जिसप्रकार से किसी फिल्म में एक पटकथा लेखक होता है | एक निर्देशक होता है | कुछ अभिनेता होते हैं |पट कथा लेखक उस कहानी को लिखता है | निर्देशक उन कलाकारों को अभिनय के लिए प्रशिक्षित करता है | उसी पटकथा के अनुसार निर्देशक के निर्देशन में अभिनेता लोग अपनी अपनी भूमिका निभाते हैं | दर्शक लोग केवल अभिनय देखते हैं, समझदार लोग निर्देशन की बारीकियों पर भी ध्यान देते हैं ,जबकि ज्ञानी लोग पटकथा की गुणवत्ता को भी समझते हैं |
इसी प्रकार से इस ब्रह्मांड का सृजन करने वाली सर्वोच्च शक्ति ही भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि प्राकृतिक घटनाओं की पटकथा लेखक होती है | उन घटनाओं को घटित कब कैसे होना है | उसका निर्देशन समय करता है | उस सर्वोच्च शक्ति की पटकथा के अनुशार समय के निर्देशन में भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाएँ घटित होती हैं | ये घटित होते रंगमंच अर्थात सामने दिखाई पड़ती हैं | यही उनका अभिनय होता है |
विशेष बात ये है कि रंगमंच पर न तो पटकथा लेखक दिखाई पड़ता है और न ही निर्देशक दिखाई पड़ता है | वहाँ केवल अभिनेता ही दर्शकों के सामने नाटक आदि प्रस्तुत कर रहे होते हैं | अभिनेता जो अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करते दिखाई पड़ रहे होते हैं | उन्हें यह नहीं पता होता है कि भविष्य में क्या दिखाया जाएगा | पटकथा के लेखक निर्देशक आदि जिन्हें यह पता होता है कि इस नाटक के अगले अंशों में क्या क्या दिखाया जाएगा ,किंतु ये उस जो रंग मंच पर दिखाई नहीं दे रहे होते हैं |
इसलिए अभिनेताओं के अभिनय पर कितना भी बड़ा रिसर्च क्यों न कर लिया जाए किंतु उसके आधार पर इस बात का अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाया जा सकता है कि भावी दृश्यों में क्या दिखाया जाएगा |
इसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाओं को प्रत्यक्ष देखने के अतिरिक्त उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि कैसे लगाया जा सकता है |
जिस प्रकार से नाटक की पटकथा लिखी कहीं और जाती है | निर्देशन कहीं और होता है और रंगमंच पर प्रस्तुति कहीं और हो रही होती है | जहाँ प्रस्तुति हो रही होती है उस स्थान एवं उन अभिनेताओं एवं दर्शकों के बिषय में कितना भी बड़ा अनुसंधान करके यह पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है कि नाटक के अगले अंशों में क्या क्या दिखाया जाएगा | इसका कारण उस पटकथा का उस निर्देशक का वहाँ विद्यमान न होना है | वैसे भी जिस रंगमंच पर नाटक का प्रस्तुतीकरण हो रहा होता पटकथा उससे दूर किसी एकांत स्थान में लिखी गई होती है | इसलिए वहाँ उसके अंश कैसे विद्यमान हो सकते हैं | वहाँ उन्हें खोजने का का प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए |
इसी प्रकार से जिस स्थान पर भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाएँ घटित हो रही होती हैं | वहाँ न तो उनके निर्मित होने के कारण विद्यमान होते हैं और न ही वहाँ से उनके बिषय में कोई जानकारी ही जुटाई जा सकती है | ऐसी स्थिति में जहाँ भूकंप आता है वहाँ कितना भी गहरा गड्ढा खोद लिया जाए उससे भूकंपों के निर्माण के बिषय में वास्तविक कारण कैसे पता लगाए जा सकते हैं | सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसी प्रकार से उपग्रहों के द्वारा बादलों या आँधी तूफ़ानों को देखकर उनकी निर्माणप्रक्रिया के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना कैसे संभव है | उपग्रह आदि यंत्रों से तो केवल निर्मित बादलों या आँधी तूफानों को ही देखा जा सकता है | इसके आधार पर कितने बादल और बनेंगे उनसे कितने दिन तक वर्षा और होती रहेगी या कितने तूफ़ान और आएँगे ये नहीं पता लगाया जा सकता है |
इसी प्रकार से इस ब्रह्मांड का सृजन करने वाली सर्वोच्च शक्ति ही भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि प्राकृतिक घटनाओं की पटकथा लेखक होती है | उन घटनाओं को घटित कब कैसे होना है | उसका निर्देशन समय करता है | उस सर्वोच्च शक्ति की पटकथा के अनुशार समय के निर्देशन में भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाएँ घटित होती हैं | ये घटित होते रंगमंच अर्थात सामने दिखाई पड़ती हैं | यही उनका अभिनय होता है |
विशेष बात ये है कि रंगमंच पर न तो पटकथा लेखक दिखाई पड़ता है और न ही निर्देशक दिखाई पड़ता है | वहाँ केवल अभिनेता ही दर्शकों के सामने नाटक आदि प्रस्तुत कर रहे होते हैं | अभिनेता जो अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करते दिखाई पड़ रहे होते हैं | उन्हें यह नहीं पता होता है कि भविष्य में क्या दिखाया जाएगा | पटकथा के लेखक निर्देशक आदि जिन्हें यह पता होता है कि इस नाटक के अगले अंशों में क्या क्या दिखाया जाएगा ,किंतु ये उस जो रंग मंच पर दिखाई नहीं दे रहे होते हैं |
