भूमिका
महामारी पीड़ितों को रिसर्चों से क्या मिला !
महामारी आई और चली गई ,लेकिन भविष्य के लिए अनेकों अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई है | जिनके उत्तर वर्तमान में भले न खोजे जा सके हों लेकिन भविष्य के लिए अवश्य खोज कर रख लिए जाने चाहिए अन्यथा कोरोना महामारी के समय जितना जो कुछ जनधन का नुक्सान हुआ है वो तो जिस किसीप्रकार से सह लिया गया है किंतु भविष्य की महामारियों में इससे भी बड़ा नुक्सान हो सकता है | ऐसी कल्पना करनी चाहिए |
नुक्सान की दृष्टि से देखा जाए तो भारत को पडोसी देशों के साथ लगभग 3 युद्ध लड़ने पड़े हैं | उन तीनों युद्धों में मिलाकर जितने लोगों की मृत्यु हुई है | उससे कई गुणा अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | समाज को महामारी के रूप में इतनी भीषण आपदा तब सहनी पड़ी है | जिससे लाखों लोगों की मृत्यु कीड़े मकोड़ों की तरह होती चली जा रही थी | शमशानों में लाशों के ढेर लगे थे | अस्पताल बीमारों से भरे पड़े थे | महामारी के द्वारा किसका कौन रिस्तेदार कौन आत्मीय जन कौन पारिवारिक सदस्य कब कब छीन लिया जाएगा | पता ही नहीं था | जिन चिकित्सा वैज्ञानिकों पर समाज भगवान् की तरह भरोसा करता है | जनता अपनी कातर निगाहों से अपने भूभगवानों(वैज्ञानिकों) की ओर बड़ी आशा से देख रही थी | वही वैज्ञानिक जगत प्रकृति के इस तांडव को बेबश देख रहा था | यही विश्व वैज्ञानिकों की दशा थी |
गंभीर चिंता की बात है कि हजारों वर्ष पहले मनुष्य का जब विकास बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था में था | आधुनिक सभ्यता, तकनीक आदि का विकास बिल्कुल नहीं हुआ था। उस समय यदि कोरोना जैसी कोई महामारी आई होगी | वैज्ञानिक योगदान की दृष्टि से उस महामारी की तुलना यदि 2019 की कोरोना महामारी से की जाए तो अंतर इतना ही रहा होगा कि उस युग में महामारी से मरती जा रही जनता को देखने वाले बेबश महामारी वैज्ञानिक नहीं रहे होंगे | इस युग में एक ओर इतना उन्नत विज्ञान तो दूसरी ओर ऐसे अनुसंधान जिनका महामारी पीड़ितों की मदद करने में कोई योगदान ही न रहा हो | ये इस प्रकार से बिचार किए जाने योग्य बात है |
विज्ञान अत्यंत उन्नत है | वैज्ञानिक अत्यंत योग्य हैं |अनुसंधान निरंतर होते रहते हैं |इन अनुसंधानों को करने कराने में इनके बताए हुए आवश्यक संसाधन उपलब्ध करवाने में सरकारें पानी की तरह पैसा बहाती हैं |आखिर कमी कहाँ रह गई जो इतनी बड़ी महामारी के समय उनके द्वारा किए जाते रहे अनुसंधानों से समाज की सुरक्षा नहीं की जा सकी |
महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में अनुसंधान करने की जिम्मेदारी सँभालने वाले वैज्ञानिकों को विश्व बिचारमंचों पर भेजकर सम्मान दिलवाने में, ऊँची ऊँची पद प्रतिष्ठा प्रदान करने में ,सुख सुविधाएँ प्रदान करने में, निर्धारित प्रतिष्ठापूर्ण पारिश्रमिक प्रदान करने में सरकारें उत्साहबर्धक भूमिका निभाती हैं | धन की कमी कभी आड़े नहीं आने देती हैं |
विज्ञान उन्नत है | उसके द्वारा धरती की गहराई से लेकर आकाश की उँचाई तक पहुँचा जाने लगा है | इस दृष्टि से विज्ञान और विकास नित नूतन उँचाइयाँ चूम रहा है | उससे जीवन की कठिनाइयों को सरल करने एवं सुख सुविधाओं को बढ़ाने की दृष्टि से सराहनीय विकास कर लिया गया है |
ऐसी परिस्थिति में बिचार करने की बात यह है कि इतना सारा विकास जिन मनुष्यों की कठिनाइयाँ कम करने एवं उन्हें सुख सुविधा प्रदान करने के लिए किया गया है | मानव जीवन की भविष्य में और अधिक उन्नति करने के लिए किया गया है | उसी मनुष्य जीवन को कोरोना जैसी महामारियाँ तथा भूकंप तूफ़ान बज्रपात बाढ़ एवं बादल फटने जैसी आपदाएँ यदि ऐसे ही निगलती रहीं तो उस विकास का क्या होगा जो मनुष्यों को सुख सुविधाएँ देने एवं उनका भविष्य उन्नत बनाने के लिए किया गया है |
कोरोना महामारी से हममें से जितने लोग भी जीवित बचे हैं | उनके जीवित बचने का कारण उनकी अपनी कोई न तो विशेषता है और न ही उन्होंने ऐसा कोई विशेष प्रयत्न किया है | उनके जीवित बचने में न तो विज्ञान का कोई योगदान है और न ही उनका बचा हुआ जीवन सरकारों के किसी प्रयास का ही परिणाम है | उन्हें तो कोरोना महामारी के द्वारा कृपा पूर्वक जीवित छोड़ दिया गया है | इसलिए जीवित हैं | महामारी चाहती तो बचे खुचे लोगों को भी समाप्त कर सकती थी तो भी उसका हाथ नहीं पकड़ा जा सकता था | विश्व की उपलब्धियों ये क्षमता ही नहीं थी कि अपने अनुसंधानों के बलपर कुछ देशों प्रदेशों को ही उद्घोषणा पूर्वक सुरक्षित बचाकर ये दिखाया तो जा सकता था कि वैज्ञानिकअनुसंधानों में महामारी से सुरक्षित बचाने की क्षमता है | संसाधनों की कमी होने के कारण अबकी एक जिला प्रदेश या देश को ही सुरक्षित बचाया जा सका है | भविष्य में संपूर्ण समाज को महामारियों से सुरक्षित बचाने के लिए प्रभावी प्रबंध कर लिए जाएँगे | समाज को भी उनकी बातों पर भरोसा होता कि वैज्ञानिकों ने जिस जिला प्रदेश या देश को ही सुरक्षित बचाने की घोषणा की थी उसे उन्होंने बचा लिया है, या वहाँ महामारी का प्रकोप कम कर लिया गया है |इससे भविष्य के लिए कुछ आशा बँधती | ऐसा कुछ करके दिखाया नहीं जा सका | इसलिए कोरोना महामारी ने अभी जितना जनसंहार करना था | उतना तो कर ही लिया है | भविष्य के लिए भी अभी पूरा भय बना हुआ है कि ऐसी भयंकर महामारी भविष्य में न जाने कब आकर अचानक हमला कर दे | उससे सुरक्षा के लिए मनुष्यों के पास कुछ भी नहीं हैं | ऐसे प्राकृतिक संकटों में सुरक्षा की जिम्मेदारी सँभालने में विज्ञान से अभी की तरह भविष्य के लिए कैसे कोई आशा की जा सकती है |
रिसर्चों के नाम पर जनता का नुक्सान न किया जाए
रिसर्चों के नाम पर मनगढंत बातों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए | ऐसी बातों से कई बार उसी जनता का नुक्सान होता है | जो ऐसे अनुसंधानों का खर्च वाहन करती है | जनता सोचती कृषिकार्यों है कि विशेषज्ञ कह रहें हैं तो सही ही होगा | किसी न किसी अनुसंधान से उन्हें पता लगा होगा ,जबकि पता लगता है उन बातों का कोई वैज्ञानिकआधार ही नहीं होता है | वो उनकी व्यक्तिगत बातें थीं या ऐसी आधार विहीन कल्पनाएँ थीं | जिनका वैज्ञानिक अनुसंधानों से कोई लेना देना ही नहीं था | ऐसी स्थिति में जिन समस्याओं के पैदा होने या बढ़ने का कारण ही पता न हो तो उसका निवारण कैसे कर लिया जाएगा |
वायुप्रदूषण को ही लें तो वैज्ञानिकों के द्वारा वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए कोई निश्चित कारण नहीं खोजा जा सका है | धुआँ धूल उड़ाने वाले सभी कार्यों को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बता दिया गया है | इसका आधार कोई तर्कसंगत वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं है | जिसमें प्रमाणित कारणों के साथ इसे सिद्ध किया जा सका हो | इसके बाद भी उन लोगों के विरुद्ध कार्यवाही कर दी जाती है जिनके कार्यों से धुआँ धूल उड़ती है | भारत कृषि प्रधान देश है | कृषि के कार्य होते ही मिटटी से संबंधित हैं | धुआँ धूल उड़ना आम बात है | घर बनाने से धूल उड़ती है | यही धुआँ की स्थिति है | ऐसे सभी कार्य बंद कैसे किए जा सकते हैं |
भारत में वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए दीपावली में पटाखे फोड़ने को कारण माना गया किंतु चीन ईरान जैसे जिन देशों में दिवाली नहीं मनाई जाती है | वायु प्रदूषण तो वहाँ भी बढ़ता है | इसके बाद भी पटाखे फोड़ने को बंद करने की कार्यवाही की जाती है |
वायुप्रदूषण बढ़ने में पराली जलाना कारण है या नहीं ! इसे अनुसंधान पूर्वक प्रमाणित कारणों के साथ सिद्ध नहीं किया जा सका है ,फिर भी पराली जलाने को वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार मानकर किसानों के विरुद्ध कार्यवाही कर दी जाती है |
इसी प्रकार से ईंटभट्ठों से ,उद्योगों से, बाहनों से ,निर्माण कार्यों से वायुप्रदूषण बढ़ने की बातें कही जाती हैं |जिनके अनुसंधान पूर्वक प्रमाणित कारण अभी तक खोजे नहीं जा सके हैं किंतु वायुप्रदूषण बढ़ने पर इन्हें बंद करवा दिया जाता है| ऐसे जितने भी कार्य बंद करवाए जाते हैं | इससे उनकी एवं उनमें कार्य करने वालों की आजीविका प्रभावित होती है |आम जनता की दिनचर्या बिगड़ती है|कल्पना कीजिए कि यदि अनुसंधान पूर्वक वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारणखोजने पर पता लगे कि ये सब वायु प्रदूषण बढ़ने के कारण नहीं है | कारण कुछ और हैं | सजा उन्हें दी जा रही है जो इसके लिए दोषी नहीं हैं | उन्हीं पीड़ितों के उन्हीं कार्यों से टैक्स लेकर उन्हीं वैज्ञानिकों को सैलरी आदि सुख सुविधाएँ दी जाती हैं जो उनके काम धंधे को वायु प्रदूषण बढ़ाने वाला बताते हैं | इसलिए अनुसंधान पूर्वक वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण खोजे जाने की आवश्यकता है |इससे पहले किसी के विरुद्ध कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता नहीं है
कोरोना महामारी में बनाए गए कोविडनियमों का पालन न करने पर जुर्माना लगाया जाने लगा बाद में देखा गया कि जिन्होंने पालन नहीं किया उन्हें या उन स्थानों पर संक्रमण बढ़ते नहीं देखा गया, दिल्ली का किसान आंदोलन,हरिद्वार का कुंभ,दिल्ली मुंबई से श्रमिकों का पलायन,बिहार बंगाल चुनावों की रैलियाँ हों या महानगरों में सब्जी वाले फल वाले या भोजन की कतारों में लगे गरीबों के बच्चे जहाँ कोविड नियमों का पालन बिल्कुल हुआ ही नहीं फिर भी उसके दुष्प्रभाव दिखाई नहीं पड़े |
ऐसी स्थिति में बिचार करने की बात है कि यदि कोविडनियमों का पालन आवश्यक नहीं था तो सारे काम काज को बंद करवाकर समाज का कामधंधा क्यों रुकवा दिया गया | यदि बिहार बंगाल में चुनावी रैलियाँ की जा सकती थीं तो सावधानी बरतते हुए व्यावसायिक काम काज भी संचालित किए जा सकते थे | ऐसे कोविड नियम जिस वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर बनाए गए थे | उन पर पुनर्बिचार की आवश्यकता है कि वे आवश्यक थे या नहीं थे |
वायुप्रदूषण बढ़ने पर संक्रमण बढ़ेगा कहा गया था किंतु हुआ इससे बिल्कुल बिपरीत हुआ | अक्टूबर नवंबर 2020 में वायु प्रदूषण तो बढ़ता जा रहा था किंतु महामारी संबंधी संक्रमण दिनोंदिन कम होता जा रहा था | ऐसे ही मार्च अप्रैल 2021 में कोविड की सबसे भयंकर लहर जब आई | उस समय प्राकृतिक वातावरण इतना अधिक स्वस्छ था कि पंजाब के अमृतसर एवं बिहार के सीतामढ़ी से हिमालय के दर्शन होने लगे थे | कोविडसंक्रमण वायु प्रदूषण के कारण बढ़ता था | ये बात गलत निकल गई | जिससे उन अनुसंधानों के नाम पर जो जो कुछ किया गया था वो सब गलत निकल गया जिनके आधार पर ये पता लगाया गया था कि वायु प्रदूषण के कारण संक्रमण बढ़ता है | ऐसे ही ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताकर भविष्य के लिए एक से एक भयानक भविष्य वाणियाँ की जाने लगती हैं | कहा जाता है भविष्य में ग्लेशियर पिघल जाएँगे उससे समुद्र में इतना पानी बढ़ जाएगा | पीने के पानी कमी हो जाएगी | ये किस अनुसंधान के आधार पर कहा गया मुझे नहीं पता है | इस बात की सच्चाई को परखा जाए तो जिस प्रकार से नदियाँ तालाब आदि गर्मी में सूख जाते हैं वर्षात में फिर भर जाते हैं ये प्रकृति का नियम है |इसी प्रकार से ग्लेशियरों का पिघलना एवं बनना प्रकृति का अपना नियम है | ऐसा हमेंशा होता रहता है |
भविष्यवाणियों के नाम पर समय समय पर ऐसीबातें वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर बोल दी जाती हैं कि आज के सौ वर्ष बाद ऐसा होगा वैसा होगा इतनी भयंकर भयंकर घटनाएँ घटित होंगी सूखा पड़ेगा बार बार भूकंप आएँगे तेज तूफ़ान आएँगे तापमान बहुत बढ़ जाएगा,ग्लेशियर पिघल जाएँगे,बार बार महामारियाँ आएँगी आदि आदि | कोई कहता है निकटभविष्य में हिमालय में भीषण भूकंप आएगा | ऐसी भविष्यवाणियाँ उन लोगों के द्वारा की जा रही होती हैं | जिनके द्वारा बताए गए मध्यावधि दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान आज तक सही नहीं निकले |मानसून आने जाने की तारीखें सही नहीं निकलीं | अलनीनो लानिना संबंधी बातें अभी तक घटनाओं के साथ प्रमाणित नहीं की जा सकीं | अनपढ़ लोगों के द्वारा लगाए हुए तीर तुक्के कुछ तो वे भी सही निकल ही जाते हैं | वैज्ञानिक अनुसंधानों का मतलब है कि वे अधिक से अधिक सही निकलें |
