कोरोना महामारी की सच्चाई
और
प्राचीन विज्ञान
दो शब्द
वर्तमानसमय में विज्ञान अत्यंत उन्नत है| वैज्ञानिक विद्वान हैं| अनुसंधान निरंतर हो रहे हैं|वैज्ञानिक अनुसंधानों में सरकारें भी पूरी रुचि ले रही हैं | आवश्यक सारे संसाधन समय से उपलब्ध करवा रही हैं | अनुसंधान कार्यों में लगे लोगों को पर्याप्त पारिश्रमिक सुख सुविधाएँ आदि प्रदान की जा रही हैं | विशिष्ट पद प्रतिष्ठा प्रदान की जा रही है अनुसंधानों एवं अनुसंधानकर्ताओं पर खर्च की जाने वाली धनराशि का भार वहन टैक्स रूप में जनता करती आ रही है | ऐसे अनुसंधानों का संचालन निरंतर होता आ रहा है |
इतनी सारी व्यवस्थाएँ करने के बाद भी न तो प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में कुछ पता लगाया जाना संभव हो पाया है और न ही महामारी के बिषय में ! जिन प्राकृतिक घटनाओं या महामारियों को समझने या उनके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे | ऐसे अनुसंधानों के द्वारा उनकी ओर तिल भर भी बढ़ना संभव नहीं हो पाया है|सभी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के वास्तविक कारणों को खोजने के बजाए उनके बिषय में कुछ काल्पनिक किस्से कहानियाँ गढ़ ली गई हैं | जिन्हें सच्चाई के साथ प्रमाणित भले न किया जा सका हो किंतु प्राकृतिकघटनाओं को उसी काल्पनिक दृष्टि से देखा जा रहा है |
भूकंपों के बिषय में कहने सुनने के लिए तो ये ठीक है कि जमीन के अंदर वायुदाब से या प्लेटों के खिसकने से भूकंप आते हैं किंतु ऐसा होते किसी ने न तो प्रत्यक्ष देखा है और न प्रकारांतर से ही अनुभव किया है | यह केवल एक कल्पना है|जो सही या गलत दोनों निकल सकती है | इसके गलत निकलने की संभावना इसलिए अधिक है ,क्योंकि इसके आधार पर भूकंपों के विषय में अभी तक लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान गलत निकल जाते रहे हैं |इससे यह प्रमाणित हो जाता है कि भूकंपों के आने का कारण जिन घटनाओं को माना जा रहा है | उसमें सच्चाई नहीं है |
अपनी बात
प्रकृति के रहस्य को समझने का विज्ञान न होने के कारण प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में न तो अनुसंधान किया जा सकता है और न ही उनके बिषय में निश्चित तौर पर कुछ कहा ही जा सकता है | ऐसी स्थिति में अनुसंधानों के नाम पर कुछ कल्पनाएँ कर ली जाती हैं | उनके आधार पर कुछ दावे कर दिए जाते हैं | जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है |ऐसे दावे गलत निकलने पर उनके कुछ काल्पनिक कारण बता दिए जाते हैं |जो सही नहीं निकलते हैं |
उदाहरण के रूप में कहा जा रहा था कि ब्रह्मांड के फैलने की रफ्तार धीमी नहीं हो रही है | बाद में उसका खंडन कर दिया गया | इसीप्रकार से अधिकाँश प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों को विज्ञान केनाम पर उलझाना सुलझाना चलता रहता है | कोरोना महामारी के बिषय में ऐसा ही होता रहा है | प्रकृति विज्ञान के अभाव में प्राकृतिक अनुसंधानों को ऐसे ही भटका दिया जाता रहा है |
महामारी संबंधी विभिन्न परिस्थितियों के बिषय में कुछ वैज्ञानिकों ने एक बात कही | उसी बिषय में उससे अलग कुछ दूसरों ने दूसरी बात कही | कुछ तीसरे वैज्ञानिकों ने उन दोनों प्रकार के वैज्ञानिक बिचारों का खंडन करके एक नई बात कह दी | बाद में वो घटना उन तीनों प्रकार के वैज्ञानिकबिचारों से अलग घटी | जिनसे उन बिचारों का दूर दूर तक कोई संबंध नहीं था | अनुसंधानों के नाम पर ऐसा खिलवाड़ महामारी जैसे संकटों में समाज को झोंक देता है |
प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित विज्ञान के अभाव में अनुसंधानों के नाम पर यही सब कुछ होता आ रहा है | जिसमें वैज्ञानिक प्रक्रिया के नाम पर अपनी अपनी कल्पित बातें कह दी जाती हैं | उनमें से कुछ सही कुछ गलत एवं कुछ बीच की निकलती हैं | प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों के नाम पर यही सब कुछ होता आ रहा है |
भारतीय मौसमविज्ञान विभाग को ही लिया जाए तो उसकी स्थापना किए डेढ़ सौ वर्ष बीत चुके हैं| मौसमविज्ञान पर अभी तक केवल इतना हो पाया है कि बादलों आँधी तूफानों को दूर से देख लिया जाने लगा है | इसलिए उनके बिषय में कुछ पहले से तीर तुक्के लगाए जाने लगते हैं |सही निकल गए तो ठीक और गलत निकले तो उसका कारण जलवायु परिवर्तन को बता दिता जाता है |
भूकंप जैसी घटनाएँ उपग्रहों से नहीं दिखाई पड़ती हैं | इसलिए उनके बिषय में कुछ कहने को होता नहीं है | इसीलिए निकट भविष्य में हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आने वाला है | ऐसी बातें बोल दी जाती हैं | जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है |
कोरोना महामारी बिषय में भी इसी प्रकार से तीर तुक्के लगाए जाते रहे | जिनके सही न निकलने महामारी का स्वरूप परिवर्तन बता दिया जाता रहा है |
प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधान करने या अनुमान पूर्वानुमान लगाने की इसी प्रक्रिया के कारण सभी प्रकार हिंसक प्राकृतिक घटनाओं महामारियों में जनधन का बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता है | उसमें वैज्ञानिक अनुसंधानों से बिल्कुल मदद नहीं मिल पाती है |ऐसी हिंसक घटनाएँ घटित के बाद जनधन का नुक्सान हो जाने के बाद उन जिम्मेदार लोगों के आधारविहीन तरह तरह के वक्तव्य सुनने को मिलते हैं | जिनका उस परिस्थिति से कोई संबंध नहीं होता है |
प्राकृतिक अनुसंधानों के क्षेत्र में लगातार अनुसंधान करते रहने के बाद भी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में जो जो कुछ बताया जाए वो गलत निकलता जाए | ऐसी गलती सैकड़ों वर्ष तक करते रही जाए |जिसका मूल्य कोरोना महामारी या प्राकृतिक आपदाओं के रूप में समाज को चुकाना पड़े !आखिर ये कब तक सहा जाना चाहिए !
इसीलिए मुझे लगा कि भूकंप,बाढ़,बज्रपात बादल फटने या महामारी आने के बिषय में पहले से सही सही पूर्वानुमान न लगाए जा सकें तो ऐसे अनुसंधानों पर जनता का धन को व्यय करने का औचित्य ही क्या बचता है |हमें समझना होगा कि अनुसंधानों का आर्थिकभार करने वाले समाज का लक्ष्य अनुसंधानों के नाम पर कुछ भी करते रहना नहीं है|समाज चाहता है कि ऐसे अनुसंधानों के द्वारा प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि के समय उसे कुछ मदद मिले |
इसीलिए भारत के प्राचीनविज्ञान आधार पर मैंने ऐसे अनुसंधानों को किया है | जिससे ऐसे संकट जनधन की सुरक्षा करने में बहुत मदद मिल सकती है |
भूमिका
कुछ सौ वर्ष पूर्व आधुनिक विज्ञान जब से आस्तित्व में आया तब से आधुनिक विज्ञान के आधार पर महामारी एवं मौसम संबंधी घटनाओं को समझने का प्रयास किया जाता रहा है | अनुसंधानों के नाम पर किया कुछ भी जाता रहा हो किंतु उससे प्राप्त अनुभवों के आधार पर प्रकृति को समझना संभव नहीं हो पाया है | यही कारण है कि विश्व वैज्ञानिकों के द्वारा आज तक न तो मौसम संबंधी किसी घटना या आपदा के घटित होने का कारण खोजा जा सका है और न ही उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाए जा सके हैं |
इसीप्रकार से महामारी के बिषय में किए जाते रहे अनुसंधानों से जो अनुसंधानजनित अनुभव प्राप्त हुए हैं | उनकी सच्चाई का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कोरोनामहामारी को न तो समझा जा सका है और न ही उसके या उसकी किसी लहर के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सका है | उन अनुभवों के आधार पर कोरोना महामारी के समय समाज को ऐसी क्या मदद पहुँचाई जा सकी है | जिससे मनुष्यों को सुरक्षित बचाने में या संक्रमण से मुक्ति दिलाने में कुछ भी मदद मिल सकी हो | महामारी से निपटने के ढंग में जिस प्रकार की हड़बड़ाहट थी |उससे तो ऐसा ही लग रहा था जैसे विज्ञान के विकास से पहले आदि काल में कोई महामारी पहली बार अचानक आ गई हो |
ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि यदि उनके बिषय में इतना कुछ पता लगाया जा सका होता और वो सही होता तब तो ऐसी घटनाओं के बिषय में लगाए जाने वाले अनुमान पूर्वानुमान आदि सही लगा लिए गए होते | किसी भी प्राकृतिक घटना या महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि अभी तक नहीं लगाए जा सके हैं |
इतना सक्षम विज्ञान होने के बाद भी प्राकृतिक घटनाओं तथा महामारियों के कारणों को समझना अभी तक संभव नहीं हो पाया है | इसीलिए इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो सका है | इसके बिना ऐसी हिंसक घटनाओं से सुरक्षा की तैयारियाँ करने के लिए समय नहीं मिल पा रहा है | इसीलिए इतने बड़े बड़े अनुसंधानों के बाद भी संक्रमितों को स्वस्थ करने में या मृतकों की संख्या कम करने में अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है |
महामारी में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु सामान्य घटना नहीं है |ये गंभीर चिंता का बिषय है कि पड़ोसी शत्रु देशों के साथ भारत को तीन युद्ध लड़ने पड़े | उन तीनों युद्धों में मिलाकर भारत के जितने लोगों की मृत्यु हुई थी |उससे कई गुना अधिक लोग केवल कोरोनामहामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | ऐसे महामारी संबंधी अनुसंधानों के द्वारा यदि उन्हें सुरक्षित नहीं बचाया जा सका है तो ये अनुसंधान आम जनता के आखिर किस काम आएँगे |
महामारी में मदद के लिए कितने सक्षम हैं अनुसंधान
महामारी को समझने के लिए महामारी पैदा
होने का वास्तविक कारण नहीं पता लगाया जा सका है | इसके लिए कह तो दिया
गया कि महामारी के लिए मौसम जिम्मेदार है | मौसमसंबंधी घटनाओं को जिम्मेदार
मान भी लिया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना पड़ेगा | मौसम
का कोई विज्ञान ही होता तो अब तक मौसम संबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगा
लिए जाते | मध्यावधि दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान नहीं
है | यदि होता तो सही पूर्वानुमान लगाना संभव हो जाता | अल्पावधि
पूर्वानुमान लगाने के लिए भी कोई विज्ञान नहीं है | उसके लिए तो बादलों
आँधी तूफानों को दूर से देखने के लिए एक जुगाड़ कर लिया गया है | उनकी गति
और दिशा के हिसाब से यह अंदाजा लगा लिया जाता है कि ये इतने समय में अमुक
स्थान पर पहुँच जाएँगे |
ऐसे जुगाड़ों से मौसमसंबंधी घटनाओं को कुछ पहले देखने में मदद भले मिल
जाती हो किंतु इसमें विज्ञान का उपयोग कहाँ है और अनुसंधानों की क्या भूमिका
है ?
कहने को तो कह दिया जाता है कि रडार, मौसम के गुब्बारे, और ज़मीनी वेधशालाओं की मदद से तापमान, हवा की गति, आर्द्रता, और वायुदाब के वर्तमान आंकड़े जुटाए जाते हैं,किंतु उन वर्तमान आंकड़ों के आधार पर वर्तमान समय के बिषय में ही अंदाजा लगाया जा सकता है | इस आधार पर भविष्य के बिषय में लगाया गया अंदाजा संभव नहीं होता है | यह अंदाजा लगाने का केवल एक जुगाड़ होता है | वो किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर नहीं लगाया गया होता है |
इसीलिए यदि रडार, मौसम के गुब्बारे, और ज़मीनी वेधशालाओं की मदद से तापमान, हवा की गति, आर्द्रता, और वायुदाब के वर्तमान आंकड़ों के आधार पर पूर्वानुमान लगना संभव होता तो मौसमसंबंधी घटनाओं को प्रत्यक्ष या किसी यंत्र की सहायता से दिखाई देने से पहले उनके बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया गया होता | जहाँ जब जैसा घटित होते देखा उसके आधार पर किसी दूसरी जगह वैसा घटित होने के बिषय में अंदाजा उसी प्रकार की घटना है जैसे गंगा जी में एक जगह की बाढ़ देखकर उस बाढ़ के पानी के दूसरी जगह पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगाया जाता है | इसमें विज्ञान, अनुसंधान एवं पूर्वानुमान जैसा कुछ भी नहीं होता है |
इसीलिए
मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि
लगाना संभव नहीं हो पाया है | ऐसी स्थिति में मौसम के आधार पर महामारी को
समझा जाना कैसे संभव है | महामारी को समझने के लिए महामारी पैदा होने का वास्तविक कारण खोजना ही पड़ेगा | इसके लिए यदि मौसम संबंधी घटनाओं को जिम्मेदार माना जाएगा तब तो महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना पड़ेगा |मौसम को समझने के लिए कोई विज्ञान ही नहीं है | इसीलिए मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव नहीं हो पाया है | ऐसी स्थिति में मौसम के आधार पर महामारी को समझा जाना कैसे संभव है |
भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात वज्रपात जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधानों के लिए कोई विज्ञान नहीं है |इसीलिए ऐसी घटनाओं के बिषय में अनुसंधान करने के नाम पर जो कुछ किया जाता है उनसे ऐसा कुछ नहीं निकलता है | जिनका घटनाओं के साथ संबंध सिद्ध हो सके | कई बार कुछ घटनाओं के बिषय में गलत निष्कर्ष पकड़कर उन्हें ही सही की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है |
जिस प्रकार से कोरोना काल में चिकित्सा के लिए प्लाज्मा थैरेपी को सक्षम बताया गया था |महामारी की दूसरी लहर यदि न आती तो प्लाज्मा थैरेपी की वो सच्चाई कभी सामने न आ पाती कि कोरोना संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्लाज्मा थैरेपी सक्षम नहीं है |प्लाज्मा थैरेपी की तरह ही भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात वज्रपात जैसी प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों अनुमानों पूर्वानुमानों के बिषय में जो काल्पनिक किस्से कहानियाँ गाढ़ी गई हैं | उनके आधार पर न तो उन घटनाओं को समझना संभव हो पाया है और न ही ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगना ही संभव हो पाया है | कोरोनामहामारी के बिषय में भी ऐसा ही होते देखा गया है | बातों के अनुरूप काम नहीं हुआ है |
विज्ञान और अनुसंधान संबंधी इन्हीं कमजोरियों के कारण प्रायः प्राकृतिकदुर्घटनाओं के घटित होने से जो नुक्सान होना होता है वो तो हो ही जाता है | उसके बिषय में थोड़े बहुत समय तक चर्चा होती रहती है | इसके बाद लोग घटनाओं को भूलने लग जाते हैं | इसके बाद उन अनुसंधानों का क्या होता है | ये पता नहीं लग पाता है | दोबारा फिर जब घटनाएँ घटित होती हैं जनधन का नुक्सान होता है तब फिर अनुसंधान करने की चर्चाएँ शुरू होतीं हैं |उसके बाद फिर वही होता है | घटनाएँ शांत होती हैं | चर्चाएँ शांत होती हैं | अनुसंधान भी शांत हो जाते हैं |
महामारी पैदा होने के कारणों की खोज !
कोरोना महामारी मनुष्यकृत थी या प्राकृतिक ! यह पता लगाया जाना बहुत आवश्यक होता है | कुछ वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी पैदा होने के लिए किसी देश विशेष की प्रयोगशाला से निकले वायरस (बिषाणुओं) को जिम्मेदार बताया जाता है |
महामारी पैदा होने का कारण यदि किसी देश विशेष की लैब से लीक हुआ वायरस था तब तो संक्रमण उसी स्थान पर फ़ैल जाता | उसी के आस पास बना रहता ,जहाँ लीक हुआ था | बिना किसी प्रसार माध्यम के वो संपूर्ण विश्व में कैसे फ़ैल जाता | दूसरी बात किसी लैब से यदि एक बार लीक हुआ था तो एक ही लहर आनी चाहिए थी |जितना बढ़ना होता उतना एक बार ही बढ़ता बार बार बढ़ने घटने का कारण क्या था |
मनुष्यकृत रोग या महारोग तो उस गाड़ी की तरह होते हैं | जिसे धक्का देकर एक बार आगे बढ़ा दिया जाता है |वो जहाँ तक जाती है चली जाती है| इसके बाद वो जहाँ जब रुक जाती है तो रुक ही जाती है | दोबारा तब तक नहीं बढ़ती है जब तक दोबारा धक्का नहीं दिया जाता है | जब दुबारा धक्का दिया जाता है तब उसकी गति फिर बढ़ जाती है | उसके बाद जब फिर रुकने लगती है तब फिर धक्का देना होता है | इसमें धक्का देते एवं गति घटते बढ़ते सब कुछ प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है | इसमें उस गाड़ी की गति बढ़ने घटने का कारण धक्का दिया जाना जैसा बाह्यबल था | महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने का कारण ऐसा कोई बाह्यबल चिन्हित नहीं किया जा सका |
मनुष्यकृत महामारियाँ धक्का देकर चलाई जाने वाली गाड़ियों की तरह होती हैं | इसमें मनुष्यों के द्वारा कुछ ऐसे कार्य किए जाते हैं | जिससे प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | युद्ध आदि में उपयोग किए जाने वाले विस्फोटकों ,गैसों ,किसी लैब से लीक बिषाणुओं से वातावरण बिषैला हो जाता है | इससे प्राकृतिक रोग या महामारी पैदा हो जाती है | इसे वातावरण में साँस लेने से मनुष्य रोगी होने लगते हैं | ये रोग तभी तक होते हैं जब तक उक्त कारण बने रहते हैं | ऐसी घटनाओं के एक बार रुकते ही महामारियाँ शांत होने लगती हैं |
इसके बाद कोई दूसरी लहर तब आएगी जब मनुष्यों के द्वारा प्राकृतिक वातावरण प्रदूषित करने के लिए फिर से कोई वैसा कार्य किया जाएगा | जिससे प्राकृतिक वातावरण फिर से प्रदूषित होने लगे | इसमें ऐसा नहीं होता है कि कोरोना महामारी की तरह ही मनुष्यों के द्वारा दोबारा कुछ किए बिना ही संक्रमण बार बार बढ़ता घटता रहे |
कोरोनामहामारी यदि मनुष्यकृत होती तो उसके पैदा होने के मनुष्यकृत कारण खोज लिए जाते | किसी लैब से निकले वायरस से यदि पैदा हुई होती तो संक्रमितों की संख्या एक बार कम हो जाने के बाद दोबारा तब बढ़ती जब लैब से दोबारा बायरस लीक होता | ये सब कुछ प्रत्यक्ष दिखाई देता | ऐसा कुछ होते देखा नहीं गया | इसलिए कहा जा सकता है कि कोरोना महामारी मनुष्यकृत तो नहीं थी |
इसी प्रकार से प्राकृतिक महामारियाँ मोटर वाली गाड़ी की तरह होती हैं | इसमें उसके चलने रुकने तेज धीमी आदि करने की प्रक्रिया सब गाड़ी के अंदर ही होती है |इसलिए इसमें सब कुछ कैसे हो रहा है | ये प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ता है |
जिस प्रकार से मोटर वाली गाड़ी अपने आप चलने लगती है, रुक रुककर चलने लगती है | अपने आप से तेज और धीमी हो जाती है | इस दृष्टि से देखा जाए तो कोरोना महामारी में लहरों का आना जाना बार बार देखा जा रहा था | ये प्राकृतिक महामारियों में ही संभव हो सकता है |
ऐसी महामारियाँ प्राकृतिक बिकारों से पैदा होती है जो दिखाई नहीं पड़ते हैं | ऐसे बिकारों का प्राकृतिक रूप से बढ़ना घटना भी दिखाई नहीं पड़ता है | उनसे संक्रमण ही बढ़ते घटते दिखाई पड़ता है | कोरोना महामारी प्राकृतिक रूप से पैदा हुई थी | इसीलिए उसके पैदा होने एवं संक्रमण बढ़ने घटने के प्रत्यक्ष कारण को खोजा नहीं जा सका है इसकी संपूर्ण प्रक्रिया महामारी के अंदर ही विद्यमान थी | इसलिए कोरोना महामारी को प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ ही मानना तर्कसंगत है | उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने की प्रक्रिया भी प्राकृतिक ही थी |
अनुसंधानों में चूक कहाँ हुई !