इसलिए अभिनेताओं के अभिनय पर कितना भी बड़ा रिसर्च क्यों न कर लिया जाए किंतु उसके आधार पर इस बात का अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाया जा सकता है कि भावी दृश्यों में क्या दिखाया जाएगा |
इसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाओं को प्रत्यक्ष देखने के अतिरिक्त उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि कैसे लगाया जा सकता है |
जिस प्रकार से नाटक की पटकथा लिखी कहीं और जाती है | निर्देशन कहीं और होता है और रंगमंच पर प्रस्तुति कहीं और हो रही होती है | जहाँ प्रस्तुति हो रही होती है उस स्थान एवं उन अभिनेताओं एवं दर्शकों के बिषय में कितना भी बड़ा अनुसंधान करके यह पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है कि नाटक के अगले अंशों में क्या क्या दिखाया जाएगा | इसका कारण उस पटकथा का उस निर्देशक का वहाँ विद्यमान न होना है | वैसे भी जिस रंगमंच पर नाटक का प्रस्तुतीकरण हो रहा होता पटकथा उससे दूर किसी एकांत स्थान में लिखी गई होती है | इसलिए वहाँ उसके अंश कैसे विद्यमान हो सकते हैं | वहाँ उन्हें खोजने का का प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए |
इसी प्रकार से जिस स्थान पर भूकंप आँधी तूफ़ान बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाएँ घटित हो रही होती हैं | वहाँ न तो उनके निर्मित होने के कारण विद्यमान होते हैं और न ही वहाँ से उनके बिषय में कोई जानकारी ही जुटाई जा सकती है | ऐसी स्थिति में जहाँ भूकंप आता है वहाँ कितना भी गहरा गड्ढा खोद लिया जाए उससे भूकंपों के निर्माण के बिषय में वास्तविक कारण कैसे पता लगाए जा सकते हैं | सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसी प्रकार से उपग्रहों के द्वारा बादलों या आँधी तूफ़ानों को देखकर उनकी निर्माणप्रक्रिया के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना कैसे संभव है | उपग्रह आदि यंत्रों से तो केवल निर्मित बादलों या आँधी तूफानों को ही देखा जा सकता है | इसके आधार पर कितने बादल और बनेंगे उनसे कितने दिन तक वर्षा और होती रहेगी या कितने तूफ़ान और आएँगे ये नहीं पता लगाया जा सकता है |
इसीलिए कई बार किसी क्षेत्र में जब लंबे समय तक लगातार वर्षा होती रहती है | उस समय मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा दो दिन और वर्षा होने की भविष्यवाणी की जाती है | उसके बाद भी वर्षा होती रहती है तो 72 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है फिर भी वर्षा न रुकी तो 48 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है | ये सिलसिला जब तक वर्षा होती रहेगी तब तक चलता रहेगा | वस्तुतः भविष्यवाणियों के नाम पर ये आँखों देखा हाल बताया जाता है | वैसे भी जिन मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा एक दो सप्ताह की वर्षा संबंधी भविष्यवाणियाँ एक साथ नहीं बताई जा पाती हैं | उनके द्वारा आगामी मानसून में कैसी वर्षा होगी या जलवायुपरिवर्तन के प्रभाव से आज के सौ दो सौ वर्ष बाद मौसम संबंधी कैसे कैसी घटनाएँ घटित होते देखी जाएँगी | इस बिषय में भविष्यवाणियाँ की जा रही होती हैं | उन्हें कैसे विश्वसनीय माना जा सकता है |
इसीलिए अभी तक बज्रपात चक्रवात महामारी आदि घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाए जाने संभव नहीं हुए हैं |
प्राकृतिक घटनाओं के निर्मित होने के कारणों या उनकी निर्माण प्रक्रिया के बिषय में जो जो कुछ बताया जाता रहा है |उसे सच्चाई की कसौटी पर कसे जाने की आवश्यकता है | इससे समाज का संपूर्ण भ्रम दूर हो जाएगा कि ऐसे किस्से कहानियों का प्राकृतिक घटनाओं की निर्माण प्रक्रिया से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं होता है |
इसमें सच्चाई होती तो वर्षा होने के लिए जिस प्राकृतिक परिस्थिति को जिम्मेदार बताया जाता है |उस परिस्थिति के आधार पर अनुसंधान पूर्वक वर्षा के बिषय में मध्यावधि या दीर्घावधि सही पूर्वानुमान क्यों नहीं लगाए जा सके हैं |उसके लिए बादलों को प्रत्यक्ष या यंत्रों से देखकर ही तीर तुक्के लगाए जाते हैं | यही स्थिति आँधी तूफानों की है वे कैसे बनते हैं | इसके बिषय में तमाम किस्से कहानियाँ गढ़ी गई हैं | उनमें आँधीतूफानों के निर्मित होने के लिए जिन कारणों को जिम्मेदार बताया जाता है | उन कारणों के आधार पर आँधीतूफानों के निर्मित होने के बिषय में कभी कोई सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका है | यही स्थिति सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं की है |
कुल मिलाकर प्राकृतिक घटनाओं के निर्माण होने के कारणों का पता लगाने के लिए या तो उस सर्वोच्च शक्ति के द्वारा लिखी पटकथा समझनी पड़ेगी या फिर उस समय को समझना पड़ेगा जो ऐसी घटनाओं का सूत्रधार होता है |समय संचार को गणित के द्वारा समझा जा सकता है | गणित ही प्रकृति की भाषा है |
समय के साथ होते हैं प्रकृति में परिवर्तन !