महामारी के बिषय में लगाए गए कोई भी पूर्वानुमान सही नहीं निकले | महामारी के बिषय में जो जो कहा गया उसमें से कुछ भी सही नहीं निकला | किसी भी लहर से संबंधित पूर्वानुमान सही नहीं निकले |
अनुसंधानों के नाम पर ये सब जो किया जा रहा है जिसके प्रमाणित हुए बिना उससे समाज की सुरक्षा कैसे की जा सकती है |
अनुसंधानों में शासकों की भूमिका
रिसर्चों के नाम पर जो अंदाजे लगाए जाते हैं | उनका आधार यदि वैज्ञानिक हो तभी उनसे समाज को लाभ हो सकता है | अनुसंधानों के नाम पर मनगढंत बातें बताते रहने से और अधिक नुक्सान हो जाता है | जिन बातों वैज्ञानिकता का अभाव हो तो वैज्ञानिकों के द्वारा कहे जाने के बाद भी वे समाज के लिए उपयोगी नहीं होते हैं | ऐसे अवैज्ञानिक अंदाजे तो आम समाज भी लगा सकता है | इसके लिए वैज्ञानिकों एवं उनके अनुसंधानों पर जनता का धन क्यों खर्च किया जाए जिनसे जनता को कोई मदद न मिल सकती हो | मदद मिलने की जगह यदि नुक्सान होता हो तो ऐसे कार्यों को बिल्कुल ही नहीं किया जाना चाहिए ,वो भी तब जब उनसे प्राप्त जानकारी से समाज का नुक्सान होता हो | ऐसे अनुसंधानों और अनुसंधानों की नीतियों में बदलाव की आवश्यकता होती है | विज्ञान संबंधी अनुसंधानों और अपनी मनगढंत बातों में अंतर होता है | उसे पहचाना जाना चाहिए | वैज्ञानिकों के द्वारा कही गई अतार्किक एवं अवैज्ञानिक बातों को उस प्रकार का महत्त्व नहीं मिलना चाहिए |
अनुसंधानों पर खर्च करने के लिए धन की कमी न हो जाए इसलिए समाज ईमानदारी से अपने हिस्से का टैक्स सरकारों कोदेता है | जो लोग टैक्स नहीं देते हैं या टैक्स की चोरी करते हैं | उनके विरुद्ध सरकारें कठोर से कठोर कार्यवाही करके उनसे टैक्स वसूलती हैं | आम जनता के खून पसीने की कमाई से वसूली गई वही धन राशि ऐसे प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित अनुसंधानों एवं अनुसंधान कर्ताओं पर भी खर्च की जाती है | जिन्होंने आज तक ऐसा क्या खोजा है | जिससे महामारियों भूकंपों बज्रपातों चक्रवातों आदि के बिषय में कुछ भी पता लगाया जा सके |
टैक्स न देने के लिए सरकारें यदि समाज के साथ इतना कठोर व्यवहार कर सकती हैं तो प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों के बिषय में आज तक कुछ भी खोज न पाने पर भी उनकी जवाबदेही तय क्यों नहीं करती हैं | अनुसंधान करते सैकड़ों वर्ष बीत गए आज तक ऐसी घटनाओं के निर्मित होने के ऐसे सही कारण नहीं खोजे जा सके जिसके आधार पर ऐसी घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सका हो | कहने को तो कह दिया जाता है कि भूमिगत प्लेटें टकराने से भूकंप आता है किंतु इसके आधार पर जब तक भूकंपों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाना संभव न हो तब तक ये कैसे विश्वास किया जाए कि भूमिगत प्लेटें आपस में टकराने से ही भूकंप आता होगा | ये बात सही है | ऐसे ही सभी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के कल्पित कारण बताकर छोड़ दिया गया है | वे तब तक विश्वसनीय नहीं हैं जबतक उन कारणों के आधार पर उस प्रकार की घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान न लगाए जा सकें | सैकड़ों वर्ष बीत गए प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में किए जा रहे अनुसंधानों में कुछ तो प्रगति होनी चाहिए थी |विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है केवल ये दोहराया ही जा रहा है | प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से सुरक्षा के लिए अभी तक ऐसा क्या किया जा सका है | इसकी समीक्षा की जानी चाहिए | ऐसे अनुसंधानों के बिषय में नए सिरे से बिचार किए जाने की आवश्यकता है |
भारत में डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की गई थी आज भी उपग्रहों से देखा हुआ आँखों देखा हाल ही बताना संभव हो पाया है | अनुसंधान आधारित पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो पाया है | जिन चक्रवातों को उपग्रहों रडारों से देखकर जनधन की सुरक्षा कर ली जाने लगी है | वो एक जुगाड़ है | विज्ञान आधारित अनुसंधानों का उसमें कोई योगदान नहीं है | कल्पना कीजिए यदि किसी वर्ष एक के बाद एक ऐसे दस बारह चक्रवात लगातार आते चले जाएँ तो ऐसा इस वर्ष क्यों हो रहा है और यह कब तक होता रहेगा | इसका पता लगाया जाना संभव नहीं हो पाएगा | केवल इतना ही बताया जा पाएगा कि एक तूफ़ान और आ रहा है | इसके बाद फिर कोई दिखाई देगा तो फिर कह दिया जाएगा कि एक और तूफ़ान आ रहा है | ऐसे जुगाड़ों से केवल आँखों देखा हाल ही बताया जा पाता है |भविष्यसंबंधी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं है | वर्षा संबंधी पूर्वानुमानों के नाम पर भी आँखों देखा हाल ही बताया जा पाता है | इसीलिए आज तक मौसमसंबंधी मध्यावधि या दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं हो पाया है | यदि ऐसा कोई विज्ञान ही नहीं है | जिसके द्वारा भविष्य में झाँका जा सकता हो तो पूर्वानुमान लगाने की कल्पना ही नहीं की जानी चाहिए |
विज्ञान के नाम पर यदि यही सबकुछ पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता रहा तो भावी पीढ़ी से भी ऐसी आशा कैसे की जा सकती है कि भविष्य में ही महामारी एवं भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं से समाज की सुरक्षा की जा सकेगी | सरकारें टैक्स वसूलने के लिए करदाताओं के साथ यदि इतना कठोर व्यवहार कर सकती हैं तो कर रूप में उससे प्राप्त धनराशि प्राकृतिक अनुसंधानों को करने कराने पर भी खर्च की जाती है | महामारियों एवं प्राकृतिक आपदाओं से समाज की सुरक्षा करने में वैज्ञानिकों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए | प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों से जनहित में निकलने वाले ऐसे परिणाम पूछे जाने चाहिए | जिनका प्राकृतिक आपदाओं महामारियों में जनसुरक्षा की दृष्टि से कोई योगदान ही न रहा हो |
अनुमानों पूर्वानुमानों के नाम पर प्राकृतिक घटनाओं या महामारियों के बिषय में पूर्वानुमानों के नाम पर बहुत सारी काल्पनिक बातें बोल दी जाती हैं | उनमें से जितनी सही निकल जाती हैं उन्हें तो पूर्वानुमान एवं जो गलत निकल जाती हैं | उनका कारण जलवायु परिवर्तन को महामारी के स्वरूप परिवर्तन को बता दिया जाता है | सरकारों को समीक्षा पूर्वक सही सही पूर्वानुमान उपलब्ध करवाना चाहिए | ये जिम्मेदारी शासकों की है |
महामारी का रहस्य कितना समझ सके वैज्ञानिक
अनुसंधानों को करने कराने का उद्देश्य यदि महामारी से समाज की सुरक्षा करना है तो भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए कितने और क्या प्रयास किए जा रहे हैं|मुझे नहीं पता है | विशेष बात यह बिचार की जानी चाहिए कि कोरोना महामारी मनुष्यकृत कारणों से पैदा हुई थी या फिर इसके पैदा होने का कारण प्राकृतिक था | ऐसे ही महामारी समाप्त होने के कारण मनुष्यकृत प्रयत्न थे या कि प्राकृतिक रूप से ही महामारी समाप्त हुई थी |
इसीप्रकार से महामारी की लहरें कोविडनियमों को पालन न करने जैसी मनुष्यकृत लापरवाहियों ही से पैदा हुई थीं याकि उनके पैदा होने के प्राकृतिक कारण होते थे | ऐसे ही महामारी की लहरें मनुष्यकृत प्रयत्नों से शांत होती थीं
या कि लहरों के समाप्त होने का कारण प्राकृतिक था |
या कि लहरों के समाप्त होने का कारण प्राकृतिक था |
इस बिषय में अनुसंधानजनित कोई निश्चित जानकारी न तो की जा सकी और न ही समाज को दी जा सकी जबकि ऐसा किया जाना चिकित्सा के लिए तो बहुत आवश्यक था ही इसके साथ ही लोगों को भी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए सतर्क किया जा सकता था कि वे महामारी से सुरक्षित रहने के लिए क्या करें क्या न करें किंतु ऐसा नहीं किया जा सका |
किसी रोग या महारोग की चिकित्सा के लिए रोग के पैदा होने एवं बढ़ने के कारण को खोजकर उनके निवारण के बिषय में प्रयत्न किया जाता है | महामारी पैदा होने या संक्रमण के लिए यदि मनुष्यकृत कारण जिम्मेदार हैं तब तो सुधार के लिए मनुष्यकृत प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते थे | इसी से अपनी एवं समस्त मानवता की सुरक्षा की जा सकती है |
कोई रोग या महारोग यदि प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ हो तो उसे मनुष्यकृत प्रयत्नों से कैसे शांत किया जा सकता है |जिस प्रकार से प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले भूकंपों आँधी तूफानों वर्षा बाढ़ों चक्रवातों बज्रपातों को मनुष्यकृत प्रयत्नों से नहीं रोका जा सकता है | उसीप्रकार से महामारी भी यदि प्राकृतिक रूप से ही पैदा हुई थी तो उसे मनुष्यकृत प्रयत्नों से कैसे रोका जा सकता है | महामारी के समाप्त होने का श्रेय यदि अपने प्रयत्नों को दिया जाने लगेगा तो प्लाज्माथैरेपी की तरह भविष्य की घटनाओं के साथ जोड़कर इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकेगा , क्योंकि इसमें सच्चाई नहीं है |
प्राकृतिक महामारी आने के बिषय में जानकारी कब मिली किस माध्यम से मिली | इसका कोई अनुसंधानजनित माध्यम था या लोग संक्रमित होने लगे अथवा मृत्यु को प्राप्त होने लगे तब महामारी आने के बिषय में आमआदमी की तरह ही वैज्ञानिकों को भी महामारी आने का समाचार पता लगा | यदि ऐसा है तो चिंता की बात है |
जिसप्रकार से कैसी प्राकृतिक परिस्थिति बनने पर किस प्रकार की मौसमसंबंधी घटना का निर्माण होता है | अभी तक ये पता नहीं लगाया जा सका है | जब वो पता लगेगा तब लगा लिया जाएगा | तब तक के लिए इतना जुगाड़ तो कर ही लिया गया है कि उपग्रहों रडारों से बादलों आँधी तूफानों को दूर से देख तो लिया जाता है | उसकी गति और दिशा के हिसाब से ये अंदाजा लगा लिया जाता है कि ये कब किस देश या प्रदेश में पहुँच सकते हैं | यदि बीच में हवाओं का रुख बदला नहीं तो कभी कभी ऐसे तीर तुक्के सही भी निकल भी जाते हैं | इनसे जितनी मदद मिल जाती है उतनी ही बहुत है | मौसम विज्ञान भले न खोजा जा सका हो किंतु ऐसे जुगाड़ चक्रवातों से जनधन की सुरक्षा करने में सहायक हो जाते हैं |
इसीप्रकार से प्राकृतिक महामारी का निर्माण कब होता है| महामारी बनने से पूर्व प्राकृतिकवातावरण में किस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं | प्रकृति में किस प्रकार के लक्षण प्रकट होने पर महामारी आने के संकेत मिलते हैं | ऐसे ही प्रकृति में किस प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने के संकेत मिलने लगते हैं और किस प्रकार के संकेत मिलने पर महामारी के स्वयं ही समाप्त होने के संकेत मिलने लगते हैं | महामारी आने से पहले दिखाई देने वाले लक्षणों के बिषय में जब तक पता लगाया जाना संभव न हो सके तब तक कोई तो ऐसा जुगाड़ करके रखा ही जाना चाहिए | जिससे महामारी आने से पहले महामारी से समाज की सुरक्षा संबंधी तैयारियों को करने के लिए कुछ तो समय मिल सके ! महामारी से लोगों को यदि अचानक संक्रमित होना ही है तो ऐसे रिसर्चों की समाज हित में उपयोगिता ही क्या बचती है |
इसलिए रिसर्च हो रहे हैं ये अच्छी बात है किंतु इन रिसर्चों के द्वारा उन महामारी पीड़ितों को भी कुछ तो मदद मिलनी ही चाहिए | जिन्हें ऐसे अनुसंधानों का व्ययभार टैक्स रूप में वहन करना पड़ता है |अनुसंधानों के द्वारा महामारी से जुड़े ऐसे किस रहस्य को सुलझाया जा सका है | जिससे लोगों को महामारी से संक्रमित होने से बचाया जा सका हो | ये समीक्षा की जानी चाहिए | ऐसे रिसर्च न किए जा रहे होते तो महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाया जाना संभव न था |
