उस समय लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी परीक्षण प्रक्रिया का पालन किया जा सकता है |ऐसे समय कुछ औषधियों टीकों आदि का प्रयोग अनुमान के आधार पर सभी लोगों पर एक जैसा  कर दिया जाता है ,किंतु सभी लोग न तो एक जैसे रोगी होते हैं और न ही उन्हें एक जैसी औषधि की आवश्यकता होती है | उन सभी के शरीर भी एक जैसी प्रतिरोधक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं | थोड़ा बहुत अंतर तो सभी में होता है फिर एक जैसी औषधि एक जैसी मात्रा में सभी को देकर उन्हें स्वस्थ कैसे किया जा सकता है | 

    अंदाजे से दी जाने वाली ऐसी औषधियों टीकों आदि से वे तो स्वस्थ हो  जाते हैं | जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है|जिन शरीरों को ऐसी औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है | उनमें  इनके सेवन से छोटे बड़े तमाम प्रकार के दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं | कोरोना महामारी के बाद भी बहुत स्वस्थ लोगों की मृत्यु होते  देखी जाती रही है |ऐसे दुष्प्रभावों से बचने के लिए चिकित्सा से पूर्व रोग औषधि एवं शरीरों की प्रकृति का अध्ययन करना आवश्यक होता है |महामारी के अचानक आ जाने पर इतने कम समय में न तो इस प्रकार के अध्ययन किए जा सकते हैं और न ही औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जा सकता है | औषधि निर्माण करने में , निर्मित औषधियों  का परीक्षण करने में ,परीक्षित औषधियों  को जन जन तक पहुँचाने में  बहुत समय लग जाता है | 

 कहाँ है पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान !     

     नियमतः किसी रोग के प्रारंभ होने से पहले उस प्रकार की सावधानी बरतनी प्रारंभ कर देनी चाहिए | जिससे  महामारी से शरीर को रोगी होने से बचाया जा सके ! यदि रोग प्रारंभ हो भी जाए तो रोग का सही निदान तुरंत किया जा सके | उसी के आधार पर रोग मुक्ति दिलाने के लिए प्रभावी चिकित्सा तुरंत प्रारंभ की जा सके | इससे शरीर रोगी भले  जाए किंतु चिकित्सा के प्रभाव से उसे धीरे धीरे रोग मुक्ति मिल जाती है |  

    महामारी जैसे बड़े रोगों में बहुत अधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है | महामारियों का वेग बहुत अधिक होता है | इसमें बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते चले जा रहे होते हैं| ऐसे में रोग की प्रकृति खोजना बड़ा काम होता है | इसके बाद चिकित्सा का निर्णय तुरंत लिया जाना कठिन होता है |औषधि खोजने ,औषधीय द्रव्यों का संग्रह करने एवं औषधि निर्माण करने में काफी समय लग जाता है | इसके बाद कहीं चिकित्सा की प्रक्रिया  प्रारंभ हो पाती है |इतने समय तक तो रोग बहुत अधिक बढ़ चुका होता है | इतने समय तक महामारियाँ  न तो प्रतीक्षा करती रहेंगी और न ही शरीर महामारी की पीड़ा सहने लायक रह जाते हैं |तब तक तो शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुके होते हैं | 

     ऐसी परिस्थिति में  महामारी से लोगों की सुरक्षा तभी की जा सकती है | जब महामारी आने से पहले  उतनी तैयारियाँ पूरी करके रख ली  जाएँ |  जिनसे मनुष्यों की सुरक्षा की जा सके | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी आने से पहले उसके बिषय में पूर्वानुमान पता हों | पूर्वानुमान लगाना अत्यंत कठिन कार्य होता है | इसलिए गलत निकल जाते हैं | कई बार लगता है कि पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने में कोई गलती छूट गई होगी ,किंतु ऐसा नहीं था |पूर्वानुमान लगाने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो पूर्वानुमान लगाने के लिए अंदाजे के आधार पर ही निर्णय लेना होगा |    

   महामारी या वर्षा आदि के बिषय में जितना जो कुछ पता हो उसके आधार पर जो न पता हो उस प्रकार के कुछ अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाएँ | यदि वे लत निकल जाते हैं | इसका मतलब उस घटना के बिषय में जो जो कुछ समझा गया है वो  सही नहीं है |यदि वे सही निकल जाते हैं  तो उस घटना को ठीक ठीक से समझ लिया गया है |  ऐसा मान लिया जाना चाहिए | उस घटना का यही विज्ञान है |ऐसा मानकर उसी के आधार पर भविष्य बिषयक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | 

रोग और औषधियों को पैदा करता है समय !