सृष्टि में परिवर्तन निरंतर होते ही रहते हैं | तापमान बढ़ना घटना भी एक प्रकार का प्राकृतिक परिवर्तन ही होता है |तापमान बढ़ने घटने का वर्षा एवं आँधी तूफ़ान जैसी घटनाओं के बनने में बड़ा योगदान होता है |आँधी तूफ़ान जैसी घटनाएँ भी तापमान के सहयोग से ही निर्मित होती हैं | मौसम को समझने के लिए तापमान के बढ़ने घटने के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान लगाते रहना होता है |
किसी नाटक के रंगमंच की तरह पृथ्वी और आकाश का मध्यभाग ही रंगमंच है | पृथ्वी और आकाश तो अपने अपने स्थान पर लगभग एक जैसी परिस्थिति में बने रहते हैं |उन दोनों के बीच बने काल्पनिक रंगमंच पर गर्मी वर्षा सर्दी आदि समय की अवस्थाएँ ऋतुरूप में अपना अपना अभिनय करती रहती हैं | इसी रंग मंच पर समय के साथ संपूर्ण प्रकृति बदलते रहती है |
बसंत आदि ऋतुएँ समय का ही अंग होती हैं | बसंतऋतु के आने पर तापमान बढ़ने लगता है | ग्रीष्मऋतु का समय आने पर तापमान और अधिक बढ़ जाता है | उष्ण हवाएँ चलने लगती हैं |आकाश प्रायः बादलों से मुक्त होता है| इसके बाद वर्षाऋतु का समय आता है तो आकाश में बादलों की घनघोर घटाएँ घिर जाती हैं | हेमंत और शिशिर ऋतुओं का समय आने पर आकाश कोहरा पाला आदि से ढक जाता है | ठंडी ठंडी हवाएँ चलने लगती हैं |
इसका मतलब गर्मी वर्षा सर्दी होने का कारण समय ही होता है | इसलिए ऐसी घटनाओं को समझने एवं इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए समय संबंधी अनुसंधानों की ही आवश्यकता होती है |
समय जब जैसा आता है | प्राकृतिक वातावरण में तब तैसे बदलाव होने लगते हैं |बसंत ऋतु आने पर पेड़ों में पतझड़ होने लगता है | नई नई कोपलें निकलने लगती है | आम के पेड़ों में मंजरियाँ लगने लगती हैं | ऐसे ही गरमी की ऋतु आने पर आम इमली गन्ना खरबूजा तरबूज आदि मीठे होने लगते हैं | ऐसे अनेकों प्रकार के परिवर्तन प्राकृतिक वातावरण में होते देखे जाते हैं |
इसी प्रकार से ऋतुओं के अनुसार जीव जंतुओं के व्यवहार में परिवर्तन होते देखे जाते हैं |बसंत ऋतु में कोयलें कूकने लगती हैं | ऐसे ही सभी ऋतुओं से संबंधित जीव जंतु ऋतुओं के अनुसार आचार व्यवहार अपनाने लगते हैं | कई बार कुछ ऋतुओं के चिन्ह कुछ दूसरी ऋतुओं में भी प्रकट होने लगते हैं | जीव जंतु भी उसी प्रकार का व्यवहार करने लगते हैं |ऐसे समय उस प्रकार का समय आ गया है | ऐसा स्वीकार करना चाहिए | उसी के अनुसार मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना चाहिए |
कोरोना महामारी के समय विशेषज्ञों को बार बार कहते सुना जाता रहा है कि महामारी के आने जाने पर या संक्रमण के बढ़ने घटने पर मौसम संबंधी घटनाओं का प्रभाव पड़ता है | इसलिए महामारी संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना पड़ेगा |
ऋतुओं में कुछ दूसरी ऋतुओं का प्रभाव
ग्रीष्मऋतु में वर्षा होने लगने का मतलब ये वर्षा ऋतु का प्रभाव है ना या
मौसम का पूर्वानुमान लगाने की प्राचीनविधियाँ
साधना के आधार पर ,गणित के आधार पर, प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर,पेड़ पौधों में हो रहे परिवर्तनों के आधार पर ,जीव जंतुओं के व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों के आधार पर मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है | इन्हीं अनुमानों पूर्वानुमानों के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है |
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