अचानक ही आती हैं महामारी और प्राकृतिक आपदाएँ
महामारी अचानक आ गई थी या भूकंप अचानक आ गया था | इसलिए उससे बचाव की तैयारियाँ नहीं की जा सकीं |ये कहा जाना उचित नहीं है | मृत्यु ,महामारी,आपदाएँ और दुर्घटनाएँ हमेंशा अचानक ही आया करती हैं | उन्हीं से समाज की सुरक्षा के लिए अनुसंधान किए जाते हैं अन्यथा अनुसंधानों की आवश्यकता ही क्या थी फिर तो केवल बचाव की तैयारियों की ही आवश्यकता रह जाती |
इसलिए बड़ी आपदाओं से सुरक्षा के लिए तैयारियाँ भी बड़ी ही करनी पड़ती हैं | इसके लिए अधिक संसाधनों के साथ साथ अधिक समय की भी आवश्यकता होती है | वो समय तभी मिल सकता है जब ये पहले से पता लगाया जा सके कि महामारी आनी वाली है | इसके लिए उतना समय चाहिए जितना समय महामारी से सुरक्षा की तैयारियों में लग सकता हो | इसलिए पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है | पूर्वानुमान भी दीर्घावधि चाहिए दस पाँच दिन पहले के पूर्वानुमान लगा भी लिए जाएँ तो उतने में महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ कैसे की जा सकती हैं |जिस प्रकार से पानी में पड़ी कोई चीज देखने के लिए ऐसी दृष्टि चाहिए जिससे पानी के अंदर की वस्तुओं को भी देखा जा सकता हो | ऐसे ही पूर्वानुमान लगाने के लिए ऐसा विज्ञान चाहिए जिससे भविष्य में झाँका जा सकता हो और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बिषय में अनुमान लगाया जा सकता हो | उन घटनाओं से सुरक्षा संबंधी तैयारियाँ करने के लिए समय तभी मिल सकता है |
दूसरी बात यह है कि घटनाओं के घटित होने का कारण खोजकर उसके आधार पर पूर्वानुमान लगाया जाए |प्रत्येक घटना के घटित होने का कोई न कोई कारण अवश्य होता होता है | कारण के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता है | कारणता निश्चित नियम है | इसे ही 'विज्ञान में कारणता का सिद्धांत' माना जाता है | जिस घटना के कारण के आधार पर उसके बिषय में लगाए गए भविष्यसंबंधी पूर्वानुमान सही निकलें तो उस कारण को सही और गलत निकलें तो कारण भी गलत होते हैं |जिन्हें उस घटनाओं के घटित होने के लिए जिम्मेदार माना गया था | जिस घटना के लिए माने गए कारण के आधार पर लगाया गया अनुमान पूर्वानुमान आदि सही नहीं होता है | उसे घटना का वास्तविक कारण नहीं माना जा सकता है |
वैज्ञानिक न्यूटन भी कारणता पर बहुत विश्वास करते थे | उनका मानना था कि जिन घटनाओं के घटित होने में कई कारणों का योगदान होता है | उन सभी कारणों को यदि खोज लिया जाए तो उसके आधार पर उस घटना के बिषय में भूत भविष्य वर्तमान तीनों को जाना जा सकता है | जिस कारण के आधार पर घटना के बिषय में लगाए गए पूर्वानुमान गलत निकलें तो उस कारण में कोई सच्चाई नहीं होती है |
कारण गलत होने से गलत निकलते हैं अनुमान पूर्वानुमान |
महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने के लिए वायुप्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार माना गया था | उसके आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान गलत निकल गए |इसका मतलब संक्रमण बढ़ने का कारण वायुप्रदूषण बढ़ना नहीं था |ऐसा होते देखा भी गया था | 2020 के अक्टूबर नवंबर में वायुप्रदूषण बहुत बढ़ा हुआ था,किंतु कोरोना संक्रमण दिनोंदिन कम होता जा रहा था |
ऐसे ही संक्रमण बढ़ने का कारण तापमान कम होने को माना गया | इसके आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान गलत निकलने लगे | इसका मतलब था कि तापमान कम होने पर संक्रमण नहीं बढ़ता है | ऐसा ही होते भी देखा गया था | भारत में कोरोना महामारी की पहली दूसरी और चौथी लहर तब आई थी जब तापमान बढ़ा हुआ था |
कोरोनामहामारी में बनाए गए कोविडनियमों का पालन न करने को कोरोना बढ़ने का कारण माना गया था किंतु दिल्ली का किसान आंदोलन,हरिद्वार का कुंभ,दिल्ली मुंबई से श्रमिकों का पलायन,बिहार बंगाल चुनावों की रैलियाँ हों या महानगरों में सब्जी वाले फल वाले या भोजन की कतारों में लगे गरीबों के बच्चे जहाँ कोविड नियमों का पालन बिल्कुल हुआ ही नहीं फिर भी उसके दुष्प्रभाव से संक्रमण बढ़ा हो ऐसा दिखाई नहीं पड़ा |
इसीप्रकार से कोरोना महामारी पैदा और समाप्त होने के एवं संक्रमण बढ़ने और घटने के लिए जितने भी कारणों को जिम्मेदार माना गया | उसके आधार पर जो जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए गए | वे सभी गलत निकल गए | इसका मतलब है कि कोरोना महामारी के पैदा और समाप्त होने का एवं उससे संबंधित लहरों के आने या जाने का कारण खोजा ही नहीं जा सका है | सही कारण न पता लगने के कारण ही विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा जितने भी प्रकार के पूर्वानुमान लगाए जाते रहे वे सब के सब गलत निकलते जा रहे थे |ऐसे ही महामारी को समझने के लिए जितने भी प्रयत्न किए जा रहे थे वे सभी गलत निकलते जा रहे थे |
महामारी संबंधी संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए जितने भी चिकित्सकीय प्रयोग किए जा रहे थे | वे सब के सब गलत निकलते जा रहे थे |संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्लाज्मा थैरेपी एवं रेमडीसिविर को पहले हितकर माना गया था | निदान गलत होने से चिकित्सा का गलत होना स्वाभाविक ही था |
दूसरी लहर आने के बाद ऐसे सभी भ्रम दूर होते चले गए | अंततः इसी बात पर भरोसा करना पड़ा कि जिस रोग के पैदा होने का कारण नहीं खोजा जा सका | उसे पहचाना नहीं जा सका | उस पर किया गया चिकित्सकीय प्रयोग प्रभावी नहीं हो सका | ऐसी स्थिति में कोरोना महामारी संबंधी संकटकाल में आजतक किए गए महामारी संबंधी अनुसंधान किस काम आ सके | ये चिंतन का बिषय है |
इसीलिए महामारी संबंधी अनुसंधान प्रारंभ करने से पूर्व उसके पैदा होने के लिए जिम्मेदार सही कारण खोजे जाने चाहिए थे | ऐसा न किए जाने के कारण ही महामारी से सुरक्षा के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया जा सका | जो किए भी गए उनका प्रभाव कुछ हुआ या नहीं ये ईश्वर ही जाने | जिस रोग को पहचाना ही न जा सके | उससे मुक्ति दिलाने की कल्पना ही कैसे की जा सकती है |
घटनाओं के वास्तविक कारणों की खोज !
जिन कारणों के आधार पर जिस घटना के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि सही निकल जाएँ | इसका मतलब उस घटना के घटित होने में जिन कारणों को जिम्मेदार माना गया है | वे सही हैं | जिन कारणों के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान गलत निकल जाएँ | इसका मतलब वे कारण गलत हैं | जिनके आधार पर वे पूर्वानुमान लगाए गए थे |
कुछ घटनाओं के घटित होने में कारण तो होते ही हैं | उस घटना को प्रभावित करने में उन कारणों के भी कारणों का योगदान होता है | इसलिए उन कारणों या घटकों को भी समझना होता है |
किसी कड़ाही में दूध उबल रहा हो तो उसे देखकर ये पता लगाना हो कि ये दूध कब तक उबलेगा | कड़ाही में दूध उबलने का कारण कड़ाही के नीचे जल रही आग होती है | आग जब तक जलेगी तब तक दूध उबलेगा | आग धीमे जलेगी तो दूध धीमें उबलेगा और आग तेज जलेगी तो दूध तेज उबलेगा | दूध का उबलना उसके अपने आधीन नहीं है | वो तो आग के आधीन नहीं है |
कड़ाही के नीचे जल रही आग ईंधन के आधीन है |जितना होगा आग उतनी देर जलेगी | कड़ाही का दूध भी उतनी ही देर तक उबलेगा | इसका अनुमानित पूर्वानुमान लगाया जा सकता है किंतु इसी बीच यदि उस आग में ईंधन और रख दिया जाता है तो ऐसा तो कभी तक भी किया जा सकता है | इसलिए इसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है | ऐसी स्थिति में यदि कोई पूछे कि आपने तो कहा था कि ये आग इतनी ही देर तक जलेगी और इतनी ही देर तक दूध उबलेगा किंतु आपकी वो बात तो गलत हो गई |इसका कारण क्या है | ये प्रश्न यदि मौसमवैज्ञानिकों से किया जाता है तो वे इसका कारण जलवायुपरिवर्तन को बताते हैं और यही प्रश्न यदि महामारी वैज्ञानिकों से किया जाता है तो वे इसका कारण महामारी का स्वरूप परिवर्तन बताते हैं ,जबकि इसका कारण न तो जलवायुपरिवर्तन होता है और न ही महामारी का स्वरूपपरिवर्तन | इसका कारण कड़ाही के नीचे ईंधन रख जाने वाले का पता न लगा पाना होता है |
कड़ाही के नीचे आग में रखा ईंधन ख़त्म होने पर उसमें फिर से ईंधन रख दिया जाए बार बार ऐसा होता रहे तो एक और कारण तैयार हो जाता है कि जब तक आग में ईंधन रखा जाता रहेगा तब तक आग जलती और दूध उबलता रहेगा | ईंधन रखने वाला चेतन है | इसलिए वो कब तक ऐसा करता रहेगा | इसे पता लगाए बिना ये कैसे कहा जा सकता है कि कड़ाही में दूध कब तक उबलता रहेगा | प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने में ईंधन लगाने वाले इसी चेतनतत्व की योजना समझनी पड़ेगी कि ये आखिर आग में इतना ईंधन लगा क्यों रहा है | ये कितने समय तक आग जलाकर रखना चाहता है | उसी के अनुसार इसका पूर्वानुमान लगाना पड़ेगा |
महामारी मौसम और उसका पूर्वानुमान !
महामारी आने के लिए बहुत विशेषज्ञों ने मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं को जिम्मेदार बताया था | इस आधार पर देखा जाए तो महामारी पैदा होने या महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने का कारण मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाएँ हुईं | ऐसी स्थिति में महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाना होगा | कारण के बिषय में सही पूर्वानुमान लगा लिया जाए तो उसी के आधार पर घटना के बिषय में भी सही पूर्वानुमान लगा लिया जाएगा |
मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने के लिए जो उपलब्ध वैज्ञानिक विधाएँ हैं | उनके द्वारा केवल तत्कालीन परिस्थितियाँ ही पता लग पाती हैं | भविष्य के बिषय में कोई अंदाजा नहीं लग पाता है | यदि ऐसा किया जाना संभव होता तो मौसम संबंधी मध्यावधि तथा दीर्घावधि पूर्वानुमान पता लगा लिए जाते | उपग्रहों रडारों से बादल आँधी तूफ़ान आदि जो घटनाएँ जिस दिशा में जितनी गति से जाती दिखाई देती हैं | उसी के आधार पर आगे के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है |
महामारी को समझने के लिए इसप्रकार का मौसमविज्ञान नहीं चाहिए | ये तो एक प्रकार का जुगाड़ है | जुगाड़ और मौसमविज्ञान में अंतर है | उपग्रहों रडारों के जुगाड़ से केवल वही घटनाएँ देखी जाती हैं | जो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगती हैं, जबकि महामारी पर मौसम का प्रभाव समझने के लिए तो ऐसा मौसमविज्ञान खोजना पड़ेगा | जिसके आधार पर ये पता लगाया जा सके कि कब किस प्रकार की घटना का निर्माण होने वाला है | इसके बिना महामारी पर मौसम के प्रभाव का अध्ययन किया जाना संभव नहीं है | कोरोना महामारी संबंधी अनुसंधानों में उपग्रहों रडारों के जुगाड़ से जुड़े वैज्ञानिकों को सम्मिलित करने के बाद भी इसीलिए कुछ नहीं किया जा सका क्योंकि महामारी संबंधी अनुसंधानों में प्रकृति के स्वभाव को समझने में सक्षम मौसम वैज्ञानिकों की आवश्यकता थी | उपग्रहों रडारों के जुगाड़ से घटनाओं के वास्तविक कारणों को नहीं खोजा जा सकता है |
जिसप्रकार से किसी कड़ाही में दूध उबल रहा हो तो वह दूध कब तक उबलता रहेगा | उस उबलते हुए दूध को कितने भी बड़े यंत्रों दूरबीनों उपग्रहों रडारों आदि से देख लिया जाए | कितने भी सुपर कंप्यूटरों से डेटा विश्लेषण करवा लिया जाए किंतु ऐसा सब कुछ करके भी यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि कड़ाही में उबल रहा दूध ऐसे ही कब तक उबलता रहेगा | इसी प्रकार से उपग्रहों सुपर कंप्यूटरों से बादलों आँधी तूफानों को देखकर या डेटा विश्लेषण करके बादलों ,वर्षा एवं आँधीतूफानों के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं हो सकता है |
कारणों समझकर ही लगाया जा सकता है पूर्वानुमान !