     समय एवं हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं | हेमंतऋतु में समय मीठा होता है | उसके प्रभाव से गन्ना मीठा हो जाता है | ग्रीष्मऋतु में हवाएँ मीठी होती हैं  हवाओं के प्रभाव से अत्यंत खट्टी इमली  एवं आम जैसे खट्टे फल पक कर मधुर हो जाते हैं | लू जितनी अधिक चलती है तरबूज खरबूजे आदि उतने ही अधिक मधुर होते हैं | 

     इस प्रकार से समय और हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं |उनसे मनुष्य आदि जीव जंतुओं के शरीर तो प्रभावित होते ही हैं  | इसके साथ ही साथ पेड़ पौधे फलफूल शाक  सब्जियाँ अनाज दालें आदि  प्रभावित होने लगती हैं | अर्थात वे भी उन्हीं ऋतुओं के स्वाद और गुणों से प्रभावित  होती हैं | यही कारण है कि स्वस्थ रहने के लिए ऋतुफल एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाक सब्जियाँ  स्वास्थ्य के लिए हितकारी माने जाते हैं  | 

    जिस प्रकार से मनुष्यों के शरीरों में चिकनाहट पैदा होती है | उसी प्रकार से वृक्षों बनस्पतियों में पशु पक्षियों में चिकनाहट पैदा होती है | कमजोर शरीर वाले मनुष्यों के शरीर में उस  चिकनाहट की कमी होती है | उसे पूरा करने के लिए  सरसों तिल आदि  के तेलों का उपयोग किया जाता है | पशुओं से प्राप्त होने वाले  दूध घी मक्खन आदि से पूरा किया जाता है | इसी प्रकार से शरीर के लिए आवश्यक जिन तत्वों की जिन मनुष्यों में कमी रह जाती है | उन्हें  पेड़ पौधों  शाक सब्जियों आदि से पूरा किया जाता है | उसके बाद भी यदि कमी रह जाए तो उन गुणों से युक्त बनस्पतियों  या उनसे निर्मित औषधियों का उपयोग करके शरीरों को स्वस्थ  किया जाता है | इसीलिए ऋतुफलों  एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाकसब्जियों को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना जाता है |उन्हीं फलों  शाकसब्जियों  आदि को  यदि दूसरी ऋतुओं में खाया जाए तो वे उतने गुणकारी नहीं रह जाते हैं |कभी कभी तो रोगकारक भी होते  देखे जाते हैं  | 

     इसी प्रकार से  समय और ऋतुओं का  भी गुण और स्वभाव होता है | उससे शरीर प्रभावित होता है | प्रत्येक ऋतु यदि  अपने अपने गुण और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार  करती रहे तब तो  वात पित्त आदि संतुलित बने रहते हैं  | ऋतुएँ  जब दूसरी ऋतुओं के गुण ग्रहण करने लगती हैं | ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने लगे सर्दी के समय तापमान बढ़ने लगे वर्षा के समय सूखा पड़ने लगे या फिर  ग्रीष्म ऋतु में अधिकवर्षा होने लगे ,अधिकसर्दी के समय अधिक सर्दी बढ़ने लगे बढ़ने लगे ,वर्षाऋतु में अधिक वर्षा होने लगे | ऐसे समय रोग पैदा होने की संभावना अधिक हो जाती है | यह असंतुलन कम होता है तो छोटे रोग पैदा होते हैं  और यदि यह असंतुलन अधिक हो जाता है  तो बड़े रोग पैदा होने लगते हैं | 

    यदि मीठा भोजन करने से शुगर बढ़ती है तो मीठे समय  एवं मीठी  हवाओं का सेवन करने से भी तो शुगर बढ़ सकती है |ऋतुओं में जब असंतुलन होता है तो केवल उतना ही नहीं होता है उस असंतुलन का भी प्रभाव समाज के स्वास्थ्य पर पड़ता है |अचानक जो भूकंप   या आँधीतूफ़ान आदि आ जाते हैं |वो घटना केवल इतनी ही नहीं होती है कि  कितने घर गिर गए या क्या क्या उड़ा ले गए प्रत्युत ऐसी घटनाओं से संपूर्ण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता  है | इससे उस स्थान की प्रकृति के सभी अंग प्रभावित होते हैं | इसका प्रभाव जीवों के स्वास्थ्य पर पड़ता है | फूलों फलों तथा उस समय की फसलों के गुण और स्वाद पर भी पड़ता है | 