कोरोना महामारी के बिषय में वैज्ञानिकों ने जितने भी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए हैं | उनमें से एक आध ही भले सही निकला हो बाक़ी गलत निकलते चले गए |ये गंभीर चिंता की बात इसलिए है क्योंकि ये आम आदमी के द्वारा लगाए गए सामान्य अंदाजे नहीं थे| जिनके गलत निकल जाने पर सहकर चुप बैठ जाया जाए | इनमें वैज्ञानिकों का परिश्रम लगता है | सरकारों के प्रयत्न लगते हैं | जनता के खून पसीने की कमाई लगती है | इन सबसे आशा तो इतनी ही रहती है कि महामारी जैसी घटनाओं के घटित होने पर वैज्ञानिक अपने अनुसंधानों के द्वारा महामारियों से देश वासियों की सुरक्षा कर लेंगे |
महामारियों के आने पर उसका सामना सीधे जनता को ही करना पड़े | प्रभावी प्रयत्नों के अभाव में जनता को संक्रमित होना ही पड़े !कुछ लोगों की मृत्यु भी हो ही जाए तो इससे ऐसे अनुसंधानों की कमजोरी सिद्ध होती है | जिसके कारणों की खोज इसलिए की जानी चाहिए | कोरोना महामारी तो जैसे तैसे निकल गई किंतु भविष्य में आने वाली महामारियों के समय विज्ञान जगत इतना बेवश न रहे |
अनुसंधानों का ये ढंग बिल्कुल विश्वास करने योग्य नहीं है कि भूकंप आने पर जितनी जनधन हानि होनी है वो होती ही रहे और भूकंप संबंधी अनुसंधान भी होते रहें | घटनाएँ भी घटित होती रहें और जनधन का नुक्सान भी होता रहे तो अनुसंधानों से लाभ क्या है | कोरोना महामारी के समय यही होते देखा जाता रहा है | अनुसंधानों से इतनी मदद तो मिलनी ही चाहिए कि प्राकृतिक आपदाएँ आने पर जनधन की हानि इतनी अधिक न होती |
भूकंपविज्ञान की वैज्ञानिकता तब तक संदिग्ध है जब तक उस विज्ञान के द्वारा भूकंप के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि सही न निकलने लगें !भूकंपों के नाम पर कुछ काल्पनिक किस्से कहानियाँ गढ़ लेना अनुसंधान नहीं है | यही स्थिति महामारी संबंधी अनुसंधानों की है | महामारी संबंधी अनुसंधान होते हुए भी जनधन का इतना बड़ा नुक्सान होने से यह सिद्ध होता है कि इससे संबंधित अनुसंधानों से सुरक्षात्मक सहयोग नहीं मिल पाया है |
इसलिए ऐसे अनुसंधानों के लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए |अनुसंधानकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए | अनुसंधान बिषयक बिकल्पों पर बिचार करते हुए उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए | महामारी के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान जो गलत हुए हैं | वे उनके द्वारा लगाए गए थे | जिन्हें ऐसे बिषयों का विशेषज्ञ माना जाता है | उन्हें उनकी इसी योग्यता के कारण इतनी बड़ी जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं | इसीलिए उन्हें ऐसे विशिष्ठ वैज्ञानिक पद प्रतिष्ठा सुख सुविधाएँ आदि प्रदान की जाती हैं| उनके द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि यदि इतनी आसानी से गलत निकल सकते हैं तो वह समाज ऐसे अनुसंधानों का क्या करे | जिसे इन पर व्यय होने वाला आर्थिक बोझ वहन करना पड़ता है |
अनुसंधान और भविष्यसंबंधी चिंताएँ !
विकास का मतलब अनुसंधानों के द्वारा सुख सुविधा के साधन खोज लिया जाना मात्र नहीं है | उन मनुष्यों की को सुरक्षित रखना भी है | जिन्हें सुखी करने के लिए सुख सुविधाओं के साधन खोजे जाते हैं | कोरोना महामारी जैसी आपदाएँ यदि उन मनुष्यों को यूँ ही निगलती चली जाएँगी तो उन सुख सुविधाओं का क्या होगा | उन्हें कौन भोगेगा | वे किसका जीवन सरल बनाएँगी | जो मनुष्यों के लिए खोजी गई हैं | इसलिए महामारी जैसी आपदाओं से मनुष्यों को सुरक्षित बचाया जाना पहले आवश्यक है | सुख सुविधाएँ कुछ कम रहेंगी तो भी स्वस्थ रहकर सुखी हुआ जा सकता है |
महामारी जैसे संकटों से मनुष्यों को सुरक्षित बचाने में वैज्ञानिकअनुसंधान यदि सक्षम थे तो महामारी पीड़ितों की मदद क्यों नहीं की जा सकी | विज्ञान इतना सक्षम नहीं था या वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसे प्रभावी अनुसंधान नहीं किए जा सके | जो महामारी पीड़ितों का बचाव करने में समर्थ होते |
प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधानों के नाम पर जो कुछ किया जाता है | उस किए जाने का उस प्राकृतिक घटना से कोई तो संबंध सिद्ध होना चाहिए | ये आवश्यक है | अक्सर देखा जाता है कि भूकंप संबंधी अनुसंधानों से भूकंपों के बिषय में कुछ पता नहीं लग पाता है और महामारी संबंधी अनुसंधानों से महामारी के बिषय में कुछ पता नहीं लग पाता है | ऐसी तैयारियों के बल पर भविष्यसंबंधी महामारियों से सुरक्षा की दृष्टि से कितनी मदद मिल पाएगी |कोरोना महामारी में क्या मदद मिल पाई है | उन अनुसंधानों के योगदान का आकलन कैसे किया जाए |
महामारी से जो जनधन का नुक्सान हुआ है वो तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है किंतु अनुसंधानों से क्या मदद मिली !वो भी पता लगना चाहिए | ये आत्ममंथन इस कसौटी के आधार पर किया जाना चाहिए कि महामारी संबंधी जो अनुसंधान अभी तक किए जाते रहे | यदि ऐसे अनुसंधान पहले से न किए जा रहे होते तो क्या महामारी इससे भी अधिक लोगों को संक्रमित कर सकती थी या इससे भी अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त हो सकते थे | आखिर इतने महँगे अनुसंधानों का योगदान क्या रहा ? इतनी बड़ी महामारी में कोई भूमिका ही न रही हो ये कैसे हो सकता है | सच्चाई यदि यही है तो चिंता जनक है |
इसे विज्ञान वैज्ञानिकों अनुसंधानों अनुमानों पूर्वानुमानों के भरोसे भविष्य एवं भावी पीढ़ियों को कैसे छोड़ा जा सकता है | उनके लिए प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों के लिए कुछ तो करके जाना होगा |परिवारों में व्यापारों में सरकारों में प्रतिवर्ष भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं | उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए पूरे साल यथा संभव प्रयत्न किए जाते हैं | जिसमें कुछ सफलता कुछ असफलता मिलती है |
इसीप्रकार से भूकंप महामारी आदि घटनाओं के बिषय में किए जाने वाले अनुसंधानों का भी प्रतिवर्ष लक्ष्य घोषित किया जाना चाहिए | उसे प्राप्त करने की योजना बनाई जानी चाहिए ,तभी अनुसंधानों से कुछ आशा की जा सकती है |
इसके अभाव में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हुई क्या लक्ष्य था |उसे पाने के लिए प्रयत्न क्या किए जाते रहे | इन डेढ़ सौ वर्षों में ये अनुसंधान कितना मार्ग तय कर चुके हैं | लक्ष्य हासिल करने की दृष्टि से कितना गंतव्य बचा है | ये सार्वजनिक करते हुए भविष्य की यात्रा तय करनी होगी ,ये अनुसंधान व्यक्तिगत नहीं है | इसमें जनता साझीदार है | इसपर होने वाला आर्थिक व्यय जनता वहन करती है | इसलिए उसे पता होना चाहिए कि प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि से जनता की सुरक्षा के लिए किया क्या जाना है | उसमें कितना किया जा चुका है | कितना किया जाना बाकी है | जो किया जाना बाक़ी है उसे करने में कितना समय और लगेगा | जिसके बाद विश्वास पूर्वक ये कहा जा सकेगा कि महामारियों एवं प्राकृतिक आपदाओं से अब जनता सुरक्षित है |
कितना उचित है अनुसंधानों के नाम पर एकाधिकार !
प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में किए जा रहे अनुसंधानों के निरंतर असफल होते जाने के बाद भी इस प्रकार का एकाधिकार ठीक नहीं है कि आधुनिक विज्ञान के आधार पर हम जो करें वो तो विज्ञान और वही अनुसंधान ! हम जो न कर पावें वही यदि प्राचीनविज्ञान के आधार पर कर दिया जाए तो वो अंधविश्वास !
जिस प्राचीनविज्ञान के बलपर समाज आदिकाल से लेकर अब तक सकुशल रहता रहा है | प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों आदि से सुरक्षित और रोग मुक्त होता आ रहा है| उन प्राचीनविज्ञान से संबंधित अनुसंधानों को भी यदि आधुनिक विज्ञान की तरह समर्पित भाव एवं संसाधनों के साथ किया जाए तो प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित रहस्यों को सुलझाया जा सकता है |
उपग्रहों रडारों सुपर कंप्यूटरों से बादलों आँधी तूफानों जैसी तैयार घटनाओं को दूर से देखने में मदद मिल सकती है वे कब कहाँ पहुँचेंगी भले लिया जाए किंतु प्रकृति के स्वभाव को समझने में ये सहायक नहीं हो सकते हैं | मौसम का प्रभाव यदि महामारियों पर पड़ता है तो महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना पड़ेगा |ऐसे जुगाड़ तत्कालीन सुरक्षा में सहायक भले हो जाएँ किंतु भावी प्रकृति योजना को समझने में या उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं | प्रकृति की महामारी योजना को सही सही समझने एवं उसके बिषय में सही अनुमान लगाने के लिए भावी प्रकृति योजना को समझना एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना होगा | प्रकृति के स्वभाव को समझे बिना महामारी को समझा जाना संभव नहीं है |
मौसम के बिषय में यह कहा जाना बिल्कुल उचित नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम संबंधी अनुमान पूर्वानुमान गलत निकल जाते हैं | सच्चाई तो ये है कि मौसम के स्वभाव को जिस विज्ञान से समझा जाए वो विज्ञान ही नहीं है | विज्ञान के बिना काल्पनिक रूप से जो तीर तुक्के लगाए जाते हैं वे यदि सही निकल गए तो पूर्वानुमान और गलत निकल गए तो जलवायु परिवर्तन बता दिया जाता है | ऐसे तीर तुक्के बादल फटने में बाढ़ में भूकंपों आदि में काम नहीं आते हैं |
अनुसंधानों के नाम पर ये सब कुछ होते कुछ सौ वर्ष तो बीत चुके हैं | उन अनुसंधानों से प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों में मदद मिल पाना संभव नहीं है | कोरोना महामारी के रूप में समाज ने उसे सहा है |
इसके बिषय में यह कहा जाना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि महामारी के बिषय में अनुसंधान तो बहुत किए गए प्रयत्न भी बहुत किए जाते रहे किंतु महामारी बार बार स्वरूप बदलती रही इसलिए उसे समझना संभव नहीं हो सका या उससे समाज की सुरक्षा नहीं की जा सकी | ऐसी परिवर्तनशील परिस्थितियों को समझना ही तो उसकी विशेषज्ञता है |
इस सच्चाई को अभी भी स्वीकार कर लेने में भलाई है कि ऐसा कोई विज्ञान नहीं है | जिसके आधार पर महामारी को समझा जाना संभव हो | इसीलिए प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों को अभी तक समझा नहीं जा सका है |
इतना उन्नत विज्ञान होते हुए भी कोरोना महामारी के बिषय में अभी तक कुछ भी पता नहीं लगाया जा सका है | महामारी मनुष्यकृत है या प्राकृतिक ! इसका विस्तार कितना है !प्रसार माध्यम क्या है !अंतर्गम्यता कितनी है ! कोरोना वायरस किसी देश लैब से लीक हुआ है या प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ है ! महामारी या उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने पर तापमान के घटने बढ़ने का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं | वायु प्रदूषण बढ़ने घटने का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं | खान पान का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं !संक्रमितों पर चिकित्सा का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ! टीकों आदि का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ! संक्रमण बढ़ने घटने पर कोविड नियमों के पालन का प्रभाव पड़ता है या नहीं |ऐसे प्रश्नों के निश्चित उत्तर खोजे बिना किसी महामारी वैज्ञानिक की वैज्ञानिकता पर पर विश्वास कैसे कर लिया जाए | कैसे यह मान लिया जाए कि ऐसी महामारियों से जनता की सुरक्षा करने में ऐसे लोग समर्थ हैं |
विज्ञान या अंधविश्वास
वर्तमान समय विज्ञान को जिस उन्नत शिखर पर पहुँचा बताया जाता है | ये केवल कहने सुनने से नहीं होगा | ये सिद्ध भी किया जाना चाहिए कि कोरोनामहामारी से सुरक्षित बचाने में या संक्रमितों को स्वस्थ करने में विश्व वैज्ञानिक जगत का क्या योगदान रहा है ! कोरोना महामारी को समझने में तथा कोरोना महामारी एवं उसकी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने में विज्ञान कितना सफल हुआ | ऐसी सफलताओं को सामने रखकर ही विज्ञान की वैज्ञानिकता के आस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए |
मूल्यांकन करने की समाज की अपनी शैली होती है |तंत्र मंत्र जादूटोना झाड़ फूँक करके समाज को रोग मुक्ति या समस्याओं से मुक्ति दिलाने का दावा करने वाले लोग यदि ऐसा नहीं कर पाते हैं तो समाज उन्हें अंधविश्वास फैलाने वाला मान लेता है |इसी कसौटी पर मौसम एवं महामारी संबंधी वैज्ञानिक दावों को भी कसा जाना चाहिए | महामारी के बिषय में उनके द्वारा लगाए गए सभी अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकलते चले गए ! चिकित्सा की दृष्टि से किए गए प्रयत्न फलित नहीं हुए !
ऐसी स्थिति में विज्ञान के नाम पर ,वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर,प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित पूर्वानुमानों के नाम पर ,जलवायु परिवर्तन के भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों के नाम पर,भूकंपों के आने का कारण बताने के नाम पर जो जो कुछ बताया जा रहा है !उसका कोई निश्चित वैज्ञानिक आधार नहीं होता है | जिसे किसी भी प्रकार से प्रमाणित माना जा सके |
इसी प्रकार के दोष के कारण तंत्र मंत्र जादूटोना झाड़ फूँक आदि को यदि अंधविश्वास की संज्ञा दी जा सकती है तो प्राकृतिक घटनाओं के विषय में समय समय पर वैज्ञानिकों के द्वारा दिए जाने वाले निरर्थक वक्तव्यों को भी अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाने वाला मानकर उनसे क्यों न दूरी बना ली जाए | जिससे ऐसे लोगों के द्वारा फैलाई जाने वाली अफवाहों से समाज में डर, घबराहट या दहशत पैदा न हो।
समय समय पर वैज्ञानिकों के द्वारा कह दिया जाता है - " हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आने वाला है |"जलवायु परिवर्तन के कारण आज के दो सौ दो सौ वर्ष बाद भीषणसूखा पड़ेगा,तापमान बहुत अधिक बढ़ जाएगा ,आदि और बहुत सारी ऐसी डरावनी बातों की भविष्यवाणियाँ उन लोगों के द्वारा परोसी जा रही होती हैं | जिनके द्वाराआगामी मानसून में कैसी वर्षा होगी | इस महीने या सप्ताह में कैसी वर्षा होगी | इसके सही पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके | वे सैकड़ों वर्ष आगे के बिषय में भविष्यवाणियाँ कर रहे होते हैं |
माना कि वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा बहुत सारे क्षेत्रों में एक से एक बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा चुकी हैं | जिनके द्वारा जीवन की बहुत सारी कठिनाइयाँ कम हुई हैं | जीवन सुख सुविधा संपन्न हुआ है | लौकिक समस्याओं से सुरक्षित हुआ है | ऐसी सफलताओं का लाभ मनुष्यों को तभी मिल पाएगा जब वे स्वस्थ और जीवित रहेंगे | महामारी भूकंप आदि प्राकृतिकआपदाओं से बहुत बड़ी संख्या में जिन लोगों की मृत्यु अचानक हो जाती है ,वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए विकास उनके किस काम के !
इसलिए समाज को स्वस्थ और सुरक्षित बचाने के प्रयासों को सर्व प्रथम प्राथमिकता दी जानी चाहिए | वैज्ञानिक अनुसंधानों की गुणवत्ता को इसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए | इस लक्ष्य को प्राप्त किए बिना केवल दावे करके किसी बिषय को विज्ञान के रूप में थोपा जाना ठीक नहीं है | जनता से प्राप्त टैक्स रूप में प्राप्त किया गया धन अनुसंधानों के नाम पर ऐसे कार्यों में व्यय नहीं किया जाना चाहिए | जिनसे प्राप्त परिणामों से समाज की मदद न की जा सके |
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने बीते डेढ़ सौ वर्षों में अनुसंधानों के नाम पर न जाने क्या किया है |भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ महामारी आदि के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हैं | कोरोना महामारी को समझा जाना या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाना संभव नहीं हो पाया है |पर्यावरण के बिषय में भी कुछ समझा नहीं जा सका है | ऐसा किया जाना संभव होता तो अब तक कर लिया गया होता | बीते डेढ़ सौ वर्षों में केवल इतना हुआ है कि सुदूर क्षेत्रों में उठे बादलों एवं आँधीतूफ़ानों को देख लिया जाने लगा है |
भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ महामारी आदि के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हैं | कोरोना महामारी को समझा जाना या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाना संभव नहीं हो पाया है |पर्यावरण के बिषय में भी कुछ समझा नहीं जा सका है | ऐसा किया जाना संभव होता तो अब तक कर लिया गया होता |
वैसे भी अनुसंधान उसका होगा जिसका कोई विज्ञान होगा !प्राकृतिक घटनाओं को समझने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो अनुसंधान कैसे कर लिया जाएगा | ऐसा किया जाना यदि संभव होता तो कर लिया गया होता | भूकंप आदि एक से एक बड़ी हिंसक घटनाएँ घटित होती हैं | उनमें जन धन का नुक्सान होता है | ये विज्ञान न होता और ये अनुसंधान न हो रहे होते तो ऐसी प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों में क्या इससे भी अधिक जनधन का नुक्सान हो सकता था | ये सोचे जाने का बिषय है कि ऐसे कार्यों पर जनता का धन व्यय किया जा रहा है | जिनसे जनता को मदद मिल ही नहीं पा रही है | महामारी से जूझती जनता को ऐसे ही दावों आश्वासनों से सांत्वना दी जाती रही है | जिनसे जनता प्रत्यक्ष रूप से जूझ रही होती है |
प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधान किया जाना यदि संभव नहीं हो पा रहा है तो ऐसे अनुसंधान कार्य भारत के प्राचीन विज्ञान के आधार पर किए जाने चाहिए आखिर प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि तो पहले भी घटित होती रही हैं |उस समय उन्हीं प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों से समाज की सुरक्षा होती रही है | उससे अब क्यों नहीं हो सकती है |
वैज्ञानिक अनुसंधानों के क्षेत्र में इस प्रकार का एकाधिकार ठीक नहीं है कि हम करें तो अनुसंधान और प्राचीन विज्ञान के आधार पर किया जाए तो अंध विश्वास | ऐसे बिचार वैश्विक समाज के हित में नहीं हैं |
तर्कसंगत कल्पनाओं से ही मिल सकती है मदद
प्राकृतिक अनुसंधानों के क्षेत्र में विज्ञान के नाम पर जिस जिस प्रक्रिया को अपनाकर हम जो जो कुछ करके उसे अनुसंधान बताते जा रहें हैं | इसी वैज्ञानिक लापरवाही के कारण कोरोना में समाज को वो सब कुछ सहना पड़ा है | जिससे बचा जा सकता था | महामारी संबंधी वैज्ञानिक अनुसंधान यदि 1 प्रतिशत भी सही दिशा में जा रहे होते तो समाज को 1 प्रतिशत तो मदद मिलती | आज सजीव लोगों को सोचने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि कोरोनामहामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाने में ,उससे मनुष्यों की सुरक्षा करने में या कोरोना संक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाने में विज्ञान की भूमिका क्या रही | पारदर्शिता पूर्वक समीक्षा तो की ही जानी चाहिए |
किसी भी गंतव्य पर पहुँचने मार्ग अलग अलग हो सकते हैं किंतु गंतव्य एक ही होता है | अनुसंधान प्राचीन विज्ञान के आधार पर किए जाएँ या आधुनिक विज्ञान के आधार पर किंतु उनका लक्ष्य उस प्राकृतिक घटना के रहस्य को सुलझाना ही होता है |
उदाहरण के लिए देखा जाए तो जिस पृथ्वी का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 12,756 किलोमीटर है | पृथ्वी की सतह से इसके केंद्र की गहराई लगभग 6,371 किलोमीटर है | किसी भी वैज्ञानिक विधा के द्वारा न तो पृथ्वी के आर पार पहुँचा जा सका है और पृथ्वी के केंद्र तक भी नहीं पहुँचा जा सका है| इसलिए पृथ्वी की आतंरिक बनावट की जानकारी किसी को नहीं है ,फिर किसी एक प्रक्रिया के आधार पर अनुसंधानों के नाम पर कुछ कुछ करते रहने वाले लोग किसी दूसरी प्रक्रिया से वही करने वाले लोगों को गलत कैसे कह सकते हैं | विज्ञान के नाम पर यही होता आ रहा है | स्वयं कुछ कर पावें न कर पावें किंतु दूसरों को गलत बता देना या अंधविश्वास फैलाने वाला बता देना क्या यही विज्ञान है | यदि ऐसा बनहिं है तो प्रश्न उठता है कि भूकंपों आँधी तूफानों वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात आदि घटनाओं के बिषय में अभी तक ऐसा क्या खोजा जा सका है | जिससे ऐसी घटनाओं के पैदा होने के वास्तविक कारणों के बिषय में पता लगाया जा हो |
मानव अब तक पृथ्वी के अंदर गड्ढा खोदकर केवल 12.2 किलोमीटर तक ही पहुँच पाया है | मनुष्य के पास पृथ्वी के बिषय में सही जानकारी केवल इतनी ही है | यह किसी अंडे के छिलके जितनी मोटाई के बराबर भी नहीं है। इतनी छिछली जानकारी के आधार पर इतनी विराट पृथ्वी की बनावट को समझ लेने का दावा किया जाने को विज्ञानसम्मत कैसे माना जा सकता है |
पृथ्वी की जितनी गहराई तक या जिन जिन स्थानों तक मनुष्यकृत प्रयत्नों से पहुँचा जाना संभव नहीं है | उतनी या उससे भी अधिक गहराई तक कुछ उस प्रकार के जीव जंतुओं को रहने का अभ्यास होता है| प्राकृतिक रूप से उनकी बनावट भी उसीप्रकार की होती है | इसीलिए वे सुदूर आकाश में तथा घनीभूत जंगलों समुद्रों नदियों तालाबों में या उनके आसपास रहते हैं | प्रकृति में जब कुछ ऐसे परिवर्तन होने लगते हैं जो वे सह नहीं पा रहे होते हैं तो उनमें बेचैनी बढ़ती है | वे जीव जंतु परेशान होकर उन दुर्गम्य स्थानों को छोड़ छोड़ भागने लगते हैं | उनके भागने का कारण खोज लिए जाने से अनुसंधानों में बड़ी मदद मिल जाती है | इसीप्रकार के परिवर्तन खगोल भूगोल आदि निर्जीव प्रतीकों में भी होते देखे जाते हैं | प्रकृति को समझने के लिए उन परिवर्तनों को भी समझना आवश्यक होता है |
इसीलिए प्राचीनविज्ञान के द्वारा पृथ्वी के अंदर की जो जानकारी गहरा गड्ढा खोदकर पता लगाई जाती है | प्राचीन विज्ञान वही जानकारी जुटाने के लिए उतनी गहराई में रहने वाले जीव जंतुओं के परिवर्तित व्यवहारों का अनुसंधान करने की सलाह देता है | इसके आधार पर पृथ्वी के आतंरिक परिवर्तनों का पता लगा लिया जाता है | जहाँ जितना कम या जितना अधिक तापमान होता है वहाँ उसे सहने योग्य उस प्रकार के जीव जंतु आदि निवास करते हैं | इसलिए प्राचीन वैज्ञानिकों को वह जानकारी प्राप्त करने के लिए उतने गहरे गड्ढे नहीं खोदने पड़ते थे |
प्राचीनविज्ञान और अनुसंधान !
