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प्राकृतिक

     महामारी मनुष्यकृत  है या प्राकृतिक ! इसका विस्तार कितना है !प्रसार माध्यम क्या है !अंतर्गम्यता कितनी है ! कोरोना वायरस किसी देश लैब से लीक हुआ  है या प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ है ! महामारी या उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने पर तापमान के घटने बढ़ने का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं | वायु प्रदूषण बढ़ने घटने का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं | खान पान का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं !संक्रमितों पर चिकित्सा  का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं ! टीकों आदि का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं  ! संक्रमण बढ़ने  घटने पर कोविड नियमों के पालन का प्रभाव पड़ता था या नहीं |ऐसे  प्रश्नों के निश्चित उत्तर  खोजे बिना किसी महामारी वैज्ञानिक की वैज्ञानिकता पर संशय होना स्वाभाविक ही है |
    वर्तमान समय विज्ञान को जिस उन्नत शिखर पर पहुँचा बताया जाता है | ये  केवल कहने सुनने से नहीं होगा | ये सिद्ध भी किया जाना चाहिए कि कोरोनामहामारी से सुरक्षित बचाने में या संक्रमितों को स्वस्थ करने में विश्व वैज्ञानिक जगत का क्या योगदान रहा ! कोरोना महामारी को समझने में विज्ञान कितना सफल हुआ | कोरोना महामारी या उसकी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने में विज्ञान कितना सफल हुआ | ऐसी सफलताओं को सामने रखकर ही विज्ञान की वैज्ञानिकता के आस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए | अन्यथा नहीं |
      मूल्यांकन करने की समाज की अपनी शैली होती है | तंत्र मंत्र जादूटोना  झाड़ फूँक  करके समाज को रोग मुक्त समस्या का दावा करने वाले लोग यदि ऐसा नहीं कर पाते हैं तो समाज उन्हें अंधविश्वास फैलाने वाला मान लेता  है |इसी कसौटी पर महामारी संबंधी वैज्ञानिक दावों को भी कसा जाना चाहिए | महामारी के बिषय में उनके द्वारा लगाए गए अनुमान गलत निकलते चले गए ! पूर्वानुमान गलत निकलते चले गए ! चिकित्सा की दृष्टि से किए गए प्रयत्न फलित नहीं हुए !
     ऐसी स्थिति में विज्ञान के नाम पर ,वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर,प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित  पूर्वानुमानों के नाम पर ,जलवायु परिवर्तन के भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों के नाम पर जो जो कुछ बताया जाता है !उसका कोई निश्चित वैज्ञानिक आधार नहीं होता है | जिसे किसी भी प्रकार से प्रमाणित किया जा सके | 
      इसी दोष के कारण तंत्र मंत्र जादूटोना  झाड़ फूँक आदि को यदि अंधविश्वास की संख्या दी जा सकती है तो प्राकृतिक घटनाओं के विषय में समय समय पर वैज्ञानिकों के द्वारा दिए जाने वाले वक्तव्यों को भी  अंधविश्वास  को बढ़ावा  दिया जाने वाला क्यों न मानकर उससे दूरी बना ली जाए | जिससे ऐसे लोगों के द्वारा फैलाई जाने वाली अफवाहों  से समाज में डर, घबराहट या दहशत  पैदा न हो। 
      समय समय पर वैज्ञानिकों के द्वारा कह दिया जाता है - " हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आने वाला है |"जलवायु परिवर्तन के कारण आज के दो सौ दो सौ वर्ष बाद भीषणसूखा  पड़ेगा,तापमान बहुत अधिक बढ़ जाएगा ,आदि और बहुत सारी ऐसी डरावनी बातों की भविष्यवाणियाँ  उन लोगों के द्वारा परोसी जा रही होती हैं | जिनके द्वारा इस मानसून में कैसी वर्षा होगी | इस महीने या सप्ताह में  वर्षा होगी इसके सही पूर्वानुमान नहीं प्रस्तुत किए जा सके |  
    माना कि वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा बहुत सारे क्षेत्रों में एक से एक बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा चुकी हैं | जिनके द्वारा जीवन की बहुत सारी कठिनाइयाँ कम हुई हैं | जीवन सुख सुविधा संपन्न हुआ है | इनका लाभ मनुष्यों को तभी मिल पाएगा जब वे स्वस्थ और जीवित रहेंगे | महामारी भूकंप आदि प्राकृतिकआपदाओं से बहुत बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु अचानक हो जाती है | वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए विकास उनके किस काम के !
     इसलिए समाज को स्वस्थ और सुरक्षित बचाने के प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए | इस लक्ष्य को  प्राप्त किए बिना केवल दावे कर कर के किसी बिषय को विज्ञान के रूप में थोपा जाना ठीक नहीं है | अनुसंधानों के नाम पर ऐसे कार्यों पर जनता से टैक्स रूप में प्राप्त किया धन नहीं व्यय किया जाना चाहिए | जिनसे प्राप्त परिणामों से समाज की मदद न की जा सके | केवल दावे किए जाते रहें | इन्हीं डॉन में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने डेढ़ सौ वर्ष बिता दिए | मिला क्या ये स्वयं में अनुसंधान का बिषय है | 
     
यदि ऐसा होता तो कोरोना महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने में विज्ञान से कुछ तो मदद मिली होती पीड़ितों विज्ञान को   
     

    वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसे  प्रश्नों के निश्चित उत्तर दिए जाने चाहिए थे समाज को 

महामारी मनुष्यकृत है या 

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