बादलों के आकाश में उड़ने का कारण हवाएँ होती हैं | हवाएँ जबतक चलेंगी तब तक बादल उड़ते रहेंगे | हवाएँ जब जिधर जाएँगी बादल भी उधर ही जाएँगे | हवाएँ तेज चलेंगी तो बादल तेज चलेंगे और हवाएँ धीमें चलेंगी तो बादल धीमे उड़ेंगे | बादलों का उड़ना बादलों के अपने आधीन नहीं है वो तो वायु के आधीन है | इसलिए बादलों आँधी तूफानों का उड़कर कहीं जाने का कारण वायु संचार है | हवाएँ जब जिधर जाएँगी | बादल और आँधी तूफ़ान भी उड़कर वहीं जाएँगे | इसका पूर्वानुमान बादलों या आँधी तूफानों को देख कर नहीं लगाया जा सकता है प्रत्युत हवाओं के संचार के आधार पर लगाया जा सकता है |
इसलिए बादल और आँधी तूफान उड़कर कहाँ जाएँगे |ये पता लगाने के लिए वायुसंचार को समझना होगा उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना होगा | हवाओं का रुख तो कभी भी किसी भी तरफ को बदल सकता है | कब किधर को बदल जाएगा | वायु का रुख कब किधर को बदलेगा | इसे उपग्रहों रडारों से देखकर एवं सुपर कंयूटरों से डेटा विश्लेषण करके पता लगाया जाना संभव नहीं है |
मौसम के बिषय में देखा जाए तो वायु को न तो उपग्रहों रडारों से देखा जा सकता है और न ही सुपर कंप्यूटरों से उसका डेटा विश्लेषण किया जा सकता है | ये तो पता लगाया ही नहीं जा सकता है कि हवाएँ कब तक किस दिशा की ओर जाएँगी और कितनी गति से जाएँगी | इसका अनुमान या पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान नहीं है | इसका मतलब मौसम पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान नहीं है |
इसीलिए प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में उपग्रहों रडारों से जितने बादल या आँधी तूफ़ान दिखाई पड़ जाते हैं | उनकी गति और दिशा के अनुसार उनके बिषय में अंदाजा लगा लिया जाता है | पूर्वानुमानों के नाम पर उन्हीं अंदाजों को बता दिया जाता है |
इसके बाद में बादलों या आँधी तूफानों की दूसरी श्रृंखला शुरू हो जाती है |पहले लगाए गए अंदाजे में ये बात सम्मिलित नहीं होती है ,क्योंकि उस समय दूसरी श्रृंखला वाले बादल निर्माणाधीन थे | इसलिए उस समय वे उपग्रहों से दिखाई ही नहीं पड़ रहे होते हैं | संभव है कि उस समय ये बादल बने ही न हों | ऐसे बादल कब तक बन बन कर आते रहेंगे ये चैन कब तक चलती रहेगी | यह पता लगाने के लिए कोई विज्ञान नहीं है | उपग्रहों आदि से केवल तैयार बादलों को ही देखा जा सकता है | बादलों के बनने की ये श्रृंखला कब तक चलती रहेगी | ये पता लगाना प्रत्यक्ष विज्ञान के बश की बात नहीं है | इसके बिना वर्षा एवं आँधी तूफानों के बिषय में सही पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है |
उपग्रहों रडारों वाला मौसम विज्ञान और पूर्वानुमान !
किसी गाँव के एक ओर कोई जंगल था | उधर से हाथी आकर गाँव में अचानक घुस कर तोड़ फोड़ करने लगते थे | गाँव के लोग जब तक इकट्ठा होकर उन्हें भगाते तब तक काफी नुक्सान हो चुका होता था | इससे हैरान परेशान होकर गाँव के लोगों ने जंगल की ओर कुछ कैमरे लगा दिए जिससे हाथी जब गाँव की ओर आने लगते तब दूर से ही दिखाई पड़ जाते तब तक गाँवों वाले लोग इकट्ठे होकर उन हाथियों को खदेड़ दिया करते इससे जन धन का नुक्सान होने से तो बचाव हो जाता था किंतु ध्यान रहे कि इसे हाथियों से सुरक्षा करने का जुगाड़ तो कहा जा सकता है किंतु इसे हाथीविज्ञान नहीं कहा जा सकता |
इसीप्रकार से उपग्रहों रडारों से बादलों आँधीतूफ़ानों को सुदूर आकाश में देख लिया जाता है | वे जिस दिशा में जितनी गति से जा रहे होते हैं | उसी हिसाब से ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये कब कहाँ पहुँच सकते हैं | ये एक जुगाड़ होता है | इसमें किसी वैज्ञानिक पद्धति या अनुसंधानों का कोई योगदान नहीं होता है |
जिस प्रकार से किसी नदी में बहते जा रहे फूल पत्तियों के बहने का कारण नदी की जलधारा होती है | वो जलधारा जहाँ जाएगी | उन फूल पत्तियों को बहकर वहाँ जाना पड़ेगा | ऐसे ही बादलों आँधीतूफानों का कहीं आना जाना उन हवाओं पर निर्भर करता है | जिनके साथ वे उड़ रहे होते हैं | वे हवाएँ जहाँ जाएँगी बादल आँधी तूफ़ान भी उड़कर वहीं जाएँगे | हवाएँ रुक जाएँगी तो वे भी रुक जाएँगे | यदि हवाएँ किसी अन्य दिशा में मुड़ जाएँगी तो उनके साथ उड़ने वाले बादल आँधी तूफ़ान भी हवाओं के साथ ही मुड़ जाएँगे | उपग्रहों रडारों के द्वारा बादलों आँधी तूफानों के बिषय में केवल आँखों देखा हाल बताते रहा जा सकता है | जिससे कभी कभी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं से कुछ सुरक्षा हो जाती है किंतु ये एक प्रकार का जुगाड़ है मौसमविज्ञान नहीं है |
उपग्रहों के द्वारा बादलों आँधी तूफ़ानों को देखकर ये पता किया जा सकता है कि वे अभी कहाँ हैं और किस दिशा में कितनी गति से जा रहे हैं | यदि ये इसी गति से इसी दिशा में जाते रहे तो इतने समय में अमुक देश या प्रदेश में पहुँच सकते हैं | यदि हवाएँ उसी दिशा में उतनी ही गति से चलती रहीं तो ये अंदाजा सही निकल भी सकता है ,अन्यथा हवाओं का रुख बदलते ही यह अंदाजा भी बदल जाता है |
हवाओं का रुख कब किधर को बदलेगा |यह पता लगाना उपग्रहों रडारों सुपरकंप्यूटरों के बश का नहीं है |इसलिए इनके द्वारा बादलों आँधी तूफ़ानों के बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | जिस दिन हवाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाना सीख लिया जाएगा | उस दिन आँधी तूफानों एवं बादलों के बिषय में भी पूर्वानुमान लगाया जाने लगेगा | हवा का रुख भविष्य में कब किधर को बदलेगा | इसका पूर्वानुमान लगाने में न उपग्रह रडार आदि मदद कर सकते हैं और न ही सुपर कंप्यूटर | ऐसी स्थिति में हवा का रुख बदलने के बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकेगा | इसके लिए विज्ञान ही नहीं है,फिर भी ऐसा करने से कभी कभी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं से कुछ सुरक्षा हो जाती है किंतु ये एक प्रकार का जुगाड़ है मौसमविज्ञान नहीं है |
इसलिए वैज्ञानिकों के द्वारा वर्षा भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात आदि घटनाओं के निर्माण के लिए तय किए गए जिम्मेदार कारणों के आधार पर प्राकृतिक घटनाओं के निर्मित होने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए कि ऐसी घटनाओं का निर्माण होना कब प्रारंभ होगा | पहले से पता किए गए कारणों के आधार पर लगाए गए ऐसे पूर्वानुमान यदि सही निकलने लगते हैं अर्थात घटनाएँ पता किए गए समय पर ही घटित होने लगती हैं,तभी उन कारणों की कारणता पर भरोसा किया जाना चाहिए | जो पहले तय किए गए थे | इसके अतिरिक्त किसी प्राकृतिक घटना के कारण के नाम पर कुछ भी कह दिया जाना उचित नहीं है | कई बार ऐसे कारणों का उन मूल घटनाओं से कोई संबंध ही नहीं होता है |
इसीप्रकार से महामारी पैदा होने के निश्चित कारण खोजे जाने चाहिए | उन कारणों के आधार पर महामारी तथा उसकी लहरों के आने जाने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए |उन पूर्वानुमानों के सही निकलने के बाद ही महामारी या उनकी लहरों के आने या जाने के बिषय में सार्वजनिक रूप से भविष्यवाणी की जानी चाहिए |
भविष्यवाणियों के नाम पर कच्चे पक्के अनुमान सार्वजनिक कर देने से वे अनुमान कम अफवाहें अधिक सिद्ध होती हैं |इनसे बचा जाना चाहिए | मौसम के बिषय में तो ऐसा अक्सर होता ही रहता है | कोरोना महामारी के बिषय में भी पूर्वानुमानों के नाम पर ऐसा खिलवाड़ बार बार होता रहा है |जो नहीं होना चाहिए |
कुल मिलाकर अनुसंधानों के आधार पर पूर्वानुमान लगाए जाने चाहिए और पूर्वानुमानों के आधार पर अनुसंधानों का परीक्षण किया जाना चाहिए | हमारे कहने का मतलब ये है कि जिस प्राकृतिक घटना के घटित होने के लिए जिस कारण को जिम्मेदार माना जाए | उस कारण के आधार पर पूर्वानुमान लगाए जाने चाहिए यदि वे कारण सही होंगे तो पूर्वानुमान भी सही निकलेगा यदि कारण ही सही नहीं होंगे तो पूर्वानुमान भी सही नहीं निकलेंगे | जिस दिन घटनाओं के घटित होने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारणों का सही चयन किया जाने लगेगा | उसी दिन प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाने लगेगा | वर्तमान समय सबसे बड़ी गलती यही हो रही है कि प्राकृतिक घटनाओं के कारणों के रूप में जिन प्रतीकों को स्थापित किया जा रहा हो उन्हीं प्रतीकों के आधार पर पूर्वानुमान लगाए जाने चाहिए | उनके सही निकलने पर ही यह माना जाना चाहिए कि जिन प्रतीकों का चयन किया गया है वे सही हैं |
महामारी भयानक थी या अनुसंधानों में ही दम नहीं थी !
कोरोना महामारी का विज्ञान क्या था! अनुसंधान कैसे किए जा रहे थे! अनुसंधानों को करने का उद्देश्य क्या था | उस उद्देश्य की पूर्ति कैसे हो रही थी |इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है ,तब ये पता लगेगा कि महामारी भयानक थी या अनुसंधान ही मदद करने लायक नहीं थे | यदि अनुसंधान ही किसी लायक नहीं थे तो महामारी को भयंकर कैसे कहा जा सकता है | इतने हल्के अनुसंधानों के आधार पर महामारी का सामना किया जा रहा था जो अनुसंधान कम तीर तुक्के ज्यादा लग रहे थे |महामारी से सुरक्षा की अनुसंधानात्मिका तैयारियाँ इतनी कमजोर थीं कि महामारी भयानक न होती तो भी भयानक हो जाती | महामारी पैदा होने या संक्रमण बढ़ने के लिए जो कारण बताए जा रहे थे | उन कारणों का घटनाओं से कोई संबंध सिद्ध ही नहीं होता था |
कारणों का परीक्षण किए बिना ही कुछ घटनाओं को कुछ दूसरी घटनाओं के घटित होने का कारण बता दिया जाता रहा है|उन्हीं कारणों के आधार पर भविष्यवाणियाँ कर दी जाती रही हैं | भविष्यवाणियों के नाम पर की जाने वाली बातें भविष्यवाणियाँ कम अफवाहों का काम अधिक करती रही हैं | इससे समाज के मन में भय पैदा होता रहा है,जबकि अनुसंधानों का उद्देश्य समाज का भय कम करके सुरक्षा एवं सुख सुविधा उपलब्ध करवाना होता है |
ऐसी भविष्यवाणियों के गलत निकलने का कारण न तो जलवायुपरिवर्तन होता है और न ही महामारी का स्वरूपपरिवर्तन ! प्रत्युत महामारी का सही विज्ञान न होना एवं कारण की सही खोज न होना ही ऐसे पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण होता है |
विशेषज्ञों के द्वारा महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने का कारण वायुप्रदूषण बढ़ने को बताया गया था | उसी के आधार पर भविष्यवाणी कर दी गई कि 2020 के अक्टूबर नवंबर में जब वायुप्रदूषण बढ़ेगा | उस समय कोरोना संक्रमण भी बहुत अधिक बढ़ जाएगा | इसके बाद 2020 के अक्टूबर नवंबर का जब समय आया तब वायुप्रदूषण तो बहुत बढ़ा लेकिन उससे कोरोना संक्रमण नहीं बढ़ा प्रत्युत संक्रमण दिनोंदिन कम होता जा रहा था | इससे ये केवल भविष्यवाणी ही गलत नहीं हुई प्रत्युत वो कारण भी गलत हो गया | जिसके आधार पर कहा गया था कि वायुप्रदूषण बढ़ने से कोरोना संक्रमण बढ़ेगा |
ऐसे ही तापमान घटने पर संक्रमण घटता है |पहले ये बताया गया था | इसी के आधार पर भविष्यवाणी कर दी गई थी कि आगामी सर्दी में संक्रमण बढ़ेगा | इसी के अनुसार दिल्ली के अस्पतालों में तैयारियाँ भी करके रख ली गईं थीं | सर्दी का समय बीतता गया सन 2020 का अक्टूबर नवंबर दिसंबर बीता ! 2021 की पूरी जनवरी बीत गई | सर्दी बढ़ती जा रही थी किंतु संक्रमण बढ़ा ही नहीं प्रत्युत संक्रमण दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा था | ऐसे तीर तुक्के तो गलत निकल ही गए | इसी के साथ वो सिद्धांत भी गलत निकल गया | जिसके आधार पर ऐसी बातें बोली गई थीं |
ऐसे ही महामारी पैदा होने का कारण जलवायुपरिवर्तन को बताया गया किंतु उन्हीं विशेषज्ञों के द्वारा जलवायुपरिवर्तन को दीर्घावधिक बताया जाता रहा है | इस हिसाब से जलवायुपरिवर्तन तो लंबी अवधि की घटना है उसे दो तीन वर्षों में घटित हुई महामारी का कारण जलवायुपरिवर्तन को बताया जाना तर्कसंगत नहीं है || जलवायुपरिवर्तन तो महामारी आने से पहले भी हो रहा था और अब भी हो रहा है | भविष्य में भी इसीप्रकार से होता रहेगा,जबकि महामारी न तो 2019 के पहले थी और न ही अब है |
महामारी पैदा होने या उसका संक्रमण बढ़ने घटने के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए कारणों के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण तो बताया जाना चाहिए था कि ऐसा क्यों हुआ |
विज्ञान या वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर इतनी हल्की बातें कभी नहीं की जानी चाहिए | जिन्हें देख सुन कर लगता था कि इनमें वैज्ञानिक अनुसंधानों जैसा कुछ है ही नहीं|अनुमानों पूर्वानुमानों की गलतियाँ आम लोगों के द्वारा पकड़ी जा रही थीं | उनमें विज्ञान एवं वैज्ञानिकअनुसंधानों जैसा क्या था |
कुलमिलाकर प्राकृतिक वैज्ञानिक उपलब्धियों को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि आदि काल में महामारी आई होगी तब समाज में जिस प्रकार की परिस्थितियाँ रही होगीं | उनकी अपेक्षा 2019 की कोरोना महामारी के समय हम कितना अधिक सुरक्षित हो चुके थे | महामारी संबंधी वैज्ञानिकअनुसंधानों से कोरोना महामारी के समय ऐसी क्या मदद मिल सकी | महामारी से मनुष्यों को सुरक्षित बचाने में उस मदद का क्या योगदान रहा | यदि ऐसे अनुसंधान न किए जा रहे होते तो क्या महामारी से इससे भी अधिक नुक्सान हो सकता था |इसका भी चिंतन किया जाना चाहिए कि महामारी जैसी आपदा के समय ही यदि महामारी संबंधी अनुसंधानसमाज को सुरक्षित बचाने में किसी काम नहीं आ सके तो उनसे भविष्य के लिए क्या आशा की जानी चाहिए |
अनुसंधानों की प्राचीन पद्धति
प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के कारण एवं उनके पूर्वानुमान !