समय ही होता है प्राकृतिक परिवर्तनों का कारण !
वस्तुतः प्रकृति स्वयं में तो जड़ है | उसमें गति नहीं है | ऐसी स्थिति में भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ महामारी आदि घटनाएँ घटित होने के लिए गति चाहिए | ये गति वायु के आधीन है और वायु समय के आधीन है | प्रकृति में प्रतिपल हो रहे परिवर्तन समय की योजना होते हैं | समयसंचार का अनुगमन करने वाली हवाएँ ही उन परिवर्तनों को मूर्तरूप दे रही होती हैं |
इसप्रकार से प्राकृतिक वातावरण में घटित हो रही प्रत्येक घटना समय से प्रेरित होकर ही घटित हो रही होती है | समय के आधार पर ही उन सब के घटित होने का समय और प्रकार निश्चित होता है | प्रकृति को भी उसी का अनुगमन करना पड़ता है |समय के अनुसार ऋतुजनित परिवर्तन होते हैं | समय बदलते ही पेड़ों पौधों बनस्पतियों फसलों आदि में परिवर्तन आने लगते हैं |
इन्हीं परिवर्तनों के प्रभाव से पशु पक्षियों समेत समस्त जीव जंतुओं का व्यवहार बदलने लगता है |बुरे समय के प्रभाव से उनमें बेचैनी बढ़ने लगती है | वे उन्मादित होकर उपद्रव करने लगते हैं |
प्राचीन काल में इन्हें देखकर विभिन्न प्रकार की संभावित प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया जाता रहा है | इन्ही परिवर्तनों के आधार पर भविष्य में घटित होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लगा लिया जाता है |
प्राकृतिक घटनाएँ और महामारियाँ समय के अनुसार पैदा होती हैं | जब जैसा समय बदलता है तब तैसी घटनाएँ घटित होती जाती हैं | समय बदलता हुआ दिखाई नहीं पड़ता है | इसलिए समय में कब कैसे बदलाव हो रहे हैं | इसका ज्ञान उस समय घटित हो रही प्राकृतिक घटनाओं एवं जीव जंतुओं के व्यवहारों में हो रहे परिवर्तनों
के आधार पर किया जाता है |
बसंत का समय आने पर पेड़ों में पतझड़ होकर नई पत्तियाँ निकलने लगती हैं | आम के वृक्षों में मंजरियाँ लगने लगती हैं | कोयलें बोलने लगती हैं | प्रातः काल होने पर मुर्गा बोलने लगता है |प्रातः काल होने पर कमल खिल जाता है |इसप्रकार के और भी बहुत सारे प्राकृतिक संकेत होते हैं | जो भविष्य संबंधी सूचनाएँ दिया करते हैं |
कुल मिलाकर व्यवहार में ऐसा देखा जाता है कि समय को समझने में मशीनों से प्राप्त जानकारी एक बार गलत निकल सकती है किंतु प्रकृति या जीव जंतुओं से प्राप्त संकेत कभी गलत नहीं निकलते हैं |
वर्षाऋतु का समय आने पर वर्षा होने लगती है | शिशिरऋतु आने पर सर्दी पाला कोहरा आदि देखा जाता है | ग्रीष्मऋतु आने पर तापमान बढ़ जाता है | लू आदि गर्म हवाएँ चलने लगती हैं | पूर्णिमा का समय आने पर पूर्ण चन्द्रमा दिखाई देने लगता है | अमावस्या का समय आने पर चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता है | सूर्य उदय एवं अस्त होने की घटनाएँ उनके अपने अपने निर्धारित समय पर घटित होती हैं | यहाँ तक कि कभी कभी घटित होने वाली सूर्य चंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ भी उस प्रकार का समय आने पर ही घटित होती हैं | समुद्र में ज्वारभाटा अपने निर्द्धारित समय पर घटित होता है | इस प्रकार से संपूर्ण प्रकृति अपने अपने समय के अनुसार व्यवहार करते देखी जाती है |
व्यवहार में ऐसा देखा जाता है कि समय को समझने में मशीनों से प्राप्त जानकारी एक बार गलत निकल सकती है किंतु प्रकृति या जीव जंतुओं से प्राप्त जानकारी गलत नहीं होती है |
प्राचीनविज्ञान संबंधी अनुसंधान प्रक्रिया में प्राकृतिक परिवर्तनों एवं जीव जंतुओं के व्यवहारों में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करना होता है | बहुत सारी प्राकृतिक घटनाएँ पेड़ पौधे बनस्पतियाँ आदि अपने अपने समय से संबंध रखती हैं | उसी के अनुसार व्यवहार करती हैं |पशु पक्षी भी अपने अपने समय के अनुशार व्यवहार करते हैं | इसलिए प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के आधार पर, पेड़ों पौधों में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर जीव जंतुओं के व्यवहारों के आधार पर समय की पहचान की जाती है |
कई बार अंतर ऋतुएँ आती हैं | इसमें किसी एक ऋतु का प्रभाव कुछ दूसरी ऋतुओं में देखा जाता है |ऐसी स्थिति में वर्षाऋतु के अलावा कुछ दूसरी ऋतुओं में भी वर्षा होते देखी जाती है | ऐसे समय वहाँ खोजने पर कुछ ऐसे चिन्ह भी मिल जाते हैं | जो वर्षाऋतु से संबंधित होते हैं | उस समय वहाँ वर्षाऋतु के समय का प्रभाव होता है | इसलिए वहाँ वर्षा हो रही होती है | इसलिए जो रोग वर्षाऋतु में होते हैं | वही रोग उस समय भी हो सकते हैं |
इसी प्रकार से कोयलें बसंत के अलावा किसी अन्य ऋतु में बोलने लगें तो इसका मतलब बसंतऋतु न आने पर भी बसंतऋतु कुछ समय के लिए आ गई है | कई बार ऐसी घटना किसी छोटे से क्षेत्र में घटित होती है | उससे ये सिद्ध होता है कि बसंतऋतु का समय न होने पर भी इस स्थान पर इस समय बसंतऋतु का प्रभाव है | यह निश्चय हो जाने पर उस समय प्रकृति के कुछ दूसरे लक्षणों का भी मिलान करना चाहिए | जिस स्थान पर ऐसा हो उस स्थान पर उस समय पतझड़ होने या आम्र मंजरी लगने जैसे अन्य चिन्ह भी खोजे जाने चाहिए | ऐसी सभी घटनाओं का आपस में मिलान करना चाहिए | यदि ऐसा होता है तो उस स्थान पर बसंत की उपस्थिति समझी जानी चाहिए |
इसप्रकार से सभी पेड़ पौधे जीव जंतु आदि समय संबंधी परिवर्तनों के अनुसार परिवर्तित होने लगते हैं | जीव जंतुओं के स्वभाव में उस प्रकार के बदलाव होने लगते हैं | इसीलिए भूकंप आदि बड़ी घटनाओं के समय कुछ जीव जंतुओं के व्यवहार को बदलतेदेखा जाता है | जिससे ऐसी घटनाओं के घटित होने का अनुमान लगाया जाता है |
विज्ञान और वैज्ञानिकता
मौसमसंबंधी प्रकृति के स्वभाव को समझने के लिए अभी तक कोई विज्ञान नहीं है | बिज्ञान के बिना अनुसंधान किए ही नहीं जा सकते हैं | इसलिए मौसमसंबंधी सभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के नाम पर जो तीर तुक्के लगाए जाते हैं | वे सही गलत कुछ भी निकल सकते हैं | इसलिए जो सही निकल जाते हैं उन्हें पूर्वानुमान मान लिया जाता है और जो गलत निकल जाते हैं | उसका कारण जलवायुपरिवर्तन बता दिया जाता है |
ऐसे ही कोरोनामहामारी या उसकी लहरों के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के नाम पर तरह तरह के तीर तुक्के लगाए जाते रहे |वे सही निकल गए तो ठीक और गलत निकल गए तो महामारी का स्वरूप परिवर्तन बता दिया जाता रहा है |
इसमें विशेष ध्यान देने की बात ये है कि ऐसे तीर तुक्कों में जो गलत निकल जाते हैं | वे तो गलत होते ही हैं | उनमें से जो सही भी निकलते हैं | वे भी बहुत विश्वास करने योग्य इसलिए नहीं होते हैं, क्योंकि उनका आधार मजबूत नहीं होता |प्लाज्मा थैरेपी की तरह आज जो सही होते दिख भी रहा होता है |कल वही गलत निकल जाएगा | यदि ये संशय बना ही रहा तो इसके आधार पर जो भी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाएँगे | उन पर विश्वास नहीं हो पाएगा और उनके आधार पर कोई योजना बनाना संभव नहीं होगा | इसीलिए कोरोना महामारी के समय विभिन्न वैज्ञानिकों को द्वारा लगाए जाते रहे सैकड़ों अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकल जाते रहे | जिससे ये सिद्ध होता रहा है कि कोरोनामहामारी के बिषय में आजतक जो भी जाना या समझा जा सका है | उसके आधार पर लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि यदि सही नहीं है तो सही वो भी नहीं है | जिसके आधार पर वे अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते रहे हैं |
अब बात जलवायुपरिवर्तन या महामारी के स्वरूपपरिवर्तन की जिनके बहाने से गलत भविष्यवाणियों को भी सच सिद्ध कर दिया जाता है | मतलब साफ होता है कि उनके द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि तो सच थे किंतु जलवायुपरिवर्तन या महामारी का स्वरूप परिवर्तन होने के कारण वे गलत निकल गए |
समय के अनुसार होते हैं परिवर्तन
जलवायुपरिवर्तन या महामारी के स्वरूपपरिवर्तन जैसी कल्पित घटनाएँ यदि अनुसंधानों को इस सीमा तक प्रभावित करती हैं कि उनके कारण वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए मौसम एवं महामारी संबंधी पूर्वानुमान गलत हो सकते हैं तो मौसम एवं महामारी संबधी गलत या संशयास्पद भविष्यवाणी ही नहीं करनी चाहिए | ऐसा करने से जलवायुपरिवर्तन एवं महामारी के स्वरूपपरिवर्तन जैसी घटनाओं के रहस्य को सुलझाया जाना चाहिए |
किसी रसोइए को भोजन बनाने की जिम्मेदारी दी गई हो |जिस किसी कारण से दाल पकी ही न हो तो वो क्या कच्ची दाल परोस देगा ! ऐसे ही वैज्ञानिकों के द्वारा किसी भी घटना के बिषय में परोसे गए कच्चे पूर्वानुमानों को सही नहीं मना जा सकता है |
दूसरी बात किसी विवाहोत्सव में भोजन बनाने की जिम्मेदारी जिस रसोइए को सौंपी जाती है | उसे आवश्यक सारे संसाधन उपलब्ध करवा दिए जाते हैं | इसके बाद स्वादिष्ट भोजन निर्माण की सारी जिम्मेदारी उस रसोइए की हो जाती है | रसोइया यदि स्वादिष्ट भोजन बनाने में सफल हो जाता है तो उसे कुशल रसोइया मान लिया जाता है | यदि वो ऐसा नहीं कर पाता है और भोजन बिगड़ जाता है | उस बिगड़ने के लिए वो जलवायुपरिवर्तन जैसे कितने भी कारण गिनावे | इससे उसे निर्दोष तो नहीं मान लिया जाएगा | उससे यही कहा जाता है कि आप में स्वादिष्ट भोजन बनाने की योग्यता नहीं थी तो आपको ये जिम्मेदारी सँभालनी ही नहीं चाहिए थी |
इसी प्रकार से मौसम एवं महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाने की जिम्मेदारी सँभालने से पहले उन्हें यह बिचार करना चाहिए था कि हमें जलवायुपरिवर्तन तथा महामारी के स्वरूपपरिवर्तन जैसी घटनाओं की समझ नहीं है | इसलिए हमारे लगाए हुए अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकल सकते हैं | ऐसी स्थिति में उन्हें यह जिम्मेदारी सँभालनी ही नहीं चाहिए थी | इस अयोग्यता के कारण उन्हें ऐसी घटनाओं के बिषय में भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए थी | महामारी संबंधी अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकल जाते हैं तो अनुसंधानकर्ताओं को सबसे पहले इन परिवर्तनों का कारण खोजना चाहिए | उनके आधार पर सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना चाहिए | उनके सही निकलने के बाद ही सार्वजानिक रूप से अनुमानों पूर्वानुमानों को घोषित किया जाना चाहिए |
परिवर्तनों के प्राकृतिक सिद्धांत समझने होंगे !
संपूर्णब्रह्मांड में प्रतिपल परिवर्तन होते रहते हैं | संपूर्ण प्रकृति में एवं प्रकृति के प्रत्येक अंश में प्रतिपल परिवर्तन होते हैं |जीवों के शरीरों स्वभावों एवं बिचारों में परिवर्तन होते रहते हैं | परिवर्तन तो प्रकृति का स्वभाव है | इसलिए परिवर्तनशील तो संपूर्ण संसार है| ऐसी स्थिति में जलवायुपरिवर्तन तथा महामारी के स्वरूपपरिवर्तन जैसी घटनाओं को भी उसी परिवर्तनशील प्रक्रिया का अंश समझकर स्वीकार करना चाहिए |आवश्यकता ऐसे परिवर्तनों के सिद्धांत एवं प्रक्रिया को समझने की है | ये विशेषज्ञता ही वैज्ञानिकता है |
प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों में सबसे बड़ी समस्या यह होती है | हम ऐसा मानकर चलने लगते हैं कि पिछले कुछ शदियों दशकों से जो घटनाएँ जब जैसी घटित होती रही हैं | उन्हें देखकर वैसी ही आगे भी घटित होती रहेंगी | ऐसी कल्पनाएँ करके इसी के अनुसार भविष्यवाणी कर दी जाती है | ऐसी आधार विहीन भविष्यवाणियाँ जब गलत निकलजाती हैं तो उसे जलवायुपरिवर्तन का प्रभाव मान लिया जाता है |इस प्रक्रिया में न तो कहीं विज्ञान है और न ही वैज्ञानिकता और न ही अनुसंधान |
पिछले वर्ष जिस महीने के जिस सप्ताह में जिस क्षेत्र में जितनी बारिश हुई थी | इस वर्ष भी वहाँ उस समय उतनी ही बारिश होगी | ऐसा अनुमान लगा लिया जाता है |यदि ऐसा हुआ तब तो ठीक और नहीं हुआ तो हमारी बात गलत निकल गई ,लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने के बजाए हम इसका कारण जलवायु परिवर्तन को बता कर अपनी इज्जत बचा लेते हैं | जलवायुपरिवर्तन कहते ही ये मान लिया जाता है कि इसका अनुसंधान किया जाना संभव नहीं है | ये तो एक उदाहरण मात्र है | सभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में इसी प्रकार से विज्ञान के बिना तीर तुक्के लगाए जाते हैं | जिनके गलत निकलते ही जलवायुपरिवर्तन जैसी काल्पनिक घटनाओं को जिम्मेदार बता दिया जाता है |
कोई भी प्राकृतिक घटना अचानक नहीं घटित होती है | प्रत्येक घटना के घटित होने का निश्चित समय और नियम होता है | उस नियमितता को समझे बिना उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाया जा सकता है | ऋतुएँ प्रतिवर्ष कुछ महीनों के लिए आती जाती हैं | उनका अपना नियम और प्रभाव होता है | ऐसे ही सूर्योदय सूर्यास्त जैसी घटनाएँ प्रतिदिन घटित होती हैं | उनका अपना नियम होता है | ये तो निश्चित घटनाएँ हैं जिन्हें कहा जा सकता है कि किसी वर्ष या दिन में ऐसी घटनाएँ घटित होंगी ही |
ऐसे ही सूर्य चंद्र ग्रहण हैं | ये प्रतिदिन प्रति महीने भले न घटित होती हों फिर भी ये अपने नियम से ही घटित होती हैं | इनकेभी नियम होते हैं | जिनके आधार पर गणित के द्वारा महीनों वर्षों पहले इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिए जाते हैं |
उस प्राचीन युग में सूर्य चंद्र ग्रहणों को यदि गणित विज्ञान के आधार पर न समझा गया होता तो वर्तमान मौसम भविष्यवाणियों की तरह ही सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में भी तीर तुक्के ही लगाने पड़ते | वर्ष की बारहों अमावस्याओं में सूर्य ग्रहण एवं बारहों पूर्णिमाओं में चंद्रग्रहण होने की भविष्यवाणी करनी पड़ती | जो ग्रहण जिस अमावस्या या पूर्णिमा में घटित हो जाता उसे सही मान लिया जाता और जिस अमावस्या पूर्णिमा को ग्रहण न घटित होता उसे जलवायु परिवर्तन मान लिया जाता |
जिसप्रकार से प्राचीनगणितीय पद्धति के आधार पर सूर्यचंद्र ग्रहणों की सच्चाई को खोज लिया गया और इसे जलवायु परिवर्तन के काल्पनिक भ्रम से बचा लिया गया | इसी प्रकार से ग्रहणों की तरह ही जिस दिन गणितविज्ञान के आधार पर भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ महामारी आदि घटनाओं के रहस्यों को समझना संभव हो पाएगा | उसी समय जलवायुपरिवर्तन तथा महामारी के स्वरूपपरिवर्तन जैसे भ्रम हमेंशा हमेंशा के लिए समाप्त हो जाएँगे |
कुलमिलाकर सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ अपने समय पर अपने नियम से घटित होती हैं | इसलिए इनके बिषय में ये नहीं कहा जा सकता है कि ये हर अमावस्या या पूर्णिमा में घटित होंगी ही | ये किसी किसी अमावस्या पूर्णिमा में घटित होती हैं | उसके भी नियम होते हैं | इसलिए इनके नियम के अनुसार ही इन्हें समझना होगा कि ये किस अमावस्या या पूर्णिमा को घटित होंगी | उस नियम को समझे बिना ये नहीं कहा जा सकता है कि हर अमावस्या को सूर्य ग्रहण लगेगा एवं हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण लगेगा |
कुलमिलाकर प्रत्येक प्राकृतिक घटना अपने अपने नियम के अनुसार अपने अपने समय से ही घटती है | किस घटना के घटित होने का समय कौन सा है | उस समय को खोजने के लिए अनुसंधान किए जाते हैं | ग्रहण जैसी जिन घटनाओं का समय और सिद्धांत खोज लिया गया उसका सही पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |जिनका सिद्धांत पता लगाए बिना भविष्यवाणी के नाम पर कुछ तीर तुक्के लगाए गए और वे सही नहीं निकले तो उनके लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है |
इसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ महामारी आदि घटनाओं के घटित होने का न तो नियम खोजा जा सका और न ही सिद्धांत | इन्हें समझने के लिए कोई विज्ञान भी नहीं है | इसके बिना लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकल जाते हैं | इसीलिए ऐसी घटनाओं को घटित होने के लिए जलवायुपरिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाता है |
जलवायु परिवर्तन और अनुसंधान !
जिन प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का सिद्धांत न पता हो | उन्हीं प्राकृतिक घटनाओं से भविष्यवाणियों के प्रकरण में जलवायु परिवर्तन की आवश्यकता पड़ती है | प्रत्येक प्राकृतिक घटना के घटित होने का कोई न कोई सिद्धांत अर्थात निश्चित नियम होता है | इसलिए अनुसंधानपूर्वक किसी घटना के घटित होने का नियम पता लगाना होता है |
प्रातःकाल में तापमान कम एवं दोपहर में बहुत अधिक होता है | दोपहर के बाद फिर कम होने लगता है | सूर्यास्त के बाद तापमान धीरे धीरे कम होते होते रात्रि में बहुत कम हो जाता है | ये सूर्य संचार का सिद्धांत है | सूर्य का तापमान कब कैसा रहेगा | यह पता लगाने के लिए सूर्य संचार के इस सिद्धांत को समझना पडेगा | इस सिद्धांत को समझे बिना केवल तर्क के आधार पर ऐसे पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सकते हैं
सूर्य संचार का सिद्धांत समझे बिना इसी घटना को केवल तर्क के आधार पर देखा जाए तो प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधान ऐसे किए जाते हैं | प्रातःकाल 6 बजे तापमान इतना था ,दोपहर12 बजे बढ़कर तापमान इतना अधिक हो गया | बीते 6 घंटों में तापमान जितना बढ़ा आगामी 6 घंटों में भी तापमान उसी अनुपात में बढ़ेगा तो सायं 6 बजे तापमान इससे दो गुना अधिक बढ़ जाएगा | उसी अनुपात में रात्रि में भी बढ़ता चला जाएगा | ऐसी गलत कल्पना कर ली जाती है | इसके सही निकलने तक इस बात को यदि यहीं रोक कर रख लिया जाए तो जलवायुपरिवर्तन जैसे निरर्थक शब्द का सहारा नहीं लेना पड़ेगा ! प्राचीन वैज्ञानिक ऐसा ही किया करते थे | वे व्यक्तिगत तौर पर अनुसंधान करते थे | इसलिए उन्हें किसी को जवाब नहीं देना पड़ता था | प्राकृतिक अनुसंधानों और उसके तामझाम पर जबसे जनता का इतना भारी भरकम धन खर्च किया जाने लगा |सरकारें सम्मिलित हो गईं तबसे ये जनता एवं सरकारों को बताया जाना आवश्यक हो गया कि अनुसंधानों के नाम पर क्या कुछ हो रहा है |
प्राचीन अनुसंधान कर्ताओं के अनुभव में कोई बात जब बार बार सही निकलती थी तब भविष्यवाणी की जाती थी | वर्तमान समय में भविष्यवाणी के नाम पर कुछ न कुछ प्रसारित करना होता है | उस भविष्यवाणी के गलत निकलने पर समाज को जवाब देने के लिए जलवायुपरिवर्तन को कारण बताकर ये समझाना होता है कि हम खाली नहीं बैठे हैं अनुसंधान कर रहे हैं | इसके अलावा जलवायुपरिवर्तन की कोई उपयोगिता नहीं है |
वैश्विक मौसम विज्ञान विभाग कुछ सौ वर्षों से ऐसे ही समय बिताते जा रहे हैं | आज तक वो प्राकृतिकसिद्धांत नहीं खोजा जा सका है | मौसम संबंधी परिवर्तनशील प्रकृति को समझा जा सके | उसके बिना ही सैकड़ोंवर्ष बिता दिए गए | अनुसंधानों की दृष्टि से जहाँ तब थे वहीं अब भी हैं | इतने वर्षों से अनुसंधान करते रहने के बाद के बाद भी प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के आनेपर हमारे अनुसंधान बेकार सिद्ध हो जाते हैं | यंत्रों की मदद से अब बादलों आँधी तूफानों को दूर से देख लिया जाने लगा है किंतु उससे प्राकृतिकसिद्धांत समझना संभव नहीं है |
कुल मिलाकर सिद्धांत की जानकारी के अभाव में वर्तमानसमय भी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में लगाए गए ऐसे तीर तुक्के गलत निकल जाते हैं | उसके लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार बतला दिया जाता है |
प्रकृति बिषयक अनुसंधानों की ये सबसे बड़ी बिडंबना है |जो समझ लिया जाए वो खोज और जो समझ में न आवे वो जलवायु परिवर्तन |
महामारी का स्वरूप परिवर्तन
जिस प्रकार से कच्ची अंबी हरी होती है | उसका स्वाद खट्टा एवं उसकी गुठली नरम होती है | वही अंबी जब पकती है तो उसका स्वाद मीठा रंग पीला एवं गुठली कठोर हो जाती है | ये आम में होने वाले परिवर्तनों की स्वाभाविक प्रक्रिया है | आम में इस इस प्रकार के परिवर्तन आएँगे | इसी सिद्धांत के दायरे में रहकर आम में होने वाले परिवर्तनों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
आम में होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया पता है | इसीलिए उन परिवर्तनों को देखकर किसी को आश्चर्य नहीं होता है | कोरोना महामारी में होने वाले परिवर्तनों का सिद्धांत खोजा ही नहीं जा सका | उस प्रक्रिया को न समझ पाने के कारण उसमें होने वाले छोटे छोटे परिवर्तनों को देख देखकर आश्चर्य होने लगता था | जिसे महामारी के स्वरूप परिवर्तन का नाम दिया गया |
वस्तुतः महामारी का वास्तविक स्वरूप था क्या ,जब यही पता नहीं लगाया जा सका, तो ये किस आधार पर कहा जा सकता है कि महामारी का स्वरूप परिवर्तन हो रहा है | सच्चाई ये है कि ऐसे परिवर्तनों को समझने के लिए उनके सिद्धांतों को खोजा जाना चाहिए | प्राकृतिक घटनाओं के सिद्धांतों को खोजे बिना ही कुछ कहानियाँ गढ़ ली गईं | उसके अनुसार भविष्य के लिए कुछ गलत अंदाजे लगा लिए गए | ये गलती अपनी होती है | इसमें महामारी के स्वरूप परिवर्तन का क्या दोष !