      कोरोना महामारी आई भले 2019 में थी किंतु  ऋतुएँ 2009 से ही असंतुलित होने लगीं थीं  |यह असंतुलन  दिनों दिन बढ़ता जा रहा था जो महामारी के आगमन की सूचना दे रहा था  | उसी के आधार पर मुझे किसी बड़े रोग के पैदा होने का अनुमान होने लगा था |   

       कुल मिलाकर समय संचार के आधार पर  समय एवं हवाओं के स्वाद और गुणों का पता लगाया जा सकता है |   रोगों या महारोगों  (महामारी) को समझने या उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए भी उसी प्रक्रिया से समय को समझना होता हैं | 


कोरोनामहामारी पर प्रभावी है प्राचीनविज्ञान

      प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि तो प्राचीनकाल से ही घटित होती रही होंगी | सृष्टि के आरंभिक काल में तो जनसंख्या बहुत कम  रही होगी | प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि को उस युग में यदि जनधन का इतना नुक्सान करने दिया गया होता,तब तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ पाना संभव ही न था | उस युग के सक्षम  वैज्ञानिकों ने उसी समय बिना किसी आधुनिक उपकरण के जब सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही सटीक पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोज लिया था तो वे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के बिषय में क्या पूर्वानुमान नहीं लगा पाए होंगे | जिनसे मनुष्य जीवन को सीधे जूझना पड़ता था |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदिके बिषय में वे न केवल पूर्वानुमान लगा लेते रहे होंगे,प्रत्युत ऐसी प्राकृतिक घटनाओं से जनजीवन की सुरक्षा करने के उपाय भी खोज लिए होंगे | इसीलिए तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ना संभव हो पाया है |

      ऐसे सक्षम प्राचीन ज्ञानविज्ञान की उन उपलब्धियों पर विश्वास करके मैंने भी उसी प्राचीन विज्ञान के आधार पर उसी प्रकार के अनुसंधान करने का निश्चय किया था | जिससे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के साथ साथ ऐसी आपदाओं से जनधन की सुरक्षा करने का न केवल लक्ष्य निश्चित किया ,प्रत्युत कोरोना महामारी की सभी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने के लिए जो प्रयत्न किए वे सफल हुए |इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर विद्यमान हैं |  

      मेरे प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों का दूसरा लक्ष्य महामारी से  समाज को सुरक्षित बचाना था | इसलिए कोरोना महामारी की दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ने लगा तो उसे घोषणापूर्वक मैंने तुरंत नियंत्रित करने का प्रयत्न जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही महामारी की दूसरी लहर तुरंत नियंत्रत होने लगी थी | इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर अभी भी सुरक्षित हैं | 

   विश्व में  मुझे छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति या वैज्ञानिक को इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है | मुझे भी यह सफलता केवल इसलिए मिली है ,क्योंकि मैंने भारत के प्राचीन विज्ञान के आधार पर अनुसंधान पूर्वक महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाए हैं | इसलिए वे सही निकले हैं | 

                              प्राचीन विज्ञान के आधार पर मेरे अनुसंधान

    प्राचीनविज्ञान  के आधार पर मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान  करता आ रहा हूँ | जिससे मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में तो पूर्वानुमान लगाता ही रहा हूँ | उसी के आधार पर मैं महामारी पैदा और समाप्त होने के सही कारणों की पहचान कर  पाया  हूँ | 

     कोरोनामहामारी के बिषय में विश्ववैज्ञानिकों ने जिन बातों को बहुत बाद में कहा या स्वीकार किया है | कुछ बिंदुओं पर तो वे अभी तक दुविधा में हैं | ऐसी सभी बातें मैंने 19 मार्च 2020 को ही लिखकर  पीएमओ की मेल पर भेज दी थीं | मैंने उसमें लिखा था - 

      "ऐसी महामारियों को सदाचरण स्वच्छता उचित आहार विहार आदि धर्म कर्म ,ईश्वर आराधन एवं ब्रह्मचर्य आदि के अनुपालन से जीता जा सकता है |"(बाद में कोविड  नियमों में स्वच्छता को सम्मिलित किया गया था "