वायु समय का दूत है | समय जब जैसे संकेत देता है तब वायु वैसा व्यवहार करने लगता है | समस्त ग्रहों का संचार वायु के प्रभाव से होता है | भूकंप आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात बादलों का फटना वर्षा होना न होना, सुनामी आना समुद्रों का फैलना सिमिटना सब कुछ वायु के संचार के आधीन है |
हेमंत और शिशिर ऋतुओं में उत्तरी हवाएँ चलती हैं वे ठंडी होती हैं | ग्रीष्मऋतु में पश्चिमी हवाएँ चलती हैं | वे गर्म होती हैं | वर्षाऋतु में सभी दिशाओं की हवाएँ चलती हैं | वे वर्षा करती हैं | ऐसी बातों से ऋतुओं अर्थात समय का संबंध हवाओं से सिद्ध होता है | इससे स्पष्ट होता है कि हवाएँ समयसंचार का अनुपालन करती हैं |
समय के संकेतों का अनुपालन करती हुई हवाएँ प्रकृति को समय के अनुसार चलाती हैं | हेमंत और शिशिर ऋतुओं के आने पर कोहरा पाला से आकाश आच्छादित होने लगता है | सूर्य की किरणें मंद पड़ने लगती हैं | ठंढक होने लगती है |
इसी प्रकार से ग्रीष्मऋतु आने पर आकाश प्रायः बादलों से मुक्त होता है | सूर्य किरणें तेज हो जाती हैं | धूल उड़ाती पश्चिमी गरम हवाएँ चलने लगती हैं | वर्षाऋतु आते ही आकाश बादलों से भर जाता है | सभी दिशाओं की तेज हवाएँ चलने लगती हैं |भीषण वर्षा बाढ़ जैसे दृश्य दिखाई देने लगते हैं | प्रकृति में इसप्रकार के परिवर्तन प्रतिवर्ष एक निश्चित समय पर होने का कारण मनुष्यकृत नहीं है | ये प्राकृतिक ही है | जो समय प्रेरित वायुकृत है |
प्रकृति में इस प्रकार के जितने भी परिवर्तन होते दिखाई हैं |इसका कारण उस समय उसप्रकार का वायुसंचार होता है | उसप्रकार का वायुसंचार होने का कारण समय होता है | समय और हवाएँ दिखाई नहीं पड़ती हैं लेकिन समय प्रेरित हवाओं के कारण घटित होने वाली घटनाएँ दिखाई पड़ती हैं |
अच्छा समय आने पर सभी ऋतुएँ अपने अपने गुण धर्म का पालन इसप्रकार से करती हैं | जो मनुष्यों के लिए हितकर हो | समय समय पर उचित मात्रा में वर्षा होती है | सर्दी गरमी आदि भी उचित मात्रा में होती है | अच्छे समय के प्रभाव से अच्छी हवाएँ चलती हैं | अच्छी हवाओं के प्रभाव से सभी वृक्ष बनस्पतियाँ आदि अपने संपूर्ण गुणों से युक्त पूर्णतः निरोग होती हैं | उनके प्रभाव से फूल फल अन्न शाक सब्जियाँ आदि स्वास्थ्य के लिए हितकर होती हैं | स्वच्छ हवा में साँस लेने एवं स्वास्थ्यकर फूल फल अन्न शाक सब्जियाँ आदि खाने पीने से मनुष्य समेत समस्त जीव जंतु स्वस्थ एवं आनंदित रहते हैं |
समय परिवर्तनशील होता है | इसलिए समय में हमेंशा बदलाव होते रहते हैं | समय के साथ हवाएँ बदलती रहती हैं | समय में अच्छे बुरे दोनों प्रकार के बदलाव होते रहते हैं |समय के अनुसार हवाएँ चलती हैं | हवाओं के अनुसार प्रकृति में परिवर्तन होते रहते हैं | बुरे समय में अहितकर हवाएँ चलने लगती हैं | जिनके प्रभाव से प्राकृतिक वातावरण डरावना हो जाता है | ऋतुओं की मर्यादा नष्ट होने लगती है | अतिवर्षा सूखा तेज गरमी बार बार तूफ़ान चक्रवात बज्रपात भूकंप सुनामी जैसी घटनाएँ घटित होने लगती हैं | जिन्हें देखकर ये अंदाजा लगाया जाता है कि इस समय हवाएँ ठीक नहीं चल रही हैं |इसका मतलब समय ठीक नहीं चल रहा है | इसलिए इस समय स्वास्थ्य के बिपरीत वातावरण बनता चला जाएगा | इससे रोग महारोग (महामारी) आदि पैदा होते देखे जाते हैं |
ऐसा वातावरण बनते ही अपनी सुरक्षा के लिए अपने रहन सहन खान पान में उस प्रकार की सावधानी बरतकर शरीरों में उसप्रकार की प्रतिरोधक क्षमता तैयार करनी होती है | जिससे सुरक्षा हो सके |
समय में कुछ निश्चित बदलाव होते हैं | कुछ अनिश्चित बदलाव होते हैं | ऋतुएँ आदि निश्चित बदलाव होते हैं | इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि अनिश्चित बदलाव होते हैं | सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ अनिश्चित बदलाव होते हैं | ये समय के द्वारा प्रकृति के माध्यम से दिए जाने वाले आकस्मिक संदेश होते हैं |ऐसे समय संदेश मनुष्यजीवन की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं | इनके आधार पर भविष्य में संभावित सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं | जैसे धुआँ देखकर आग के होने का अनुमान लगा लिया जाता है | ऐसे ही कुछ प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते देखकर कुछ दूसरी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |
ऋतुओं के अनुसार सभी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं | ऋतुओं के अनुसार सभी वृक्ष फूलते फलते हैं | जैसे ऋतुओं कहा भी जाता है कि किसी वृक्ष को कितना भी खाद पानी दिया जाए वे हरे भरे हो जाते हैं किंतु वे फूलते फलते अपने समय पर ही हैं | ये निश्चित सिद्धांत है |
वर्षा ऋतु के बिना भी कभी कभी ग्रीष्म या शिशिर ऋतु में भी वर्षा होते देखी जाती है | इसका मतलब उन ऋतुओं में भी उतने दिनों के लिए वर्षाऋतु का प्रभाव आ गया होता है | ऐसे ही कई बार वर्षा ऋतु में भी वर्षा नहीं होने लगती है | कुछ पेड़ पौधे कभी कभी बिना ऋतु के भी फूलने फलने लगते हैं | ऐसा होने का मतलब ये नहीं होता है कि पेड़ पौधे भूलकर ऐसा कर रहे हैं प्रत्युत उस दूसरी ऋतु में भी कुछ दिनों के लिए उनकी अपनी उस ऋतु का समय आ चुका होता है | जिसमें वे फूलते फलते हैं | ऐसे ही कुछ बीज जो खेतों में झड़ जाते हैं | वर्षाऋतु में वे पड़े पड़े भीगा करते हैं किंतु अपने समय से पहले अंकुरित नहीं होते हैं | शरदऋतु शुरू होते ही वे अंकुरित होने लगते हैं | यदि वे किसी दूसरी ऋतु में अंकुरित होने लगें तो इसका मतलब उस ऋतु में कुछ समय शरदऋतु का आ गया है | इसीप्रकार से कुछ पशु पक्षी हैं| जिनका स्वभाव व्यवहार आदि ऋतुओं के अनुसार बदलता है | कोयल बसंतऋतु में बोलती है | मेढक वर्षाऋतु में टर्राते हैं | यदि कोयलें किसी दूसरी ऋतु में बोलने लगें तो उस समय बसंत के प्रभाव की उपस्थिति समझी जानी चाहिए | मुर्गा प्रतिदिन प्रातःकाल में बोलते है | यदि वे किसी दूसरे समय बोलने लगें | इसका मतलब उस समय प्रातःकाल का प्रभाव चल रहा है |
ऐसी परिस्थिति में ये पेड़ों पौधों बीजों या जीव जंतुओं में जो बदलाव दिख रहे होते हैं | ये दिखते भले उनमें हैं किंतु ये बदलाव समय संचार में हुए होते हैं | उसी परिवर्तित समय के अनुसार पेड़ पौधों बीजों एवं पशु पक्षियों में परिवर्तन आने लगते हैं |
समय में इस प्रकार के नियम विरुद्ध परिवर्तन होना साधारण घटना नहीं है | समय का ऋतुओं के अनुसार अपना स्वाद बदलता रहता है | हेमंतऋतु का समय मीठा होता है | जिसके प्रभाव से गन्ने में मधुरता बढ़ती है | ग्रीष्म ऋतु में चलने वाली लू आदि हवाएँ मीठी होती हैं | उसी मिठास के कारण ग्रीष्मऋतु में गन्ने में कीड़े लग जाते हैं | आम इमली खरबूजे तरबूज लीची आदि में लू चलने से मिठास बढ़ जाती है | समय और हवाओं का अपना अपना स्वाद होता है | उसके अनुसार ये वात पित्त और कफ को घटाने बढ़ाने वाले होते हैं | ये प्रभाव समस्त खाने पीने की वस्तुओं फूलों फलों शाक सब्जियों आदि पर पड़ता है | जिन्हें खाने पीने से शरीर रोगी होते हैं | ये प्रभाव बनस्पतियों औषधियों आदि पर भी पड़ता है जिससे इनके गुणधर्म बदल जाते हैं | ये जिन रोगों से मुक्ति दिलाने में समर्थ मानी जाती हैं | इनके गुणधर्म में परिवर्तन हो जाने के कारण ये उन रोगों से मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं रह जाती हैं | ये प्रभाव समस्त जीवों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है | जिससे स्वास्थ्य बनता बिगड़ता रहता है | औषधियों के गुणधर्म में परिवर्तन हो जाने के कारण उन औषधियों के सेवन से रोग मुक्ति नहीं मिल पाती है | इसीलिए रोग बढ़ता जाता है | इसी अवस्था को महामारी मान लिया जाता है |
कुल मिलाकर समय संचार में होने वाले आकस्मिक परिवर्तन प्राकृतिक आपदाओं तथा महामारियों की दृष्टि से ये बहुत बड़ी घटना होती है ,क्योंकि समय अकेले कभी नहीं बदलता है समय के साथ संपूर्ण ब्रह्माण्ड प्रकृति के बदलता है | इससे प्रकृति के प्रत्येक अंश में उस प्रकार के परिवर्तन होने लगते हैं | हवाओं के स्वाद और प्रभाव में अंतर आता है | मौसम में उस प्रकार के अचानक परिवर्तन होने लगते हैं |इस प्रकार के परिवर्तन अचानक होने से मनुष्य समेत सभी जीव जंतुओं में बेचैनी बढ़ने लगती है | इस बेचैनी को मनुष्य अच्छी जगह जाकर अच्छा खाकर अच्छे लोगों से मिलकर चिकित्सा आदि का लाभ लेकर कुछ कम कर लेता है ,जबकि पशु पक्षियों के पास ये सब विकल्प नहीं होते हैं | इसलिए वे उन्मादित होकर उपद्रव करने लगते हैं |
इस प्रकार के परिवर्तन जब ज्यादा बड़े स्तर पर होने लगते हैं तो खाने पीने की वस्तुओं के स्वाद गुण धर्म आदि में अधिक बदलाव होने लगते हैं | ऐसे सभीपरिवर्तन जो हमेंशा होते दिखाई नहीं देते हैं | यदि वे होने लगते हैं तो उनके उस प्रकार के प्रभाव भी होंगे | ऐसा भरोसा किया जाना चाहिए | उस प्रभाव से जो घटनाएँ घटित होनी चाहिए वे भी घटित होंगी | समुद्र में लहरें आती हैं तो केवल समुद्र का पानी ही नहीं हिलता है | उसमें तैर रही नावें भी हिलती हैं | नावों में बैठे लोग भी हिलते हैं | ऐसे ही हवाएँ दिखाई भले न पड़ती हों किंतु उन हवाओं में उड़ने वाली वस्तुएँ देखकर हवाओं के उड़ने का अंदाजा लगा लिया जाता है |
इसी प्रकार से समय संचार में हो रहे परिवर्तन दिखाई भले न पड़ते हों किंतु संसार में हो रहे परिवर्तनों को देखकर समय में हो रहे परिवर्तनों के बिषय में अंदाजा लगाया जाता है |
समय संबंधी ऐसे परिवर्तनों को समझने के लिए ट्रेनों की समयसारिणी खोजनी पड़ेगी | उसके आधार पर यह खोजना होगा कि कौन ट्रेन किस महीने की किस तारीख को किस रूट से जाएगी उसके स्टॉपेज कहाँ कहाँ होंगे | समयसारिणी के आधार पर ये महीनों पहले घर बैठे ट्रेनों को देखे बिना भी पता लगाया जा सकता है |
जलवायुपरिवर्तन पद्धति से ट्रेनों के परिचालन को समझना
इसप्रकार से भी देखा जा सकता है जैसे कौन ट्रेन कहाँ कब जाएगी | इसके लिए ट्रेन के आने जाने के रूट एवं समय को प्रतिदिन देखते देखते यह अनुभव किया जाए कि कौन ट्रेन किस रूट से किस समय आती जाती है और कहाँ कहाँ रुकती है | इसके आधार पर यह मानकर भविष्य के बिषय में अनुमान लगाया जाता है कि ये ट्रेनें भविष्य में भी इसी समय इसी रूट से इसी प्रकार आती जाती रहेंगी | भ्रमवश ऐसा समझकर इसी के आधार पर ट्रेनों के आवागमन के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाने लगे | ये कुछ दिनों तक सही होते देखकर इसी को ट्रेन विज्ञान मान लिया जाए | इसी के आधार पर ट्रेनों के आवागमन से संबंधित अनुसंधान करने के लिए एवं ट्रेनों को दूर से देखने के लिए दूरबीनों उपग्रहों रडारों को लगा लिया जाए और उनकी संख्या बढ़ाते रही जाए | उससे प्राप्त दृश्यों को सुपर कंप्यूटरों में डालकर डेटा विश्लेषण करवाया जाए | उसके आधार पर जितनी दूर तक की ट्रेनों का परिचालन देखा जा सके वहाँ तक के बिषय में अंदाजा लगा लिया जाने लगे |