कुलमिलाकर किसी प्राकृतिक घटना या महामारी के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण जलवायुपरिवर्तन या महामारी का स्वरूपपरिवर्तन नहीं है प्रत्युत उस प्राकृतिक घटना को समझने में गलती हुई है | उसी गलत समझ के आधार पर लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि गलत निकल जाते हैं |
ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों के गलत निकलने के लिए जलवायुपरिवर्तन या महामारी के स्वरूपपरिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाना गलत है | ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं जो अपने क्रम से अपने समय से प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार ही घटित होती हैं | ये अचानक घटित होती हैं | ऐसा कहा जाना विज्ञान सम्मत नहीं है |
सभी ऋतुएँ अपने अपने अपने निर्द्धारित समय पर आती जाती हैं | सूर्य चंद्र अपने अपने समय से उगते एवं अस्त होते हैं | सूर्यचंद्र ग्रहण अपने अपने समय पर घटित होते हैं | संपूर्ण प्रकृति यदि इतनी दृढ़ता से समय के सिद्धांत के साथ बँधी हुई है, तो ये कल्पना कैसे की जा सकती है कि भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ जैसी घटनाएँ अचानक घटित हो जाती होंगी |
इसलिए सभी प्राकृतिक घटनाओं की तरह ही महामारी जैसी घटनाएँ भी अपने अपने समय से ही घटित होती हैं | उस समय को खोजना ही अनुसंधानों का उद्देश्य हो सकता है | प्राचीनविज्ञान की दृष्टि में जलवायुपरिवर्तन या महामारी के स्वरूप परिवर्तन जैसी कोई घटना ही नहीं होती है | ऐसी घटनाएँ भी प्रकृति के पूर्व निर्धारित नियम के अनुसार ही घटित हो रही होती हैं | उन्हें आकस्मिक घटित हुआ नहीं माना जाना चाहिए |
जिस कार्य को करने के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं | वो कार्य हो ही जाएगा | जिस प्रयत्न पर इतना भरोसा हो और प्रयत्न करने पर वो कार्य हो भी जाता हो | जैसा करना चाह रहे हैं वैसा ही हो जाता है | जितना करना चाह रहे हैं उतना ही होता है | ऐसे कार्य को करने का श्रेय लेने का अधिकारी प्रयत्नकर्त्ता होता है |
जिस कार्य को अच्छीप्रकार से किए जाने के बाद भी उसके होने या न होने पर संशय बना रहे या उसके बिगड़ जाने की भी आशंका हो |ऐसा कार्य यदि हो भी जाए तो प्रयत्नकर्त्ता उस कार्य के किए जाने का श्रेय नहीं ले सकता है | इसका कारण उस कार्य के होने के प्रति प्रयत्न कर्त्ता के मन में संशय होना है | उस संशय से यह सिद्ध होता है कि इस कार्य पर किसी अन्य शक्ति का भी प्रभाव पड़ रहा है जो हमारे नियंत्रण में नहीं है | ऐसा उस कर्ता ने स्वीकार कर लिया है | इसके साथ ही साथ यह भी स्वीकार कर लिया है कि वह प्रभाव हमारे प्रयत्न की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली है |
कार्य करने की क्षमता इस एक उदाहरण से समझते हैं - किसी की शिकायत सुन कर कोई मुख्यमंत्री उसको आश्वासन देता है कि आपका कार्यहम करवा देंगे | इसके बाद वो उस कार्य को करने के लिए अपने किसी अधिकारी से कहता है | वो अधिकारी काम करता है तो ठीक और नहीं करता है तो दबाव देकर वह काम उससे करवा लेता है | वह अधिकारी यदि उस काम को बिगाड़ देता है तो मुख्यमंत्री उस अधिकारी को दंडित करके उसके स्थान पर किसी दूसरे अधिकारी को लाकर उससे वह कार्य करवा लेता है | मुख्यमंत्री ने जो कार्य करवाने के लिए प्रयत्न किया वो हर हाल में करवाकर उन्होंने अपनी कार्य करने की क्षमता को प्रमाणित कर दिया | ये उस मुख्यमंत्री के कर्त्तापन की पुष्टि करता है |
इसी के साथ एक बार काम हो जाने का मतलब यह भी हो सकता है कि वो कार्य अपने आपसे ही हो गया हो | जिसका श्रेय प्रयत्नकर्ता तभी ले सकता है जब मुख्यमंत्री बार बार उस प्रकार का काम करने में सफल होते हैं | इससे यह प्रमाणित हो जाता है कि मुख्यमंत्री उस प्रकार का कार्य करने की क्षमता रखते हैं |
संसार के जितने भी कार्य करने के लिए हम प्रयत्न करते हैं वे होंगे तो हम कर लेंगे, नहीं होंगे तो भी हम कर लेंगे, जैसे होंगे वैसे कर लेंगे और यदि बिगड़ जाएँगे तो भी हम बना लेंगे | यदि ऐसा करने में हम सफल भी हो जाते हैं तो हम ऐसे कार्य के कर्त्ता हो सकते हैं |
परोक्ष प्रभाव और प्रयत्नों के परिणाम
परोक्ष प्रभाव इतना अधिक शक्तिशाली होता है कि कार्य करने के लिए मेरे द्वारा प्रयत्न किए जाने के बाद भी वो उस कार्य को नहीं होने दे सकता है | वो उस कार्य को बिगाड़ भी सकता है | वो उस कार्य को बना भी सकता है | जिस कार्य में किसी परोक्ष शक्ति का इतना बड़ा हस्तक्षेप हो | ऐसा कार्य हमारे प्रयत्न करने के बाद यदि हो भी गया हो तो भी उसे अपना किया हुआ नहीं माना जाना चाहिए ,क्योंकि वह कार्य परोक्ष प्रभाव से संपन्न हुआ होता है |
कोई कार्य या कोई अनुसंधान ,कोई चिकित्सा या कोई आपरेशन या किसी अन्य कार्य के लिए किया गया प्रयत्न सफल होगा या नहीं या उससे भी अधिक बिगड़ जाएगा | इसका उत्तर उसी शक्तिशाली प्रभाव पर निर्भर करता है | जो ये तय करता है कि जिस रोगी का आपरेशन किया गया है | उसे होश में आने देना है या नहीं | ऐसे ही सर्प काटने या किसी दुर्घटना का शिकार होने के बाद भी उसकी मृत्यु होनी है या नहीं | ये उसी शक्तिशाली प्रभाव पर आश्रित होता है | किसी गहरी खाई में गिर कर भूकंप आदि से गिरे भवनों में दब कर सुनामी में बहकर भी कुछ लोग जीवित बचते देखे जाते हैं | कई मृत लोग जीवित लौट कर घर आते देखे जाते हैं |
ऐसे असंभव से संभव हुए कार्यों को विज्ञान आश्चर्य या ईश्वरीय चमत्कार मान लेता है | इसका मतलब होता है कि यह किया जाना मनुष्यकृत प्रयासों से संभव नहीं था | जो हुआ है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि मनुष्यकृत प्रयासों से जो किया जाना संभव ही नहीं था | ऐसे असंभव कार्य को भी जो शक्ति संभव कर सकती है तो जो कार्य मनुष्यों के द्वारा किए जाने संभव माने जाते हैं | उन्हें भी यदि वही शक्ति करती हो तो इसमें आश्चर्य क्या है | वो शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है | जो करते हुए दिखाई पड़ती है उसे ही कर्त्ता मानलिया जाता है |
भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात वर्षा बाढ़ जैसी घटनाओं का निर्मित होना मनुष्यकृत प्रयत्नों से संभव नहीं हैं | ऐसी सभी घटनाएँ परोक्ष शक्ति के प्रभाव से घटित होती हैं | इसमें मनुष्यों की कोई भूमिका नहीं होती है | जिस परोक्ष प्रभाव से इतनी बड़ी बड़ी घटनाएँ घटित हो सकती हैं | वही प्रभाव उन घटनाओं के लिए भी जिम्मेदार हो तो इसमें आश्चर्य क्या है | जिनके लिए प्रयत्न करने के कारण मनुष्य अपने को कर्त्ता मान लेता है |
इसी प्रकार से जिस चिकित्सकीय उपाय पर इतना अधिक भरोसा हो कि उसे करने से स्वस्थ होना निश्चित है ,ऐसा उपाय करने के बाद यदि स्वस्थ हो जाए तब तो उसके प्रभाव से स्वस्थ हुआ मान लिया जाता ,किंतु जिस उपाय को करने के बाद स्वस्थ या अस्वस्थ कुछ भी हुआ जा सकता है | यदि इस प्रकार का संशय बना रहे तो उसको करने के बाद यदि स्वस्थ हो भी जाए तो भी उस स्वस्थ होने का श्रेय केवल उस उपाय को दिया जाना तर्क संगत नहीं होगा |
समय प्रभाव प्रयत्न और परिणाम
कई बार जो कार्य समय के प्रभाव से संपन्न हो रहे होते हैं | जिनका श्रेय हम अपने द्वारा किए जा रहे प्रयत्नों को दे रहे होते हैं | इसी समय के प्रभाव को न समझपाने एवं ऐसे रोगों पर अंकुश लगाने की सामर्थ्य न होने के कारण ही बड़े बड़े चिकित्सालयों में शवगृह बनाए जाते हैं | जिसका मतलब ये होता है कि समय साथ देगा तो हम स्वस्थ कर देंगे अन्यथा समय जैसा चाहेगा वैसा होगा | समय यदि मारना ही चाहेगा तो हम क्या कर लेंगे | शवगृह उनके लिए बना दिए जाते हैं अन्यथा शरीर को स्वस्थ करने के लिए बनाए गए चिकित्सालयों में शवगृहों का क्या काम ?
किसी कार्य को करने का प्रयत्न करने के बाद उस कार्य का होना या न होना या कार्य जैसा था ,उससे भी अधिक बिगड़ जाना जैसी तीन घटनाऍं घटित होती हैं | कार्य करने में सफल होने पर उस सफलता का श्रेय कार्य के लिए प्रयत्न करने वाला ले लेता है | कार्य सफल न हो या कार्य जैसा था उससे भी अधिक बिगड़ जाए तो इस कार्य को विफल करने या बिगाड़ने में जो ऊर्जा लगी होगी | प्राचीनकाल में उस प्रभाव या ऊर्जा को समय मान कर गणना की जाती रही है |
कुल मिलाकर प्राचीनविज्ञान कार्य बनने और बिगड़ने के लिए या प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने के लिए समय को जिम्मेदार मानता रहा है | उनका मानना था कि कार्य करना हमारा धर्म है | कार्य बनना या न बनना या बिगड़ जाना ये समय का प्रभाव है | उनका यह भी मानना था कि कार्य के लिए प्रयत्न करने में और कार्य के बनने न बनने या बिगड़ जाने में उस कार्य के लिए किए जाने वाले प्रयत्न का सामान्य संबंध होता है | इसीलिए गीता में "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन !" कहा गया है |
किसी रोगी की चिकित्सा उसे स्वस्थ करने के लिए की जाती है | यदि वो स्वस्थ हो जाता है तो इसे उस प्रयत्न का परिणाम मान लिया जाता है | विशेष बात ये है कि कार्य का होना यदि एक कार्य है तो स्वस्थ न होना भी एक कार्य ही है | स्वस्थ न होकर मृत्यु होना भी एक कार्य है |
कई बार प्रयत्न करने के बाद भी वो स्वस्थ नहीं होता है या उसकी मृत्यु हो जाती है | यदि वो स्वस्थ हो जाता है इसके बाद वो स्वस्थ होता भी है और नहीं भी होता है | क्षेत्र में जिसकी चिकित्सा की जाती है | वो स्वस्थ होगा या नहीं होगा | इसमें कुछ भी निश्चित नहीं होता है | केवल चिकित्सा ही नहीं प्रत्युत संसार के जितने भी लोग जितने भी प्रकार के कार्य करके सफल होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं | उनके अलावा भी एक ऐसी अदृश्य शक्ति है | जो उस कार्य के होने या न होने के लिए अपना योगदान दे रही होती है | उसका अनुभव केवल तब होता है | जब बार बार प्रयत्न करने पर भी कार्य नहीं होता है एवं कई बार अत्यंत सामान्य प्रयत्न पर भी कार्य हो जाता है | प्रयत्न करने पर भी कार्य अक्सर नहीं होता है |
चिकित्सा और समय की संयुक्त भूमिका !
प्राचीन विज्ञान की दृष्टि से ऐसे रोगों को समयप्रभाव से पैदा हुआ माना जाता है और ये रोग समाप्त होने का समय आने पर समय के प्रभाव से समय के साथ ही समाप्त होते हैं | ऐसे रोगों को शांत करने के लिए कोई उपाय किया जाए या न किया जाए, समय आने पर ये स्वतः ही शांत हो जाते हैं
वर्तमान वैज्ञानिकचिंतन में प्रत्यक्ष को ही प्रमाण माना जाता है |समय प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ता है | इसलिए समय प्रभाव से स्वस्थ हो रहे लोग अपने स्वस्थ होने का कारण उस समय अपने द्वारा किए जा रहे उपायों को मान लेते हैं | स्वस्थ होते समय इसके लिए जो धर्म कर्म तंत्र मंत्र जादू टोना आदि कर रहा होता है |वो अपने स्वस्थ होने का श्रेय उन्हें ही देता है |स्वस्थ होते समय जो लोग चिकित्सा का लाभ ले रहे होते हैं | वे अपने स्वस्थ होने का श्रेय चिकित्सकीय प्रयासों और चिकित्सा आदि को देते हैं |
समय संबंधी जिन रोगों को समाप्त नहीं होना होता है | वे कभी समाप्त नहीं होते हैं |उन पर औषधीय चिकित्सा का भी प्रभाव बहुत अधिक नहीं पड़ पाता है | कभी कभी तो बिल्कुल नहीं पड़ता है | इसीलिए कई बार सघन चिकित्सा कक्ष में सुयोग्य चिकित्सकों की देख रेख में चिकित्सा चलते रहने के बाद भी रोग बढ़ता जाता है | रोगी की स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती जाती है |
समयजनित रोग से पीड़ित रोगी को स्वस्थ करने के लिए अच्छी से अच्छी चिकित्सा समेत जितने भी उपाय किए जाते हैं | वे तब तक निरर्थक होते हैं जब तक समय का सहयोग नहीं मिलता है | बड़े बड़े चिकित्सालयों में लाखों रोगी अच्छी से अच्छी चिकित्सा का लाभ लेकर भी महीनों वर्षों तक अस्वस्थ पड़े रहते हैं | कुछ लोगों की औषधियाँ चिकित्सा की पद्धति आदि बार बार बदली जाती है | कुछ लोग चिकित्सक बदलकर एक से एक योग्य चिकित्सकों की सेवाएँ ले रहे होते हैं | कुछ लोग चिकित्सालय बदल बदलकर तो कुछ लोग भिन्न भिन्न देशों में जाकर वहाँ की चिकित्सा का लाभ ले रहे होते हैं | इन सबके बाद भी कई बार रोगी स्वस्थ नहीं होता है | इसका कारण उसे समय का सहयोग न मिलना होता है |
कुछ विशिष्ट वैज्ञानिक सोच वाले लोग आधुनिक चिकित्सा को तो विज्ञान मान लेते हैं किंतु जड़ी बूटियों के सेवन को या तंत्र मंत्र झाड़ फूँक आदि को विज्ञान नहीं मानते हैं उसका प्रभाव मानते हैं किंतु चिकित्सा हो या तंत्र मंत्र झाड़ फूँक आदि दोनों प्रकार के परिणाम दोनों स्थानों पर मिलते हैं | कुछ लोग वैज्ञानिक चिकित्सा का लाभ लेने के बाद भी स्वस्थ नहीं होते हैं | कई बार तो उनकी भी मृत्यु हो जाती है तो दूसरी ओर अनेकों लोग तंत्र मंत्र झाड़ फूँक आदि का लाभ लेते समय ही स्वस्थ हो जाते हैं | यदि उन्होंने चिकित्सा का लाभ लिया ही नहीं तो स्वस्थ होने का श्रेय तंत्र मंत्र झाड़ फूँक आदि को ही मिलेगा | ये सच है |इसीलिए ऐसे लोगों के यहाँ भी भारी भीड़ें लगी रहती हैं | धर्म कर्म को अपना रहे लोग विभिन्न देवी देवताओं की मनौतियाँ मान लेते हैं |वे जब स्वस्थ होते हैं तो अपने स्वस्थ होने का श्रेय उन मनौतियों पूजापाठ दानधर्म आदि को देते हैं |
यहाँ विशेष ध्यान देने यह है कि शरीर को स्वस्थ रखने में चिकित्सा और समय दोनों की भूमिका होती है | चिकित्सा शरीर को स्वस्थ करती है और समय स्वास्थ्य को सुनिश्चित करता है | चिकित्सा के द्वारा किसी को स्वस्थ रखने के लिए प्रयत्न किया जा सकता है स्वस्थ नहीं किया जा सकता है | मृत्यु को नहीं टाला जा सकता है | इसीप्रकार से समय के द्वारा व्यक्ति को स्वस्थ भी किया जा सकता है और मृत्यु को भी टाला जा सकता है ,किंतु स्वस्थ करने के लिए प्रयत्न तो करना पड़ेगा | किसी की हड्डी टूटी हो तो उस हड्डी को हड्डी के सामने रखकर जोड़ना तो पड़ेगा | समय उस जोड़ को सफल कर देगा | इसलिए किसी के स्वस्थ होने में चिकित्सा और समय दोनों की भूमिका होती है | ऐसे जो लोग चिकित्सा का लाभ ले रहे होते हैं वे अपने स्वस्थ होने का श्रेय चिकित्सा को देते हैं | कई बार समय का सहयोग यदि न मिले तो ऐसा सब कुछ करने के बाद भी लोग स्वस्थ नहीं होते हैं |
कुल मिलाकर चिकित्सा समेत सभीप्रकार के उपाय करने के बाद भी रोगी स्वस्थ हों या अस्वस्थ बने रहें | ऐसा कुछ भी हो सकता है |
किसी के स्वस्थ होने का संपूर्ण श्रेय यदि प्रयत्नों को ही दिया जाए तो बहुत से रोगी ऐसे होते हैं | जिन्हें स्वस्थ करके सुरक्षित बचाने के लिए प्रयत्न किए जा रहे होते हैं लेकिन उनका रोग बढ़ता जाता है या उनकी मृत्यु हो जाती है | ऐसी स्थिति में रोग बढ़ने या मृत्यु होने के लिए तो प्रयत्न ही नहीं किया फिर ऐसा हुआ कैसे ! ऐसा होने के लिए कोई प्रभाव तो जिम्मेदार होगा | वो प्रभाव चिकित्सकीय प्रयत्नों के प्रभाव को निष्फल करते हुए यदि रोगी का रोग बढ़ा सकता है या मृत्यु प्रदान कर सकता है तो संभव है जो लोग स्वस्थ होते हैं वे स्वस्थ भी उसी प्रभाव से हो रहे हों |स्वस्थ होने के लिए चूँकि चिकित्सकीय प्रयत्न किए जाते दिखाई पड़ रहे होते हैं | इसलिए श्रेय उन प्रयत्नों को ही दे दिया जाता है |
इस सच्चाई को और अधिक समझने के लिए उनके बिषय में अनुसंधान किए जाने की आवश्यकता है | जो सुदूर जंगलों आदि में रहकर संपूर्णरूप से प्राकृतिक जीवन जीते हैं | वे चिकित्सा सुविधाओं से पूरी तरह दूर हैं | रोगी वे भी होते हैं | चोट उन्हें भी लगती है | घाव उनके भी होते हैं | चिकित्सकीय संसाधनों के बिना भी स्वस्थ वह भी होते हैं |
चिकित्सकीय प्रयत्नों का प्रभाव हो सकता है उन पर भी उतना न पड़ता हो जो चिकित्सा के बाद स्वस्थ हो रहे होते हैं | उस प्रभाव को खोजे बिना किसी रोगी पर पर पड़ने वाले चिकित्सा के प्रभाव का आकलन किया जाना संभव नहीं है |
समय संचार के बिगड़ने से पैदा होती है महामारी !