"इसमें चिकित्सकीय प्रयासों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा | क्योंकि महामारियों में होने वाले रोगों का न कोई लक्षण होता है न निदान और न ही कोई औषधि होती है |"

"किसी भी महामारी की शुरुआत समय के बिगड़ने से होती है और समय के सुधरने पर ही महामारी की समाप्ति होती है | "

 "बुरे समय का प्रभाव सबसे पहले ऋतुओं पर पड़ता है | ऋतुओं का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है उसका प्रभाव वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि समस्त खाने पीने की वस्तुओं पर पड़ता है वायु और जल पर भी पड़ता है इससे वहाँ के कुओं नदियों तालाबों  आदि का जल प्रदूषित हो जाता है | इन परिस्थितियों का प्रभाव जीवन पर पड़ता है इसलिए शरीर ऐसे रोगों से पीड़ित होने लगते हैं |"   इसलिए महामारी प्राकृतिक है| 

     कुलमिलाकर मैंने ये सब कुछ उस मेल में लिखकर भेजा था | इसके  साथ ही साथ  महामारी की सभी लहरों के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर  आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो सही निकलते रहे हैं | साक्ष्यरूप में वे अभी तक सुरक्षित रखे गए हैं | 

    दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ चुका था | संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी | इसका पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो सही निकला है | यह प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान के द्वारा ही संभव हो पाया है |    दूसरी लहर के बिषय में मैंने उस मेल में यह लिखा था -    

   " यज्ञ प्रभाव के विषय में मेरा अनुमान है कि ईश्वरीय कृपा से 20 अप्रैल 2021 से ही महामारी पर अंकुश लगना प्रारंभ हो जाएगा ! 23 अप्रैल के बाद महामारी जनित संक्रमण कम होता दिखाई भी पड़ेगा !और 2 मई के बाद से पूरी तरह से संक्रमण समाप्त होना प्रारंभ हो जाएगा |"        

 " 20 अप्रैल 2021 को  यज्ञ प्रारंभ  होते ही महामारी का वेग रुकने लगा था  23 अप्रैल से संक्रमण बढ़ना रुक गया था | वह यज्ञ 11 दिवसीय था |इसलिए  11 हवें दिन अर्थात 1 मई को यज्ञ की पूर्णाहुति होते ही उसी दिन से दिल्ली में संक्रमितों की संख्या कम होने लगी थी | राष्ट्रीय कोरोना ग्राफ में भी 6 मई से राष्ट्रीय स्तर पर संक्रमण कम होते देखा जा रहा था | 

     कुल मिलाकर  प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में प्राचीनकाल की तरह ही अभी भी प्रासंगिक हैं | सनातन धर्म की इस वैज्ञानिक सामर्थ्य का उपयोग करके प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है | 

     वैदिक विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महामारी का मैंने जो  निदान निकाला था | वो बिल्कुल सही घटित हुआ है | इसीप्रकार से महामारी के बिषय में जितने भी प्रकार के पूर्वानुमान लगाकर मैंने पीएमओ की मेल पर भेजे थे वे सभी सही निकले हैं | 

      इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ऐसा विज्ञान था | जिसके द्वारा उस युग से अभीतक प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से जनता की सुरक्षा की जाती रही है | इसीलिए सृष्टिक्रम आगे बढ़ पाया है | प्रकृति के स्वभाव को समझकर प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है |जितना प्राचीनकाल में था | बीते कुछ  सौ वर्ष पूर्व  हुए महाकवि घाघ जिन्होंने उसी प्राचीन ऋतुविज्ञान  के आधार पर मौसम के स्वभाव को समझा तथा समाज को समझाया था | उन्होंने उसी  प्राचीन विज्ञान से संबंधित अपने अनुसंधानों अनुभवों के आधार पर वर्षा बिषयक पूर्वानुमान लगाने के लिए  जिन सूत्रों का निर्माण किया था  | जिनके आधार पर लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान अभी भी सही निकलते देखे जाते हैं |इसीलिए तो किसानों एवं ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता अभी भी  बनी हुई है | 

      प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में भारतीय प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान से संबंधित  अनुसंधान न किए जाने के कारण समाज को इससे होने वाला लाभ नहीं मिल पा रहा है | कोरोना महामारी के बिषय में यदि  प्राचीनविज्ञान के आधार पर अनुसंधान किए गए होते तो समाज को महामारी से इतना पीड़ित नहीं होना पड़ता | 