इसमें उपग्रह रडार आदि तो ट्रेनों को दूर से देखने में मदद कर सकते है और सुपरकंप्यूटर उसका हिसाब किताब लगाने में मदद कर सकते हैं | बिचार करने की बात यह है कि हिसाब किताब लगाने के लिए वह गणित विज्ञान तो सुपरकंप्यूटर में भरना पड़ेगा | जिसके आधार पर वह हिसाब किताब लगा सके | कल्पना की जिए यदि वह गणित विज्ञान ही न हो तो ऐसा किया जाना कैसे संभव हो पाएगा | ये उसी तरह की बात होगी जैसे तेल निकालने के लिए बहुत महँगा कोल्हू खरीद कर रख लिया जाए किंतु उसमें क्या पेरने से तेल निकलेगा यह पता न हो | इसलिए सरसों की जगह बालू को डालकर तेल निकालने का प्रयास किया जा रहा हो | तेल न निकलने पर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए कोल्हू बहुत महँगा है | इसलिए भरोसा रखो कि तेल निकलेगा ही यह समझाया जा रहा हो |
विज्ञान के नाम पर यह सब करने से समाज का भला कैसे किया जा सकता है | कोरोना महामारी से जनधन का सबसे बड़ा नुक्सान होने का यही कारण है कि महामारी पैदा होने या उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने के लिए जिन मौसम संबंधी घटनाओं वायु प्रदूषण एवं तापमान आदि को जिम्मेदार ठहराया भी गया उसको समझने उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान ही नहीं था | इसलिए उसे नहीं लगाया जा सका | यदि महामारी पैदा होने और संक्रमण बढ़ने के लिए वही कारण जिम्मेदार थे तो उन्हें समझे बिना एवं उनके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाए बिना महामारी को कैसे समझा जा सकता था और उसके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जानाकैसे संभव हो सकता है |
इस आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान तब तक सही निकलते हैं | जब तक ट्रेनों का आवागमन इसी प्रकार से चलता रहता है किंतु कुछ ट्रेनों का सप्ताह के कुछ दिनों में किसी दूसरे रूट से जाना नियमावली में सम्मिलित होता है | इसलिए उन दिनों में वे दूसरे रूट से जाती हैं | जिस इन ऐसा होता है उस दिन पूर्वानुमान लगाने वालों से पूछा जाता है कि आज ऐसा क्यों हुआ | आपकी बात क्यों गलत हो गई | सच्चाई तो यह है कि उन्हें ट्रेन की यह परिवर्तित नियमावली पता नहीं होती है | उनका अंदाजा इसलिए गलत हुआ होता है ,लेकिन यह स्वीकार करने के बजाए वे लोगों का ध्यान यह कहकर भटका देते हैं कि यह गलती ट्रेन परिचालन प्रक्रिया की है | इसीलिए ट्रेन भटककर दूसरे रूट पर चली गई है | दूसरी बात यह भटकाव अचानक हुआ है ऐसा सिद्ध करने का प्रयास करते हैं | इसी के साथ समाज को यह कहकर भटकाने एवं भविष्य के लिए डराने का प्रयत्न करते हैं कि यदि इस भटकाव को समय रहते रोका न गयाऔर भविष्य में भी यदि यही होता रहा तब तो कोई भी ट्रेन कभी भी किसी दूसरे तीसरे रूट पर भटककर जा सकती है | इससे लोगों के अपने गंतव्य पर न पहुँचकर दूसरे तीसरे शहरों में पहुँच जाने का बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा | इसलिए जो लोग चाहते हैं कि वे ऐसे भटकाव के शिकार न हों तो उन्हें ट्रेनों का सहारा छोड़कर पैदल चलना शुरू कर देना चाहिए |
अपने को ज्ञानी सिद्ध इसके लिए ट्रेन की परिचालन प्रक्रिया को ही अपनी गलती स्वीकार करने के बजाए
ट्रेनें
उसका समय क्या होता है
संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण में उसीप्रकार का बदलाव करने लगते हैं | जिससे विभिन्नप्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ रोग महारोग (महामारियाँ ) आदि पैदा होने लगते हैं | ऐसे समय के प्रभाव से संसार का प्रत्येक द्रव्य प्रभावित होता है |
रोग महारोग जैसी घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं |
प्रकृति में विद्यमान कुछ दूसरे जड़ चेतन तत्त्व वायु से प्रेरित होकर उस प्रकार की भूमिका का निर्वाह कर रहे होते हैं | उन जड़ चेतन तत्वों को वायु के सहयोग से वैसा बनना पड़ता है | परिवर्तनशील वायु समय का अनुगमन करती रहती है |इसीलिए उसकी भी गतियाँ मार्ग आदि बदला करते हैं | जब जैसा समय तब तैसी वायु !ग्रीष्मऋतु का समय आने पर चलने वाली पश्चिमी उष्ण हवाएँ हेमंत ऋतु के समय उत्तर की ओर से बहने लगती हैं | उस घटना के घटित होने में वह भूमिका निभा रहे होते हैं |
जिस प्रकार से नदी की धारा में बहते जा रहा कोई फूल पत्ता आदि कब कहाँ पहुँचेगा |यह पता लगाने के लिए जलधारा की गति को समझना होगा | उसी के आधार पर यह पता लग जाएगा कि उसमें बहते जा रहे फूल पत्ते आदि कब कहाँ पहुँच सकते हैं |इसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान वर्षा बाढ़ बज्रपात आँधी तूफ़ान एवं महामारी जैसी घटनाएँ समय की धारा में बहती जा रही हैं| समय के संचार को समझ लिया जाएगा तो ऐसी घटनाओं के बिषय में स्वतः समझ में आ जाएगा कि कब किस प्रकार की घटना घटित होने वाली है |
सभी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का कारण हवाएँ होती हैं | हवाओं का प्रवाह समय के आधीन होता है | समय साक्षाद् ईश्वर का स्वरूप है | 'कालःसाक्षाद् ईश्वरः | इस नियम से संपूर्ण घटनाएँ ईश्वर अर्थात समय से प्रेरित होती हैं | इसलिए यदि घटनाओं को समझना है तो समय के संचार को समझना होगा | समय के बिषय में यदि सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव हो जाएगा तो समय के साथ घटित होने वाली सभी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में स्वतः ही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगता चला जाएगा |
समय के संचार को कैसे समझा जाए इसके लिए कहा गया है कि 'कालज्ञानं ग्रहाधीनम्' अर्थात समय को समझना है तो ग्रह संचार को समझना होगा | ग्रह संचार के आधार पर ही सभी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | जिस प्रकार से घड़ी देखकर समय का पता लग जाता है | उसी प्रकार से ग्रहसंचार के आधार पर ये पता लगा लिया जाता है कि भविष्य में कब कैसा समय आएगा | जब जैसा समय आएगा तब तैसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगेंगी |
समय संचार को कैसे समझा जाए | इसके लिए कहा जाता है कि प्रकृति की भाषा गणित है | प्रकृति को समझने के लिए गणित का सहारा लेना पड़ेगा | गणित के आधार पर ग्रहों का संचार समझने की अपने यहाँ अत्यंत प्राचीन पंचांग पद्धति है | जिसके आधार पर सैकड़ों वर्ष पहले के ग्रहों का पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |इसी के आधार पर हजारों वर्षों के सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | जिस प्रकार से ग्रहण प्राकृतिक घटना है | उसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान वर्षा एवं महामारी आदि भी तो उसी प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ ही हैं | इन्हें भी ग्रह संचार की गणितीय पद्धति के आधार पर समझना होगा | इनके बिषय में भी गणित के माध्यम से सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है |
दो शब्द
महामारी के मानवों से हुए युद्ध में क्या बिना हथियारों के ही लड़ते रहे वैज्ञानिक !
पूर्वानुमान लगाने की परोक्ष पद्धति
मौसम एवं महामारी जैसी घटनाओं के कारण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ते हैं | ऐसे कारणों को खोजने के लिए प्रत्यक्ष और पदार्थ विज्ञान से ऊपर उठकर परोक्षविज्ञान संबंधी रहस्यों को समझना होता है | जिससे किसी व्यक्ति या परिस्थिति पर परोक्ष प्रभाव का अध्ययन करना होता है | जहाँ ये तय होता है कि प्राकृतिक जगत में भविष्य में क्या क्या घटित होने वाला है | कब किस प्रकार की महामारी या प्राकृतिकआपदा आने वाली है | उस महामारी तथा प्राकृतिकआपदा के समय प्रकृति से लेकर जीवन तक में कब कब किस किस प्रकार के परिवर्तन होने हैं |
जीवन को इसलिए देखना आवश्यक होता है क्योंकि अनुसंधानों का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों में जीवन को सुरक्षित करना होता है |प्रकृति और जीवन दोनों को समझना इसलिए आवश्यक होता है , मनुष्यों की मृत्यु प्राकृतिक आपदाओं महामारियों से तो होती ही है | इनके बिना भी व्यक्तिगत कारणों से उनकी मृत्यु होते देखी जाती है | इसलिए हर किसी की मृत्यु के लिए प्राकृतिकआपदाओं महामारियों आदि को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है | व्यक्तिगत कारण भी मनुष्यों की सुरक्षा में अत्यंत प्रबल भूमिका का निर्वाह करते हैं | इसी प्रभाव के कारण कई बार अत्यंत भीषण प्राकृतिक आपदाओं महामारियों दुर्घटनाओं से भी कुछ लोगों को जीवित बच निकलते देखा जाता है | जिनमें उनके बचने की संभावना बिल्कुल नहीं होती है |
इसलिए अनुसंधानों के द्वारा पहले तो प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाना चाहिए
| इसके बाद यह खोजा जाना चाहिए कि इस महामारी या प्राकृतिक आपदा में कितने प्रतिशत लोगों को संक्रमित होना है उसमें से कितने प्रतिशत लोगों की मृत्यु होनी है | किसे जीवित रहना है किसे नहीं और किसे संक्रमित होना है किसे नहीं | चिकित्सा के द्वारा किसे स्वस्थ किया जा सकता है किसे नहीं | उस संकट से किस मनुष्यों को कितना प्रभावित होना है | ये सब पता करके रखना होता है |
प्रत्यक्ष विज्ञान के द्वारा केवल चिकित्सा की जा सकती है | वो स्वस्थ होगा या नहीं | प्रायः ये पता लगाया जाना संभव नहीं है | यदि यह जानना संभव ही होता तो चिकित्सालयों में शवगृह बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती | ऐसे ही किस दुर्घटना में किसे चोट लगनी है किसे नहीं | किसे बचना है किसे नहीं ! कब किस प्रकार की प्राकृतिक आपदा या महामारी आनी है कब नहीं | ये पता किया जाना प्रत्यक्ष विज्ञान से संभव नहीं है | इसके लिए ही प्राचीनकाल में परोक्ष विज्ञान का सहारा लिया जाता था | मौसमसंबंधी घटनाओं प्राकृतिकआपदाओं महामारियों के बिषय में उसी के आधार पर सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाता है |
ऐसी स्थिति में प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के लिए जिम्मेदार परोक्ष कारण खोजने पड़ते हैं | इसीलिए इसके आगे के बिषय में प्रत्यक्ष के आधार पर जो अनुमान पूर्वानुमान लगाए जाते हैं | उनके गलत निकलने का कारण जलवायु परिवर्तन या महामारी का स्वरूप परिवर्तन न होने के बाद भी ऐसे कारण इसलिए बोल दिए जाते हैं, क्योंकि ये तर्कसंगत विज्ञान के आधार पर प्रमाणित करने नहीं पड़ते हैं |
पूर्वानुमानों के आधार पर होना चाहिए अनुसंधानों का परीक्षण
सही पूर्वानुमानों के अभाव में होते हैं भ्रम !