खाने पीने की चीजों में विद्यमान पोषकतत्व स्वयमेव घटने लगें और रोग पैदा करने वाले बिकार बढ़ने लग जाएँ | बनस्पतियों समेत समस्त औषधीय द्रव्यों एवं निर्मित औषधियों में ऐसे बिकार आने लगें कि वे अपने अपने गुणधर्म से विहीन होने लग जाएँ तो महामारी जैसे महारोगों के पैदा होने का समय आ चुका होता है | महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से इस प्रकार की प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनने लगती हैं | जिससे मनुष्य बड़ी संख्या में रोगी होने लगते हैं | बुरे समय के प्रभाव से एक साथ ऐसी परिस्थितियाँ बनाने लगती हैं |
समय से संपूर्ण संसार प्रभावित होता है | समय अच्छा बुरा दो प्रकार का होता है | अच्छे समय में सब कुछ अच्छा अच्छा होता है बुरे समय में सबकुछ बुरा बुरा होता है | बुरे समय के प्रभाव से प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | उसमें बिकार आने लगते हैं | हवाओं की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है |इससे रोगकारक बिषाणुओं की वृद्धि होने लगती है |
बुरे समय से प्रभावित हवाओं का जितना प्रभाव प्राकृतिक वातावरण पर पड़ता है |उतना ही प्रभाव बृक्षों फसलों अनाजों दालों फूलों फलों शाक सब्जियों पर पड़ता है | जिन्हें खाने से शरीर हृष्ट पुष्ट होते हैं |ये प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में सहायक माने जाते रहे हैं किंतु ऐसी बिकार युक्त हवाओं में पले बढ़े होने के कारण उन्हीं अनाजों दालों फूलों फलों शाक सब्जियों आदि में भी उस प्रकार के दोष आ जाते हैं | जिन्हें खाने पीने से शरीर रोगी होने लगते हैं |
ऐसे ही बृक्षों बनस्पतियों आदि से प्राप्त होने वाले औषधीयद्रव्यों पर भी उतना ही प्रभाव पड़ता है | इसलिए वे भी वे अपने अपने गुणधर्म से विहीन होने लग जाते हैं | उनसे निर्मित औषधियाँ संक्रमितों को रोगमुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं रह जाती हैं |ऐसी औषधियाँ जो निर्मित होने पर काफी समय तक रखी रहती हैं | उन पर भी उसी बुरे समय का प्रभाव पड़ता है |जिससे उनकी भी गुणवत्ता में कमी आ जाती है | इसीकारण महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से औषधियाँ औषधीय गुणों से विहीन हो जाती हैं | ऐसे समय यदि परीक्षण किया जाए तो अधिकाँश औषधियाँ क्वालिटी टेस्ट में फेल निकल सकती हैं |
इसी प्रकार से बासी खाना डबलरोटी बिस्कुट मीठा दालमोठ आदि ऐसे भोज्य पदार्थ जो निर्मित होने के बाद कई कई दिनों तक रखे रहते हैं |इन पर उन बिषैली हवाओं का पूरा प्रभाव पड़ा होता है |जिन्हें खाने से शरीर सहज ही रोगी हो जाते हैं | पशु पक्षी ऐसे खानपान से दूर रहने के कारण ऐसे संक्रमणों से बचे रहते हैं | ऐसे खाद्यपदार्थों का परीक्षण किया जाए तो वे भी क्वालिटी टेस्ट में फेल निकल सकते हैं | महामारी के आगे पीछे के कुछ वर्षों तक ऐसी ही प्राकृतिक स्थिति रहती है |
इस प्रकार से जहाँ एक ओर प्राकृतिक वातावरण रोगी कर रहा होता है तो दूसरी ओर उसी बुरे समय का प्रभाव मनुष्यों पर भी पड़ रहा होता है | समय के प्रभाव के कारण ही लोगों के शरीरों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लग जाती है |जिससे वे रोगी होने लायक बन जाते हैं | उस बुरे समय का प्रभाव सभी खाद्य एवं पेय पदार्थों पर पड़ता है | जिनके खाने पीने से शरीरों के अंदर स्वयं ही रोग पैदा होने लगते हैं |
इस प्रकार से बिषाणु बढ़ने से प्राकृतिक वातावरण सहने लायक नहीं रह जाता है | उसमें साँस लेकर स्वस्थ रहना कठिन हो जाता है | ऐसे रुग्ण वातावरण में साँस लेने से शरीर रोगी होने लगते हैं | ऐसे वातावरण में पैदा हुई खाने पीने की अन्न फल फूल शाक सब्जी आदि चीजों में उन पोषक गुणों की कमी आ जाती है | जिसके लिए वे जानी जाती हैं | इन्हें खाने पीने से मनुष्यों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होगी तो शरीर रोगी होने ही लगेंगे | यही विकारयुक्त प्राकृतिक प्रभाव औषधीय द्रव्यों एवं बनस्पतियों आदि पर पड़ने लगेगा |निर्मित औषधियों पर पड़ेगा | जिससे वे रोगों से मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं रह जाती हैं |
इस प्रकार से जिन मनुष्यों में प्रतिरोधक क्षमता की कमी होती है | वे रोगी होते देखे जाते हैं | इसका कारण यह है कि मनुष्य अपने ऊपर पड़े ऐसे वातावरण संबंधी प्रभावों से स्वयं तो रोगी होते ही हैं | इसके साथ ही वे जो कुछ खाते पीते हैं | वो भी बिकारित होता है| इसलिए मनुष्यों में ऐसे संक्रमण अधिक दिखाई पड़ते हैं | इसके बाद रोग मुक्ति के लिए मनुष्य जो औषधियाँ खाते हैं | उन रोगकारक बुरे प्रभावों से वे औषधियाँ भी प्रभावित होती हैं |इसलिए उनकी गुणवत्ता में बिकार आने के कारण महामारी संबंधी रोगों पर उनका प्रभाव नहीं पड़ता है और रोग बढ़ते चले जाते हैं |
कुल मिलाकर जब प्राकृतिक वातावरण में महामारी संबंधी बिषाणुओं की वृद्धि हो जाए | मनुष्यों के शरीर इतने दुर्बल हो जाएँ कि वे उन बिषाणुओं को पराजित करने में समर्थ न रह जाएँ | औषधियाँ ऐसे रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता से विहीन होने लग जाएँ |निर्मित औषधियों की गुणवत्ता घटती चली जाए | जिससे औषधियों में रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता कमजोर हो जाए |ये तीनों घटनाएँ एक साथ घटित हों तब महामारी पैदा होने की परिस्थिति निर्मित होती है |
इस प्रकार से सभी प्राकृतिक परिस्थितियाँ जब किसी एक ही प्रकार की घटना के घटित होने में सहायक बनती जा रही हों |शरीर भी दुर्बल होते जा रहे हों ,औषधियाँ भी रोगमुक्ति दिलाने में समर्थ न रह जाएँ | इस प्रकार का संयोग तभी बनता है , जब उन्हें बुरे समय का साथ मिल रहा हो |
प्राचीनकाल की अनुसंधान पद्धति के आधार पर कोरोना महामारी के बिषय में यदि बिचार किया जाए तो महामारी पैदा होने तथा उसी समय प्रतिरोधक क्षमता के कम होने एवं उसी समय औषधियों की गुणवत्ता घटने के लिए बुरे समय संचार को जिम्मेदार मान लिया जाता है | इसके लिए अच्छे तथा बुरे समय संचार की प्रक्रिया को आगे से आगे समझने की आवश्यकता होती है |
अच्छा बुरा समय संचार और प्राकृतिक घटनाएँ
महामारी के लिए अनेकों वैज्ञानिकों ने मौसम को जिम्मेदार माना है | मौसमसंबंधी जानकारी जुटाने में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं | एक तो प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते प्रत्यक्ष देखकर उनके बिषय में कुछ सही गलत अंदाजा लगा लिया जाए और दूसरा प्रकृति के स्वभाव को समझा जाए उसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाने का प्रयास किया जाए और तीसरा उस नियमावली को खोजा जाए जिसमें अनुसार प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं |
इसमें बादलों आँधी तूफानों आदि प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते प्रत्यक्ष या उपग्रहों आदि से देखकर उसकी गति और दिशा के अनुसार आगे पहुँचने के बिषय में जो अंदाजा लगा लिया जाता है | ये अंदाजे अक्सर गलत निकल जाते हैं | अंदाजा लगाने की ये सबसे कमजोर प्रक्रिया है |
इसे यदि ट्रेन के परिचालन से इस कमजोरी को समझा जाए तो किसी ट्रेन को किसी मार्ग पर जाते देखकर ये अंदाजा लगा लिया जाए कि ये कहाँ जा रही होगी | दूसरा उस जाती हुई ट्रेन का नाम मार्ग गंतव्य आदि पता करके ये अंदाजा लगाया जाए कि ये किस मार्ग पर किन किन स्टेशनों से होकर जाएगी | तीसरा ट्रेन को देखे बिना ही ट्रेन के आवागमन के बिषय में महीनों पहले पता करनी हो तो ट्रेन की नियमावली अर्थात समयसारिणी खोजनी पड़ेगी जिसके आधार पर ट्रेनों का परिचालन होता है | उसके आधार पर महीनों पहले ये पता लगाया जा सकता है | कौन ट्रेन किस तारीख को कितने बजे किस मार्ग से किस स्टेशन तक जाएगी | बीच में किन किन स्टेशनों पर रुकेगी | समयसारिणी के आधार पर ट्रेन के बिषय में ऐसी पूरी जानकारी महीनों पहले पता लगाई जा सकती है |
इसी प्रक्रिया से मौसम को समझना हो तो एक तो तत्कालीन प्राकृतिक वातावरण को देखकर बादल वर्षा आँधी तूफान के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है और दूसरा उपग्रहों से सुदूर आकाश में बादलों आँधी तूफानों को देखकर उनकी गति और दिशा के आधार पर ये अंदाजा लगा लिया जाना कि ये कब कहाँ पहुँच समते हैं | बीच में हवाओं की गति और दिशा बदलने पर ये अंदाजे गलत निकल जाते हैं |
जिन प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में महीनों वर्षों पहले सही अनुमान पूर्वानुमान पता लगाया जाना हो |उसके लिए ऐसी प्राकृतिक घटनाओं की समयसारिणी खोजनी पड़ेगी | जो केवल गणितविज्ञान के आधार पर ही खोजी जा सकती है |जिस प्रकार से गणित के द्वारा सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया जाता है | उसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान वर्षा बाढ़ चक्रवात बज्रपात महामारी आदि घटनाओं के बिषय में भी गणित संबंधी अनुसंधानों के द्वारा सैकड़ों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं |
इसप्रकार से घटनाओं के समय का अंदाजा गणितागत अनुसंधानों से लगाकर उसप्रकार की घटनाओं के चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में देखे जाने चाहिए | इसमें समस्त प्राकृतिक परिवर्तनों को निरंतर देखते रहना होता है | किस प्रकार की प्राकृतिक घटना का निर्माण किस प्रकार की प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनने पर होता है |ये पता होना चाहिए | प्राकृतिक वातावरण में किस प्रकार के प्राकृतिक लक्षण कितने समय तक दिखाई पड़ते रहने के बाद किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं का निर्माण होता है | इसका ज्ञान होना चाहिए | उसी के अनुशार प्रकृति की पहचान की जानी चाहिए |
ऐसे ही पशु पक्षियों समेत विभिन्न जीव जंतुओं में दिखाई देने वाली किस प्रकार की चेष्टाएँ किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं के निर्मित होने के संकेत दे रही होती हैं | भूकंप आँधी तूफ़ान बादल वर्षा अतिवर्षा की प्रक्रिया प्रारंभ होने से पहले प्रकृति में किस किस प्रकार के परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं | ये पता होना चाहिए |
महामारी पैदा होने के कितने पहले से किस किस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगती हैं | किस किस प्रकार के चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में उभरने लगते हैं | जीव जंतुओं के स्वभाव में किस किस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं |
प्राचीन काल में इसीप्रकार से प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में गणित के द्वारा प्राप्त हुए अनुमानों पूर्वानुमानों का प्राकृतिक संकेतों से मिलान करके जीव जंतुओं की चेष्टाओं का संयुक्त अध्ययन अनुसंधान आदि करके भूकंप आदि प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाता रहा है|
इस प्रकार से महामारी संबंधी अनुसंधानों में प्राचीन प्रकृति विज्ञान संबंधी अनुसंधान काफी सहायक हो सकते हैं | जिस प्रकार से कौन ट्रेन किस तारीख़ को कितने बजे चलेगी | किस दिन किस मार्ग से जाएगी | किस स्टेशन पर कब पहुँचेगी | किस स्टेशन पर रुकेगी किस पर नहीं रुकेगी | ये सब महीनों पहले पता करना है तो ट्रेनों के आवागमन की समय सारिणी खोजने पड़ती है | उसके आधार पर ये सब कुछ बहुत पहले पता लगाया जा सकता है , जबकि उस समय वह ट्रेन दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रही होती है |
इसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं की भी समयसारिणी होती है| जिसे खोजकर उसके आधार पर सूर्य चंद्र ग्रहणों की तरह ही समस्त प्राकृतिक घटनाओं एवं महामामारियों के बिषय में महीनों वर्षों पहले अनुसंधान पूर्वक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों में उसी से मदद मिल सकती है |
प्राचीन विज्ञान और महामारी
प्रकृति विज्ञान और अनुसंधान !
प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने का प्रभाव सबसे पहले पेड़ पौधों पर ही दिखाई देता है | उसका अनुभव सबसे पहले पशु पक्षियों आदि समस्त जीव जंतुओं को होता है | प्राकृतिक जीवन का सेवन करने वाले ऋषियों मुनियों को होता है | प्रकृति से जुड़े ग्रामीणों किसानों मालियों पशुपालकों बनबासियों चरवाहों नाविकों बहेलियों आदि को होता है |कुछ जीव जंतु पृथ्वी के गर्भ में कई कई किलोमीटर की गहराई पर रहने के लिए जाने जाते हैं | पृथ्वी के अंदर का वातावरण जब बिगड़ने लगता है तब वे बेचैन होकर बाहर निकलने लगते हैं | पृथ्वी के बाहर का वातावरण जब बिगड़ता है तब पृथ्वी के बाहर रहने वाले जीव जंतुओं का व्यवहार बदलने लगता है | अत्यंत उन्नत आकाश में जब ऐसे बदलाव होने लगते हैं तो उस उँचाई पर रहने वाले जीव जंतुओं का व्यवहार बदलने लगता है | कई बार तो जहाँ यंत्रों का पहुँचना या उनसे जानकारी जुटाना संभव नहीं होता है | वहाँ की जानकारी भी उस स्थान से संबंधित प्राणियों के द्वारा मिल जाया करती है |
इस प्रकार से सभी स्थानों पर रहने वाले जीव जंतु प्रतिपल प्राकृतिक वातावरण का अनुभव करने लगते हैं | प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों में इनकी बहुत मदद ली जाती रही है |
प्राचीनकाल में प्राकृतिकपरिवर्तनों को समझने के लिए ऋषि मुनि महात्मा आदि जंगलों में ही रहा करते थे ,ताकि प्रकृति में रहकर प्राकृतिकघटनाओं के संकेतों परिवर्तनों एवं जीव जंतुओं की चेष्टाओं आदि का अनुभव कर सकें |
इन्हीं प्राकृतिक परिवर्तनों को समझने के लिए राजा लोग शिकार आदि के बहाने अक्सर जंगलों में जाया करते थे |समुद्रों नदियों तालाबों गाँवों बनों बागों खेतों खलिहानों में समय समय पर होते रहने वाले परिवर्तनों को वहाँ रहकर स्वयं समझते थे | इसके लिए राजालोग ग्रामीणों किसानों पशुपालकों बनबासियों चरवाहों नाविकों बहेलियों आदि से मिलकर उनसे प्राकृतिक परिवर्तनों के बिषय में अनुभव लिया करते थे |इस प्रकार से प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों घटनाओं पर सूक्ष्म दृष्टि रखा करते थे | समय समय पर पशु पक्षियों के व्यवहारों में आए परिवर्तनों का पता लगाते थे | अभी यदि ऐसा हो रहा है तो इसके प्रभाव से भविष्य में कैसा होगा ? अर्थात अभी जो इसप्रकार की घटना घटित हो रही है | उसके प्रभाव से भविष्य में कब कैसी घटनाएँ घटित होंगी |
कई बार प्रकृति में कुछ विशेष प्रकार के लक्षण उभरने पर उन्हें समझने के लिए राजाओं को कई कई दिनों तक जंगलों में ही रहना पड़ता था |उन जंगलों में बने आश्रमों में ऋषि मुनियों के पास जा जाकर उनसे उन परिवर्तनों को समझकर उनके बिषय में परिचर्चा करके भविष्य संबंधी घटनाओं के बिषय में अनुमान लगाए जाते थे |
ऐसे समस्त संकेतों के आधार पर भविष्य में घटित होने जा रही घटनाओं महामारियों आदि के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया करते थे |
मनुष्यों को भी होता है प्रकृति का अनुभव
प्राकृतिकपरिवर्तनों को यदि पेड़ पौधे पशुपक्षी आदि पहले से पहचान लेते हैं तो मनुष्यों को भी ऐसे प्राकृतिकपरिवर्तनों की जानकारी पहले से हो जानी चाहिए | ऐसा हो सकता है किंतु मनुष्यों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्यों ने अपने को प्रकृति से दूर कर लिया है | मनुष्य नगरों महानगरों की सुख सुविधा संपन्न व्यवस्था में रहते हैं | इसलिए प्रकृति और प्राकृतिक घटनाओं के कारणों को वे कैसे समझ सकते हैं |
वर्तमान समय के वैज्ञानिकों की तरह महानगरों के सुख सुविधापूर्ण भवनों में रहकर न तो प्रकृति का अनुभव किया जा सकता है और न ही महामारी का ! प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में निराधार तीर तुक्के लगाना या भविष्यवाणियों के नाम पर झूठी अफवाहें फैलाना ये प्रकृति विज्ञान नहीं है और न ही इससे समाज को मदद ही मिल पाती है |
एक महामारी के बाद दूसरी महामारी दूसरी के बाद तीसरी महामारी ये क्रम तो चलता ही आ रहा है | मौसम संबंधी पूर्वानुमान बार बार गलत निकलते देखे जा रहे हैं | वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण अभी तक नहीं खोजा जा सका है | महामारी में समाज की मदद की दृष्टि से कोई जानकारी नहीं जुटाई जा सकी है |
प्राचीन काल में मनुष्य भी प्राकृतिक संकेतों के आधार पर प्राकृतिक घटनाओं आपदाओं या महामारियों के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगा लेते रहे हैं | ऐसे संकेत प्रकृति स्वयं देती रहती है | महामारी यदि प्राकृतिक है तो उसे समझना भी प्रकृतिविज्ञान के ही आधार पर होगा |
जिसप्रकार से किसी के शरीर में रोगों के पैदा होने से काफी पहले उसके शरीर में उसप्रकार के चिन्ह प्रकट होने लगते हैं | पूर्व संकेत शरीर स्वयं देता है | प्राचीनकाल में उन संकेतों को समझकर संभावित रोगों की पहचान आगे से आगे कर ली जाती रही है | उसी के आधार पर सावधानियाँ बरतकर उसप्रकार के रोगों से शरीर की सुरक्षा की जाती रही है |
वर्तमान समय में रक्त मल मूत्र एक्सरे अल्ट्रा साउंड आदि अनेकों प्रकार की जाँच करके शरीर के स्वस्थ रहने की पहचान करनी होती है | इस प्रकार की जाँचों से शरीर में उस समय जो रोग होता है | केवल उसी के बिषय में पता लग जाता है किंतु भविष्य में संभावित रोगों के बिषय में उतना पता नहीं लग पाता है |
इसीप्रकार से भूकंप आँधी तूफान बाढ़ बज्रपात चक्रवात आदि प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि प्रकृति में होने वाले रोग हैं | ऐसी घटनाओं के घटित होने के काफी पहले से प्रकृति के विभिन्न अंगों में उस प्रकार के चिन्ह प्रकट होने लगते हैं | उनके आधार पर सुरक्षा के लिए प्रतिपल प्रकृति का परीक्षण करते रहना पड़ता है |
प्राकृतिक घटनाओं आपदाओं एवं महामारियों को प्राचीनविज्ञान के आधार पर समझना पड़ेगा | इसके आधार पर भी गंभीरतापूर्वक अनुसंधान करना पड़ेगा तभी प्रकृति के रहस्यों को समझा जाना संभव है |
मनुष्य प्रकृति से दूर होता चला गया !
मनुष्यों का जीवन जब केवल प्रकृति के आधीन होता था तो उन्हें भी ऐसे प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव हुआ करता था किंतु सुख सुविधाओं के साधन बढ़ने से मनुष्य प्राकृतिक वातावरण से दूर होता जा रहा है | मनुष्य को जो प्राकृतिक अनुभव प्रकृति के साथ रह कर करना आवश्य क था | उन्हें वो नहीं कर पा रहा है |
बढ़े हुए तापमान एवं उसके परिणामों का अध्ययन करना है तो पंखा कूलर एसी आदि व्यवस्थाओं में रहने आने जाने काम करने वाले लोग इसका अनुभव कैसे कर सकते हैं | ठंढा पानी पीने वाले लोग इसका अनुभव नहीं कर सकते हैं |
इसके अलावा गरमी भी कई प्रकार की होती है कुछ हुमश वाली गरमी होती है | कुछ वर्षा के बीच की गर्मी होती है | कुछ क्रमिक गर्मी होती है कुछ अचानक गर्मी होती है | सितंबर के महीने में हुई गर्मी बिल्कुल अलग प्रकार की होती है | इस समय जितनी गर्मी बढ़ती है उतने रोग बढ़ते हैं | सबका गुण धर्म स्वाद आदि अलग अलग होता है | सबमें अलग अलग प्रकार के रोग होते हैं |
समय का भी स्वाद होता है| दिशाओं के अनुसार हवाओं का भी स्वाद बदलता रहता है |हेमंतऋतु का समय मीठा होता है | इसीलिए मीठे स्वभाव वाले गन्ने की मिठास हेमंतऋतु में बढ़ जाती है | जिस वर्ष मिठास बहुत अधिक बढ़ जाती है तो फलों गन्ने आदि में कीड़े लगने लगते हैं |जिस वर्ष ऐसा होने लगे तो फलों गन्ने आदि के गुणधर्म में तो परिवर्तन आ ही जाते हैं ऐसा प्रभाव सभी जीवजंतुओं पर पड़ता है मनुष्यों पर भी पड़ता है | जो पचाने के अभ्यासी मनुष्य नहीं होते हैं |
गर्मी का स्वाद भी मीठा होता है | इसलिए जितनी अधिक गर्मी उतनी अधिक मिठास ! गर्मी के प्रभाव से कच्ची अंबी इमली खरबूजा तरबूज लीची जामुन जैसे मीठे स्वभाव वाले फलों का स्वाद और अधिक मीठा हो जाता है | कहा जाता है कि जितनी अधिक लू चलती है फलों में उतनी मिठास बढ़ती है | ग्रीष्मऋतु में गर्मी का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाने से गन्ने में मिठास बहुत अधिक बढ़ जाती है | इससे गन्ने में कीड़े लगने लगते हैं | जिसके कारण उन में उसप्रकार के रोगों के होने की संभावना बन जाती है |गर्मी और मधुरता इतनी अधिक बढ़ जाने से इससे संबंधित रोग पैदा होने लगते हैं | ऐसा मानकर प्रकृति बिषयक अनुसंधान किए जाते हैं | इसके प्रभाव से प्रभावित होकर पेड़ों पौधों फसलों बनस्पतियों समुद्रों नदियों तालाबों आदि में कुछ उस प्रकार के चिन्ह उभरने लगते हैं | किसी वर्ष समय का प्रभाव यदि अधिक बढ़ गया या गर्मी का प्रभाव यदि अधिक बढ़ गया तो ऐसे फलों सब्जियों आदि में कीड़े लगने लग जाते हैं | ये भविष्य की किसी घटना का संकेत होता है |
रोग महारोग आदि शरीरों में चुपके चुपके प्रवेश करते रहते हैं | कुछ महीनों वर्षों तक इस प्रकार का असंतुलन सहते सहते महामारी जैसे बड़े रोग फैलने लगते हैं | जिस प्रकार से सीढ़ी पर चढ़ते हुए लोग पाँच मंजिल पर चढ़ जाते हैं किंतु बिना सीढ़ी के एक मंजिल से भी कूद जाएँ तो चोट लग जाती है |इसी प्रकार से क्रमिक रूप से गर्मी बढ़ती जा रही हो और लोग सहते जा रहे हों तो ज्यादा कठिनाई नहीं होगी किंतु पानी बरसते बरसते अचानक तेज गर्मी होने लगे या अधिकांश समय वातानुकूलित वातावरण में रहने वाले लोगों को उस समय अचानक तेज धूप में निकलना पड़े जब गर्मी बहुत अधिक पड़ रही हो तो वो रोगी हो जाएँगे | इसका कारण तेज गरमी का होना कम अपनी जीवन शैली बिगड़ना अधिक होता है | महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए दो ही मार्ग हैं | एक तो ऐसे प्राकृतिक लक्षणों को देखकर कुछ महामारियों को आने के कुछ पहले पहचान लिया जाए और दूसरा प्रकृति में ऐसे लक्षण प्रकट होने का कारण समय होता है |इसलिए ऐसा समय कब आएगा | इसका पूर्वानुमान लगाकर उसके आधार पर पूर्वानुमान लगा लिया जाए | समयसंबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए गणितविज्ञान ही एक मात्र मार्ग है | जिसके द्वारा अनुसंधानपूर्वक महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
प्रकृति से दूर रहकर प्राकृतिक अनुसंधान !कैसे संभव हैं ?