         इसप्रकार से महामारी को समझना जब संभव हो पायगा तभी वर्तमान महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाने में कुछ मदद मिल सकती है | भावी महामारियों से लोगों की सुरक्षा के लिए उपाय भी तभी  किए जा  सकते हैं |       

Comments

Popular posts from this blog

मुश्किल है मौसम की सटीक भविष्यवाणी

28 June 2013-मौसम का सही अनुमान घटा सकता है नुकसान !उत्तराखंड में आई आपदा के बाद यह जरूरी हो चला है कि मौसम का सटीक see ... https://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=74073&fbclid=IwAR1lUVXZ5Se2pF1PmlosxjRZPMcLF15g3MwptGf27pwjM_RtIOCeUVsgJXo 09 Aug 2015 - मौसम विभाग ने कहा था सूखा पड़ेगा, अब बारिश बनी मुसीबत !see more... https://www.naidunia.com/madhya-pradesh/indore-was-the-drought-the-rain-made-trouble-now-443720? fbclid=IwAR1M27RhN7beIPbj9rUYDc3IekccbHWF0bInssXxtdnrivIBiZqGAQ8Lciw 11 Apr 2019- मानसून को लेकर आए स्काईमेट के इस पहले पूर्वानुमान पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता। स्काईमेट पिछले छह वर्षों मानसून का पूर्वानुमान लगाता रहा है, लेकिन उसका अनुमान सही साबित नहीं होता।see... https://www.drishtiias.com/hindi/daily-updates/daily-news-editorials/problems-in-monsoon-prediction   11-10-2019-    मौसम विभाग को दगा देता रहा मौसम , अधिकांश भविष्यवाणी गलत साबित हुई see .... https://www.bhaskarhindi.com/city/news/meteorological-department-weather-m...

मुश्किल है कोरोना की भविष्यवाणी !-1008

  09 May 2020- कोरोना का जवाब विज्ञान है नौटंकीनहीं, महामारी पर गलत साबित हुई केंद्र सरकार see... https://caravanmagazine.in/health/surge-in-covid-cases-proves-centre-wrong-pandemic-response-marked-by-theatrics-not-science-hindi 06 Jun 2020 -गणितीय मॉडल विश्लेषण में खुलासा, मध्य सितंबर के आसपास भारत में कोरोना महामारी हो जाएगी खत्म see...  https://www.amarujala.com/india-news/covid-19-pandemic-may-be-over-in-india-around-mid-september-claims-mathematical-model-based-analysis 18 Jun 2020 - कोविड-19 के लिए केवल गणितीय मॉडल पर नहीं रह सकते निर्भर : Iकोविड-19 महामारी की गंभीरता का अंदाजा लगाने के लिए अपनाए जा रहे बहुत से गणितीय मॉडल भरोसेमंद नहीं हैं।इस तरह के अनुमान के आधार पर नीतिगत फैसले लेना या आगे की योजनाएं बनाना बहुत खतरनाक हो सकता है। इसलिए इनसे बचना चाहिए।यह लेख राजेश भाटिया ने लिखा है। वह डब्ल्यूएचओ के साउथ-ईस्ट एशिया रीजनल ऑफिस में संचारी रोग विभाग के डायरेक्टर रह चुके हैं।इसकी सह लेखिका आइसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की डायरेक्टर प्रिया अब्राहम हैं। लेख में कह...

प्रथम

                                                                     दो शब्द                                           महामारी आए हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है इसमें से बहुत लोग संक्रमित होकर स्वस्थ भी हो गए हैं उनमें से अनेकों संक्रमितों की दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु हो गई है |महामारी का स्वरूप इतना अधिक भयावह था कि सभी संक्रमितों की जाँच करने में ही सरकारी संसाधन अत्यंत बौने सिद्ध हुए थे |अस्पतालों की संख्या कम पड़  गई चिकित्सकों की संख्या कम पड़ गई संक्रमितों को एडमिट करने के लिए वस्त्रों की संख्या कम पड़ गई औषधियों का संग्रह कम पड़ गया उपयोगी माने जाने वाले इंजेक्शन कम पड़ गए आक्सीजन कम पड़ गई | अस्पतालों में पड़े कातर रोगी कराह रहे थे चिकित्सक लाचार थे | चिकित्सकों को महामारी के लक्...