प्राकृतिक कारणों से पैदा हुए रोग प्राकृतिक प्रक्रिया से ही शांत होते हैं | मनुष्यों का योगदान न तो ऐसे रोगों के पैदा होने में होता है और न ही ऐसे रोगों से मुक्ति दिलाने में होता है | ऐसे रोग अपने आपसे पैदा होते हैं और अपने आपसे ही शांत होते हैं से इनसे होने वाली वेदना एवं रोग बढ़ने की प्रक्रिया कम करने में मनुष्य कृत प्रयासों का कुछ प्रभाव पड़ता हो तो कह नहीं सकते हैं | ये स्पष्ट रूप से कहा जाना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि जिन लोगों ने महामारी संबंधी संक्रमण कम करने के लिए जितने भी प्रयास किए थे | उनके परिणाम किस प्रकार दिखाई देंगे | इस बिषय में विश्वासपूर्वक वे भी कुछ कह नहीं सके थे | यदि कुछ कहा भी था तो वो सच नहीं निकला |
प्लाज्मा थैरेपी के बिषय में जो कहा गया था वो सही नहीं निकला | रेमडीसिविर के बिषय में भी यही हुआ | वैक्सीन लगाई गई |उसका किस प्रकार का प्रभाव कितने दिनों में दिखाई देगा | इसकी दोनों डोज लगवाने के बाद महामारी से संक्रमित नहीं होंगे या संक्रमितों को लगाने से उनकी रिकवरी जल्दी हो जाएगी | ऐसा कोई न तो आश्वासन दिया जा सका और न ऐसा कुछ प्रभाव ही अलग से दिखाई दिया | जिन्होंने वैक्सीन लगवाई हो और जिन्होंने नहीं लगवाई उन दोनों में क्या अंतर था | ऐसा कुछ भी अनुभव नहीं किया गया और न ही ऐसे कोई दावे किए गए न ही भविष्य के लिए ऐसा कुछ विश्वास पूर्वक ही कहा जा पा रहा है | कोई यदि ऐसा कहना चाहे कि महामारी के शांत होने को वैक्सीन का प्रभाव मान लिया जाए तो इस बात पर भी भरोसा किया जाना भी इसलिए संभव नहीं है ,क्योंकि जिन्होंने वैक्सीन की एक डोज भी नहीं लगवाई थी | वे भी उसी प्रकार से उतने ही दिनों में स्वस्थ हुए जितने दिनों में वैक्सीन लगाने वाले लोग स्वस्थ हुए | जिन देशों में वैक्सीन का अभाव था या वैक्सीन देर से पहुँची | वे भी सभी के साथ ही महामारी से मुक्त होते देखे गए | ऐसे भी बहुत लोग थे | जिन्होंने वैक्सीन भी नहीं लगवाई और संक्रमित भी नहीं हुए |
प्राचीनविज्ञान के आधार पर रिसर्च करने पर वैक्सीन विधा के बिषय में एक सच्चाई और सामने आई कि कोरोना महामारी की तरह ही वैक्सीन का प्रभाव कभी अलग से अनुभव नहीं किया जा सकता | इतना अवश्य हुआ कि प्राकृतिकरोगों से राहत दिलाने के लिए जो वैक्सीनें लगाई गईं | वे तब तक लगाई जाती रहीं जब तक वो रोग समाप्त नहीं हुआ जब वो रोग समाप्त हुआ चूँकि उस समय वैक्सीन लगाई जा रही थी | इसलिए रोग समाप्त होने को वैक्सीन का ही प्रभाव मान लिया गया किंतु ऐसा करने से पहले इस बात पर भी बिचार किया जाना चाहिए था कि जिन लोगों ने वैक्सीन नहीं लगवाई या जिन देशों में वैक्सीन नहीं लगाई गई रोग मुक्ति तो उन्हें भी उसी समय मिली थी | इस प्रक्रिया के परीक्षण के लिए और कोई प्रक्रिया भी नहीं थी |
प्राचीन विज्ञान में ऐसी घटनाओं का अध्ययन समय के आधार पर किया जाता रहा है | जिसमें ये देखा जाता है कि महामारी के पैदा और समाप्त होने का समय क्या है | ऐसे ही महामारी की किस लहर के आने जाने का समय क्या है | ये पहले ही पता लगा लिया जाता है | किसी लहर को जिस तारीख को आना था और जिस तारीख को समाप्त होना था | यदि वो लहर उसी समय प्रारंभ और उसी समय समाप्त हुई है | इसका मतलब उस लहर के पैदा होने में कोविड नियमों के पालन न करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है | वो अपने आप से ही पैदा हुई है |
इसीप्रकार से पूर्वानुमान में जिस लहर को जब शांत होना था यदि वो अपने समय पर ही शांत हुई है तो उसमें कोविड नियमों के पालन करने करवाने जैसे मनुष्यकृत प्रयत्नों का कोई योग दान नहीं रहा है | आपको याद होगा कि सन 2020 के 13 नवंबर को पहली लहर शांत होगी | ऐसा मैंने पहले लिखकर 16 जून 2020 को ही पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | वो लहर अपने समय और उसी तारीख के आसपास ही शांत हुई है जबकि उस समय वायु प्रदूषण बहुत बढ़ा था | इसी समय बिहार और बंगाल की चुनावी रैलियों में भारीभीड़ उमड़ रही थी | इस कारण उस समय कोविड नियमों का पालन बिल्कुल नहीं किया जा रहा था फिर भी महामारी दिनों दिन शांत होती जा रही थी | इससे ये प्रमाणित हो जाता है कि महामारी संबंधी संक्रमण के बढ़ने में वायु प्रदूषण बढ़ने का या कोविड नियमों के पालन न करने का कोई योगदान नहीं था | ऐसे ही महामारी संबंधी संक्रमण के कम होने में कोविड नियमों के पालन न करने एवं वायु प्रदूषण कम होने का कोई योगदान नहीं था |
महामारी को समझना है
तो पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोजना होगा !
महामारियों के बिषय में अनुसंधान करने का उद्देश्य यही होता है कि अधिक से अधिक लोगों को संक्रमित होने से बचाया जाए एवं संक्रमितों को संक्रमण मुक्त किया जा सके | वर्तमानसमय में जिसे महामारीविज्ञान माना जा रहा है |उसमें विज्ञान कहाँ है और अनुसंधान कहाँ हैं | ऐसे अनुसंधान महामारियों से समाज को सुरक्षित बचाने में कैसे सहायक हो सकते हैं | कोरोना महामारी से समाज को सुरक्षित बचाने में उन अनुसंधानों से ऐसी क्या मदद मिली | यदि वे न किए जा रहे होते तो महामारी में इससे अधिक और क्या क्या नुक्सान हो सकता था | उन अनुसंधानों के होने से समाज का कितना बचाव हो गया | क्या ये तथ्यों के साथ कहा जा सकता है |
महामारियों के बिषय में अनुसंधान करने के विज्ञान कहाँ है |जिसे विज्ञान कहा जा रहा है उसके आधार पर अनुसंधान कैसे किए जा सकते हैं और ऐसे अनुसंधान महामारी पीड़ित समाज को सुरक्षित बचाने में कैसे मदद कर सकते हैं उनमें ऐसा है क्या ?ऐसे अनुसंधानों में विज्ञान कहाँ है ?अनुसंधान कहाँ हैं | उससे मदद क्या मिलती है | कोरोना महामारी में वे कितने सहायक सिद्ध हुए | ये कैसे पता लगे |
महामारी को समय विज्ञान की दृष्टि से देखे जाने पर जो सच्चाई सामने आती है | उससे ऐसा लगता है कि अनुसंधानों के नाम पर अभी जो जो कुछ किया जा रहा है | वो सब कुछ यदि इसी प्रकार से भविष्य में भी किया जाता रहा तो ऐसे अनुसंधानों से भविष्य के लाखों वर्षों तक महामारीपीड़ित समाज को कोई मदद मिल सकेगी | इसकी आशा कैसे की जा सकती है |
परोक्ष विज्ञान के बिना दंडित हो रहा समाज
परोक्षविज्ञान का सहारा लिए बिना यह कैसे कहा जा सकता है कि महामारी पैदा होने का कारण क्या है | इसके बिना महामारी पैदा होने के बिषय में तरह तरह की किस्से कहानियाँ गढ़ी जाती हैं | महामारी समाप्त होने का पूर्वानुमान न पता होने के कारण उसके समाप्त होने के लिए तरह तरह के फर्जी कारणों की कल्पना कर ली जाती है |
अनुसंधानों की इस कमजोरी के लिए उसी जनता को दंडित किया जाने लगता है जिससे टैक्स रूप में वसूला हुआ धन सरकारें ऐसे अनुसंधानों और अनुसंधान कर्ताओं पर खर्च किया करती हैं |
इसका परिणाम यह होता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने पर जनता एक ओर आपदा से जूझ रही होती है तो दूसरी ओर अनुसंधानों के नाम पर वैज्ञानिकों के द्वारा बताए जा रहे गलत कारणों पर भरोसा करके सरकारें समाज को दंडित करने लगती हैं | अनुसंधानकर्ताओं की गलती का दंड समाज को भुगतना पड़ता है |
वैज्ञानिकों ने कहा कि कोरोना संक्रमण बढ़ने का कारण वायु प्रदूषण बढ़ना होता है | वैज्ञानिक जो कह रहें हैं वो सही है या नहीं है | जिस बिषय का विज्ञान ही नहीं है | उसके वैज्ञानिक कैसे बन सकते हैं | क्या पढ़ कर बन सकते हैं इसका बिचार किए बिना ही सरकारें उन कामों को बंद कराने निकल पड़ती हैं जिनसे धुआँ धूल आदि फैलती है | पराली जलाने वाले किसानों ,धुआँ फेंकने वाले वाहनों ,उद्योगों,ईंट भट्ठों आदि पर जुर्माना आदि लगाकर दण्डित किया जाने लगता है | बाद में पता लगा कि महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने पर वायुप्रदूषण का प्रभाव पड़ता ही नहीं है | यदि पड़ता होता तो अक्टूबर नवंबर 2020 में जब जब वायु प्रदूषण बहुत बढ़ा हुआ था उस समय कोरोना संक्रमितों की संख्या दिनोंदिन घटती न जा रही होती | ऐसी स्थिति में यह निश्चित हो जाता है कि वायु प्रदूषण बढ़ने से कोरोना संक्रमण बढ़ता है यह कहानी जिन विशेषज्ञों ने गढ़ी होगी | ये उनकी अयोग्यता सिद्ध करती है | ऐसे लोगों की अफवाहूँ पर भरोसा करके सरकारों ने पराली जलाने वाले किसानों ,धुआँ फेंकने वाले वाहनों ,उद्योगों,ईंट भट्ठों आदि पर जुर्माना आदि लगाकर अकारण ही उनका उत्पीड़न क्यों किया ?
इसी प्रकार से कोरोना संक्रमण बढ़ने के लिए वैज्ञानिकों के कहने पर कोविड नियमों का पालन न करने वालों को जिम्मेदार मानकर उन्हें दंडित किया जाने लगा | उन पर जुर्माना लगाया जाने लगा | बाद में देखा गया कि दिल्ली में आंदोलनरत किसानों एवं हरिद्वार कुंभ मेला में सम्मिलित साधू संतों एवं आम लोगों को संक्रमण नहीं हुआ | 2020 के अक्टूबर नवंबर में बिहार बंगाल में चुनावी रैलियाँ हो रही थीं | दिल्ली मुंबई से श्रमिकों का पलायन हुआ जहाँ कोविड नियमों का पालन किया जाना बिल्कुल संभव न था ,फिर भी कोरोना संक्रमण बिल्कुल नहीं बढ़ा | इससे ये सिद्ध होता है कि कोरोना नियमों के पालन न करने से कोरोनासंक्रमण बिल्कुल नहीं बढ़ा | इसका मतलब कोविड नियमों का पालन न करने वालों से जुर्माना गलत वसूला गया | ये सलाह वैज्ञानिकों ने दी थी इसका पालन सरकारें करवा रही थीं | यह शोषण सह जनता रही थी | जो ऐसे वैज्ञानिकों अनुसंधानों एवं सरकारों को टैक्स रूप में अपने खून पसीने की कमाई टैक्सरूप में देती है | इस प्रकार से जनता जिनकी सुख सुविधाओं के लिए टैक्स रूप में धन देती है | उन्हें के ऊटपटांग वक्तव्यों के कारण वही जनता दण्डित की जाती है |
कुल मिलाकर महामारी आने और जाने के बिषय में पहले से पूर्वानुमान लगा लिया जाए | महामारी आने और जाने के बिषय में जो समय पहले से पता लगा है महामारी यदि उसी समय पर आती जाती है तो महामारी के आने में किसी लैब से लीक वायरस का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है ये तो प्राकृतिक रूप से पैदा हुई है | इसी प्रकार से पूर्वानुमानों में महामारी के समाप्त होने का जो समय पूर्वानुमान में पता लगा है | यदि महामारी उन्हीं तारीखों में समाप्त होती है तो उसके समाप्त होने में मनुष्यकृत किसी वैक्सीन आदि प्रयत्न का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है |
वायरस के किसी लैब से लीक होने की बात यदि कोई कहे भी तो उसे इस तरह समझा जाना चाहिए कि वायरस तो किसी माचिस की जलती हुई तीली की तरह होता है | माचिस की तीली कहीं जलाकर फेंक देने मात्र से वहाँ आग नहीं लग जाती है |आग लगने के लिए वहाँ ज्वलनशील ईंधन भी चाहिए होता है |जिसमें लगकर आग बड़ा रूप ले लेती है | तीली जलाकर कहीं फेंक भी दी जाए तो भी वहाँ यदि ज्वलनशील ईंधन नहीं होगा तो वहाँ आग जलेगी ही नहीं | इसलिए बिना ईंधन के तो आग स्वतः शांत हो जाएगी |ऐसी स्थिति में कोरोना संक्रमण किसी लैब से लीक हुआ होगा यदि यह मान भी लिया जाए तो उसका प्रसार माध्यम क्या था | इसका भी पता लगाना होगा | किस प्रकार के लोग उस संक्रमण से संक्रमित हुए यह भी पता लगाना होगा |
विज्ञान के बिना कैसे हो सकते हैं अनुसंधान
मनुष्यकृत प्रयासों प्राकृतिक कारणों की पहचान प्रभाव आदि पता न होने के कारण प्राकृतिक प्रक्रिया से पैदा और समाप्त होने वाले रोगों महारोगों के लिए भी मनुष्यकृत कारणों को जिम्मेदार मान लिया जाता है |
जिस प्रकार से कोरोना महामारी के प्राकृतिक कारणों से पैदा होने पर भी उसके पैदा होने के लिए किसी लैब से लीक हुए वायरस को जिम्मेदार मान लिया गया | इसीप्रकार से महामारी जब प्राकृतिक रूप से शांत होने लगती है तो उसके शांत होने का कारण भी मनुष्यकृत उपायों को ही मान लिया जाता है |