वर्तमानसमय में वर्षा कब कैसी होगी या इस वर्ष मानसून में वर्षा कैसी होगी | ये वर्षा वैज्ञानिकों को भी पता नहीं होता है | भूकंप आँधी तूफान बाढ़ बज्रपात चक्रवात या बादल फटने जैसी घटनाओं के बिषय में इनसे संबंधित वैज्ञानिकों के द्वारा पहले कभी कोई ऐसा पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका होता है |जो पहले कभी सही भी निकला हो |महामारी के बिषय में भी ऐसे ही तीर तुक्के लगाए जाते हैं | कोरोना महामारी के बिषय में भी जितने भी अनुमान पूर्वानुमान लगाए जाते रहे वे सभी गलत निकलते चले गए | ये पूर्वानुमान लगाने वाले वे जिन्हें सरकारें उन उन बिषयों का विशेषज्ञ मानकर उन्हें सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ पद प्रतिष्ठा प्रचुर पारिश्रमिक आदि प्रदान करती है |
ऐसी असफलताओं का एक बड़ा कारण प्राकृतिक वातावरण में रहकर अनुभव करने के बजाए वातानुकूलित भवनों में रहकर पूर्वानुमानों के नाम पर तीर तुक्का लगाना हो सकता है | अनुभव यंत्रों से नहीं किया जा सकता है |
प्राचीनकालके वैज्ञानिकों का मानना था कि जिसप्रकार से पानी से दूर रहकर तैरना नहीं सीखा जा सकता है| उसीप्रकार से प्रकृति से दूर वातानुकूलित वातावरण में रहकर न तो प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव किया जा सकता है और न ही प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सकता है |इसलिए प्राकृतिक परिवर्तनों संकेतों वातावरण आदि का अनुभव करने के लिए प्राकृतिक वातावरण में ही रहना आवश्यक होता है |
सुख सुविधाओं में पले बढ़े राजाओं के लिए जंगलों का रहन सहन कितना कठिन होता होगा ,फिर भी वे कई कई दिनों या सप्ताहों तक जंगलों में रहकर प्राकृतिक संकेतों को समझने का प्रयत्न किया करते थे | राजा लोग चाहते तो प्राकृतिक अध्ययनों अनुसंधानों आदि के लिए अपने सेवक सैनिक आदि नियुक्त कर सकते थे | स्वयं राजभवनों में ही बने रहते किंतु वे ऐसा नहीं करते थे | अनुभव स्वयं ही करने पड़ते हैं |
इसी प्रकार से ऋषिमुनि अक्सर गृहस्थ होते थे | उनका पत्नी बच्चों के साथ जंगलों में रहना कितना कठिन होता है | ऋषिमुनियों को राजा लोग महानगरों के सुख सुविधा संपन्न भवनों में पत्नी बच्चों के साथ रख सकते थे | उन्हें सुख सुविधाएँ प्रदान कर सकते थे | समाज भी उनके रहने खाने पीने आदि की व्यवस्था कर सकता था ,फिर भी ऋषिमुनिजंगलों में ही रहकर प्राकृतिक परिवर्तनों का अनुभव करते रहे |
ऋषियों का उद्देश्य यदि केवल तपस्या करना ही होता तो तपस्या के लिए जंगलों में रहना ही आवश्यक नहीं होता है |यह तो महानगरों के सुख सुविधा युक्त भवनों में रहकर भी कर सकते थे किंतु इससे प्रकृति बिषयक अनुसंधान किया जाना संभव नहीं होता | इसके लिए तो ऐसा भी किया जा सकता था कि ऋषिमुनि स्वयं जंगलों में रहकर तपस्या करते अपने पत्नी बच्चों को महानगरों के सुख सुविधा संपन्न भवनों में रख सकते थे किंतु इससे उनके बच्चे उन शिक्षा और संस्कारों से बंचित रह जाते |जिससे वे भविष्य के प्रकृति वैज्ञानिक बनने से बंचित रह जाते | इसलिए प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन अनुसंधान आदि स्वयं करने के साथ साथ बच्चों को भी साथ रखा जाना आवश्यक था |
ऋषि मुनि चाहते तो जंगलों में अपने अपने आश्रम एक दूसरे से दूर दूर बनाने के बजाए एक दूसरे के पास बनाकर भी रह सकते थे | इससे आपस में एक दूसरे के सहयोग से ऋषि परिवारों का जीवन आसान हो सकता था |
इससे अनुसंधानों में एक बाधा होती कि एक ही स्थान पर रहने के कारण उन सभी ऋषियों को एक ही प्रकार के प्राकृतिक वातावरण का अनुभव करने को मिलता | इसीलिए बनों में दूर दूर आश्रम बनाए जाते थे ताकि सभी स्थानों के प्राकृतिक परिवर्तनों तथा वातावरण आदि का अनुभव किया जा सके |
उस युग में ऋषिमुनियों एवं शासकों का लक्ष्य प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से प्रजा की सुरक्षा करना होता था | इसके लिए वे समर्पित भावना से सदैव प्रयत्नशील रहते थे कि किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी के पैदा होने से पहले उसके बिषय में पता लगा लिया जाए ,ताकि उनसे बचाव के लिए तैयारियाँ करने का समय मिल सके | जिससे उस आपदा की आँच मनुष्यों तक न पहुँच पाए |
प्रजा को प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों का सामना न करना पड़े | इस उद्देश्य से प्राचीनकाल में शासक लोग प्रकृति से जुड़कर जीवन जीते थे | प्रकृति के सर्वांग परिवर्तनों को निरंतर देखते रहते समझते रहते थे | इससे सभीप्रकार की प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में आगे से आगे सूचना प्राप्त होती रहती है | जिससे सुरक्षा या बचाव की तैयारियों को करने के लिए समय मिल जाता था |
प्राचीनऋषि मुनियों राजाओं आदि को ये सच्चाई पता थी कि महानगरों का रहन सहन तभी तक स्वस्थ एवं सुखसुविधा पूर्ण है ,जब तक प्राकृतिक वातावरण स्वस्थ है |जीवन का रास्ता जंगलों से होकर जाता है |जंगल स्वस्थ हैं इसका मतलब प्राकृतिक वातावरण स्वस्थ है | प्राकृतिक वातावरण जब अस्वस्थ होना प्रारंभ होता है | उसके कुछ महीने या वर्ष बाद उस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ आपदाएँ या महामारियाँ आदि पैदा होनी प्रारंभ होती हैं | प्राकृतिक वातावरण जब अस्वस्थ होना प्रारंभ हो उसी समय यदि पता लगा लिया जाए तो उसके आधार पर भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं आपदाओं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | इतने समय में भविष्य संबंधी सुरक्षा के लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं |इसलिए प्राचीन अनुसंधानों के आधार पर भी प्रकृति को समझने के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए |
समझने होंगे प्राकृतिक परिवर्तनों के सिद्धांत !
जंगलों में रहने मात्र से सबकुछ समझ में आ जाएगा | ऐसा भी नहीं है इसके लिए प्रकृति के स्वभाव को बनने बिगड़ने वाले लक्षणों संकेतों आदि को पहले समझना होगा | उसी के अनुसार जंगलों में रहकर प्रकृति का अध्ययन करना होगा |
समय का भी स्वाद होता है| दिशाओं के अनुसार हवाओं का भी स्वाद बदलता रहता है |हेमंतऋतु का समय मीठा होता है | इसीलिए मीठे स्वभाव वाले गन्ने की मिठास हेमंतऋतु में बढ़ जाती है | गर्मी का स्वाद भी मीठा होता है | इसलिए जितनी अधिक गर्मी उतनी अधिक मिठास ! गर्मी के प्रभाव से कच्ची अंबी इमली खरबूजा तरबूज लीची जामुन जैसे मीठे स्वभाव वाले फलों का स्वाद और अधिक मीठा हो जाता है | कहा जाता है कि जितनी अधिक लू चलती है उतनी मिठास बढ़ती है |
ग्रीष्मऋतु में गर्मी का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाने से गन्ने में मिठास बहुत अधिक बढ़ जाती है इससे गन्ने आदि में कीड़े लगने लगते हैं | किसी वर्ष समय का प्रभाव यदि अधिक बढ़ गया या गर्मी का प्रभाव यदि अधिक बढ़ गया तो ऐसे फलों सब्जियों आदि में कीड़े लगने लग जाते हैं | ये भविष्य की किसी घटना का संकेत होता है | जो अनुसंधान का बिषय हो सकता है |
गर्मी और मधुरता इतनी अधिक बढ़ जाने से इससे संबंधित रोग पैदा होने लगते हैं | ऐसा मानकर प्रकृति बिषयक अनुसंधान किए जाते हैं | इसके प्रभाव से प्रभावित होकर पेड़ों पौधों फसलों बनस्पतियों समुद्रों नदियों तालाबों आदि में कुछ उस प्रकार के चिन्ह उभरने लगते हैं | इस प्रभाव से मनुष्य पशु पक्षी आदि जीव जंतुओं पर इसका प्रभाव पड़ने से वे बेचैन होने लगते हैं | हाथी भैंसें अजगर आदि व्याकुल होने लगते हैं | उनका व्यवहार बदलने लगता है |
ऐसी सभी घटनाओं का एक दूसरे के साथ मिलान करके ही यह निश्चित किया जा सकता है कि इस वर्ष सर्दी गर्मी वर्षा आदि काफी अधिक बढ़ या घट रही है | जिसके प्रभाव से उससे संबंधित रोग फैलेंगे |
प्राचीनविज्ञान के आधार पर इसी प्रकार के पूर्वानुमान लगाने के लिए आकाश पाताल पृथ्वी आग,समुद्र एवं वायु संबंधी सभी संकेतों को देखना समझना होता है| जो हमने समझा है,वो सही है या नहीं !इसका परीक्षण उस समय घटित हो रही बादल वर्षा बाढ़ बज्रपात चक्रवात भूकंप आदि प्राकृतिक घटनाओं से मिलान करके किया जाता है | इसके साथ ही बृक्ष बनस्पतियाँ फसलें फूल फल एवं उनके स्वाद में बदले हुए संकेतों का अध्ययन करना होता है | पशु पक्षियों के व्यवहारों में आ रहे बदलावों का अध्ययन करना होता है | यदि सभी संकेत एक प्रकार की सूचना दे रहे होते हैं तो उस पर विश्वास किया जाना चाहिए |
इस प्रकार से प्रायः सभी प्राकृतिक घटनाओं का संबंध भविष्य में घटित होने वाली कुछ दूसरी प्राकृतिक घटनाओं से जोड़कर अध्ययन किया जाता है | ऐसी घटनाएँ स्वयं तो घटित हो ही रही होती हैं | इसके साथ ही भावी प्राकृतिक परिवर्तनों की सूचनाएँ भी दे रही होती हैं |
इसीप्रकार से वर्षा बाढ़ चक्रवात बज्रपात भूकंप महामारी आदि घटनाएँ जब प्रारंभ होने वाली होती हैं |उसके काफी पहले से उनके निर्मित होने या घटित होने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है | जिससे संबंधित चिन्ह प्राकृतिक वातावरण में उभरने लगते हैं | ऐसे ही महामारी आने के कुछ वर्ष पहले से खेतों खलिहानों फसलों वृक्षों बनस्पतियों बनों बागों नदियों तालाबों समुद्रों में उस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं | जीव जंतुओं के व्यवहारों में वैसे बदलाव आने लगते हैं | महामारी को समझने के लिए ऐसे संकेतों एवं प्राकृतिक परिवर्तनों का अध्ययन लगातार करते रहना होता है |
ऐसे परिवर्तनों का प्रभाव प्राकृतिक वातावरण और जीवन दोनों पर पड़ता है | इनमें से कुछ तुरंत तो कुछ वर्षों बाद अनुभव किए जाते हैं | मौसम एवं महामारी को समझने के लिए ऐसी घटनाओं के भविष्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन अनुसंधान आदि लगातार करते रहना होता है |
वर्तमान समय में ऐसे प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों के अभाव में भूकंप बाढ़ बज्रपात चक्रवात भूकंप महामारी आदि घटनाएँ मनुष्यों पर जब आक्रमण कर देती हैं, तभी उनके आने के बिषय में पता लग पाता है | उतने कम समय में उनसे सुरक्षा के लिए कुछ किया जाना संभव नहीं होता है | ऐसी घटनाओं से होने वाली जनधन हानि को सहने के अलावा विज्ञान कोई विकल्प उपलब्ध नहीं करा सका है | ऐसी स्थिति में अनुसंधानों पर धन भी खर्च होता है और उनसे समाज को कोई मदद भी नहीं मिल पाती है | इसलिए कुछ ऐसा किया जाना चाहिए | जिस पर यदि समाज का धन खर्च होता है तो प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों के समय समाज को कोई मदद भी पहुँचाई जा सके |
अलनीनो लानिना जैसी घटनाओं का कारण और संबंध
वस्तुतः प्रकृति का संबंध समय से होता है | ऋतुएँ भी समय का ही नाम हैं | ग्रीष्मऋतु में तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है | हवाएँ गर्म चलने लगती हैं | आकाश प्रायः बादलों से मुक्त होता है | वर्षाऋतु का समय आने पर
वर्तमानसमय में मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए अलनीनो लानिना जैसे समुद्री संकेतों को समझने का प्रयास किया जाता है | केवल समुद्री संकेत संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं | समुद्र जैसा प्रभाव प्रकृति के कुछ अन्य अंगों पर भी उसी प्रकार का दिखना चाहिए | अलनीनो की तरह प्रकृति के किसी एक अंग से प्राप्त सूचना गलत भी निकल सकती है | इसलिए प्रकृति के विभिन्न अंगों का परीक्षण निरंतर करते रहना चाहिए | जिससे आगे से आगे प्राकृतिक घटनाओं आपदाओं या महामारियों के संकेत मिलते रहते हैं |
वर्तमान समय में आधुनिक विज्ञान के आधार पर अलनीनो लानिना जैसी घटनाओं से संबंधित अध्ययनों में केवल समुद्री संकेतों को ही सम्मिलित किया जाता है | इनका प्रकृति की अन्य अंगों में उभर रहे संकेतों के साथ जोड़कर अध्ययन नहीं किया जाता है | इसीलिए अलनीनो लानिना जैसी केवल समुद्री घटनाओं के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणियाँ प्रायः सही नहीं निकलती हैं |?
2026 में अलनीनो या सुपर अलनीनो आने की बात की जा रही है किंतु ऐसा होने की प्रामाणिकता का परीक्षण कुछ दूसरी प्राकृतिक घटनाओं से किया जाना चाहिए | ऐसा किए बिना ये कैसे कहा जाए कि जो समझा जा रहा है वो सही ही है | प्राचीन विज्ञान की दृष्टि से देखने पर प्रकृति में अलनीनो के समर्थक ऐसे कुछ दूसरे लक्षण अभीतक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं | जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि प्रकृति में ऐसी ऐसी घटनाएँ घटित हो सकती हैं | ऐसी आधी अधूरी बातों को पूर्वानुमानों की तरह प्रस्तुत करने से जो अफवाहें फैलती हैं | उससे समाजिक वातावरण तनाव युक्त होता है |
प्रतिरोधक क्षमता
प्रतिरोधक क्षमता 4 प्रकार की होती है |1. प्राकृतिकरूप से वातावरण की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है | 2.मनुष्यकृत कार्यों वातावरण में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है | 3.मनुष्य शरीरों में प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक कमजोर होती है |4.मनुष्यों का आहार बिहार बिगड़ने से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है |एक तो वो जो प्रत्यक्ष कारणों से होने वाले रोगों से हमारी रक्षा करती है | सर्दी गरमी लगने से,असंतुलित या अस्वास्थ्यकर भोजन करने से या असमय में सोने जागने से या अपनी लापरवाही से कोई चोट चभेट लगने से जो रोग पैदा होते हैं | उनसे सुरक्षित होने में या रोग मुक्ति पाने में शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता मदद करती है |
इन चारों प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने को दो भागों में बाँटा जा सकता है | एक प्रत्यक्ष और दूसरी परोक्ष | प्रत्यक्ष कारण दिखाई पड़ते हैं जबकि परोक्ष कारण दिखाई नहीं पड़ते | उन्हें अनुभवों से पहचाना जा सकता है |
विशेष बात यह है कि जीवन को सुरक्षित स्वस्थ रखने के लिए सभी प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता होती है | प्रत्यक्ष शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता रोगों से शरीर की सुरक्षा करती है |रोगी शरीरों को रोगमुक्त करने में मदद करती है | परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता जीवन को सुरक्षित रखती है | स्वास्थ्य सुरक्षा रोगमुक्ति आदि सुनिश्चित करती है | मानसिक प्रतिरोधक क्षमता बुरे बिचारों से चिंता से भय से मन की सुरक्षा करती है |
वातावरण में मनुष्यकृत विकृतियाँ !
वर्तमान समय में यांत्रिक विकास दिनों दिन बढ़ता जा रहा है | जिससे धुआँ धूल बढ़ना भी स्वाभाविक है | ईंट भट्ठों से ,उद्योगों से ,वाहनों से ,निर्माण कार्यों से बढ़ने वाली धुआँ धूल वातावरण को प्रभावित करती है | उसमें साँस लेने से शरीर रोगी होने लगते हैं | उससे दूषित हो चुके खाद्य एवं पेय पदार्थों का सेवन करने से रोग होते हैं | इससे पेड़ों पौधों अनाजों दालों शाक सब्जियों फूलों फलों के स्वाद बिगड़ते हैं और ये स्वास्थ्य के लिए अहितकर होते जाते हैं | इनसे पेटरोग स्वाँसरोग नेत्ररोग सिररोग आदि पैदा होते देखे जाते हैं |
प्राकृतिक वातावरण में मनुष्यकृत बिकारों के होने पर मनुष्यों में फैलने वाले रोगों से समाज की सुरक्षा करने के लिए वातावरण को बिषैला बनाने वाले कार्यों को इस आशा से रोकना होगा कि इनके रुकते ही समाज रोगमुक्त होने लगेगा |मनुष्यकृत विकारों में ये विशेषता होती है कि बिकारों के कारण पता होते हैं | इसलिए उनका निवारण किया जा सकता है जबकि प्राकृतिक बिकारों में ऐसा किया जाना संभव नहीं होता है ,क्योंकि उनके कारणों के बिषय में किसी को कुछ पता ही नहीं होता है |
स्वास्थ्य बिगड़ने के मनुष्यकृत कारण !
कुछ रोग रहन सहन खान पान आदि बिगड़ने से पैदा होते हैं | उनसे पीड़ित रोगियों को औषधीय चिकित्सा से स्वस्थ कर लिया जाता है | सर्दी लग गई तो जुकाम खाँसी बुखार आदि हो सकता है | गरमी लू आदि लग गई तो बुखार उल्टी दस्त आदि हो सकता है |
इसी प्रकार से कुछ विकृत वस्तुओं का खानपान में यदि उपयोग कर लिया गया जिनका स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है | उन्हें खाने पीने से यदि कोई रोग हो गया तो उससे बचाव के लिए औषधीय चिकित्सा का सहारा लेकर स्वस्थ हुआ जा सकता है |
ऐसे ही रहन सहन आदि बिगड़ने से यदि कोई रोग पैदा होता है तो कारण का निवारण कर लेने से शरीर रोगमुक्त हो सकता है |
कुल मिलाकर स्वास्थ्य बिगड़ने के मनुष्यकृत कारणों की यह पहचान होती है कि उनके पैदा होने का कारण पता होता है | इसलिए उसका निवारण कर लिया जाता है जबकि प्राकृतिक रोगों या महारोगों के पैदा होने का कोई कारण समझ में ही नहीं आता है |
संयुक्त कारणों से पैदा हुए रोगों से सुरक्षा !
कई बार कुछ रोगों के पैदा होने के लिए प्राकृतिक एवं संयुक्त दोनों ही कारण जिम्मेदार होते हैं |उनसे होने वाले रोगों के वास्तविक कारणों को खोजना कठिन होता है | इसलिए उनका निवारण खोजा जाना भी अत्यंत कठिन होता है |
उदाहरण के रूप में कुछ ऐसे रोग जो वायुप्रदूषण बढ़ने के कारण पैदा होते हैं | वायु प्रदूषण घटेगा तो ऐसे रोग भी घटने लग जाएँगे किंतु वायु प्रदूषण घटेगा कैसे ये सोचने वाली बात है ,क्योंकि वायुप्रदूषण बढ़ता कैसे है ये पता ही नहीं है |
प्राचीनविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो वायुप्रदूषण बढ़ने के 3 कारण होते हैं | पहला कारण किसी भी प्रकार से धुआँ धूल बढ़ने के कारण वायुप्रदूषण बढ़ता है |दूसरा कारण कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहाँ वायु प्रदूषण हमेंशा ही बढ़ा रहता है | तीसरा कुछ समय ऐसा होता है जब वायुप्रदूषण बढ़ता है | उसके बाद कुछ समय ऐसा आता है जब वायु प्रदूषण कम होता है | वायु प्रदूषण बढ़ने में तीनों का एक समान योगदान होता है |
मनुष्यकृत कारण पता होते हैं इसलिए उनका निवारण किया जाना मनुष्यों के बश में होता है | | भौगोलिक कारणों से बढ़ने वाले वायु प्रदूषण को कम किया जाना कठिन होता है |समय संबंधी कारणों से यदि वायु वायुप्रदूषण बढ़ रहा होता है तो उससे पैदा होने वाले रोगों से मुक्ति मिलना इसलिए कठिन होता है ,क्योंकि वो समय के साथ ही समाप्त होते हैं |
ईंट भट्ठों से ,उद्योगों से ,वाहनों से ,निर्माण कार्यों से या पराली आदि जलाने जैसे कुछ कार्य ऐसे होते हैं |जिनसे धुआँ धूल आदि बढ़ता ही है | कुछ स्थान ऐसे होते हैं ,जहाँ भौगोलिक कारणों से वायुप्रदूषण बढ़ता ही है | कुछ समय ऐसा आता है | जिन वर्षों महीनों या सप्ताहों में धुआँ धूल अधिक बढ़ता है |
ऐसी परिस्थिति में वायुप्रदूषण बढ़ने के कारण पैदा होने वाले रोगों से यदि समाज को मुक्ति दिलानी है तो वायुप्रदूषण बढ़ने के कारण खोजने होंगे | जिन कार्यों को करने से धुआँ धूल बढ़ता है | उस प्रकार के कार्यों को वहाँ नहीं स्थापित किया जाना चाहिए , जहाँ भौगोलिक कारणों से वायुप्रदूषण बढ़ा ही रहता है | धुआँ धूल बढ़ने वाले कार्यों को उन वर्षों महीनों दिनों में नहीं किया जाना चाहिए | जिनमें वायुप्रदूषण बढ़ने की संभावना होती है |
भौगोलिक दृष्टि से वायुप्रदूषण बढ़े रहने वाले स्थानों पर वायुप्रदूषण बढ़ाने वाले कार्यों को यदि उन दिनों में किया जाने लगे | जिनमें वायु प्रदूषण बढ़ा रहता है तो ऐसी स्थिति में वायुप्रदूषण 100 प्रतिशत बढ़ा रहेगा | ऐसे समय रोगों या महारोगों (महामारियों) के फैलने की संभावना अधिक रहती है
प्राकृतिकरूप से वातावरण की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के लक्षण और उपाय
प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर महामारी जैसी घटनाएँ घटित होने की संभावना बढ़ जाती है | प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता कम होने का कारण बुरे समय का संचार होता है | अच्छा बुरा समय दिखाई नहीं पड़ता है | उसे समझने के दो ही मार्ग हैं | एक प्राकृतिक उपद्रवों को देखकर बुरे समय का अनुमान लगाया जाए | दूसरा गणित के आधार पर बुरे समय को पहचाना जाए एवं उसके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाए |
कई बार प्राकृतिक वातावरण प्राकृतिक रूप से प्रदूषित होने लगता है | जिसके कारणों का पता लगाया जाना संभव नहीं होता है |आकाश का रंग काला होने लगता है |आकाश धूल धुएँ से भर जाता है |ऐसी हवाओं का प्रभाव पेड़ों पौधों फूलों फलों अनाजों शाक सब्जियों पर पड़ने से वे बिकारित होने लगती हैं | उन्हें खाने पीने से प्राणियों के दुर्बल शरीर रोगी होने लगते हैं |मजबूत शरीर कुछ पीड़ा सह जाते हैं | ऐसे समय वातावरण में विद्यमान हवाएँ न तो प्रकृति के लिए हितकर होती है और न ही जीवन के लिए हितकर नहीं रह जाती हैं |इसीलिए ऐसे समय पाँचों तत्व असंतुलित होने लगते हैं |
पृथ्वी तत्व के प्रकुपित होने से पृथ्वी में बार बार भूकंप आने लगते हैं | जलतत्व के प्रकुपित होने से अतिवृष्टि अनावृष्टि होने लगती हैं | कहीं बादल फटते हैं | कहीं सूखा पड़ता है | वर्षा ऋतु के समय वर्षा कम होती है | सर्दी गर्मी के समय वर्षा अधिक होते देखी जाती है |
ऐसे ही अग्नितत्व प्रकुपित रहने लगता है | इससे तापमान अनियंत्रित होने लगता है | वातावरण में व्याप्त ज्वलनशील गैसों के कारण आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक घटित होने लगती है |
आकाश तत्व में बिकार आने से आकाश का रंग काला होने लगता है | अकारण ही आकाश धूल धुएँ से भर जाता है |सूर्य की रौशनी धीमी एवं हुमश बढ़ने लगती है |
वायु तत्व प्रकुपित होने आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात आदि हिंसक प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगती हैं |
महामारियों की निर्माण प्रक्रिया
प्राकृतिक प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने से प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | बादल वर्षा चक्रवात भूकंप आदि प्राकृतिक घटनाएँ अधिक मात्रा में घटित होने लगती हैं | ऐसे वातावरण में पल बढ़ रहे वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि में उसप्रकार
के बिकार आने लग जाते हैं |उस विकारित वातावरण का प्रभाव
बनस्पतियों एवं अन्य औषधीय द्रव्यों पर भी पड़ता है |इससे वे अपने गुणों से
हीन एवं कुछ दूसरे गुणों से युक्त हो जाती हैं |
प्राकृतिक वातावरण में प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर कुछ उस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगती हैं |ऐसी घटनाओं के घटित होने से पहले ही प्राकृतिक वातावरण में कुछ उस प्रकार के संकेत उभरने लगते हैं |
इसप्रकार से प्राकृतिक बिकारों को सह न पाने के कारण पशु पक्षियों में बेचैनी बढ़ जाती है | वे पागलों की भाँति अनियंत्रित हो जाते हैं |ऐसे वातावरण
में साँस लेने से मनुष्यों समेत समस्त पशु पक्षियों एवं जीव जंतुओं
में बेचैनी बढ़ने लगती है | उनका व्यवहार बदलने लगता है |जिससे वे उन्मादित होकर उपद्रव करने लगते हैं | इसीलिए भूकंप जैसी घटनाओं के घटित होने से पहले भी जीव जंतुओं के व्यवहार बदलते हुए देखे जाते हैं | टिड्डियों चूहों आदि का प्रजनन बढ़ जाता है वे उपद्रव करने लगते हैं | समाज असहनशील एवं हिंसक हो उठता है |तरह तरह के आंदोलन उपद्रव आदि होते देखे जाते हैं | राजा एक दूसरे पर हमला करने लगते हैं |
प्राकृतिक वातावरण में प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर पशु पक्षियों की तरह ही बेचैनी मनुष्यों में भी होती है | जिससे लोग उन्मादित हो उठते हैं | समाज आंदोलित होने लगता है |विभिन्न स्थानों पर दंगा भड़कने लगता है | आतंकी घटनाएँ घटित होने लगती हैं | कुछ राष्ट्रों में युद्ध का वातावरण बनने लग जाता है | लोगों में हिंसा की भावना बढ़ती चली जाती है | इसी घबड़ाहट से बेचैन होकर बहुत लोग हत्या आत्महत्या जैसे बुरे बिचारों से भावित हो उठते हैं |
ऐसे समय में मनुष्य प्रायः सुख सुविधाओं का सहारा लेकर या चिकित्सकीय सहयोग लेकर या रुचिकर वातावरण का सेवन करके अपनी बेचैनी कम कर लिया करते हैं तो कुछ लोग अपना ध्यान इधर उधर भटका लिया करते हैं | वैसे भी मनुष्यों का मन विविधप्रकार की चिंताओं उलझनों में लगा रहता है | इसलिए ऐसी बेचैनी का सामना करते हुए भी उनका ध्यान इधर नहीं जाता है| इसलिए उस बेचैनी के लक्षण पशुओं पक्षियों की अपेक्षा मनुष्यों को कम अनुभव हो पाते हैं | उनका ध्यान इन आतंरिक संकेतों की ऒर बहुत कम पहुँच पाता है | जंगलों में प्राकृतिक जीवन जीने वाले ऋषियों मुनियों आदि को इनका अनुभव पहले से हो जाता है |
सामान्य मनुष्यों को इसका पता तभी लग पाता है ,जब इसके कारण होते नुक्सान को वे अपनी आँखों से देख हैं | इसी कारण कोरोना महामारी जब आ गई लोग संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने लगे तब पता लगा कि महामारी प्रारंभ हो गई है| नुक्सान होना जब शुरू हो ही जाता है तो वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता ही क्या रह जाती है |प्राकृतिकआपदाओं एवं कोरोना जैसी महामारियों से समाज को सुरक्षित बचाने का यदि लक्ष्य है तो तो ऐसे उसकी पूर्ति कैसे हो सकती है |
ऐसे बिकारित वातावरण में साँस लेने से तथा इसमें पैदा होने वाली खाने पीने की वस्तुओं को खाने पीने से मनुष्य आदि जीव जंतुओं के शरीर रोगी होने लग जाते हैं | इससे प्रकृति को तो नुक्सान होता ही है | प्रकृति से पोषण प्राप्त कर रहे प्राणियों को भी नुक्सान होता है |कोरोना
काल में ही देखा जाए तो आवारा पशुओं का आतंक बहुत अधिक बढ़ गया था | अभी भी
है किंतु उतना नहीं है जितना कोरोना काल में था |गाय का स्वभाव मुर्गा
खाना नहीं होता है किंतु कोरोनाकाल में ऐसी घटनाएँ भी घटित होते देखी गईं |
कई देशों प्रदेशों में टिड्डियों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई थी |चूहों का आतंक विश्व के अनेकों देशों में बढ़ता जा रहा था | बेचैन कौवे चमगादड़ आदि पक्षी भयभीत थे | अनेकों स्थानों पर बागों जंगलों आदि में चमगादड़ कौवे जैसे पक्षी बड़ी संख्या में मृत पाए गए थे | ऐसे परिवर्तन होते हमेंशा नहीं देखे जाते हैं | ये महामारी आने या बढ़ने के संकेत थे |पशु पक्षियों को ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में बहुत पहले से आभाष हो जाता है |इन्हीं लक्षणों के आधार पर मौसम या महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पहले से पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
ऐसे समय उपद्रवों को शांत करने के दो ही उपाय होते हैं | एक तो अच्छे समय की प्रतीक्षा की जाए और जब समय सुधरेगा तब उपद्रव स्वतः शांत हो जाएँगे | दूसरा भगवती दुर्गादि देवी देवताओं को यज्ञादि पूर्वक प्रसन्न करके ऐसे उपद्रव शांत करने के लिए प्रार्थना की जाए | यदि समय भी समाप्त न हो रहा हो और महामारी को शांत करने के लिए यज्ञादि प्रयोग भी किए जाने संभव न हों तो रोग लक्षणों के आधार पर पीड़ा कम करने के लिए चिकित्सा करते रही जाए | रोग तो अपने समय पर ही समाप्त होगा | कोरोना महामारी के समय भी मजबूरी में तीसरे विकल्प को ही चुना गया था |
प्राकृतिक रूप से शरीरों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के लक्षण और उपाय
महामारियों के समय भी सभी लोग एक जैसे वातावरण में रहते और साँस लेते हैं | लगभग एक जैसे वातावरण में पले बढ़े खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं | ऐसी स्थिति में महामारियाँ यदि प्राकृतिक होती हैं तो सभी लोगों को संक्रमित होना चाहिए | कुछ लोगों के संक्रमित होने का कारण खोजा जाना चाहिए |
इसे ऐसे समझना होगा कि कई बार विभिन्न दुर्घटनाओं में बहुत लोग एक साथ प्रभावित होते हैं | उनमें कुछ की तुरंत मृत्यु हो जाती है और कुछ को चोट चभेट लगती है | वे चिकित्सा से स्वस्थ हो जाते हैं | कुछ लोग बाक़ी सभी लोगों की तरह ही उतनी बड़ी दुर्घटना का शिकार होने पर भी पूरी तरह सुरक्षित बचे रहते हैं | उन्हें खरोंच भी नहीं लगती है | किसी कार में चार लोग बैठे होते हैं वो कार खाई में गिरती है | उनमें से एक की मृत्यु हो जाती है | दो घायल हो जाते हैं | एक पूरी तरह सुरक्षित बच जाता है | ऐसा ही रेल दुर्घटना विमान दुर्घटना भूकंप दुर्घटना आदि में भी होता है | इसी तरह महामारी काल में भी बहुत लोग सुरक्षित बचे रहते हैं | इसका कारण उनकी परोक्ष प्रतिरोधकक्षमता का मजबूत होना होता है | जिसके बलपर बड़े से बड़े संकट से सुरक्षित बच लिया जाता है |महामारी के समय में बहुत लोग संक्रमितों से संपर्क में रहने के बाद भी परोक्ष प्रतिरोधकक्षमता के मजबूत होने के कारण ही संक्रमित होने से सुरक्षित बच गए |
इसके बिपरीत परोक्ष प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर कई बार देखा जाता है कि सभी प्रकार से स्वस्थ लोग उठते बैठते चलते फिरते हँसते खेलते खाते पीते नाचते कूदते सोते जागते पड़े पड़े बैठे बैठे बिना किसी कारण के अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं | परोक्ष प्रतिरोधकक्षमता के कमजोर होने पर शरीर मजबूत हो तो भी ऐसी घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं |
कई बार रसायन सेवन करने वाले या निरंतर व्यायाम करने वाले अच्छे खासे हृष्ट पुष्ट स्वस्थ लोग भी अचानक रोगी होने लगते हैं | जिनके रोगी होने का कारण न तो वे स्वयं होते हैं और न ही कोई दूसरा होता है | उनका रहन सहन खान पान आदि भी उनके रोगी होने का कारण नहीं होता है |कुछ साधनसंपन्न लोग रोगी होने पर शुरू से ही सुयोग्य चिकित्सकों की सेवाएँ लेनी शुरू कर देते हैं | स्वदेश से विदेश तक एक से एक बड़े चिकित्सकों से महॅंगी से महँगी चिकित्सा करवाने के बाद भी कई बार रोग दिनों दिन बढ़ता चला जाता है और उनकी मृत्यु तक होते देखी जाती है | इसलिए अच्छी चिकित्सा न मिलना भी इसका कारण नहीं होता है |
ऐसे रोगियों की जाँच रिपोर्टों की एवं दवा के पर्चों की मोटी मोटी फाइलें लिए उनके परिजन घूम रहे होते हैं ,लेकिन न तो रोग पैदा होने का कारण पता लग पाता है और न ही चिकित्सकीय प्रयासों के द्वारा रोगों से मुक्ति दिलाना संभव हो पाता है |
इतना उन्नतविज्ञान एवं इतने विद्वान चिकित्सकों के द्वारा की गई चिकित्सा का कोई प्रभाव क्यों नहीं पड़ा ! या फिर चिकित्सा ही गलत कर दी गई | जिसके कारण रोग बढ़ा और मृत्यु हो गई | इन दोनों ही परिस्थितियों में चिकित्सा प्रक्रिया की दुर्बलता सिद्ध होती है | इस परिस्थिति को वैज्ञानिक दृष्टि से कैसे समझा जाएगा |वर्तमान समय का इतना उन्नत विज्ञान इतना वेबश क्यों है | जिससे न प्राकृतिक रोग परीक्षण में मदद मिल पाती है और न चिकित्सा प्रक्रिया से ही परिणामप्रद सफलता मिल पाती है | वैज्ञानिकदृष्टि से ऐसे लोगों के रोगी होने तथा न होने का कारण खोजा जाना चाहिए |
प्राचीनवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इसका कारण परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता की दुर्बलता होती है | बड़ी बड़ी दुर्घटनाओं से भी सुरक्षित बच निकलने का कारण भी उनकी परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता का मजबूत होना होता है |परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता सदाचरण एवं उत्तम आयुष्य से तैयार होती है | इसमें खान पान का प्रभाव नहीं पड़ता है |
व्यवहारिक जीवन में जिस समस्या का कारण खोज लिया जाता है | उसका समाधान भी निकल जाता है | समाधान भी कारण के अनुसार ही खोजने पड़ते हैं | वही प्रभावी होते हैं | यदि ऐसा न किया जाए तो बार बार प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिल पाती है |
प्रतिरोधक क्षमता का प्रभाव उपाय और परिणाम
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से संक्रमित होने की संभावना कम रहती है | ऐसा कहा जाता रहा है | रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए पौष्टिक आहार फल मेवा नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद (7-8 घंटे), और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है।
इस प्रकार की सुविधाएँ साधनसंपन्न लोगों को अधिक मिल सकती हैं | उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़नी चाहिए | इसलिए उन्हें या तो संक्रमित नहीं होना चाहिए या कम होना चाहिए, जबकि कोरोनाकाल में उन्हें अधिक संक्रमित होते देखा गया था |
इसीप्रकार से गरीबों का तनाव मुक्त स्वच्छतायुक्त रहन सहन खान पान एवं पर्याप्त नींद लेने लायक सुख सुविधाएँ नहीं मिल सकती हैं |इसलिए गरीबों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है | इस दृष्टि से गरीबों को अधिक संक्रमित होना चाहिए था,जबकि कोविड नियमों का पर्याप्त पालन न कर पाने के बाद भी उन्हें कम संक्रमित होते देखा गया था |
इसका मतलब क्या ये समझा जाए कि प्रतिरोधक क्षमता या तो पौष्टिक आहार उचित मात्रा में नींद एवं
तनाव मुक्त जीवन जी ने से मजबूत नहीं होती है या फिर कोरोनामहामारी से सुरक्षा में उसकी कोई भूमिका नहीं थी | क्योंकि गरीबों के बच्चे भोजन के
लिए दिन दिन भर लाइनों में लगे रहे | मजदूरों का पलायन हुआ | दिल्ली में
किसान आंदोलन में लोग बैठे रहे | ऐसी स्थिति में लोग बड़ी संख्या में
संक्रमित हो सकते थे किंतु नहीं हुए सब के सब सुरक्षित बने रहे | इसका कारण
यदि प्रतिरोधक क्षमता की मजबूती माना जाए तो उन गरीबों में मजबूती का कारण
क्या था | उसे खोजा जाना चाहिए | लोग संक्रमित हुए आखिर कैसे !
कुल मिलाकर बिचार किया जाए तो साधन संपन्न लोग गरीबों की अपेक्षा अधिक संक्रमित हुए हैं | इससे उस बात की पुष्टि नहीं हो पाई | जिसमें कहा गया है कि प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से लोग कम संक्रमित होते हैं |
दूसरी बात कोरोनाकाल में कई हृष्ट पुष्ट बलवान युवा लोगों को भी महामारी में संक्रमित होते देखा गया था जबकि लक्षणों के आधार पर उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होनी चाहिए थी उन्हें कम संक्रमित होना चाहिए था | किंतु उन्हें भी संक्रमित होते देखा जा रहा था | दूसरी ओर कई दुर्बल वृद्ध लोग जिन्हें अधिक संक्रमित होना चाहिए था किंतु वे महामारी से सुरक्षित बचे रहे , जबकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर लगती थी | इसका कारण खोजा जाना चाहिए
विशेष बात कि रोगी होने का संबंध क्या महामारी से ही होता है | यदि ऐसा होता तो महामारी आने पर भी बहुत लोग रोगी नहीं होते हैं और बहुत लोग महामारी न आने पर भी रोगी होते हैं | ऐसे में किसी के रोगी होने का संबंध महामारी से होता है या प्रतिरोधक क्षमता की कमी से ! ये पता लगाए बिना ये कैसे कहा जा सकता है कि प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने से रोगों से सुरक्षा हो जाती है और यदि हो भी जाती है तो किस प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता की मजबूती से सुरक्षा हो जाती है |
इस प्रकार से प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी से लोग रोगी होते हैं और महामारी से भी लोग रोगी होते हैं | ये कैसे पता लगाया जाए कि कोरोनाकाल में लोगों को होने वाले रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण हो रहे थे या कि महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने के कारण ! कहीं ऐसा तो नहीं है कि बहुसंख्य लोगों की प्रतिरोधक क्षमता घट गई हो इसलिए लोग रोगी हुए हों | प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण उन पर चिकित्सा का प्रभाव न पड़ा हो | इसलिए उसे महामारी समझ लिया गया हो | यदि ऐसा था तो महामारी के समय ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होने का कारण क्या था ? इसका भी अनुसंधान किया जाना चाहिए |
महामारी और प्रतिरोधक क्षमता
महामारी में जो रोगी हुए उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर थी | यदि ऐसा मान लिया जाए तो प्रश्न उठता है कि
प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर बार-बार सर्दी-जुकाम, फ्लू, पाचन संबंधी समस्याएँ (दस्त, संक्रमण), निमोनिया, ब्रोंकाइटिस जैसे गंभीर श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है| महामारी संक्रमितों को भी प्रारंभ में इसी से मिलते जुलते रोग होते देखे जा रहे थे | ऐसी स्थिति में यह खोजे जाने की आवश्यकता है कि कोरोनाकाल में जो लोग रोगी हुए उसका कारण प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना था या महामारी संबंधी संक्रमण था |
महामारी आने से यदि उन्हें ही संक्रमित होने का ख़तरा होता है | जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है | इसका मतलब दोनों घटनाओं के एक साथ घटित होने से लोग रोगी होते हैं | प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो तो महामारी आने पर भी लोगों को खतरा नहीं होता है |इसका मतलब महामारी से संक्रमित न होने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होना आवश्यक होता है | यदि ये सच है तब तो प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनाकर महामारी मुक्त समाज की संरचना के लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं | कितना अच्छा हो जब महामारी आने पर भी कोई व्यक्ति संक्रमित ही न हो!