संक्रमण बढ़ने के लिए मनुष्यों के ही कुछ आचरणों अर्थात कोविड नियमों का पालन न करने को जिम्मेदार मान लिया जाता है और संक्रमण कम होने का श्रेय कोविडनियमों के पालन को दे लिया जाता है जबकि प्राकृतिक रोगों महारोगों के पैदा और समाप्त होने या संक्रमण बढ़ने और घटने की संपूर्ण प्रक्रिया स्वचालित अर्थात प्राकृतिकरूप से घटित हो रही होती है | प्राचीन विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसी घटनाओं का निर्माण जिस उँचाई पर होता है | वहाँ मनुष्यों का मानसिक रूप से भी पहुँचना संभव नहीं हो पाता है |
प्राकृतिक प्रवाह को न समझने के कारण अनुसंधानों के नाम पर ऐसे ऐसे गलत तथ्य सच मानकर संग्रहीत करके इसलिए रख लिए जाते हैं कि भविष्य में ऐसी समस्याएँ आने पर ये अनुभव जन सुरक्षा में सहयोगी सिद्ध होंगे | उस प्रकार की समस्याएँ पैदा होने पर लोग इसलिए निश्चिंत बैठे रहते हैं कि इस समस्या से सुरक्षा तो हम कर ही लेंगे | हमारे पास तैयारियाँ तो हैं ही किंतु उस प्रकार की समस्या से लोग जब जूझने लगते हैं तब उन तैयारियों की आवश्यकता पड़ती है | उनका उपयोग जब किया जाता है तो वे अनुभव गलत निकल जाते हैं और तैयारियों के नाम पर जो जो कुछ संग्रह किया गया था | उसमें तैयारियों जैसा कुछ होता ही नहीं है | ऐसे समय अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए महामारी का स्वरूप परिवर्तन या मौसम के बिषय में जलवायु परिवर्तन जैसी अफवाहें उड़ा दी जाती हैं | प्लाज्मा थैरेपी के नाम पर भी तो ऐसा ही सब कुछ तो हुआ था |
प्राकृतिक कारणों से पैदा और समाप्त होते हैं रोग
प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न हुए रोग प्राकृतिक प्रक्रिया से ही शांत होते हैं |विशेष बात ये है कि कोई रोग जब शांत होने लगता है | उस समय जो व्यक्ति उपाय के नाम पर जो कुछ कर रहा होता है | उसे ही अपने स्वस्थ होने का कारण मान लेता है |
कई बार बिना किसी चिकित्सा के प्राकृतिक कारणों से भी रोगों से मुक्ति मिलते देखी जाती है | प्राकृतिक कारणों से रोगों के शांत होने का श्रेय भी विभिन्न प्रकार की औषधियों उपायों चिकित्सकीय पद्धतियों जादू टोनों या धर्म कर्म आदि को दे दिया जाता है |जिनकी उस प्रकरण में कोई भूमिका ही नहीं रही होती है |
इसमें विशेष बात ये है कि उस समय जो रोगी रोगों से मुक्ति पाने के लिए जिस प्रकार के उपाय अपना रहा होता है वो उसी को अपने स्वस्थ होने का कारण मान लेता है | यह भ्रम आम लोगों में ही नहीं है प्रत्युत इस प्रकार के भ्रम का शिकार होते बड़े बड़े विश्व वैज्ञानिकों को होते देखा जाता है |ऐसे भ्रम चिकित्सकों को भी होते देखे जाते हैं | चिकित्सक लोग तो बहुत लोगों की चिकित्सा कर रहे होते हैं | वे यदि इस प्रकार के गलत अनुभवों का संग्रह कर लेते हैं तो वे भविष्य के लिए चिंता पैदा करने वाले होते हैं | उन्होंने रोगियों पर जिन जिन औषधियों का प्रयोग किया होता है |वे उन्हें उस रोग से मुक्ति दिलाने वाली औषधि मान लेते हैं | ऐसे ही कुछ दूसरे चिकित्सकों ने कुछ दूसरी औषधियों का प्रयोग कुछ दूसरे रोगियों पर किया होता है | उनके अनुभव में उस प्रकार की औषधियाँ उन रोगों से मुक्ति दिलाने वाली लगती हैं |
इसी प्रकार से कुछ रोगी ऐसे समय जादू टोनों या धर्म कर्म आदि उपायों को अपनाते समय स्वस्थ हुए होते हैं | उनके अनुभव में उस प्रकार के उपाय उन रोगों से मुक्ति दिलाने वाले होते हैं |
बिचार करके देखा जाए तो ऐसे सभी उपायों में पर्याप्त अंतर होता है |जिनका आपस में एक दूसरे से कोई संबंध नहीं होता है , लेकिन उपायों को करने और करवाने वाले दोनों का अनुभव यही होता है कि उनके स्वस्थ होने का कारण उनके द्वारा किए गए वही उपाय ही रहे हैं |
प्लाज्मा थैरेपी के प्रभाव के बिषय में जो भ्रम हुआ उसका कारण यही था |जिस समय प्लाज्मा थैरेपी प्रयोग किया गया उस समय संक्रमण दिनोंदिन कमजोर पड़ता जा रहा था | यह स्थिति संपूर्ण समाज की थी किंतु ध्यान केवल उन्हीं पर दिया गया जिनपर प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग किया जा रहा था | इस भ्रम पर से आवरण तब हटा जब दूसरी लहर आई अन्यथा इस भ्रम को भी रिसर्च से प्राप्त हुई दिव्य औषधि मान लिया जाता है |
इस प्रकार के भ्रम के निवारण का एक ही उपाय है कि किसी रोग या महारोग (महामारी) के पैदा एवं समाप्त होने एवं उसका वेग घटने एवं बढ़ने के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया विकसित कर ली जाए | इससे आगे से आगे यह पता लगाया जा सके कि कब किस प्रकार के रोगों के पैदा होने का समय आ रहा है |कब किस रोग का वेग घटने बढ़ने का समय है | रोग यदि अपने समय से पैदा और निर्द्धारित समय पर ही समाप्त होगा तो इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि रोग के पैदा होने या संक्रमण बढ़ने के लिए किसी निर्दोष व्यक्ति को यह मानकर दण्डित नहीं किया जाएगा कि कोविड नियमों का पालन न करने के कारण संक्रमण बढ़ा है |ऐसे ही संक्रमण घटने के बिषय में है |
किसी को रोगों से मुक्ति दिलाने में केवल चिकित्सा की ही भूमिका होती है |ऐसा इसलिए नहीं कहा जा सकता है ,क्योंकि चिकित्सा के बिना भी बहुत लोग रोगों से मुक्त होते देखे जाते हैं |सुदूर गाँवों में जंगलों में जहाँ चिकित्सा व्यवस्था आज भी नहीं है | वहाँ भी लोग रोगी होते हैं | वहाँ भी लोगों को चोट लगती है घाव हो जाते हैं | चिकित्सा के बिना भी उनके घाव ठीक हो जाते हैं और लोगों को रोगमुक्त होते देखा जाता है | इससे ये सिद्ध होता है कि रोगमुक्ति पाने के लिए चिकित्सा के अतिरिक्त भी प्राकृतिक विकल्प हो सकते हैं |
कोई रोगी दो प्रकार से रोगमुक्त होता है | एक तो चिकित्सकीय प्रयत्नों से और दूसरा प्राकृतिक रूप से रोग शांत होते हैं | विशेष बात ये है कि रोगी कोई न कोई औषधि तो लेते ही रहते हैं | इसलिए प्राकृतिक रूप से शांत हुए रोगों को भी उसी औषधि सेवन का परिणाम मान लेते हैं | रोगी के स्वस्थ होते समय जो औषधि ली जा रही होती है | उसके स्वस्थ होने का श्रेय उसी औषधि को मिल जाता है | भले उसके स्वस्थ होने में उस औषधि की कोई भूमिका हो या न भी हो | कई बार जो रोग समय प्रभाव से शांत होते हैं | समय दिखाई नहीं पड़ता है | इसलिए औषधि के प्रभाव से स्वस्थ होना मान लिया जाता है
महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाए जाने इसलिए आवश्यक होते हैं ,ताकि किसी औषधि या चिकित्सा के प्रभाव के बिषय में भ्रम न रहे |
जिस प्रकार से 6 मई 2020 के बाद समय प्रभाव से प्राकृतिक रूप से ही संक्रमण कम होने लगा था तो उसी समय का प्रभाव वैक्सीन संबंधी ट्रायलों पर भी पड़ने लगा | जिससे कई देशों ने भ्रमवश वैक्सीन संबंधी अपने ट्रायलों को सफल मान लिया था | ऐसे ही 6 मई 2020 के बाद सभी रोगी समय प्रभाव से स्वस्थ होने लगे तो प्लाज्माट्रायल जिन रोगियों पर हो रहा था | वे भी स्वस्थ होने लगे तो प्लाज्मा थैरेपी को सफल मान लिया गया | ऐसे ही महामारी जब समय प्रभाव से समाप्त होने लगी तो उसे वैक्सीन का प्रभाव मान लिया गया |
अनुसंधानों के नाम पर गलत कारणों के निर्धारण से समाज को मदद मिलने की जगह नुक्सान होने लगता है | महामारी से सुरक्षा के लिए बनाए गए कोविडनियम कितने प्रभावी थे |ये पता किए बिना ही कोविड नियमों का पालन न करने वालों को दंडित किया जाने लगा |
ऐसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने का वास्तविक कारण न पता लगा पाना अनुसंधान कर्ताओं की कमजोरी को दर्शाता है |उसके लिए दंडित पराली जलाने वाले किसानों को किया जाता है | उद्योगों एवं वाहनों के मालिकों को किया जाता है | निर्माणकार्य करने वाले लोगों को दंडित किया जाता है | ईंटभट्ठे वालों को दंडित किया जाता है | आखिर इनका दोष क्या होता है | इस बिषय में कोई अनुसंधान आधारित सच सामने नहीं लाया जा सका है फिर भी उन निर्दोष समाज सेवकों को दंडित किया जाता है | इसलिए समाज को अनुसंधानात्मक सहयोग की आवश्यकता है ,बाक़ी सारे कार्य समाज स्वयं कर लेगा |
अनुसंधानों का मतलब घटनाओं के वास्तविक कारणों तक पहुँचना होता है | उन कारणों के आधार पर घटनाओं को समझना होता है | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधान करने के लिए काल्पनिक किस्से कहानियाँ बहुत हैं किंतु विज्ञान नहीं है | अक्सर देखा जाता है कि जिस प्राकृतिक घटना के घटित होने के लिए जिस दूसरी प्राकृतिक घटना को कारण बताया जाता है |उस कारण के आधार पर उस घटना के बिषय में जब कोई अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते हैं वे गलत निकल जाते हैं ऐसा सभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में होते देखा जाता है |
किसी भी रोग से समाज को सुरक्षित बचाने के लिए या उस रोग से पीड़ित रोगी को रोगमुक्ति दिलाने के लिए उस रोग की पहचान की जानी सबसे पहले आवश्यक होती है |कोरोना महामारी की निश्चित पहचान पता ही नहीं है | कोरोना महामारी को जितना पहचाना गया | उसके आधार पर जो जो कुछ बताया गया और उसी के आधार पर महामारी बिषयक जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए गए | वे सब के सब गलत निकलते चले गए | इससे ये प्रमाणित होता है कि जो पता लगाया गया था वो सही नहीं था |यदि वो सही होता तो उसके आधार पर लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि भी सही निकलते | उसके गलत निकलने का मतलब है कि महामारी संबंधी अनुसंधानों के द्वारा महामारी को समझा जाना संभव ही नहीं है |
ऐसा कोई प्रमाणित विज्ञान नहीं है | जिसके आधार पर महामारी समेत समस्त प्राकृतिक घटनाओं को समझा जा सके | ऐसी परिस्थिति में प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारी आदि के बिषय में जितनी भी आधार विहीन कल्पनाएँ कर ली जाती है | वे गलत होती हैं | जिसके लिए दोषी तो वे स्वयं होते हैं किंतु वे अपना दोष उन घटनाओं पर ही मढ़ देते हैं | मौसम संबंधी अनुमान पूर्वानुमान गलत निकले तो यह कहने के बजाए कि हम पूर्वानुमान लगाने में सक्षम नहीं हैं | दोषी जलवायु परिवर्तन को बता दिया जाता है | ऐसे ही महामारी के बिषय में विशेषज्ञों के द्वारा की गई भविष्यवाणियों के गलत निकलने पर दोष महामारी के स्वरूप परिवर्तन का बताया जाता है |महामारी बिषयक विज्ञान के बिना महामारी से संबंधित जितनी भी कल्पनाएँ की गईं| वे गलत निकलती चली गईं | अपनी अनुसंधान संबंधी गलती स्वीकार करने के बजाए इसके लिए महामारी के स्वरूपपरिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा दिया गया था | ऐसे में प्रश्न उठता है कि महामारी का स्वरूप क्या था और उसमें परिवर्तन होकर क्या बन गया |
जिसप्रकार से कच्ची अंबी हरी खट्टी एवं उसकी गुठली नरम होती है | वही अंबी समय के साथ धीरे धीरे पकती चली जाती है | पीली मीठी एवं उसकी गुठली कठोर होते चली जाती है | एक ही अंबी अनेकों रूपों में क्रमशः परिवर्तित होते चली जाती है | ये कहीं ठहरती ही नहीं है | ऐसे क्रमिक परिवर्तनों स्वरूप परिवर्तन कैसे कहा जा सकता है | ये तो बचपन जवानी बुढ़ापे की तरह निरंतर आते जाते रहते हैं |
इसी प्रकार से महामारी के स्वरूप में जो परिवर्तन माने जा रहे थे | वे वास्तव में परिवर्तन थे या उसके प्राकृतिक परिवर्तन शील स्वरूप थे | जिन्हें उसके वास्तविक स्वरूप में पहचाना नहीं जा सका |
महामारी का स्वरूप क्या था !अंतर्गम्यता कितनी थी ! प्रसार माध्यम क्या था | विस्तार कितना था !इस पर तापमान बढ़ने घटने का प्रभाव पड़ता था या नहीं !वायुप्रदूषण बढ़ने घटने का प्रभाव पड़ता है या नहीं | ये मनुष्यकृत थी या प्राकृतिक ! मेरी जानकारी के अनुसार ऐसे प्रश्नों के उत्तर अनुसंधानों के द्वारा अभी तक खोजे नहीं जा सके हैं | जिन्हें खोजा जाना भविष्य के लिए बहुत आवश्यक है | इस जिम्मेदारी से मुख नहीं मोड़ा जा सकता है |
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