इसके लिए जो संक्रमित नहीं हों ,उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत मान लिया जाना एवं जो संक्रमित हों उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर मान लिया जाने से समाज को सुरक्षित बचाया जाना संभव नहीं हो पाएगा | यदि कोई संक्रमित हो ही गया | उसके बाद यदि ये पता लग भी जाता है कि इनके रोगी होने का कारण प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना है तो इससे लाभ क्या हुआ ? संक्रमित तो वे हो ही गए |
इसलिए प्रतिरोधक क्षमता को पहचानने के लिए कोई अनुसंधानजनित वैज्ञानिक आधार भी होना चाहिए | जिससे किसी के संक्रमित होने से पूर्व स्वास्थ्य परीक्षण पूर्वक उसकी प्रतिरोधक क्षमता के बिषय में सही सही पता लगाया जा सके |
बताया जाता है कि सीरोलॉजी जैसे स्वास्थ्य परीक्षणों से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने का पता लगा लिया जाता है | यदि ऐसा किया जाना संभव है तो करोड़ों लोग विभिन्न कारणों से अक्सर स्वास्थ्य परीक्षण कराते रहते हैं |उन परीक्षणों में सीरोलॉजी जैसे स्वास्थ्य परीक्षणों को भी अनिवार्य किया जाना चाहिए | जिससे यह पता लगते रहेगा कि किसकी प्रतिरोधक क्षमता कब कैसी रह रही है |
इससे प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण जो लोग उस समय रोगी हैं ,उन्हें तो चिकित्सा पूर्वक तुरंत स्वस्थ कर ही लिया जाएगा | इसके अतिरिक्त भावी अनुसंधानों में भी मदद मिलेगी | ऐसे स्वास्थ्य परीक्षण पहले से कराए जाने चाहिए थे |कोरोनाकाल से पूर्व यदि ऐसा किया गया होता तो करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य परीक्षणों से महामारी आने के संकेत महामारी प्रारंभ होने से पूर्व प्राप्त किए जा सकते थे | यदि ये पूर्वानुमान सही निकलते तो महामारी से सुरक्षा के लिए तैयारियाँ करने का समय मिल सकता था |इसकी रोकथाम के लिए उसी समय से प्रयत्न प्रारंभ किए जा सकते थे | जिससे संभव है कि महामारी से जनधन का उतना अधिक नुक्सान न होता जितना हुआ है |
जिन लोगों के स्वास्थ्य परीक्षण में प्रतिरोधक क्षमता मजबूत निकलती | इसके बाद भी यदि वे संक्रमित हो जाते तो यह पता लग जाता कि महामारी से संक्रमित होने का कारण प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना न होकर कुछ और ही रहा होगा | उसकी खोज की जानी चाहिए |
प्रतिरोधक क्षमता की कमी के कारणों की खोज !
महामारीकाल में लोगों के संक्रमित होने का कारण यदि केवल महामारी को माना जाए तो महामारी का प्रभाव तो सभी लोगों पर एक समान रूप से पड़ता है !महामारी से कुछ लोग संक्रमित होते और उसीसमय उसी स्थान पर रह रहे कुछ लोग संक्रमित नहीं होते | सभी लोग संक्रमित होने चाहिए थे | इसका मतलब लोगों के संक्रमित होने के लिए महामारी या केवल महामारी जिम्मेदार नहीं है |
इसके बाद लोगों के संक्रमित होने के लिए प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी को जिम्मेदार बताया गया था | कहा जाता है कि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना भी संक्रमण बढ़ने के लिए ईंधन का काम करता है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि लोग महामारी के प्रभाव से संक्रमितहो रहे थे या प्रतिरोधक क्षमता की कमी से !लोगों के संक्रमित होने का कारण यदि प्रतिरोधक क्षमता की कमी को माना जाए तो महामारी के बिना भी प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी से लोग अस्वस्थ होते देखे जाते हैं और रोग भी महामारी से मिलते जुलते होते देखे जाते हैं | ऐसे में लोगों के संक्रमित होने में महामारी की क्या भूमिका रही है |
ऐसे में महामारी कैसे पैदा हुई यह खोजने के बजाए ध्यान प्रतिरोधक क्षमता के कम होने पर देना होगा | इतनी बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता इसी समय अचानक कम होने का कारण क्या रहा है | दूसरी बात लोगों में प्रतिरोधक क्षमता की कमी प्राकृतिक कारणों से हुई थी या उन लोगों के अपने अनियमित रहन सहन खान पान आदि की कमजोरी से हुई थी |
केवल गरीब लोग यदि अधिक संक्रमित हुए होते तो इसके लिए उन अभावों को जिम्मेदार मान लिया जाता जो गरीबत के कारण सहना लोगों की मजबूरी होती है किंतु ऐसा नहीं हुआ | इसमें अनुभव कुछ ऐसा किया गया कि साधनविहीन लोगों की अपेक्षा साधन संपन्न लोग अधिक संक्रमित हुए हैं | ऐसी स्थिति में साधन संपन्न लोगों के अधिक संक्रमित होने के लिए यदि प्रतिरोधक क्षमता की कमी को कारण माना भी जाए तो इसके लिए संसाधनों के अभाव या खान पान की कमजोरी को प्रतिरोधक क्षमता की कमी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है | मनुष्यों के स्वेच्छाचार को यदि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के लिए जिम्मेदार माना जाए तो कोरोना महामारी आने से पूर्व इतनी बड़ीसंख्या में मनुष्यों ने अपने आहार बिहार रहन सहन आदि में अचानक ऐसा क्या परिवर्तन करना शुरू कर दिया था | जिसके कारण उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगी थी | उन कारणों को खोज की जानी चाहिए | उसी के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकेगा |
महामारी या प्रतिरोध क्षमता की कमजोरी !
महामारी को यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ माना जाए तो अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाओं की तरह महामारियाँ भी आती जाती रहती होंगी किंतु दिखाई नहीं पड़ती हैं |
जिस प्रकार से तारों में बिजली आने पर दिखाई नहीं पड़ती है किंतु उसके आने का प्रभाव बिजली संबंधी उपकरणों पर पड़ता है | उससे वे चलने लगते हैं | उन्हें देखने से बिजली आने के बिषय में पता लग जाता है |
इसीप्रकार से प्रतिरोधक क्षमता कम होते दिखाई नहीं पड़ती है किंतु अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाओं को देखकर ये पता लग जाता है कि प्राकृतिक वातावरण में प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है |
ऐसे ही महामारियों का प्रकोप तभी दिखाई पड़ता है जब बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने लगते हैं और लोगों की मृत्यु होने लगती है | महामारी की पहचान यदि इतनी ही है तो ऐसा कभी भी किसी भी कारण से होने लगेगा तो उसे भी महामारीमान लिया जाएगा | इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा महामारी की कोई ऐसी पहचान विकसित की जानी चाहिए थी | जिसके आधार पर लोगों के संक्रमित होने से पहले महामारी को वैज्ञानिक आधार पर पहचाना तथा पूर्वानुमान लगाया जा सके |
जिस प्रकार से किसी ने माचिस की तीली जलाकर फेंकी हो या आकाशीय बिजली गिरी हो आग जलती तो दोनों ही प्रकार से है किंतु आग जब भयंकर रूप ले चुकी हो | उस समय आग कैसे लगी इस चर्चा में रुचि लेने के बजाए | आग को बुझाया कैसे जाए | इस पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है |
इसी प्रकार से कोरोना महामारी के आने पर लोग तेजी से संक्रमित होते जा रहे थे | उस समय अनुसंधानों का कर्तव्य महामारी से समाज को सुरक्षित बचाना था | संक्रमितों को संक्रमण से मुक्ति दिलाया जाना था | ऐसा करने के बजाय उस समय यह पता लगाने में समय बर्बाद करना कितना उचित था कि महामारी प्राकृतिक है या मनुष्यकृत ! ऐसी चर्चा महामारी से सुरक्षा संबंधी गंभीरता को कम करती है | लक्ष्य यदि महामारी से मनुष्यों की सुरक्षा करना था तो जब ये पता लग गया कि महामारी आ गई है तो पूरा ध्यान उससे सुरक्षा पर ही दिया जाना चाहिए था | मनुष्यों को समस्या उसके पैदा होने से न होकर प्रत्युत उससे संक्रमित होने से है |
जिस प्रकार से आग लगने का कारण प्राकृतिक हो या मनुष्यकृत किंतु आग लग चुकने के बाद केवल इतना ध्यान दिया जाना चाहिए कि आग से ज्वलनशील ईंधन को अलग किया जाना चाहिए |,क्योंकि जितना ईंधन मिलता जाएगा | आग उतनी भड़कती जाएगी | ईंधन का ढेर जितना बड़ा होगा आग का स्वरूप उतना बड़ा और बिकराल होगा |ईंधन थोड़ा होगा तो आग थोड़ी लगेगी ! ईंधन नहीं होगा तो आग नहीं लगेगी | ज्वलनशील ईंधन के संपर्क में आए बिना आग जहाँ जलेगी वहीं बुझ जाएगी | इधर उधर फैलेगी ही नहीं | ज्वलनशील ईंधन के संपर्क में आते ही उस आग का स्वरूप बढ़ना प्रारंभ हो जाता है |
इसी प्रकार से महामारी प्राकृतिकरूप से पैदा हो या किसी लैब से वायरस लीक होने से पैदा हो | ये बढ़ती तब है जब कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग इसके संपर्क में आते हैं | महामारी रूपी चिनगारी जब कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मनुष्यों पर पड़ती है तो बिकराल रूप धारण कर लेती है |
संभव है ऐसी घटनाएँ अक्सर घटित होती रहती हों किंतु कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग महामारी के संपर्क में न आ पाते हों| इसलिए महामारी आने के बिषय में पता नहीं लग पाता है |कोरोना काल में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता तेजी से कमजोर होती जा रही थी | इसलिए भारी संख्या में लोग महामारी से संक्रमित होते जा रहे थे |
कुलमिलाकर महामारी से लोगों के संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने के लिए महामारी की अपेक्षा लोगों में प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी अधिक जिम्मेदार रही है | महामारी रूपी चिनगारी के लिए मनुष्यों में प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी ईंधन का काम करती रही है |
महामारी काल के बिना भी दुर्बल प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग रोगी होते देखे जाते हैं | प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने पर महामारी काल में भी बहुत लोग रोगी नहीं होते हैं |इस प्रकार से महामारी से संक्रमित होने में प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने की सबसे बड़ी भूमिका होती है |
पूर्वानुमान विज्ञान कहाँ है
महामारी कब आएगी ?
ये पता लगाना इसलिए आवश्यक था ,ताकि महामारी से मनुष्यों की सुरक्षा के लिए पहले से तैयारियाँ करके रखी जा सकें | इसके बिना महामारी से सुरक्षा की कल्पना भी कैसे की जा सकती है |
कोरोनामहामारी कैसे पैदा हुई !
इसके पैदा होने का जो कारण था | उस कारण के आधार पर उससे बिपरीत वातावरण तैयार करके इससे मुक्ति पाने का उपाय खोजा जा सकता था |
महामारी कब समाप्त होगी !
इसका पता लगाया जाना इसलिए आवश्यक था ताकि उतने समय तक समाज के भरण पोषण करने की तैयारियाँ पहले से करके रखी जा सकें | दूसरी बात इससे यह अंदाजा लगाने में आसानी रहेगी कि महामारी से मुक्ति दिलाने की कोई औषधि खोजी भी जा सकी है या नहीं और जो खोजी भी गई है | उसका कोई प्रभाव पड़ता भी है या नहीं! महामारी समाप्त होने का जो समय पता लगता उसी समय समाप्त होती तब तो ऐसा माना जाता कि इसमें उपायों का कोई विशेष योगदान नहीं है | ये अपने समय से ही समाप्त हुई है |जिन उपायों को करने के बाद उस अनुमानित समय से पहले यदि महामारी समाप्त होती तो इसका श्रेय उन उपायों को दिया जा सकता था |
ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जिसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सके | विज्ञान के बिना अनुसंधान कैसे संभव हैं | अनुमानों पूर्वानुमानों का वैज्ञानिक आधार न होने के कारण कोरोना काल में जितने वैज्ञानिक उतने प्रकार की बातें सुनी जाती रही हैं |एक वैज्ञानिक के द्वारा बताए गए ऐसे काल्पनिक कारण कई बार दूसरे वैज्ञानिक से अलग होते हैं | कई बार तो एक वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारण दूसरे वैज्ञानिक के द्वारा बताए हुए कारणों से पूरी तरह से बिपरीत निकलते देखे जाते रहे हैं | कई बार विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा बताए हुए कारण एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न निकलते रहे हैं | इनमें न कोई तर्क होते हैं न विज्ञान !वैज्ञानिकों के द्वारा कहे जा रहे हैं इसलिए उन पर विश्वास करना पड़ता रहा है | अनुसंधानों के नाम पर कही जाने वाली ऐसी आधार बिहीन बातों से महामारी पीड़ित समाज को कैसे कोई मदद पहुँचाई जा सकती है | कोरोना महामारी के समय ऐसा होते कई बार देखा जाता रहा है |
कोरोना महामारी को समझने के लिए पता लगाना होगा कि कोरोनामहामारी पैदा होने का निश्चित कारण क्या था |इसके साथ ही कोरोना संबंधी संक्रमण बढ़ने या घटने का कारण क्या रहा है |उसे भी खोजना पड़ेगा | ऐसे कारणों के आधार पर महामारी संबंधी अनुसंधानों को आगे बढ़ाना पड़ेगा |
प्राचीनविज्ञान की दृष्टि से अनुसंधान किया जाए तो महामारी को समझने के लिए मौसमसंबंधी उन सभी प्राकृतिक परिवर्तनों को समझना पड़ेगा | जो कोरोना महामारी प्रारंभ होने के 12 वर्ष पहले से घटित होने प्रारंभ हुए थे |
यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ माना जाए तो इसके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने योग्य साक्ष्य कुछ ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ हो सकती हैं | जो सामान्य रूप से पहले न दिखाई पड़ती रही हों | इस आधार पर प्राकृतिक महामारी आने के कुछ पूर्व से प्रकृति में ऐसे कौन कौन से प्राकृतिकपरिवर्तन होने लगे थे | जो पहले होते नहीं देखे गए थे या कभी कभी देखे गए थे | ऐसे परिवर्तनों घटनाओं संकेतों आदि को सम्मुख रख कर ये अनुसंधान करना पड़ता है | ऐसा होने पर क्या रोगों या महारोगों के पैदा होने की परिस्थिति बनती है |
वर्तमान वैज्ञानिक अनुसंधानपद्धति के द्वारा भी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों को समझने के लिए ऐसे ही प्रयत्न किए जाने चाहिए | उसी के आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है | इसके लिए प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता है | उसी वैज्ञानिक दृष्टि इन्हें समझना संभव हो पाएगा | इसके अभाव में लोग मनमाने ढंग से घटनाओं के घटित होने के कारण अनुमान पूर्वानुमान आदि बताते देखे जाते हैं |जो गलत निकलते जाते हैं |
मनुष्यों के प्रकृति विरुद्ध रहन सहन खान पान आचार व्यवहार आदि बिगड़ने से क्षुब्ध प्रकृति की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है | इसलिए प्रकृति अपने स्वभाव से बिपरीत व्यवहार करने लगती है|
ऐसा प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुसार भी होता है | समय संचार के बिगड़ने से भी कई बार प्राकृतिक वातावरण में परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है | जिससे तरह तरह की प्राकृतिक दुर्घटनाएँ घटित होने लगती हैं |
प्राकृतिक रोग हों या महामारी में हुए रोग इनके पैदा होने का वास्तविक कारण पता नहीं लग पाता है और न ही इनसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए कोई चिकित्सा औषधि आदि का ही पता लग पाता है |
परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता
जीवों में परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता जन्म के साथ ही प्रकृति प्रदत्त होती है | उन्हें सभी प्रकार की परिस्थितियों में अपना उतना जीवन जीना ही पड़ता है | जितनी श्वासें जीने को मिली हैं |
प्रतिरोधक क्षमता केवल शारीरिकरूप से ही नहीं घटती बढ़ती है | इसके अतिरिक्त एक परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता भी होती है | इसका अनुभव मनुष्यों को तब होता है,जब किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा में बहुत लोग किसी एक प्रकार की हिंसक परिस्थिति का सामना कर रहे होते हैं | उसमें कुछ लोगों की मृत्यु हो जाती है | कुछ लोग घायल हो जाते हैं तो कुछ लोग परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने के कारण पूरी तरह सुरक्षित होते हैं | जिन्हें खरोंच भी नहीं लगती है |
कोरोना महामारी के समय भी बहुत लोग संक्रमितों के साथ रह कर भी संक्रमित होने से बचे रहे | इसका कारण उनकी परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता का प्रभाव है | जिन संकटों से मनुष्यकृत प्रयत्नों से मुक्ति मिलनी संभव ही नहीं होती है |परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता वहाँ भी सुरक्षा कर लेती है |
किसी कार में 4 लोग बैठे हुए होते हैं | कार खाई में गिर जाती है | उनमें से तीन की मृत्यु हो जाती है और एक बिल्कुल स्वस्थ सुरक्षित होता है | ऐसा उस एक व्यक्ति की परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने के कारण ही हो पाता है | उसी कार में बैठे होने के कारण चोट तो उसे भी उतनी ही लगी होती है ,लेकिन बचाव हो जाता है |
ऐसी बहुत सारी दुर्घटनाओं रोगों महामारियों प्राकृतिकआपदाओं से परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता संपन्न लोग सुरक्षित बच निकलते हैं | कोरोना महामारी के समय जो लोग संक्रमित नहीं हुए पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित बने रहे | इसका कारण उन पर परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता का प्रभाव रहा है | जिससे उनके शरीरों के साथ साथ आयु की भी सुरक्षा होती रही है | मृत्यु को टालना केवल परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता से ही संभव है |
परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता विहीन लोगों को न तो स्वस्थ किया जा सकता है और न ही जीवित बचाया जा सकता है | चिकित्सकों को पता होता है कि ऐसे रोगियों को स्वस्थ करने के लिए कितने भी प्रयत्न किए जाएँ फिर भी परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता विहीन लोगों की मृत्यु होगी ही | इसीलिए ऐसे शव रखने के लिए अस्पतालों में शवगृह बनाए जाते हैं |
परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता का मतलब समय शक्ति है | जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रयत्नों के विरुद्ध परिणाम देने वाली उस समय शक्ति को समझने के लिए न तो कोई विज्ञान है न अनुसंधान हैं | न समझने की सामर्थ्य है | इसलिए यदि कोई समझाना भी चाहे तो कैसे समझावे | इसे समझने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है| परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता को न समझ पाने के कारण ही कोरोनामहामारी को समझना संभव नहीं हो पाया है ,क्योंकि महामारी की संपूर्ण संरचना ही परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर टिकी हुई थी |
परोक्ष प्रतिरोधक क्षमता विहीन लोगों की सुरक्षा के लिए उन्हें कितने भी सघन चिकित्सकीय पहरे में क्यों न रखा जाए किंतु न तो उन्हें रोगी होने से बचाया जा सकता है और न ही उनकी मृत्यु को टाला जा सकता है | ऐसे ही प्रतिरोधक क्षमता युक्त लोगों का स्वास्थ्य और जीवन प्रायः सभी परिस्थितियों में सुरक्षित रहता ही है |
इसीलिए साधनविहीन बिपरीत परिस्थितियों में जीवन जीने वाले गरीब ग्रामीण जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोग भी स्वास्थ्य संबंधी उन्हीं परिस्थितियों का सामना करते हैं | घाव उनके भी होते हैं रोग उन्हें भी होते हैं | जन्म और मृत्यु उनके यहाँ भी होती है |
ऐसे सभीप्रकार के संसाधनों से हीन,चिकित्सा सुविधा विहीन लोगों को भी स्वस्थ एवं पूर्णायु प्राप्त करते देखा जाता है | उन लोगों की भी जनसंख्या बढ़ते देखी जा रही है | आदिकाल में जब विज्ञान नहीं था तब भी समस्याएँ ऐसी ही रही होंगी फिर भी लोग स्वस्थ सुरक्षित बने रहे,तभी तो सृष्टिक्रम यहाँ तक पहुँच पाया है | उस समय वर्तमान समय जैसा अत्याधुनिक उन्नत विज्ञान न होने पर भी प्रतिरोधक क्षमता युक्त लोग स्वस्थ एवं सुरक्षित बने रहते थे |
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महामारी बिषयक अनुसंधानों से अपेक्षा !
प्रकृति में बहुत सारी घटनाएँ समय समय पर घटित होती रहती हैं |जिनसे मनुष्यों का नुक्सान न होने के कारण उनका पता ही नहीं लग पाता है कि वे कब घटित हो रही हैं | उनसे कोई भय भी नहीं होता है | सघन जंगलों में मरुस्थलों में या समुद्रों में अतिवर्षा बाढ़ भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं |वहाँ मनुष्यों की बस्तियाँ नहीं होती हैं तो उनसे किसी का नुक्सान नहीं होता है | इसलिए उनसे किसी को चिंता भी नहीं होती है |मनुष्यों की बस्तियाँ जहाँ होती हैं | प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से वहीं नुक्सान होता है |उनसे सुरक्षा कैसे की जाए |इसके लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है |
महामारी आना और महामारी से संक्रमित होना ये दोनों अलग अलग प्रकार की घटनाएँ हैं | मनुष्यों का नुक्सान महामारी आने से नहीं,प्रत्युत महामारी में संक्रमित होने से होता है | इसलिए महामारी को समझने की अपेक्षा उस समय महामारी से सुरक्षा के उपाय खोजे जाने चाहिए |
महामारी काल में लोगों के संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने के लिए महामारी को जिम्मेदार बताया जाता है किंतु जिस प्रकार से वर्षा होने पर सभी लोग भीगते हैं | भूकंप आने पर सभी लोग हिलते हैं | आँधी तूफ़ान से सभी प्रभावित होते हैं | ऐसे ही लोग महामारी से लोग संक्रमित होते तो सभी होते | एक ही स्थान पर रहते हुए कुछ लोगों के संक्रमित होने एवं बहुत लोगों के संक्रमित न होने से महामारी के प्राकृतिक होने पर संशय होना स्वाभाविक है | महामारी यदि मनुष्यकृत होती तो भी उससे कौन संक्रमित हो सकता है और कौन नहीं | इसका कोई तो निर्धारित मानक होता ! बूढ़े बच्चे स्वस्थ दुर्बल स्त्री पुरुष आदि किस श्रेणी के लोगों को इससे संक्रमित होने की अधिक संभावना है | इसलिए इसे मनुष्यकृत कहने का आधार भी खोजना होगा और अनुसंधान पूर्वक बताया जाना चाहिए कि जो संक्रमित हुए और जो संक्रमित नहीं हुए उनमें क्या अंतर था | बहुत लोग पूरी तरह स्वस्थ बलिष्ठ थे उन्हें भी संक्रमित होते देखा गया था | बहुत लोग दुर्बल थे उम्र भी अधिक थी वे संक्रमितों के साथ रहकर भी संक्रमित नहीं हुए | इसलिए संक्रमित होने या न होने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण खोजा जाना चाहिए |
संपूर्ण जनसंख्या का यदि आधा चौथाई भाग संक्रमित हुआ तो वे संक्रमित क्यों हुए और बाक़ी जो लोग संक्रमित नहीं हुए तो वे संक्रमित क्यों नहीं हुए | उनके संक्रमित न होने का कारण पता लगाया जाना चाहिए | जिस प्रकार या कारण से कुछ लोग संक्रमित होने से बचे रहे |रिसर्च पूर्वक वो कारण खोजकर उसीप्रकार से बाक़ी लोगों की भी सुरक्षा का प्रयत्न किया जाना चाहिए | ऐसा यदि किया जा सका होता तो उन लोगों को भी संक्रमित होने से सुरक्षित बचाया जा सकता था | जो संक्रमित हुए हैं | ऐसा किया जाना यदि संभव हो पाता तो महामारी आई थी ये पता ही नहीं लग पाता !
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